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तशरीह के साथ हदीसें

ज़कात की अनिवार्यता तथा ज़कात अदा न करने वाले का हुक्म

4 हदीसें

जो भी सोना या चाँदी रखने वाला व्यक्ति अपने उस धन का हक़ (ज़कात) अदा नहीं करता, उसके लिए क़यामत के दिन आग की तख़्तियाँ तैयार की जाएँगी

عَنْ أَبي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَا مِنْ صَاحِبِ ذَهَبٍ وَلَا فِضَّةٍ، لَا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا، إِلَّا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ، صُفِّحَتْ لَهُ صَفَائِحُ مِنْ نَارٍ، فَأُحْمِيَ عَلَيْهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ، فَيُكْوَى بِهَا جَنْبُهُ وَجَبِينُهُ وَظَهْرُهُ، كُلَّمَا بَرَدَتْ أُعِيدَتْ لَهُ، فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ، حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ، فَيَرَى سَبِيلَهُ، إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ، وَإِمَّا إِلَى النَّارِ» قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ، فَالْإِبِلُ؟ قَالَ: «وَلَا صَاحِبُ إِبِلٍ لَا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا، وَمِنْ حَقِّهَا حَلَبُهَا يَوْمَ وِرْدِهَا، إِلَّا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ، بُطِحَ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ، أَوْفَرَ مَا كَانَتْ، لَا يَفْقِدُ مِنْهَا فَصِيلًا وَاحِدًا، تَطَؤُهُ بِأَخْفَافِهَا وَتَعَضُّهُ بِأَفْوَاهِهَا، كُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ أُولَاهَا رُدَّ عَلَيْهِ أُخْرَاهَا، فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ، حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ، فَيَرَى سَبِيلَهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ، وَإِمَّا إِلَى النَّارِ» قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ، فَالْبَقَرُ وَالْغَنَمُ؟ قَالَ: «وَلَا صَاحِبُ بَقَرٍ، وَلَا غَنَمٍ، لَا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا، إِلَّا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ بُطِحَ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ، لَا يَفْقِدُ مِنْهَا شَيْئًا، لَيْسَ فِيهَا عَقْصَاءُ، وَلَا جَلْحَاءُ، وَلَا عَضْبَاءُ تَنْطَحُهُ بِقُرُونِهَا وَتَطَؤُهُ بِأَظْلَافِهَا، كُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ أُولَاهَا رُدَّ عَلَيْهِ أُخْرَاهَا، فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ، حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ، فَيَرَى سَبِيلَهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ، وَإِمَّا إِلَى النَّارِ» قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ، فَالْخَيْلُ؟ قَالَ: «الْخَيْلُ ثَلَاثَةٌ: هِيَ لِرَجُلٍ وِزْرٌ، وَهِيَ لِرَجُلٍ سِتْرٌ، وَهِيَ لِرَجُلٍ أَجْرٌ، فَأَمَّا الَّتِي هِيَ لَهُ وِزْرٌ، فَرَجُلٌ رَبَطَهَا رِيَاءً وَفَخْرًا وَنِوَاءً عَلَى أَهْلِ الْإِسْلَامِ، فَهِيَ لَهُ وِزْرٌ، وَأَمَّا الَّتِي هِيَ لَهُ سِتْرٌ، فَرَجُلٌ رَبَطَهَا فِي سَبِيلِ اللهِ، ثُمَّ لَمْ يَنْسَ حَقَّ اللهِ فِي ظُهُورِهَا وَلَا رِقَابِهَا، فَهِيَ لَهُ سِتْرٌ وَأَمَّا الَّتِي هِيَ لَهُ أَجْرٌ، فَرَجُلٌ رَبَطَهَا فِي سَبِيلِ اللهِ لِأَهْلِ الْإِسْلَامِ، فِي مَرْجٍ وَرَوْضَةٍ، فَمَا أَكَلَتْ مِنْ ذَلِكَ الْمَرْجِ، أَوِ الرَّوْضَةِ مِنْ شَيْءٍ، إِلَّا كُتِبَ لَهُ، عَدَدَ مَا أَكَلَتْ حَسَنَاتٌ، وَكُتِبَ لَهُ، عَدَدَ أَرْوَاثِهَا وَأَبْوَالِهَا، حَسَنَاتٌ، وَلَا تَقْطَعُ طِوَلَهَا فَاسْتَنَّتْ شَرَفًا، أَوْ شَرَفَيْنِ، إِلَّا كَتَبَ اللهُ لَهُ عَدَدَ آثَارِهَا وَأَرْوَاثِهَا حَسَنَاتٍ، وَلَا مَرَّ بِهَا صَاحِبُهَا عَلَى نَهْرٍ، فَشَرِبَتْ مِنْهُ وَلَا يُرِيدُ أَنْ يَسْقِيَهَا، إِلَّا كَتَبَ اللهُ لَهُ، عَدَدَ مَا شَرِبَتْ، حَسَنَاتٍ» قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ، فَالْحُمُرُ؟ قَالَ: «مَا أُنْزِلَ عَلَيَّ فِي الْحُمُرِ شَيْءٌ، إِلَّا هَذِهِ الْآيَةَ الْفَاذَّةُ الْجَامِعَةُ»: {فَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًا يَرَهُ، وَمَنْ يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ شَرًّا يَرَهُ} [الزلزلة: 8].
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो भी सोना या चाँदी रखने वाला व्यक्ति अपने उस धन का हक़ (ज़कात) अदा नहीं करता, उसके लिए क़यामत के दिन आग की तख़्तियाँ तैयार की जाएँगी और उन्हें जहन्नम की आग में तपाया जाएगा, फिर उनसे उसके पहलू, उसकी पेशानी और पीठ को दागा जाएगा। जब-जब तख़्तियाँ ठंडी हो जाएँगी, उन्हें दोबारा गर्माया जाएगा। यह अज़ाब एक ऐसे दिन में होगा, जिसकी अवधि पचास हज़ार साल के बराबर होगी। (यह सिलसिला जारी रहेगा) यहाँ तक कि बंदों के दर्मियान फ़ैसला कर दिया जाए और (अज़ाब में गिरफ़्तार व्यक्ति) जन्नत या जहन्नम की ओर जाने वाले अपने रास्ते को देख ले।" पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! ऊँटों का क्या हुक्म है? आपने फ़रमाया : "जो व्यक्ति ऊँटों का मालिक हो और उनका हक़ (ज़कात) अदा न करता हो, जबकि उनका हक़ यह भी है कि उनको पानी पिलाने के दिन (ज़रूरतमंदों एवं यात्रियों के लिए) उनका दूध दूहा जाए, तो क़यामत के दिन एक बड़े समतल मैदान में उसे ऊँटों के सामने मुँह के बल औंधा डाल दिया जाएगा और उसके सारे ऊँट पहले से भी अधिक मोटे होकर वहाँ उपस्थि होंगे। ऊँट का एक बच्चा तक अनुपस्थित नहीं होगा। यह ऊँट अपने खुरों से उस व्यक्ति को रौंदेंगे और अपने मुँह से उसे काटेंगे। जब अंतिम ऊँट (उसे रौंदते हुए) गुज़र जाएगा, तो पहले ऊँट को दोबारा लौटा दिया जाएग। यह अज़ाब ऐसे दिन में होगा, जिसकी अवधि पचास हज़ार साल होगी। (यह सिलसिला जारी रहेगा) यहाँ तक कि बंदों के दर्मियान फ़ैसला कर दिया जाए और वह जन्नत या जहन्नम की ओर जाने वाला अपना रास्ता देख ले।" पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! गायों और बकरियों का क्या हुक्म है? आपने फ़रमाय : "जो व्यक्ति गायों और बकरियों का मालिक हो और उनका हक़ (ज़कात) अदा न करता हो, क़यामत के दिन उसे एक बड़े समतल मैदान में उसकी गायों एवं बकरियों के सामने औंधे मुँह डाल दिया जाएगा। एक भी गाय या बकरी कम नहीं दिखेगी। किसी का सींग न मुड़ा होगा, न टूटा होगा और न कोई बिना सींग की होगी। वह अपनी सींगों से उसे मारेंगी और अपने खुरों से उसे रौंदेंगी। जब अंतिम गाय या बकरी रौंदकर गुज़र जाएगी, तो पहली गाय को दोबारा लौटा दिया जाएग। यह अज़ाब ऐसे दिन में होगा, जिसकी अवधि पचास हज़ार साल होगी। (यह सिलसिला जारी रहेगा) यहाँ तक कि लोगों के दर्मियान फ़ैसला कर दिया जाए और वह व्यक्ति जन्नत या जहन्नम की ओर जाने वाला अपना रास्ता देख ले।" पूछा गया : ऐ अल्लाह के रसूल! घोड़ों के बारे में क्या हुक्म है? आपने फ़रमयाा : 'घोड़े तीन प्रकार के होते हैं। एक तो वह घोड़े जो इन्सान के लिए बोझ (गुनाह का सबब) होते हैं, दूसरे वह घोड़े जो इन्सान के लिए पर्दा होते हैं और तीसरे वह घोड़े जो इन्सान के लिए सवाब का सबब बनते हैं। जो घोड़े इन्सान के लिए गुनाह का सबब हुआ करते हैं, वह ऐसे घोड़े हैं, जिन्हें वह लोगों को दिखाने, अभिमान और मुसलमानों का मुक़ाबला करने के लिए रखता है। इस प्रकार के घोड़े इन्सान के लिए गुनाह का सबब हुआ करते हैं। जो घोड़े इन्सान के लिए पर्दा बनते हैं, वह ऐसे घोड़े हैं, जिन्हें इन्सान अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए पालता है और उनकी पीठ और गर्दनों के बारे में अल्लाह के हक़ को नहीं भूलता। इस प्रकार के घोड़े इन्सान के लिए पर्दा हुआ करते हैं। जो घोड़े इन्सान के लिए नेकी का सबब हुआ करते हैं, वह ऐसे घोड़े हैं, जिन्हें आदमी अल्लाह के मार्ग में जिहाद के उद्देश्य से मुसलमानों के लिए चरागाह या बाग में बाँधकर रखे। वह घोड़े उस चरागाह या बाग में जो कुछ भी खाते हैं, उनके परिमाण में उसके लिए नेकियाँ लिखी जाती हैं और उनकी लीद एवं पेशाब के परिमाण में भी उसके हक़ में नेकियाँ लिखी जाती हैं। अगर वह अपनी रस्सी तोड़कर एक टीले या दो टीलों पर दौड़कर चढ़ जाएँ, तो इस दौरान उनके पाँव के पड़ने वाले निशानों और उनकी गिरने वाली लीद के परिमाण में भी अल्लाह उसके लिए नेकियाँ लिख देता है। अगर उनका मालिक उन्हें ले कर किसी नदी पर से गुज़रे और वह उसका पानी पी लें, हालाँकि उसका उन्हें पानी पिलाने का इरादा न भी हो, तब भी वह जितना पानी पीते हैं, उसके अनुसार अल्लाह उसके लिए नेकियाँ लिख देता है।'"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने विभिन्न प्रकार के धन तथा उनकी ज़कात अदा न करने वाले को क़यामत के दिन होने वाली सज़ा का ज़िक्र किया है। मसलन : 1- सोना, चाँदी तथा उनके जैसे अन्य धन एवं तिजारत के सामान। इनपर अगर ज़कात वाजिब हो जाए और ज़कात अदा न की जाए, तो क़यामत के दिन इनको पिघलाकर पहले तख़्तियों के रूप में ढाला जाएगा और उसके बाद उन तख़्तियों को जहन्नम की आग में तपाकर उनके मालिक को अज़ाब दिया जाएगा, अतः उनसे उसके पहलू, पेशानी और पीठ को दागा जाएगा, जब-जब वह ठंडी पड़ जाएँगी, उन्हें दोबारा तपाया जाएगा। क़यामत के दिन अज़ाब का यह सिलसिला दिन भर जारी रहेगा। वह दिन भी पचास हज़ार साल का होगा। थमेगा उसी समय जब लोगों के बीच अल्लाह फ़ैसला कर देगा और यह तय हो जाएगा कि वह जन्नत जाने वालों में से है या जहन्नम की तरफ जाने वालों में से है। 2- ऊँट का जो मालिक फ़र्ज़ ज़कात और उसका हक़ अदा न करता हो, मसलन उसका दूध ग़रीबों और निर्धनों को न पिलाता हो, तो क़यामत के दिन किसी एक भी ऊँट को छोड़े बिना उसके सारे ऊँटों को मोटा-ताज़ा बनाकर लाया जाएगा, फिर उनके मालिक को उनके सामने एक समतल एवं विस्तृत भूमि में लिटा दिया जाएगा, उसके बाद वह ऊँट उसे अपने पैरों से रौंदेंगे और अपने दाँतों से काटेंगे। जब अंतिम ऊँट भी गुज़र जाएगा, तो पहले ऊँट से फिर से यह सिलसिला शुरू कर दिया जाएगा। अज़ाब का यह सिलसिला क़यामत के रोज़ दिन भर जारी रहेगा और वह दिन भी पचास हज़ार वर्ष का होगा। थमेगा उसी समय जब सारे लोगों के बीच अल्लाह निर्णय कर देगा और यह तय हो जाएगा कि वह जन्नत जाने वालों में से है या जहन्नम की तरफ जाने वालों में से है।। 3- गाय और बकरी का जो मालिक उनकी फ़र्ज़ ज़कात न देता हो, क़यामत के दिन उनकी पूरी संख्या के साथ इस तरह लाया जाएगा कि एक गाय या बकरी भी इधर-उधर न होगी। सब जानवर बिलकुल सही-सालिम होंगे। न किसी का सींग मुड़ा होगा, न किसी का सींग टूटा होगा और न कोई जानवर बिना सींग का होगा। फिर उनके मालिक को एक बड़े एवं समतल मैदान में उनके सामने लिटा दिया जाएगा। फिर ये गायें और बकरियाँ उसे अपने सींगों से मारेंगी और अपने पैरों से कुचलेंगी। जब अंतिम गाय एवं बकरी भी गुज़र जाएगी, तो पहली गाय या बकरी से फिर से यह सिलसिला शुरू कर दिया जाएगा। अज़ाब का यह सिलसिला क़यामत के रोज़ दिन भर जारी रहेगा और वह दिन भी पचास हज़ार वर्ष का होगा। थमेगा उसी समय जब सारे लोगों के बीच अल्लाह निर्णय कर देगा तो वह या तो जन्नत वालों में से होगा या जहन्नम वालों में से होगा। 4- घोड़ा पालने वाला। दरअसल घोड़े तीन प्रकार के हुआ करते हैं : 1- ऐसा घोड़ा जो मालिक के लिए गुनाह का कारण बने। इससे मुराद ऐसा घोड़ा है, जिसे प्रसिद्धि, अभिमान एवं मुसलमानों से युद्ध के लिए पाला जाए। 2- ऐसा घोड़ा जो इन्सान के लिए पर्दे का कारण हो। इससे मुराद ऐसा घोड़ा है, जिसे अल्लाह की राह में जिहाद के लिए रखा जाए और फिर उसके साथ अच्छा व्यवहार करते हुए उसे खिलाने-पिलाने और उसकी देखभाल की बेहतर व्यवस्था की जाए, और इसी के अन्तर्गत नर घोड़े को मादा घोड़ी के पास जाने देना है। 3- ऐसा घोड़ा जो सवाब का कारण बने। इससे मुराद ऐसा घोड़ा है, जिसे अल्लाह की राह में जिहाद के लिए रखा जाए। इस प्रकार के घोड़े जब किसी चरागाह या बाग़ में होते हैं, तो उस चरागाह या बाग़ में जो कुछ भी खाते हैं, उसी परिमाण में उनके मालिक के लिए नेकियाँ लिखी जाती हैं, तथा उनकी लीद और मूत्र के परिमाण में भी उसके लिए नेकियाँ लिख दी जाती हैं। अगर वह रस्सी तोड़कर एक टीले या दो टीलों पर दौड़कर चढ़ जाएँ, तो उनके पैरों के निशानों और इस दौरान गिरने वाली लीद के समान अल्लाह तआला उसके लिए नेकियाँ लिख देता है। अगर उनका मालिक उन्हें किसी नहर पर ले जाए और वो उनका पानी पी लें, चाहे उनका मालिक उन्हें वहाँ पानी पिलाने का इरादा न भी रखता हो, तब भी वो जितना पानी पीते हैं, उसके पिरमाण में अल्लाह उनके लिए नेकियाँ लिख देता है। उसके बाद अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से गधों के बारे में पूछा गया कि क्या इस विषय में गधों का हुक्म घोड़ों की तरह है? आपने उत्तर दिया कि मेरे पास गधों के बारे में कोई निर्देश नहीं आया है। अलबत्ता, यह अद्भुत एवं सारगर्भित आयत मौजूद है, जिसके दायरे में हर प्रकार की नेकियाँ और गुनाह आ जाते हैं, आयत का अर्थ है : जिसने कण भर भी नेकी की होगी, वह उसको देख लेगा, तथा जिसने कण भर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा। [सूरा ज़लज़ला : 8] यानी जिसने अच्छे इरादे से गधा पाला होगा, वह उसका सवाब सामने देखेगा और जिसने बुरे इरादे से गधा पाला होगा, वह उसकी सज़ा सामने देखेगा। इस आयत के दायरे में हर प्रकार के कार्य आ जाते हैं।

फ़ायदे
  1. ज़कात देना वाजिब है। ज़कात रोकने वाले को बड़ी सख़्त चेतावनी दी गई है।
  2. सुस्ती के कारण ज़कात न देने वाला काफ़िर तो नहीं है, लेकिन बड़े ख़तरे के दहाने पर हुआ करता है।
  3. इन्सान जब किसी नेकी के काम का इरादा करके उसे कर डालता है, तो उसे उस कार्य के विवरणों का भी सवाब मिलता है, चाहे उनकी नीयत न भी की हो।
  4. धन में ज़कात के अतिरिक्त और भी हक़ हुआ करते हैं।
  5. ऊँट का एक हक़ यह है कि जब उसे पानी पिलाने के लिए घाट में ले जाया जाए, तो वहाँ मौजूद ग़रीबों को भी उसका दूध दोहकर पिलाया जाए, ताकि ज़रूरतमंदों को घर-घर न जाना पड़े और जानवरों के लिए भी अच्छा हो। इब्न-ए-बत्ताल कहते हैं : धन पर दो प्रकार के हक़ हैं :व्यक्तिगत अनिवार्यता एवं उसके सिवा। जानवर का दूध दोहकर ग़रीबों को पिलाना अनिवार्य हक़ के दायरे में तो नहीं आता, लेकिन नैतिकता का तक़ाज़ा है।
  6. ऊँट, बैल एवं बकरे से जुड़ा हुआ एक हक़ यह है कि जब उन्हें किसी मादा जानवर को गाभिन करने के लिए छोड़ने को कहा जाए, तो छोड़ दिया जाए।
  7. गधों और उन तमाम चीज़ों का, जिनके बारे में शरीयत का कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद न हो, हुक्म यह है कि वह क़ुरआन की इस आयत की व्यापकता के दायरे में आती हैं : {जिसने कण भर भी नेकी की होगी, वह उसे देख लेगा और जिसने कण भर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा।}
  8. इस आयत में नेक काम करने की प्रेरणा दी गई है, चाहे थोड़ा ही क्यों न हो। इसी तरह बुरे काम से सावधान किया गया है, चाहे मामूली ही क्यों न हो।
हवाला

صحيح البخاري (6/ 175) (4962). صحيح مسلم (2/ 680) (987). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين. بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 350). نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (2/ 862). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 253). تيسير الكريم الرحمن في تفسير كلام المنان، لعبد الرحمن آل سعدي (ص335). فتح الباري شرح صحيح البخاري، لابن حجر (3/ 268). شرح الزرقاني على موطأ مالك، لمحمد الزرقاني (2/ 164). مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي القاري (4/ 1262).

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इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है

عَنْ عَبْدِ اللهِ بنِ عُمَر رضي الله عنهما قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: «بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ، وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُهُ وَرَسُولُهُ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ».
अब्दुल्लाह बिन अमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान मास के रोज़े रखना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम को पाँच स्तंभों पर खड़े एक भवन के समान दर्शाया है। याद रहे कि इस्लाम के शेष काम इस भवन के पूरक की भूमिका रखते हैं। इन पाँच स्तंभों में से पहला स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। यह दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक ही स्तंभ की हैसियत रखती हैं। बंदा इनका उच्चारण अल्लाह के एक होने और बस उसी के इबादत का हक़दार होने को स्वीकार करते हुए, उनके तक़ाजों (मांगों) पर अमल करते हुए, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने का विश्वास रखते हुए और आपका अनुसरण करते हुए करेगा। दूसरा स्तंभ नमाज़ स्थापित करना है। दिन और रात में पाँच फ़र्ज़ नमाज़ें हैं। फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब तथा इशा। इन पाँच नमाज़ों को इनकी शर्तों, स्तंभों और अनिवार्य कार्यों के साथ अदा किया जाएगा। तीसरा स्तंभ फ़र्ज़ ज़कात निकालना है। ज़कात एक आर्थिक इबादत है, जो शरीयत द्वारा धन की एक निर्धारित मात्रा पर वाजिब होती है और जिसे उसके हक़दारों को दिया जाता है। चौथा स्तंभ हज है। हज कुछ निश्चित कार्यो को अल्लाह की इबादत के तौर पर करने के लिए मक्का जाने का इरादा करने का नाम है। पाँचवाँ स्तंभ रमज़ान के रोज़े रखना है। रोज़ा नाम है खाने, पीने और इस तरह की अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह की इबादत की नीयत से रुके रहने का।

फ़ायदे
  1. दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक को छोड़ दिया जाए, तो दूसरी सही नहीं होगी। इसी लिए दोनों को एक स्तंभ बनाया गया है।
  2. यह दोनों गवाहियाँ दीन की बुनियाद हैं। इनके बिना कोई कथन अथवा कार्य ग्रहण योग्य नहीं है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 11) (8)، صحيح مسلم (1/ 45) (16)، و(1/ 88) (82)، فتح الباري لابن رجب (1/ 22)، جامع العلوم والحكم (1/147)، شرح الأربعين لابن العطّار (ص 62)، شرح الأربعين النووية لعبد الكريم الخضير (ص 87)، فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 29)، شرح الأربعين النووية لصالح آل الشيخ (ص 91 - 95)، التحفة الربانية لإسماعيل الأنصاري (ص 12).

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और मैं साद बिन अबी बक्र नामी क़बीले से ताल्लुक़ रखता हूँ।

عن أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ رضي الله عنه قال: بينما نحن جلوس مع النبي صلى الله عليه وسلم في المسجد دخل رجل على جمل، فأناخه في المسجد ثم عقله، ثم قال لهم: أيكم محمد؟ والنبي صلى الله عليه وسلم متكئ بين ظهرانيهم، فقلنا: هذا الرجل الأبيض المتكئ. فقال له الرجل: يا ابن عبد المطلب فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: «قد أجبتك». فقال الرجل للنبي صلى الله عليه وسلم: إني سائلك فمشدد عليك في المسألة، فلا تجد علي في نفسك؟ فقال: «سل عما بدا لك» فقال: أسألك بربك ورب من قبلك، آلله أرسلك إلى الناس كلهم؟ فقال: «اللهم نعم». قال: أنشدك بالله، آلله أمرك أن نصلي الصلوات الخمس في اليوم والليلة؟ قال: «اللهم نعم». قال: أنشدك بالله، آلله أمرك أن نصوم هذا الشهر من السنة؟ قال: «اللهم نعم». قال: أنشدك بالله، آلله أمرك أن تأخذ هذه الصدقة من أغنيائنا فتقسمها على فقرائنا؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم: «اللهم نعم». فقال الرجل: آمنت بما جئت به، وأنا رسول من ورائي من قومي، وأنا ضمام بن ثعلبة أخو بني سعد بن بكر.
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : एक बार हम मस्जिद में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ बैठे हुए थे कि इतने में ऊँट पर सवार होकर एक व्यक्ति आया और अपने ऊँट को मस्जिद में बिठाकर बाँध दिया, फिर पूछने लगा कि तुममें से मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) कौन हैं ? अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस समय सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के बीच टेक लगाकर बैठे हुए थे । हमने कहा : यह सफ़ेद रंग वाले व्यक्ति जो टेक लगाकर बैठे हुए हैं, मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं। तब वह आपसे कहने लगा : ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटे! इसपर आपने फ़रमाया : जो कहना है, कहो! मैं तुझे जवाब देता हूँ। फिर उस आदमी ने आपसे कहा कि मैं आपसे कुछ पूछने वाला हूँ और पूछने में सख़्ती से काम लूँगा। आप दिल में मुझपर नाराज़ ना हों। यह सुन आपने फ़रमाया : कोई बात नहीं जो पूछना है, पूछो।तो उसने कहा कि मैं आपको आपके रब और आपसे पहले वाले लोगों के रब की क़सम देकर पूछता हूँ, क्या अल्लाह ने आपको तमाम इन्सानों की तरफ़ नबी बनाकर भेजा है? आपने फ़रमाया : हाँ अल्लाह गवाह है। फिर उसने कहा : आपको अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ क्या अल्लाह ने आपको दिन रात में पाँच नमाज़ें पढ़ने का आदेश दिया है? आपने फ़रमाया : हाँ अल्लाह गवाह है फिर उसने कहा : मैं आपको अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने साल भर में रमज़ान के रोज़े रखने का आदेश दिया है? आपने फ़रमाया : हाँ, अल्लाह गवाह है। फिर कहने लगा : मैं आपको अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको आदेश दिया है कि आप हमारे मालदारों से सदक़ा लेकर हमारे निर्धनों में बांट दें? आपने फ़रमाया : हाँ अल्लाह गवाह है। उसके बाद वह आदमी कहने लगा : मैं उस (शरीयत) पर ईमान लाता हूँ, जो आप लाए हैं। मैं अपनी क़ौम का प्रतिनिधि बनकर आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ, मेरा नाम ज़िमाम बिन सालबा है और मैं साद बिन अबी बक्र नामी क़बीले से ताल्लुक़ रखता हूँ।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु बयान कर रहे हैं : एक दिन सहाबा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ मस्जिद में बैठे हुए थे कि अचानक एक व्यक्ति ऊँट पर सवार होकर आया और उसे मस्जिद में बिठाकर बाँध दिया। उसके बाद सहाबा से पूछा कि तुममें से कौन मुहम्मद है? उस समय अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों के बीच टेक लगाकर बैठे हुए थे। अतः हमने कहा कि यह टेक लगाकर बैठे हुए गोरे व्यक्ति मुहम्मद हैं। चुनाँचे उस व्यक्ति ने आपको संबोधित करते हुए कहा : ऐ अब्दुल मुत्तलिब के बेटे! उत्तर में आपने कहा : मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूँ। तुम पूछो, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब दूँगा। उस व्यक्ति ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा कि मैं आपसे कुछ बातें पूछूँगा और ज़रा सख़्ती से पूछूँगा, इसलिए आप मुझपर नाराज़ न हों। यानी आप क्रोधित तथा विचलित न हों। यह सुन आपने कहा : जो पूछना है, पूछो। उस व्यक्ति ने कहा : मैं आपसे आपके तथा आपसे पहले लोगों के रब की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको तमाम लोगों की ओर रसूल बनाकर भेजा है? आपने उत्तर दिया : अल्लाह गवाह है कि यह बात सत्य है। आपने अल्लाह को गवाह अपनी बात की सत्यता को स्थापित करने के लिए कही। उस व्यक्ति ने कहा : मैं आपसे अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको इस बात का आदेश दिया है कि हम दिन और रात में पाँच वक़्त की नमाज़ें पढें? आपने कहा : मैं अल्लाह को गवाह बनाकर कहता हूँ कि यह बात सच्ची है। उसने कहा : मैं आपसे अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको आदेश दिया है कि हम साल में इस महीने यानी रमज़ान महीने के रोज़े रखें? आपने कहा : मैं अल्लाह को गवाह बनाकर कहता हूँ कि यह बात सच्ची है। उस व्यक्ति ने कहा : मैं आपसे अल्लाह की क़सम देकर पूछता हूँ कि क्या अल्लाह ने आपको इस बात का आदेश दिया है कि आप हमारे मालदार लोगों से यह ज़कात लें और हमारे ग़रीबों के बीच बाँट दें? अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : मैं अल्लाह को गवाह बनाकर कहता हूँ कि यह बात सच्ची है। यह सब कुछ सुनने के बाद वह व्यक्ति, जिसका नाम ज़िमाम बिन सालबा था, मुसलमान हो गया और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को बताया कि वह अपनी क़ौम को इस्लाम की ओर बुलाएँगे। फिर, बताया कि उनका नाम ज़िमाम बिन सालबा है और वह बनू साद बिन बक्र क़बीले से है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के नबी की विनम्रता कि वह व्यक्ति आपके तथा अन्य सहाबा के बीच अंतर नहीं कर सका।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आदर्श आचरण तथा सवाल पूछने वाले का जवाब देने में नर्म अंदाज़। इस हदीस से मालूम होता है कि सवाल का अच्छी तरह जवाब देना आह्वान के क़बूल होने का एक सबब है।
  3. किसी व्यक्ति के परिचय के लिए गोरा, लाल, लंबा और छोटा आदि विशेषताएँ बयान की जा सकती हैं, यदि उद्देश्य ऐब निकालना न हो और इसे संंबंधित बुरा न जाने।
  4. कोई ज़रूरत हो, तो काफ़िर मस्जिद में प्रवेश कर सकता है।
  5. इस हदीस में हज का ज़िक्र नहीं है, क्योंकि हो सकता है कि उस समय हज फ़र्ज़ न हुआ हो।
  6. सहाबा गण इस्लाम की ओर बुलाने के लिए हमेशा तत्पर रहा करते थे। क्योंकि वह व्यक्ति इस्लाम लाने के बाद ही अपनी क़ौम को इस्लाम की ओर बुलाने की बात करने लगा।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 23) (63)، صحيح مسلم (1/ 41) (12)، شرح ابن بطال (1/145)، عمدة القاري شرح صحيح البخاري (2/ 22).

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इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है

عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ بْنِ الخَطَّابِ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «بُنِيَ الإِسْلَامُ عَلَى خَمْسٍ: شَهَادَةِ أَنْ لَا إلَهَ إلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا ‌عَبْدُهُ ‌وَرَسُولُهُ، وَإِقَامِ الصَّلَاةِ، وَإِيتَاءِ الزَّكَاةِ، وَحَجِّ الْبَيْتِ، وَصَوْمِ رَمَضَانَ».
अबू अब्दुर रहमान अब्दुल्लाह बिन उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहुमा कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "इस्लाम की बुनियाद पाँच चीज़ों पर क़ायम है : इस बात की गवाही देना कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, हज करना और रमज़ान मास के रोज़े रखना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस्लाम को पाँच स्तंभों पर खड़े एक भवन के समान दर्शाया है। याद रहे कि इस्लाम के शेष काम इस भवन के पूरक की भूमिका रखते हैं। इन पाँच स्तंभों में से पहला स्तंभ इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के रसूल हैं। यह दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक ही स्तंभ की हैसियत रखती हैं। बंदा इनका उच्चारण अल्लाह के एक होने और बस उसी के इबादत का हक़दार होने को स्वीकार करते हुए, उनके तक़ाजों (मांगों) पर अमल करते हुए, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के रसूल होने का विश्वास रखते हुए और आपका अनुसरण करते हुए करेगा। दूसरा स्तंभ नमाज़ स्थापित करना है। दिन और रात में पाँच फ़र्ज़ नमाज़ें हैं। फ़ज्र, ज़ुहर, अस्र, मग़रिब तथा इशा। इन पाँच नमाज़ों को इनकी शर्तों, स्तंभों और अनिवार्य कार्यों के साथ अदा किया जाएगा। तीसरा स्तंभ फ़र्ज़ ज़कात निकालना है। ज़कात एक आर्थिक इबादत है, जो शरीयत द्वारा धन की एक निर्धारित मात्रा पर वाजिब होती है और जिसे उसके हक़दारों को दिया जाता है। चौथा स्तंभ हज है। हज कुछ निश्चित कार्यो को अल्लाह की इबादत के तौर पर करने के लिए मक्का जाने का इरादा करने का नाम है। पाँचवाँ स्तंभ रमज़ान के रोज़े रखना है। रोज़ा नाम है खाने, पीने और इस तरह की अन्य रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ों से फ़ज्र प्रकट होने से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह की इबादत की नीयत से रुके रहने का।

फ़ायदे
  1. दोनों गवाहियाँ एक-दूसरे के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई हैं। इनमें से एक को छोड़ दिया जाए, तो दूसरी सही नहीं होगी। इसी लिए दोनों को एक स्तंभ बनाया गया है।
  2. यह दोनों गवाहियाँ दीन की बुनियाद हैं। इनके बिना कोई कथन अथवा कार्य ग्रहण योग्य नहीं है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 11) (8). صحيح مسلم (1/ 45) (16)، و(1/ 88) (82). فتح الباري لابن رجب (1/ 22). جامع العلوم والحكم (1/147). شرح الأربعين لابن العطّار (ص 62). شرح الأربعين النووية لعبد الكريم الخضير (ص 87). فتح القوي المتين في شرح الأربعين للعباد (ص 29). شرح الأربعين النووية لصالح آل الشيخ (ص 91 - 95). التحفة الربانية لإسماعيل الأنصاري (ص 12).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com