अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अधिक से अधिक नेकी के कामों के साथ लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) को तलाश करने की कोशिश करने की प्रेरणा दी है। लैलतुल क़द्र के बारे में इसकी ज़्यादा आशा है कि वह रमज़ान के अंतिम दस दिनों की विषम रातों यानी इक्कीसवीं, तेईसवीं, पच्चीसवीं, सत्ताईसवीं और उनतीसवीं रातों में से किसी एक रात में हुआ करती है।
- शब-ए-क़द्र की फ़ज़ीलत और उसे तलाश करने की प्रेरणा।
- अल्लाह की हिकमत एवं दया का तक़ाज़ा यह हुआ कि इस रात को छुपाकर रखा, ताकि इसकी तलाश में लोग खूब इबादत किया करें और उन्हें बड़ा प्रतिफल प्राप्त हो सके।
- शब-ए-क़द्र रमज़ान की अंतिम दस रातों में से कोई एक रात हुआ करती है। इस बात की आशा अधिक है कि अंतिम दस रातों में से कोई विषम रात हो।
- शब-ए-क़द्र रमज़ान की अंतिम दस रातों में से कोई एक रात है। इसी रात में अल्लाह ने अपने नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर क़ुरआन उतारा और उसे बरकत, सम्मान और उसमें किए गए अच्छे कार्यों के प्रतिफल के मामले में एक हज़ार रातों से बेहतर क़रार दिया।
- इस रात को लैलतुल क़द्र या तो इसकी फ़ज़ीलत एवं प्रतिष्ठा की बिना पर कहा गया है। अरबी में कहा जाता है : "फुलानुन अज़ीमुल क़दरि" यानी अमुक बड़ी प्रतिष्ठित व्यक्ति है। इस हिसाब से यहाँ "अल्लैलतु" का संबंध "अलक़दरि" के साथ विशेष्य तथा विशेषण वाला संबंध है। यानी प्रतिष्ठि रात्रि। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हमने इसे एक मुबारक रात मैं अवतरित किया है।" [सूरा दुख़ान : 3] यानी हमने इस क़रआन को एक बरकत वाली रात में उतारा है। ऐसा भी हो सकता है कि लैलतुल क़द्र में आया हुआ क़द्र शब्द तक़दीर के अर्थ में हो। इस परिस्थिति में लैलतुल क़द्र के दोनों शब्दों का संबंध एक समय का उसमें घटित होने वाली चीज़ों के साथ है। यानी एक ऐसी रात है, जिसमें साल भर होने वाली घटनाओं का निर्धारण कर दिया जाता है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "इसमें हर सुदृढ़ कार्य का निर्णय किया जाता है" [सूरा दुख़ान : 4]
صحيح البخاري (3/ 46) (2017). صحيح مسلم (2/ 828) (1169). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص347). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (3/ 470).