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तशरीह के साथ हदीसें

मस्जिद-ए-हराम, मस्जिद-ए-नबवी तथा बैतुल मक़्दिस से संबंधित अहकाम

6 हदीसें

मक्का विजय के बाद हिजरत नहीं रही, लेकिन जिहाद और नीयत बाक़ी हैं। तथा जब जिहाद के लिए निकलने को कहा जाए तो अविलंब निकल पड़ो।

عن عبد الله بن عباس رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة: «لا هجرة بعد الفتح، ولكن جهاد ونية. وإذا اسْتُنْفِرْتُم فَانْفِرُوا. وقال يوم فتح مكة: «إن هذا البَلد حَرَّمَهُ الله يوم خلق الله السموات والأرض، فهو حَرَامٌ بحُرْمَةِ الله إلَى يوم القيامة، وإنه لم يحل القتال فيه لِأَحَدٍ قَبْلِي، ولم يَحِلَّ لي إلا ساعة من نهار، حرام بِحرمة الله إلى يوم القيامة، لا يُعْضَدُ شَوْكُهُ، وَلاَ يُنَفَّرُ صَيْدُهُ، وَلاَ يَلْتَقِطُ لُقَطَتَهُ إلا من عَرَّفَهَا، ولاَ يُخْتَلَى خَلاَهُ». فقال العباس: يا رسول الله، إلا الإِذْخِرَ؛ فإنه لِقَيْنِهِمْ وبيوتهم؟ فقال: «إلا الإِذْخِرَ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का विजय के दिन फ़रमायाः मक्का विजय के बाद हिजरत नहीं रही, लेकिन जिहाद और नीयत बाक़ी हैं। तथा जब जिहाद के लिए निकलने को कहा जाए तो अविलंब निकल पड़ो। तथा मक्का विजय के दिन ही फ़रमायाः इस नगरी को अल्लाह ने आकाश एवं धरती की सृष्टि के दिन हरम बनाया है। अतः, यह क़यामत के दिन तक हरम ही रहेगा। मुझसे पहले किसी को इसमें युद्ध की अनुमति नहीं दी गई थी और मुझे भी कुछ समय के लिए ही दी गई थी। यह अल्लाह के निर्णय के अनुसार क़यामत के दिन तक हरम ही रहेगा। यहाँ के काँटों को काटा नहीं जाएगा, शिकार का पीछा नहीं किया जाएगा, गिरी हुई चीज़ को उठाया नहीं जाएगा, यह और बात है कि कोई उसका एलान करना चाहे और हरी घास को भी काटा नहीं जाएगा। यह सुनकर अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हु- ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! इज़खिर (एक प्रकार की सुगंधित घास) को छोड़ कर, क्योंकि यह लोहारों तथा घरों के काम आती है? आपने फ़रमायाः हाँ, इज़खिर को छोड़कर।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मक्का विजय के दिन संबोधन के लिए खड़े हुए, तो फ़रमाया : अब मक्का से हिजरत नहीं रही। क्योंकि यह अब इसलामी नगर बन चुका है। हाँ, अल्लाह की राह में जिहाद बाक़ी है। अतः, जिसे जिहाद के लिए निकलने को कहा जाए, वह अल्लाह तथा उसके रसूल और अमीर की बात मानते हुए जिहाद के लिए ज़रूर निकले। फिर आपने मक्के के सम्मान एवं आदर का उल्लेख किया और बताया कि इसका यह आदर एवं सम्मान उसी दिन से है, जिस दिन अल्लाह ने आकाशों एवं धरती की रचना की थी। यह भी बताया कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पहले किसी के लिए यहाँ युद्ध करना हलाल नहीं किया गया था और आपके बाद भी किसी के लिए हलाल नहीं किया जाएगा। बल्कि, आपके लिए भी कुछ देर के लिए ही हलाल हुआ था और फिर उसकी हुरमत लौट आई है। फिर आपने मक्का के सम्मान का उल्लेख करते हुए बताया कि हरम के काँटे काटे नहीं जाएँगे, उसकेे जानवरों का शिकार नहीं किया जाएगा, वहाँ गिरी हुई चीज़ उस व्यक्ति के सिवा कोई उठा नहीं सकता, जो उसका ऐलान करना चाहता हो और उसकी घास उखाड़ी नहीं जा सकती। अलबत्ता, मक्का वालों के हित के मद्देनज़र इज़खिर को इस आदेश से अलग रखा गया है, क्योंकि लोहार लोग भट्टी जलाने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं।

हवाला

عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري ، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

पाँच प्रकार के जीव-जन्तु हानिकारक हैं, उन्हें हरम के अंदर भी मारा जाएगा, कौआ, चील, बिच्छू, चूहा और काटने वाला कुत्ता।

عن عائشة رضي الله عنها أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «خمسٌ من الدَّوَابِّ كُلُّهُنَّ فَاسِقٌ، يُقْتَلنَ في الحَرَمِ: الغرابُ، وَالحِدَأَةُ، وَالعَقْرَبُ، وَالفَأْرَةُ، وَالكَلْبُ العَقُورُ». وفي رواية: « يقتل خَمْسٌ فَوَاسِق في الْحِلِّ وَالْحَرَمِ ».
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः पाँच प्रकार के जीव-जन्तु हानिकारक हैं, उन्हें हरम के अंदर भी मारा जाएगा, कौआ, चील, बिच्छू, चूहा और काटने वाला कुत्ता। तथा एक रिवायत में हैः चार के प्रकार हानिकारक जीवों को हरम के बाहर तथा हरम में सभी जगहों में मारा जाएगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बताती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पाँच प्रकार के जानदारों को, जो सबके सब हानिकारक हैं, मारने का आेदश दिया है और इस मामले में हरम का अंदर तथा बाहर सब बराबर है। फिर बताया कि यह पाँच जानदार हैं, कौआ, चील, बिच्छू, चूहा और काटने वाला कुत्ता। इन पाँच प्रकार के जानदारों के बारे में बताया गया है कि ये आम जानदारों से इस मायने में अलग हैं कि ये हानिकारिक एवं कष्टदायक होते हैं। इन्हें संख्या के साथ इसलिए स्पष्ट किया गया है, क्योंकि इनकी हानि अलग-अलग तरह की है और हानि के मामले में इनके जैसे जो भी जानवर होंगे, वह इनके हुक्म में होंगे और उन्हें भी उनकी हानि के मद्देनज़र मार दिया जाएगा। न तो हरम क्षेत्र में वे बच सकते हैं और न एहराम की अवस्था में उनके लिए कोई राहत है।

हवाला

عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت.

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मदीना ईर से लेकर स़ौर तक हरम है। इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या इस तरह का काम करने वाले किसी व्यक्ति को शरण देगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया।

عن يزيد بن شريك بن طارق، قال: رأيت عليًّا رضي الله عنه على المنبر يخطب، فسمعته يقول: لا والله ما عندنا من كتاب نقرؤه: إلا كتاب الله، وما في هذه الصَّحِيفَةِ، فنشرها؛ فإذا فيها: أَسْنَانُ الإبل، وأشياء من الجِرَاحَاتِ. وفيها: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «المدينة حَرَمٌ ما بين عَيْرٍ إلى ثَوْرٍ، فمن أحدث فيها حَدَثًا، أو آوى مُحْدِثًا؛ فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل الله منه يوم القيامة صَرْفًا ولا عَدْلًا. ذِمَّةُ المسلمين واحدة، يسعى بها أَدْنَاهُم، فمن أَخْفَرَ مسلما، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل الله منه يوم القيامة صَرْفًا ولا عَدْلًا. ومن ادعى إلى غير أبيه، أو انتمى إلى غير مواليه، فعليه لعنة الله والملائكة والناس أجمعين؛ لا يقبل الله منه يوم القيامة صَرْفًا ولا عَدْلًا».
यज़ीद बिन तारिक़ कहते हैं कि मैंने अली -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- को मिंबर पर खुत्बा के दौरान कहते हुए सुना है : अल्लाह की क़सम, हमारे पास कोई ऐसी पुस्तक नहीं है, जिसे हम पढ़ते हों, सिवाय अल्लाह की किताब के और उसके जो कुछ इस सहीफ़े में लिखा है। फिर उन्होंने उसे खोला, तो उसमें दियत में दिए जाने वाले ऊँटों की आयु और कुछ ज़ख़्मों की दियत से संबंधित धर्मादेश दर्ज थे। साथ ही, उसमें यह भी लिखा था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "मदीना ईर से लेकर स़ौर तक हरम है। इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या इस तरह का काम करने वाले किसी व्यक्ति को शरण देगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया। मुसलमानों का वचन एक ही होता है और उनका छोटे से छोटा व्यक्ति भी वचन दे सकता है। जो किसी मुस्लिम का दिया हुआ वचन तोड़ेगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया। जो व्यक्ति अपने पिता को छोड़कर किसी दूसरे की ओर निसबत करेगा अथवा अपने मुक्त करने वाले को छोड़कर दूसरे की ओर अपनी निसबत करेगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अली -रज़ियल्लाहु अनहु- ने मिंबर पर खुतबा देते हुए कहा : अल्लाह की क़सम, अल्लाह की किताब के अतिरिक्त हमारे पास पढ़ने के लिए कोई किताब नहीं है। यदि कुछ है, तो बस यह सहीफ़ा। फिर उन्होंने उसे खोलकर दिखाया, तो उसमें दियत में दिए जाने वाले ऊँटों की आयु और ज़ख़्मों से संबंधित मसायल एवं अहकाम लखे हुए थे। साथ ही उसमें यह भी लिखा था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि मदीना, मक्का की तरह ही हरम है,और मदीने में यह छेत्र ऐर पर्वत से सौर पर्वत तक है । अतः इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या कोई अपराध अथवा अत्याचार कर मुसलमानों को कष्ट पहुँचाने का सबब बनेगा या धर्म के नाम पर कोई नया काम करने वाले को शरण देगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। जहाँ तक किसी मुसलमान द्वारा किसी काफ़िर को सुरक्षा देने की बात है, तो यह कुछ शर्तों के साथ सही है, जो प्रसिद्ध हैं। जब ये शर्तें पाई जाएँ, तो सुरक्षा प्राप्त काफ़िर से छेड़-छाड़ हराम होगी। अतः जो किसी मुसलमान द्वारा दी गई सुरक्षा का हनन करते हुए सुरक्षा प्राप्त काफ़िर से छेड़-छाड़ करेगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। इसी तरह जो अपने पिता के अतिरिक्त किसी और से अपना संबंध जोड़ेगा या जो आज़ाद किया हुआ दास अपने मालिकों के अतिरिक्त किसी और की ओर स्वयं को सनसूब करेगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। क्योंकि उसने नेमत की नाशुक्री की, मीरास तथा वली बनने के हक़ और दियत आदि से संबंधित अधिकारों का हनन किया तथा रिश्ता तोड़ने और संबंध विच्छेद करने का काम किया।

हवाला

صحيح البخاري -أبو عبد الله محمد بن إسماعيل بن إبراهيم بن المغيرة الجعفي البخاري - تحقيق محمد زهير بن ناصر الناصر -الناشر : دار طوق النجاة -الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د/ مصطفى الخن، د/ مصطفى البغا، محيي الدين مستو، علي الشربجي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة، ط:الرابعة عشر1407. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي. رياض الصالحين، تأليف محيي الدين النووي، تحقيق عصام موسى هادي، ط: وزارة الأوقاف والشؤون الإسلامية بدولة قطر. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لابن علان، نشر دار الكتاب العربي.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मक्का से हाथी वालों को रोक दिया था और उसने अपने रसूल तथा मोमिनों को उसपर विजय प्रदान किया है। देखो, यह न तो मुझसे पहले किसी के लिए हलाल हुआ था और न मेरे बाद किसी के लिए हलाल होगा। यह मेरे लिए भी केवल दिन की एक घड़ी के लिए हलाल हुआ था और इस समय हराम है।

عن أبي هُريرة رضي الله عنه قال: «لَمَّا فَتَحَ الله -تَعَالَى- عَلَى رَسُولِهِ مَكَّةَ قَتَلَتْ خزاعةُ رَجُلاً مِنْ بَنِي لَيْثٍ بِقَتِيلٍ كَانَ لَهُمْ فِي الْجَاهِلِيَّةِ، فَقَامَ النبي صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: إنَّ الله عَزَّ وَجَلَّ قَدْ حَبَسَ عَنْ مَكَّةَ الْفِيلَ، وَسَلَّطَ عَلَيْهَا رَسُولَهُ وَالْمُؤْمِنِينَ، وَإِنَّهَا لَمْ تَحِلَّ لأَحَدٍ كَانَ قَبْلِي، وَلا تَحِلُّ لأَحَدٍ بَعْدِي، وَإِنَّمَا أُحِلَّتْ لِي سَاعَةً مِنْ نَهَارٍ، وَإِنَّهَا سَاعَتِي هَذِهِ: حَرَامٌ، لا يُعْضَدُ شَجَرُهَا، وَلا يُخْتَلَى خَلاهَا، وَلا يُعْضَدُ شَوْكُهَا، وَلا تُلْتَقَطُ سَاقِطَتُهَا إلاَّ لِمُنْشِدٍ، وَمَنْ قُتِلَ لَهُ قَتِيلٌ: فَهُوَ بِخَيْرِ النَّظَرَيْنِ: إمَّا أَنْ يَقْتُلَ، وَإِمَّا أَنْ يُودِيَ، فَقَامَ رَجُلٌ مِنْ أَهْلِ الْيَمَنِ- يُقَالُ لَهُ: أَبُو شَاهٍ فَقَالَ: يَا رَسُولَ الله، اُكْتُبُوا لِي فَقَالَ رَسُولُ الله: اُكْتُبُوا لأَبِي شَاهٍ، ثُمَّ قَامَ الْعَبَّاسُ فَقَالَ: يَا رَسُولَ الله، إلاَّ الإذْخِرَ، فَإِنَّا نَجْعَلُهُ فِي بُيُوتِنَا وَقُبُورِنَا، فَقَالَ رَسُولُ الله: إلاَّ الإِذْخِرَ».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि जब अल्लाह तआला ने अपने रसूल को मक्का पर विजय प्रदान की, तो खुज़ाआ क़बीले ने बनू लैस क़बीले के एक व्यक्ति को, अपने एक व्यक्ति के बदले में क़त्ल कर दिया, जो जाहिलियत काल में क़त्ल हुआ था। ऐसे में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- खड़े हुए और फ़रमायाः "सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने मक्का से हाथी वालों को रोक दिया था और उसने अपने रसूल तथा मोमिनों को उसपर विजय प्रदान की है। देखो, यह न तो मुझसे पहले किसी के लिए हलाल हुआ था और न मेरे बाद किसी के लिए हलाल होगा। यह मेरे लिए भी केवल दिन की एक घड़ी के लिए हलाल हुआ था और इस समय हराम है। न उसका पेड़ काटा जा सकता है, न उसकी ताज़ा घास को काटा जा सकता है, न उसके काँटे को काटा जा सकता है और न उसके गिरे हुए सामान को उठाया जा सकता है। हाँ, यदि कोई एलान करने के लिए उठाए, तो और बात है। तथा जिसके किसी व्यक्ति को मार दिया जाए, उसे दो बातों में से जो बेहतर लगे, करने का अख़्तियार होगा; या तो क़त्ल करे या दियत (वह धन जो किसी को मार डालने या अंग भंग करने के बदले में दिया जाए) ले।" इतने में यमन का अबू शाह नामी एक व्यक्ति खड़ा हुआ और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे लिए लिख दीजिए। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "अबू शाह के लिए लिख दो।" फिर अब्बास - रज़ियल्लाहु अन्हु- खड़े हुए और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, हमें इज़ख़िर नामक पौधे को काटने की अनुमति दीजिए, क्योंकि हम उसे अपने घरों और क़ब्रों में डालते हैं। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "हाँ, इज़ख़िर पौधे को काटने की अनुमति है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) बता रहे हैं कि जब मक्का पर विजय प्राप्त हुई, तो ख़ुज़ाआ क़बीले के एक व्यक्ति ने हुज़ैल क़बीले के एक व्यक्ति का, अपने एक व्यक्ति के बदले में, जो जाहिलियत काल में मारा गया था, वध कर दिया। यह देख नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खड़े हुए और ख़ुतबे में वह सारी बातें कहीं, जिनका ज़िक्र हदीस में है। चुनांचे मक्का की हुरमत बयान की और यह बताया कि अल्लाह ने उससे हाथी वालों को रोक दिया था और अपने नबी के लिए दिन के कुछ समय के लिए हलाल किया था। विदित हो कि इस हदीस में उल्लिखित शब्द '‎الساعة' से आशय उसका आम अर्थ यानी एक घंटा नहीं, बल्कि उससे आशय विजय दिवस का कुछ भाग है। क्योंकि उस दिन सुबह से अस्र तक आपके लिए युद्ध करना हलाल किया गया था। आपने यह भी बताया कि उसके बाद फिर उसकी हुरमत लौट आई। साथ ही यह भी बताया कि उसके काँटे को काटा नहीं जा सकता, उसके पेड़ को नहीं काटा जा सकता और इज़खिर के सिवा हरम की सीमाओं के अंदर उगने वाली किसी घास को काटा नहीं जा सकता और वहाँ पड़े हुए किसी सामान को उठाया नहीं जा सकता। यह और बात है कि कोई एलान करने के लिए उठाए।

हवाला

صحيح البخاري، تحقيق زهير الناصر، دار طوق النجاة، ط 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي. تأسيس الأحكام للنجمي، دار المنهاج ،1427هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، دار الصحابة، الشارقة، الطبعة الأولى 1426هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

ज़माना घूमकर आज फिर उसी हालत पर आ गया है, जो हालत उस दिन थी, जिस दिन अल्लाह ने आसमान व ज़मीन को पैदा किया था। साल के बारह महीने हैं, जिनमें चार महीने हराम हैं: तीन लगातार हैं, यानी ज़ुल- क़ादा, ज़ुल- हिज्जा, मुहर्रम और मुज़र क़बीले का रजब।

عن أبي بكرة -ضي الله عنه- مرفوعاً: «إِنَّ الزمانَ قَدِ اسْتَدَارَ كَهَيْئَتِهِ يَوْمَ خَلَقَ اللهُ السَّمَاوَاتِ والأَرْضَ: السنةُ اثنا عَشَرَ شَهْرًا، منها أربعةٌ حُرُمٌ: ثلاثٌ مُتَوَالِيَاتٌ: ذُو القَعْدَةِ، وذُو الحَجَّةِ، والمحرمُ، ورَجَبُ مُضَرَ الذي بين جُمَادَى وشَعْبَانَ، أَيُّ شَهْرٍ هَذَا؟» قلنا: اللهُ ورسولُهُ أَعْلَمُ، فسكتَ حتى ظننا أنه سَيُسَمِّيهِ بغير اسمه، قال: «أَلَيْسَ ذَا الحَجَّةِ؟» قُلْنَا: بَلَى. قال: «فأَيُّ بَلَدٍ هَذَا؟» قلنا: اللهُ ورسولُهُ أَعْلَمُ، فسكتَ حتى ظننا أنه سُيَسَمِّيهِ بغير اسمه. قال: «أَلَيْسَ البَلْدَةَ؟» قلنا: بلى. قال: «فأَيُّ يَوْمٍ هَذَا؟» قُلْنَا: اللهُ ورسولُهُ أَعْلَمُ، فسكتَ حتى ظَنَنَّا أنه سيسميه بغير اسمه. قال: «أَلَيْسَ يَوْمَ النَّحْرِ؟» قلنا: بَلَى. قال: «فَإِّنَّ دِمَاءَكُمْ وأَمْوَالَكُمْ وأَعْرَاضَكُمْ عَلَيْكُمْ حَرَامٌ، كَحُرْمَةِ يَوْمِكُمْ هَذَا في بَلَدِكُمْ هَذَا فِي شَهْرِكُمْ هَذَا، وَسَتَلْقَونَ رَبَّكُمْ فَيَسْأَلُكُمْ عَنْ أَعْمَالِكُمْ، أَلَا فَلَا تَرْجِعُوا بَعْدِي كُفَّارًا يَضْرِبُ بَعْضُكُم رِقَابَ بَعْضٍ، أَلَا لِيُبَلِّغِ الشَّاهِدُ الغَائِبَ، فَلَعَلَّ بَعْضَ مَنْ يَبْلُغُهُ أَنْ يكونَ أَوْعَى لَهُ مِنْ بَعْضِ مَنْ سَمِعَهُ»، ثُمَّ قال: «أَلَا هَلْ بَلَّغْتُ، أَلَا هَلْ بَلَّغْتُ؟» قلنا: نعم. قال: «اللَّهُمَّ اشْهَدْ».
अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: ज़माना घूमकर आज फिर उसी हालत पर आ गया है, जो हालत उस दिन थी, जिस दिन अल्लाह ने आसमान व ज़मीन को पैदा किया था। साल के बारह महीने हैं, जिनमें चार महीने हराम (जिनमें युद्ध करना हराम है) हैं: तीन लगातार हैं, यानी ज़ुल- क़ादा, ज़ुल- हिज्जा, मुहर्रम और मुज़र क़बीले का रजब, जो अंतिम जुमादा और शाबान के बीच है। फिर आपने फ़रमाया: यह कौन- सा महीना है? हमने कहा: अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप कुछ देर ख़ामोश रहे। हमें लगा कि शायद आप उसको कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह ज़ुल- हिज्जा नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने कहा: यह कौन- सा शहर है? हमने कहा: अल्लाह और उलके रसूल बेहतर जानते हैं! यह सुनकर आप ख़ामोश हो गए। हमें लगने लगा कि शायद आप उसे कोई नया नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह मक्का नगर नहीं है? हमने कहा: अवश्य! फिर आपने पूछा: आज कौन- सा दिन है? हमने कहा कि अल्लाह और उसके रसूल ही बेहतर जानते हैं। यह सुनकर आप ख़ामोश रहे, जिससे हमें ख़्याल हुआ कि शायद आप उसे कोई और नाम देंगे। फिर फ़रमाया: क्या यह क़ुर्बानी का दिन नहीं है? हमने कहा: अवश्य! आपने फ़रमाया: तो जान रखो, तुम्हारा ख़ून, तुम्हारा माल और तुम्हारी प्रतिष्ठा तुम्हारे लिए उसी तरह हराम है, जिस तरह तुम्हारा यह दिन, तुम्हारे इस नगर और तुम्हारे इस महीने में हराम है। याद रखो, जल्द ही तुमको अपने रब के सामने उपस्थित होना है और वह तुमसे तुम्हारे कर्मों के बारे में पूछेगा। सुन लो, तुम मेरे बाद दोबारा काफ़िर न हो जाना कि एक- दूसरे की गर्दन उड़ाने लगो। ख़बरदार! हर उपस्थित व्यक्ति पर लाज़िम है कि वह मेरा यह पैग़ाम उन लोगों तक पहुँचाए, जो यहाँ उपस्थित नहीं हैं। इसलिए कि बहुत मुमकिन है कि जिसके पास मेरी बात (अप्रत्यक्ष रूप से) पहुँचे, वह ऐसे कई कुछ लोगों से अधिक याद रखने वाला हो, जिन्होंने उसे (प्रत्यक्ष रूप से मुझसे) सुना है। फिर आपने फ़रमाया: सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? सुनो, क्या मैंने पहुँचा दिया है? हमने कहा: हाँ! आपने फ़रमाया: ऐ अल्लाह! तू गवाह रह!
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407ه 1987م. شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين، نشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426ه. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، ط1، نشر: دار ابن الجوزي، 1415ه. صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

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कोई स्त्री दो दिन की दूरी के सफर पर उस समय तक न निकले, जब तक उसके साथ उसका पति या कोई महरम (ऐसा रिश्तेदार जिसके साथ कभी शादी न हो सकती हो) न हो

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الخُدْرِيَّ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ -وَكَانَ غَزَا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ثِنْتَيْ عَشْرَةَ غَزْوَةً- قَالَ: سَمِعْتُ أَرْبَعًا مِنَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَأَعْجَبْنَنِي، قَالَ: «لاَ تُسَافِرِ المَرْأَةُ مَسِيرَةَ يَوْمَيْنِ إِلَّا وَمَعَهَا زَوْجُهَا أَوْ ذُو مَحْرَمٍ، وَلاَ صَوْمَ فِي يَوْمَيْنِ: الفِطْرِ وَالأَضْحَى، وَلاَ صَلاَةَ بَعْدَ الصُّبْحِ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ، وَلاَ بَعْدَ العَصْرِ حَتَّى تَغْرُبَ، وَلاَ تُشَدُّ الرِّحَالُ إِلَّا إِلَى ثَلاَثَةِ مَسَاجِدَ: مَسْجِدِ الحَرَامِ، وَمَسْجِدِ الأَقْصَى، وَمَسْجِدِي هَذَا».
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, जो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ बारह धर्मयुद्धों में शामिल हुए थे, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से चार बातें सुनी हैं, जो मुझे बड़ी अच्छी लगती हैं। आपने फ़रमाया है : "कोई स्त्री दो दिन की दूरी के सफर पर उस समय तक न निकले, जब तक उसके साथ उसका पति या कोई महरम (ऐसा रिश्तेदार जिसके साथ कभी शादी न हो सकती हो) न हो, दो दिनों में रोज़ा रखना जायज़ नहीं है ; ईद-अल-फ़ित्र के दिन और ईद अल-अज़हा के दिन, सुबह की नमाज़ के बाद सूरज निकलने तक तथा अस्र की नमाज़ के बाद सूरज डूबने तक कोई नमाज़ नहीं है और इबादत की नीयत से सफ़र करके केवल तीन मस्जिदों की ओर जाना जायज़ है ; मस्जिद-ए-हराम, मस्जिद-ए-अक़सा और मेरी यह मस्जिद।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने चार बातों से मना किया है : 1- औरत को दो दिन की दूरी अपने शौहर या किसी महरम के बग़ैर अकेले तय करने से मना किया है। महरम से मुराद बेटा, पिता, भतीजा, चचा एवं मामा आदि ऐसे रिश्तेदार हैं, जिनसे हमेशा के लिए शादी हराम है। 2- ईद अल-फ़ित्र और ईद अल-अज़हा के दिन रोज़ा रखने की मनाही। चाहे रोज़ा मन्नता का हो, नफ़ली हो या कफ़्फ़ारा का। 3- अस्र की नमाज़ के बाद सूरज डूबने तक और सुबह की नमाज़ के बाद सूरज निकलने तक नफ़ल नमाज़ की मनाही। 4- हदीस में उल्लिखित तीन मस्जिदों को छोड़ किसी अन्य भूखंड की यात्रा करने, उसकी फ़ज़ीलत का विश्वास रखने और वहाँ अधिक सवाब मिलने का यक़ीन रखने की मनाही। इन तीन मस्जिदों को छोड़ किसी अन्य स्थान की यात्रा, वहाँ नमाज़ पढ़ने के इरादे से नहीं की जाएगी। क्योंकि इन तीन मस्जिदों; मस्जिद-ए-हराम, मस्जिद-ए-नबवी और मस्जिद-ए-अक़सा के अतिरिक्त किसी और स्थान में नमाज़ पढ़ने से नमाज़ का सवाब बढ़ाकर दिया नहीं जाता।

फ़ायदे
  1. महरम के बिना औरत का यात्रा करना जायज़ नहीं है।
  2. एक औरत यात्रा में दूसरी औरत का महरम नहीं बन सकती। क्योंकि हदीस के शब्द हैं : "زوجُها أو ذو محرم" (अर्थात- उसका पति अथवा कोई अन्य महरम रिश्तेदार)।
  3. हर वह दूरी जिसे तय करने को सफ़र कहा जाए, महिला के लिए पति या महरम के बिना उसे तय करना वर्जित है।
  4. महरम से मुराद महिला का पति या ऐसा व्यक्ति है, जिसके साथ उसकी शादी हमेशा के लिए हराम हो। हराम होने का कारण या तो ख़ून का रिश्ता होता है, जैसे पिता, चचा और मामा, और दूध का रिश्ता भी होता है, जैसे दूध के रिश्ते का पिता और दूध के रिश्ते का चचा तथा ससुराली रिश्ते के कारण भी होता है, जैसे पति का पिता। सफ़र में साथ में चलने वाले महरम का मुसलमान, वयस्क, समझदार, भरोसेमंद और ऐसा व्यक्ति होना ज़रूरी है कि ख़ुद उससे कोई ख़तरा न हो। क्योंकि महरम साथ रखने का उद्देश्य औरत की सुरक्षा और उसके हितों की रक्षा करना है।
  5. इस्लामी शरीयत ने औरत तथा उसकी सुरक्षा का ख़ास ध्यान रखा है।
  6. फ़ज्र और अस्र की नमाज़ों के बाद आम नफ़ल नमाज़ें दुरुस्त नहीं हैं। अलबत्ता छूटी हुई फ़र्ज़ नमाज़ और सबब वाली नमाज़ें, जैसे तहियतुल मस्जिद आदि पढ़ी जा सकती हैं।
  7. सूरज निकलने के फ़ौरन बाद नमाज़ पढ़ना हराम है। इतनी देर रुकना ज़रूरी है कि सूरज एक नेज़े के बराबर ऊपर उठ जाए, जिसमें लगभग दस से पंद्रह मिनट लगते हैं।
  8. अस्र का समय सूरज डूबने तक रहता है।
  9. इस हदीस से मालूम होता है कि इन तीनों मस्जिदों की ओर यात्रा करके जाना जायज़ है।
  10. उल्लिखित तीनों मस्जिदों का महत्व एवं श्रेष्ठता।
  11. क़ब्रों की ज़ियारत के लिए यात्रा जायज़ नहीं है। क़ब्र चाहे नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ही क्यों न हो। अलबत्ता मदीने के अंदर रहने वाले या किसी शरीयत सम्मत या वैध उद्देश्य से वहाँ पहुँचने वाले के लिए उसकी ज़ियारत जायज़ है।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 43) (1995). صحيح مسلم (2/ 975) (827). فتح الباري شرح صحيح البخاري، لابن حجر العسقلاني (4/ 75). توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، للبسام (3/ 544). فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام، لابن عثيمين (3/ 311). سبل السلام، لمحمد الصنعاني (1/ 598). مجموع فتاوى ومقالات، لابن باز(6/ 321). الشرح الممتع على زاد المستقنع، لابن عثيمين (6/ 516). شرح سنن أبي داود، عبد المحسن العباد (65/ 8 بترقيم الشاملة آليا).

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