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तशरीह के साथ हदीसें

मैं औरतों से मुसाफ़हा नहीं करता। मेरा एक औरत से बात करना एक सौ औरतों से बात करने की तरह है।

عَنْ أُمَيْمَةَ بِنْتِ رُقَيْقَةَ رضي الله عنها أَنَّهَا قَالَتْ: أَتَيْتُ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي نِسْوَةٍ مِنَ الْأَنْصَارِ نُبَايِعُهُ، فَقُلْنَا: يَا رَسُولَ اللَّهِ، نُبَايِعُكَ عَلَى أَلَّا نُشْرِكَ بِاللَّهِ شَيْئًا، وَلَا نَسْرِقَ، وَلَا نَزْنِيَ، وَلَا نَأْتِيَ بِبُهْتَانٍ نَفْتَرِيهِ بَيْنَ أَيْدِينَا وَأَرْجُلِنَا، وَلَا نَعْصِيَكَ فِي مَعْرُوفٍ، قَالَ: «فِيمَا اسْتَطَعْتُنَّ، وَأَطَقْتُنَّ» قَالَتْ: قُلْنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَرْحَمُ بِنَا، هَلُمَّ نُبَايِعْكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنِّي لَا أُصَافِحُ النِّسَاءَ، إِنَّمَا قَوْلِي لِمِائَةِ امْرَأَةٍ كَقَوْلِي لِامْرَأَةٍ وَاحِدَةٍ، أَوْ مِثْلُ قَوْلِي لِامْرَأَةٍ وَاحِدَةٍ».
उमैमा बिन्त रुक़ैक़ा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : मैं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास कुछ अंसारी औरतों के साथ आपसे बैअत करने के लिए आई। हमने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! : हम आपसे इस बात पर बैअत करते हैं कि हम किसी चीज़ को अल्लाह का साझी नहीं बनाएँगे, चोरी नहीं करेंगे, व्यभिचार में लिप्त नहीं होंगे, कोई ऐसा आरोप नहीं लाएँगे जिसे हमने अपने हाथों एवं पैरों के आगे गढ़ लिया हों और किसी भले काम में अवज्ञा नहीं करेंगे। आपने कहा : "तुम अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार ये कार्य करना।", वह कहती हैं: हम ने कहा; अल्लाह और उसके रसूल हम पर ज़्यादा दया करने वाले हैं, ऐ अल्लाह के रसूल! आइए, हम आपसे बैअत करते हैं। यह सुन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मैं औरतों से मुसाफ़हा नहीं करता। मेरा एक औरत से बात करना एक सौ औरतों से बात करने की तरह है।"
इसे तिर्मिज़ी, नसई और इब्न-ए-माजह ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उमैमा बिन्त रुक़ैक़ा बयान करती हैं कि वह कुछ अंसारी औरतों के साथ अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आपसे इस बात पर बैअत करने के लिए पहुँची कि वह किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाएँगी, चोरी नहीं करेंगी, व्यभिचार नहीं करेंगी, कोई ऐसा आरोप नहीं लाएँगी जिसे उन्होंने अपने हाथों एवं पैरों के आगे गढ़ लिया हो और आप की किसी भले काम में अवज्ञा नहीं करेंगी। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : तुम अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार ये कार्य करना। हमने कहा : अल्लाह और उसका रसूल हमपर कहीं अधिक दया करने वाला है। ऐ अल्लाह के रसूल! आइए हम आपसे उसी तरह हाथ मिलाकर बैअत करते हैं, जिस तरह पुरुष किया करते हैं। तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मैं औरतों से मुसाफ़हा नहीं करता। मेरा सौ औरतों से बात करना और बैअत करना एक औरत से बात करने की तरह ही है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के औरतों से बैअत करने के तरीक़ा का विवरण।
  2. ग़ैर-महरम औरतों से मुसाफ़हा करना हराम है।
  3. शरई ज़िम्मेदारियों का पालन शक्ति एवं सामर्थ्य से जुड़ी हुआ है।
हवाला

سنن الترمذي (3/ 247) (1597). سنن النسائي (7/ 149) (4181). سنن ابن ماجه (4/ 128) (2874). ذخيرة العقبى في شرح المجتبى (32/ 263).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
स्त्री तथा पुरुष के बीच संबंध

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com