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तशरीह के साथ हदीसें

ज़कात अल-फ़ित्र

3 हदीसें

हम अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में सदक़ा-ए-फ़ित्र, हर छोटे-बड़े, आज़ाद या ग़ुलाम की ओर से एक सा खाने की चीज़, या एक सा पनीर, या एक सा जौ, या एक सा खजूर या एक सा किशमिश निकालते थे।

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ رضي الله عنه قَالَ: كُنَّا نُخْرِجُ إِذْ كَانَ فِينَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ زَكَاةَ الْفِطْرِ، عَنْ كُلِّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ، حُرٍّ أَوْ مَمْلُوكٍ، صَاعًا مِنْ طَعَامٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ أَقِطٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ زَبِيبٍ، فَلَمْ نَزَلْ نُخْرِجُهُ حَتَّى قَدِمَ عَلَيْنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ أَبِي سُفْيَانَ رضي الله عنه حَاجًّا، أَوْ مُعْتَمِرًا فَكَلَّمَ النَّاسَ عَلَى الْمِنْبَرِ، فَكَانَ فِيمَا كَلَّمَ بِهِ النَّاسَ أَنْ قَالَ: إِنِّي أَرَى أَنَّ مُدَّيْنِ مِنْ سَمْرَاءِ الشَّامِ، تَعْدِلُ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، فَأَخَذَ النَّاسُ بِذَلِكَ، قَالَ أَبُو سَعِيدٍ: فَأَمَّا أَنَا فَلَا أَزَالُ أُخْرِجُهُ كَمَا كُنْتُ أُخْرِجُهُ، أَبَدًا مَا عِشْتُ.
तथा अबू सईद खुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं : हम अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में सदक़ा-ए-फ़ित्र, हर छोटे-बड़े, आज़ाद या ग़ुलाम की ओर से एक सा खाने की चीज़, या एक सा पनीर, या एक सा जौ, या एक सा खजूर या एक सा किशमिश निकालते थे। यह सिलसिला जारी रहा, यहाँ तक कि जब मुआविया बिन अबू सुफ़यान रज़ियल्लाहु अन्हु हमारे यहाँ हज या उमरा के इरादे से आए और मिंबर पर बैठकर लोगों से बात की, तो एक बात यह भी कही कि मैं समझता हूँ कि शाम की दो मुद गेहूँ एक सा खजूर के बराबर है। अतः लोगों ने इसपर अमल करना शुरू कर दिया। लेकिन अबू सईद -रज़ियल्लाहु अनहु- ने फ़रमाया : जहाँ तक मेरी बात है, तो मैं जब तक जीवित रहूँगा, सदक़ा-ए-फ़ित्र उसी परिमाण में निकालता रहूँगा, जिस परिमाण में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के दौर में निकाला करता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

मुसलमान अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और आपके सुपथगामी ख़लीफ़ागण के दौर में ज़कात-ए-फ़ित्र के रूप में हर छोटे-बड़े व्यक्ति की ओर से एक-एक सा खाने की चीज़ निकाला करते थे। उन दिनों उनके खाने की चीज़ें थीं : जौ, किशमिश, पनीर और खजूर। यहाँ यह याद रहे कि एक सा चार मुद का होता है और एक मुद एक औसत शरीर वाले व्यक्ति के एक लप के बराबर होता है। लेकिन जब मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- ख़लीफ़ा की हैसियत से मदीना आए और शाम के गेहूँ का इस्तेमाल अधिक होने लगा, तो उन्होंने ख़ुतबा दिया और फ़रमाया: मैं समझता हूँ कि शाम वाला दो मुद गेहूँ एक सा खजूर के बराबर है। चुनांचे लोगों ने उनके इस कथन पर अमल करना शुरू कर दिया। लेकिन अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- ने फ़रमाया : जहाँ तक मेरी बात है, तो मैं जीवन भर उसे उसी तरह निकालता रहूँगा, जिस तरह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के दौर में निकाला करता था।

फ़ायदे
  1. इस हदीस के अंदर बताया गया है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के दौर में सदक़ा-ए-फ़ित्र कितना निकाला जाता था। दरअसल आपके ज़माने में खाने की वस्तु का एक सा निकाला जाता था। वस्तु एवं मूल्य कुछ भी हो।
  2. इन्सान के खाने की हर वस्तु फ़ितरा में निकाली जा सकती है। हदीस में चार वस्तुओं का ज़िक्र विशेष रूप से इसलिए आया है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में यही वस्तुएँ लोगों के खाने के काम आती थीं।
  3. फ़ितरा में खाने की वस्तुओं के स्थान पर रुपया और नक़द निकालना जायज़ नहीं है।
  4. नववी शर्ह सहीह मुस्लिम में कहते हैं : जब सहाबा के अंदर मतभेद हो जाए, तो उनमें से किसी का कथन किसी से बेहतर नहीं हो सकता। ऐसे में हमें कोई दूसरा प्रमाण तलाश करना होगा। और हमने पाया कि हदीसों का स्पष्ट अर्थ और क़यास खाने की दूसरी चीज़ों की तरह गेहूँ का भी एक सा होने पर सहमत हैं, इसलिए इस पर भरोसा करना आवश्यक है।
  5. इब्न-ए-हजर कहते हैं : अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अनहु- की यह हदीस बताती है कि सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- के अंदर सुन्नत के अनुसरण, हदीस को मज़बूती से पकड़े रहने और क़ुरआन या हदीस से स्पष्ट प्रमाण होते हुए इजतिहाद करने से गुरेज़ करने का जज़्बा कितना मौजूद था। यहाँ यह याद रहे कि मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- का इजतिहाद और लोगों का उनसे सहमत होना इस बात का प्रमाण है कि इजतिहाद करना जायज़ और प्रशंसनीय है, लेकिन अगर क़ुरआन एवं हदीस का स्पष्ट निर्देश मौजूद हो, तो उसका कोई एतबार नहीं है।
हवाला

صحيح البخاري (2/ 131) (1508). صحيح مسلم (2/ 678) (985). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص309). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 409). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 251).

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मुसलमान को उसके घोड़े और गुलाम की ज़कात नहीं देनी है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «ليس على المُسلِم في عبدِهِ وَلاَ فَرَسهِ صَدَقَة». وفي لفظ: «إلا زكاة الفِطر في الرقيق».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- वर्णन करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मुसलमान को उसके घोड़े और गुलाम की ज़कात नहीं देनी है। एक अन्य रिवायत में ये शब्द भी आए हैं: परन्तु गुलाम की ओर से फ़ितरा देना है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

ज़कात की बुनियाद बराबरी और न्याय पर है। इसीलिए अल्लाह ने ज़कात धनवानों के ऐसे धन पर अनिवार्य की है, जो बढ़ने वाले हों और बढ़ने के लिए रखे गए हों, जैसे ज़मीन की पैदावार और व्यापार के सामान। जहाँ तक उन धनों का संबंध है, जिनके अंदर वृद्धि नहीं होती, यानी ऐसे धन जो अपने दख़ल में तथा व्यक्तिगत उपयोग के लिए हों, तो उनपर ज़कात नहीं है, क्योंकि यह स्वयं उसके प्रयोग के लिए होते हैं। इसके उदाहरणस्वरूप हम किसी की सवारी, जैसे घोड़ा, ऊँट, गाड़ी आदी और उसकी सेवा करने वाले दास, बिस्तर और प्रयोग के लिए रखे गए बरतन आदि को ले सकते हैं। लेकिन दास का फ़ितरा देना होगा, चाहे वह व्यापार का न भी हो, क्योंकि फ़ितरा का संबंध धन से नहीं, बल्कि शरीर से है।

हवाला

عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، تأليف: إسماعيل الأنصاري، مطابع دار الفكر، الطبعة الأولى:1381هـ. صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى 1422هـ. صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت.

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अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े (सब पर) एक साअ् खजूर या एक साअ् जौ फ़र्ज़ क़रार दिया है और आदेश दिया है कि उसे नमाज़ के लिए लोगों के निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।

عَنِ ابْنِ عُمَرَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمَا قَالَ: فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ زَكَاةَ الفِطْرِ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ، عَلَى العَبْدِ وَالحُرِّ، وَالذَّكَرِ وَالأُنْثَى، وَالصَّغِيرِ وَالكَبِيرِ مِنَ المُسْلِمِينَ، وَأَمَرَ بِهَا أَنْ تُؤَدَّى قَبْلَ خُرُوجِ النَّاسِ إِلَى الصَّلاَةِ.
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से रिवायत है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सदक़ा-ए-फ़ित्र मुसलमान ग़ुलाम और आज़ाद, मर्द और औरत, छोटे और बड़े (सब पर) एक साअ् खजूर या एक साअ् जौ फ़र्ज़ क़रार दिया है और आदेश दिया है कि उसे नमाज़ के लिए लोगों के निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने रमज़ान के बाद ज़कात अल-फ़ित्र वाजिब की है, जो एक साअ् यानी चार मुद है। मुद दरअसल एक औसत क़द-काठी के इन्सान के लप भर को कहते हैं। ज़कात-ए-फ़ित्र हर ऐसे मुसलमान पर वाजिब है, जिसके पास एक दिन तथा एक रात के खाने से अधिक वस्तु मौजूद हो। ग़ुलाम हो कि आज़ाद, पुरुष हो कि महिला और छोटा हो कि बड़ा। इन्सान ज़कात-ए-फ़ित्र अपनी ओर से तथा ऐसे सभी लोगों की ओर से अदा करेगा, जिनका भरण-पोषण वह करता हो। साथ ही यह भी आदेश दिया कि फ़ितरा लोगों के ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले-पहले अदा कर दिया जाए।

फ़ायदे
  1. ज़कात-ए-फ़ित्र छोटे व बड़े और आज़ाद तथा ग़ुलाम हर मुसलमान की ओर से देना वाजिब है। देने का काम अभिभावक तथा मालिक करेगा। इन्सान ज़कात-ए-फ़ित्र अपनी ओर से, अपने बाल-बच्चों की ओर से और उन तमाम लोगों की ओेर से अदा करेगा, जिनका भरण-पोषण उसपर वाजिब है।
  2. माँ के पेट में पल रहे बच्चे की ओर से ज़कात-ए-फ़ित्र निकालना वाजिब नहीं, बल्कि मुसतहब है।
  3. इस बात का बयान कि ज़कात-ए-फ़ित्र में कौन-कौन सी चीज़ें निकालनी हैं। दरअसल ज़कात-ए-फ़ित्र में लोगों की सामान्य खाने की चीज़ें निकाली जाएँगी।
  4. ज़कात-ए-फ़ित्र ईद की नमाज़ से पहले-पहले निकाल देना वाजिब है। बेहतर यह है कि ईद के दिन सुबह निकाली जाए। एक-दो दिन पहले निकालना भी जायज़ है।
हवाला

صحيح البخاري (2/ 130) (1503). صحيح مسلم (2/ 679) (986). تيسير العلام، لعبد الله البسام (ص309). تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، لابن عثيمين (3/ 406). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (1/ 249).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com