अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक यात्रा पर थे। यात्रा के दौरान आपने एक व्यक्ति के पास लोगों की भीड़ देखी, जिसपर सूरज की गर्मी और अत्यधिक प्यास के कारण छाया किया गया था। आपने पूछा : इसे क्या हुआ है? लोगों ने कहा : यह रोज़ेदार है। तो आपने फ़रमाया : यात्रा में रोज़ा रखना पुण्य का कार्य नहीं है, तुम अल्लाह की उस छूट को स्वीकार करो जो उसने तुम्हें दी है।
- इस्लामी शरीयत की सरलता का वर्णन।
- यात्रा में रोज़ा रखने और रोज़ा छोड़कर छूट पर अमल करने दोनों की अनुमति।
- सफ़र में रोज़ा रखना मकरूह है, अगर उसमें कठिनाई हो, लेकिन अगर कठिनाई जानलेवा होने की हद तक पहुँच जाए, तो यह हराम हो जाता है।
- नववी कहते हैं : "यात्रा में रोज़ा रखना पुण्य का कार्य नहीं है" का अर्थ यह है कि जब तुम्हें कठिनाई हो और हानि का भय हो। हदीस का संदर्भ इसी व्याख्या की माँग करता है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सहाबा का ख़्याल रखा करते थे तथा उनके हालात मालूम करते रहते थे।
صحيح البخاري (3/ 34) (1946). صحيح مسلم (2/ 786) (1115). تيسير العلام، للبسام (ص327). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 433).