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तशरीह के साथ हदीसें

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी क़ौम से कभी भी उस समय तक युद्ध नहीं किया, जब तक कि उन्हें (इस्लाम की) दावत न दे दी हो।

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللهُ عَنْهُمَا قَالَ: مَا قَاتَلَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَوْمًا قَطُّ حَتَّى يَدْعُوَهُمْ.
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी क़ौम से कभी भी उस समय तक युद्ध नहीं किया, जब तक कि उन्हें (इस्लाम की) दावत न दे दी हो।
इसे अह़मद और बैहक़ी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने बताया है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम किसी क़ौम से उस समय तक युद्ध आरंभ नहीं करते थे, जब तक कि पहले उन्हें इस्लाम की ओर बुला न लेते। यदि वे आह्वान स्वीकार न करते, तो उनसे युद्ध करते थे।

फ़ायदे
  1. युद्ध से पहले इस्लाम का आह्वान शर्त है, यदि उन लोगों तक इस्लाम न पहुँचा हो।
  2. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को इस्लाम की ओर बुलाते थे। यदि वे इनकार कर देते, तो उनके सामने जिज़्या अदा करने का प्रस्ताव रखते। फिर यदि वे इससे भी इनकार कर देते, तो उनसे युद्ध करते थे, जैसा कि अन्य हदीसों में आया है।
  3. जिहाद का उद्देश्य लोगों का इस्लाम में दाख़िल होना है, न कि उनकी जान, उनके धन और उनकी भूमि का लालच करना।
हवाला

مسند أحمد (4/ 16) (2105). السنن الكبرى للبيهقي (9/ 181) (18232). تحفة الأحوذي (5/ 130).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
जिहाद के अहकाम तथा मसायल

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com