عن جابرٍ رضي الله عنه قال: قدِمنا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم ، ونحنُ نقولُ: لبيك بالحجِّ، فأمرَنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فجعلناها عُمرةً.
जाबिर- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ हज के लिए तल्बिया पुकारते हुए आए तो आपने हमें आदेश दिया और हमने उसे उमरा में बदल दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
जाबिर -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- बता रहे हैं कि सहाबा किराम अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ हज्जतुल वदा के अवसर पर आए, तो अधिकतर लोग हज का तलबिया पुकार रहे थे। यानी उन्होंने हज-ए-इफ़राद का इरादा किया था।
ऐसे में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने साथ में क़ुरबानी का जानवर न लाने वालों से कहा कि हज का इरादा बदलकर उमरा का इरादा कर लें, ताकि उमरा के बाद से लेकर हज तक हलाल रहकर लाभ उठाने का अवसर मिल जाए। चुनांचे लोगों ने ऐसा ही किया।
हवाला
عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ.
تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ.
تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ.
الإفهام في شرح عمدة الأحكام، للشيخ عبد العزيز بن عبد الله بن باز، تحقيق: سعيد بن علي بن وهف القحطاني، الطبعة الأولى، 1435 هـ
خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، تأليف: فيصل بن عبد العزيز آل مبارك، الطبعة الثانية، 1412 هـ
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، تأليف: إسماعيل الأنصاري، مطابع دار الفكر، الطبعة الأولى: 1381 هـ
صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ
صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُمَا: أَنَّ تَلْبِيَةَ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَبَّيْكَ اللهُمَّ، لَبَّيْكَ، لَبَّيْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ لَبَّيْكَ، إِنَّ الْحَمْدَ وَالنِّعْمَةَ لَكَ وَالْمُلْكَ لَا شَرِيكَ لَكَ» قَالَ: وَكَانَ عَبْدُ اللهِ بْنُ عُمَرَ رَضِيَ اللهُ عَنْهُمَا يَزِيدُ فِيهَا: لَبَّيْكَ لَبَّيْكَ، وَسَعْدَيْكَ، وَالْخَيْرُ بِيَدَيْكَ، لَبَّيْكَ وَالرَّغْبَاءُ إِلَيْكَ وَالْعَمَلُ.
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के तलबिया में यह शब्द हुआ करते थे: (ऐ अल्लाह! मैं उपस्थि हूँ। मैं उपस्थित हूँ। मैं उपस्थित हूँ, तेरा कोई साझी नहीं है, मैं उपस्थित हूँ, निस्संदेह हर प्रशंसा और नेमत तेरी है और तेरी ही बादशाहत है, तेरा कोई साझी नहीं है।) वर्णनकर्ता कहते हैं कि अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- इसमें इन शब्दों की वृद्धि कर लिया करते थे : (मैं उपस्थित हूँ। मैं उपस्थित हूँ। मेरा सौभाग्य है तेरे पास आना। भलाई तेरे ही हाथ में है। चाहत तेरी ही है और अमल भी तेरे ही लिए है।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब हज या उमरा में प्रवेश करना चाहते, तो यह तलबिया कहते : (मैं उपस्थित हूं ऐ अल्लाह, मैं पूर्णतः उपस्थित हूं) ऐ अल्लाह! मैं निष्ठा, एकेश्वरवाद एवं हज आदि के आह्वान पर अनिवार्य रूप से उपस्थित हूँ। (मैं उपस्थित हूं, तेरा कोई साझी नहीं, मैं उपस्थित हूं) क्योंकि तू ही अकेला इबादत का हक़दार है। तेरे पालनहार एवं पूज्य होने तथा तेरे नामों एवं गुणों में तेरा कोई साझी नहीं है। (निस्संदेह प्रशंसा), आभार एवं स्तुति तेरी ही है। (एवं नेमत) तेरी ही ओर से प्राप्त होती है और यह चीज़ें तू ही प्रदान करता है, और ये सब (तेरे ही लिए हैं।) इन सभी चीज़ों पर हर हाल में तेरा ही अधिकार है। (एवं बादशाहत) भी तेरी ही है। (तेरा कोई साझी नहीं है।) अतः यह सारी चीज़ें तेरे ही लिए हैं। अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- इसमें इन शब्दों की वृद्धि करते थे : (मैं उपस्थित हूं, और यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उपस्थित हूं।) मैं तेरे दरबार में उपस्थि हूँ। मुझे बार-बार यह सौभाग्य प्रदान कर। एवं सारी की सारी (भलाई तेरे हाथ में है।) और तेरे अनुग्रह से ही प्राप्त होती है। (मैं उपस्थित हूं, और मेरी समस्त आशाएँ और इच्छाएँ केवल तुझी से हैं।) माँगा उसी से जाता है, जिसके हाथ में भलाई होती है। (एवं सारे अमल) भी तेरे लिए हैं कि तू ही इबादत का हक़दार है।
फ़ायदे
- हज तथा उमरा में तलबिया पुकारना एक शरीयत सम्मत कार्य है। उसकी ताकीद इसलिए आई है कि यह हज तथा उमरा की ख़ास पहचान है, जिस तरह तकबीर नमाज़ की ख़ास पहचान है।
- इब्न-ए-मुनैयिर कहते हैं : तलबिया पुकारने की शिक्षा अल्लाह के अपनेबंदों का सम्मान करने की ओर इशारा करता है कि अल्लाह के जो बंदे उसके घर की ज़ियारत के लिए पहुँचते हैं, वो दरअसल अल्लाह के बुलाने पर पहुँचते हैं।
- बेहतर यह है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सिखाए हुए तलबिया ही को पुकारा जाए। लेकिन, कुछ वृद्धि कर लेने में कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसा होता हुआ देखकर ख़ामोशी बरती है। इब्न-ए-हजर कहते हैं : यही सबसे उत्तम तरीक़ा है। चुनांचे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित शब्दों को अलग से पढ़े। उसके बाद अगर किसी सहाबी से साबित शब्दों को पढ़ना चाहे या अपनी ओर से कुछ मुनासिब शब्दों को जोड़ना चाहे, तो उन्हें अलग से पढ़े, ताकि यह शब्द नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित शब्दों के साथ मिश्रित न हो जाएँ। इसका हाल दरअसल तशह्हुद की दुआ जैसा है। क्योंकि उसके बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : फिर उसके बाद प्रशंसा एवं स्तुति के जो शब्द चाहे, चुन ले। यानी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित शब्दों को पढ़ लेने के बाद।
- पुरुषों के लिए ऊँची आवाज़ में तलबिया कहना मुसतहब है। लेकिन औरत धीमी आवाज़ में तलबिया कहेगी, ताकि फ़ितने का कारण न बन जाए।
हवाला
صحيح البخاري (2/ 138) (1549).
صحيح مسلم (2/ 841) (1184).
تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص370).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (3/ 498).
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