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तशरीह के साथ हदीसें

ऐतिकाफ़

5 हदीसें

नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- प्रत्येक रमज़ान में दस दिन एतेकाफ़ करते थे। परन्तु जब मृत्यु का वर्ष आया, तो बीस दिन एतेकाफ़ किया।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يعتكف في كل رمضان عشرة أيام، فلما كان العام الذي قُبِضَ فيه اعتكف عشرين يوماً.
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- प्रत्येक रमज़ान में दस दिन एतेकाफ़ करते थे। परन्तु जब मृत्यु का वर्ष आया, तो बीस दिन एतेकाफ़ किया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हर रमज़ान महीने के दस दिन दुनिया के झमेलों से अलग होकर अल्लाह की इबादत करने के उद्देश्य से मस्जिद में गुज़ारते थे, जिसे एतिकाफ़ कहते हैं। आप पहले सम्मानित रात्रि (लैलतुल क़द्र) को पाने की आशा में बीच के दस दिनों में एतिकाफ़ करते थे। लेकिन जब यह मालूम हो गया कि लैलतुल क़द्र अंतिम दस दिनों में होती है, तो उन्हीं में एतिकाफ़ करने लगे। फिर, जिस वर्ष आपकी मृत्यु हुई, उस वर्ष आपने बीस दिन एतिकाफ़ किया, ताकि अल्लाह की अधिक इबादत की जा सके और उसकी अधिक निकटता प्राप्त की जा सके।

हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي، الطبعة الأولى 1418ه. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. - صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - فتح الباري شرح صحيح البخاري- أحمد بن علي بن حجر العسقلاني الشافعي-دار المعرفة- بيروت، رقم كتبه وأبوابه وأحاديثه: محمد فؤاد عبد الباقي- قام بإخراجه وصححه وأشرف على طبعه: محب الدين الخطيب- عليه تعليقات العلامة: عبد العزيز بن عبد الله بن باز.

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जिसने मेरे साथ अब तक ऐतिकाफ़ किया , वह अंतिम दस दिनों का भी ऐतिकाफ़ करे, क्योंकि मुझे यह रात दिखाई गई और फ़िर भुला दी गई। मैंने उस रात की सुब्ह को देखा कि मैं पानी और मिट्टी पर सजदा कर रहा हूँ। अतः, उसे अंतिम दस रातों में तलाश करो।

عن أبي سعيد الخُدْري رضي الله عنه : «أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يَعْتَكِفُ في العَشْرِ الأَوْسَطِ من رمضان. فاعتكف عامًا، حتى إذا كانت لَيْلَةَ إِحْدَى وَعِشْرِينَ -وهي اللَّيْلَةُ التي يخرج من صَبِيحَتِهَا من اعتكافه- قال: من اعتكف معي فَلْيَعْتَكِفِ العَشْرَ الأَوَاخِرَ فقد أُرِيتُ هَذِهِ اللَّيْلَةَ ثم أُنْسِيتُهَا، وقد رَأَيْتُنِي أَسْجُدُ فِي مَاءٍ وَطِينٍ من صَبِيحَتِهَا، فَالْتَمِسُوهَا فِي العَشْرِ الأَوَاخِرِ، والتمسوها في كل وِتْرٍ. فَمَطَرَتِ السَّمَاءُ تلك الليلة، وكان المسجد على عَرِيشٍ، فَوَكَفَ المسجد، فَأبْصَرَتْ عَيْنَايَ رسول الله صلى الله عليه وسلم وعلى جَبْهَتِهِ أَثَرُ المَاءِ وَالطِّين من صُبْحِ إحْدَى وَعشْرِيْنَ».
अबू सईद खुदरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रमज़ान के बीच के दस दिनों में ऐतिकाफ़ करते थे। ऐसे ही एक साल ऐतिकाफ़ किया, यहाँ तक कि जब इक्कीसवें रोज़े की रात आई, (जिसकी सुब्ह आपको ऐतिकाफ़ से निकलना था) तो फ़रमायाः जिसने मेरे साथ अब तक ऐतिकाफ़ किया, वह अंतिम दस दिनों का भी ऐतिकाफ़ करे, क्योंकि मुझे यह रात दिखाई गई और फ़िर भुला दी गई। मैंने उस रात की सुब्ह को देखा कि मैं पानी और मिट्टी पर सजदा कर रहा हूँ। अतः, उसे अंतिम दस रातों में तलाश करो तथा उसे प्रत्येक बेजोड़ रात में तलाश करो। सो, उस रात बारिश हुई। चूँकि मस्जिद की छत खुजूर की टहनियों से बनी थी, इसलिए वह टपकने लगी। फिर तो मेरी आँखों ने इक्कीसवें रमज़ान की सुब्ह को देखा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पेशानी पर पानी और कीचड़ के निशान थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) क़द्र की रात की तलाश में रमज़ान के बीच के दस दिनों में ऐतिकाफ़ करते थे। एक साल अपनी आदत के मुताबिक़ ऐतिकाफ़ में थे कि जब इक्कीसवें रमज़ान की रात आई, जिसकी सुबह आप ऐतिकाफ़ से निकल जाया करते थे, तो आपको मालूम हुआ कि क़द्र की रात अंति दस दिनों में है। अतः, अपने साथियों से कहा : जिसने मेरे साथ बीच के दस दिनों में ऐतिकाफ़ किया है, वह अपना ऐतिकाफ़ जारी रखे और अंतिम दस दिनों में भी ऐतिकाफ़ करे। साथ ही बताया कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने आपको वह रात सपने में दिखा दी थी, लेकिन फिर उसे स्मृति से ग़ायब कर दिया। परन्तु, आपने सपने में उसकी कुछ निशानियाँ देखी थीं, जिनमें से एक यह है कि आप फ़ज्र की नमाज़ में पानी तथा कीचड़ पर सजदा कर रहे हैं। चुनांचे अल्लाह ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इस सपने को सच कर दिखाया। इक्कीसवें रमज़ान की रात को बारिश हुई। आपकी मस्जिद चूँकि झोंपड़े की तरह थी। उसके खंबे खजूर के तनों के थे और छत उसकी शाखाओं की। इसलिए बारिश होने पर मस्जिद टपकने लगी और आपने इक्कीसवें रमज़ान की सुबह को पानी और कीचड़ पर सजदा किया।

हवाला

عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. الإفهام في شرح عمدة الأحكام، للشيخ عبد العزيز بن عبد الله بن باز، تحقيق: سعيد بن علي بن وهف القحطاني، الطبعة الأولى، 1435 هـ خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، تأليف: فيصل بن عبد العزيز آل مبارك، الطبعة الثانية، 1412 هـ صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري ، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

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अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मृत्यु तक रमज़ान के अंतिम दस दिनों में एतिकाफ़ करते रहे। आपके बाद आपकी पत्नियों ने भी एतिकाफ़ किया।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المُؤْمنينَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا زَوْجِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَعْتَكِفُ العَشْرَ الأَوَاخِرَ مِنْ رَمَضَانَ، حَتَّى تَوَفَّاهُ اللَّهُ، ثُمَّ اعْتَكَفَ أَزْوَاجُهُ مِنْ بَعْدِهِ.
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की पत्नी मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मृत्यु तक रमज़ान के अंतिम दस दिनों में एतिकाफ़ करते रहे। आपके बाद आपकी पत्नियों ने भी एतिकाफ़ किया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बताती हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- लैलतुल क़द्र (सम्मानित रात्रि) की तलाश में रमज़ान के अंतिम दस दिनों में पाबंदी के साथ एतिकाफ़ करते थे। मृत्यु तक आप ऐसा ही करते रहे। आपके बाद आपकी पत्नियों ने भी एतिकाफ़ किया।

फ़ायदे
  1. एतिकाफ़ मस्जिद में करना है। औरतें भी शरई निर्देशों का पालन करते हुए मस्जिद में एतिकाफ़ करेंगी, जब फ़ितने का भय न हो।
  2. अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पाबंदी के साथ एतिकाफ़ करते थे, इसलिए रमज़ान के अंतिम दस दिनों में एतिकाफ़ करना ताकीदी बात है।
  3. एतिकाफ़ एक निरंतर रूप से जारी रहने वाली सुन्नत है, जो निरस्त नहीं हुई है, क्योंकि आपके बाद आपकी पत्नियों ने भी एतिकाफ़ किया।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 47) (2026). صحيح مسلم (2/ 831) (1172). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص351). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 474).

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शैतान आदम की संतान की रगों में लहू की तरह दौड़ता है। इसलिए मुझे डर हुआ कि शैतान तुम्हारे दिलों में कोई गलत ख़्याल न डाल दे।

عن صَفِيَّةُ بِنْتُ حُيَيٍّ رضي الله عنها قالت: «كان النبي صلى الله عليه وسلم مُعْتَكِفًا، فَأَتَيْتُهُ أَزُورُهُ ليلا، فَحَدَّثْتُهُ، ثمَّ قُمْتُ لِأَنْقَلِبَ، فقام معي لِيَقْلِبَنِي -وكان مسكنها في دار أُسَامَةَ بن زَيْدٍ-، فَمَرَّ رَجُلاَنِ من الأنصار، فلما رأيا رسول الله صلى الله عليه وسلم أسرعا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم : على رِسْلِكُمَا، إنها صَفِيَّةَ بِنْتُ حُيَيٍّ، فقالا: سبحان الله يا رسول الله، فقال: إن الشَّيْطَانَ يَجْرِي من ابن آدم مَجْرَى الدَّمِ، وإني خَشِيتُ أن يَقْذِفَ في قُلُوبِكُمَا شرا -أو قال شيئا-». وفي رواية: «أنها جاءَت تَزُورُهُ في اعْتِكَافِهِ في الْمَسْجِدِ، فِي العَشْرِ الأوَاخِرِ من رمضان، فتَحدَّثَتْ عنده ساعة، ثم قامت تَنقَلِبُ، فقام النبي صلى الله عليه وسلم معها يَقْلِبُهَا ، حتى إذا بَلَغَتْ باب المسجد عند باب أم سلمة...» ثم ذكره بمعناه.
सफ़िय्या बिंत हुयय- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐतिकाफ़ की हालत में थे कि मैं रात के समय आपसे मिलने गई। आपसे बात करने के बाद जब वापस होने के लिए खड़ी हुई, तो आप भी मुझे छोड़ने के लिए खड़े हुए। (उन दिनों सफ़िय्या का निवास उसामा बिन ज़ैद के घर में था।) इसी बीच वहाँ से दो अंसारी व्यक्ति गुज़रे। जब उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा तो तेज़ चलने लगे। उन्हें ऐसा करते देख अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें रुकने को कहा और फ़रमायाः यह सफ़िय्या बिंत हुयय हैं। दोनों ने कहाः सुबहानल्लाह! ऐ अल्लाह के रसूल (क्या हम आपके बारे में कोई संदेह कर सकते हैं?) तो आपने फ़रमायाः शैतान आदम की संतान की रगों में लहू की तरह दौड़ता है। इसलिए मुझे डर हुआ कि शैतान तुम्हारे दिलों में कोई गलत ख़याल न डाल दे। एक और रिवायत में है कि वह रमज़ान के अंतिम दस दिनों में ऐतिकाफ़ के दौरान मस्जिद में मिलने आईं और आपके साथ कुछ समय बात करने के बाद जाने के लिए खड़ी हुईं, तो आप भी उन्हें छोड़ने के लिए खड़े हो गए, यहाँ तक कि जब उम्मे सलमा के दरवाज़े तक पहुँची... उसके बाद शेष उसी अर्थ की रिवायत बयान की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रमज़ान के आखिरी दस दिनों में एतेकाफ़ में थे। इसी बीच आपकी पत्नी सफ़िय्या -रज़ियल्लाहु अनहा- आपसे मिलने आईं और कुछ देर बात करने के बाद घर वापस जाने के लिए खड़ी हुईं, तो आप खड़े हुए और कुछ दूर तक उनके साथ चलने लगे। इतने में वहाँ से दो अंसारी व्यक्ति गुज़रे और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ आपकी पत्नी को देखकर लजाते हुए तेज़ चलने लगे। यह देख, आपने उन दोनों से कहा कि ज़रा ठहरो। देखो, यह मेरी पत्नी सफ़िय्या है। दोनों ने कहा : सुबहान अल्लाह, क्या आपके बारे में गलत सोचा जा सकता है? तो आपने उन्हें बताया कि शैतान इनसान को गुमराह करने के लिए तत्पर रहता है और उसके पास इसकी बड़ी क्षमता भी है। क्योंकि वह आदम की संतान की रगों में लहू की तरह दौड़ता है। यही कारण है कि आपको डर महसूस हुआ कि कहीं शैतान उनके दिलों में कोई ग़लत ख़याल न डाल दे।

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عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري ، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.

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ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने जाहिलीयत के ज़माने में मन्नत मानी थी कि मैं मस्जिदे हराम में एक रात (एक रिवायत के मुताबिक एक दिवसीय) ऐतिकाफ़ करुँगा, इसके बारे में आप क्या कहते हैं? आपने फ़रमायाः अपनी मन्नत पूरी करो।

عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: قلت: يا رسول الله، إني كنت نَذَرْتُ في الجَاهلية أن أعتكف ليلة -وفي رواية: يومًا- في المسجد الحرام ؟ قال: «فَأَوْفِ بِنَذْرِكَ».
उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने जाहिलीयत के ज़माने में मन्नत मानी थी कि मैं मस्जिदे हराम में एक रात (एक रिवायत के मुताबिक एक दिवसीय) ऐतिकाफ़ करुँगा, इसके बारे में आप क्या कहते हैं? आपने फ़रमायाः अपनी मन्नत पूरी करो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने जाहिलियत के युग में मस्जिदे हराम में एक रात एतेकाफ़ करने की मन्नत मानी थी। उन्होंने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से इस मन्नत के हुक्म के बारे पूछा, तो आपने मन्नत पूरी करने का आदेश दिया।

हवाला

- صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام/محمد بن صالح العثيمين - مكتبة الصحابة-الشارقة -الإمارات العربية المتحدة -الطبعة الأولى 1426ه. - تيسير العلام شرح عمدة الأحكام-عبد الله البسام-تحقيق محمد صبحي حسن حلاق- مكتبة الصحابة- الشارقة- الطبعة العاشرة- 1426ه.

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com