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तशरीह के साथ हदीसें

जमात से पढ़ी जाने वाली नमाज़ की फ़ज़ीलत तथा अहकाम

16 हदीसें

अपने परिवार ओर वापस जाओ, उनके बीच रहो, उन्हें शिक्षा प्रदान करो, आदेश दो और अमुक नमाज़ अमुक समय में तथा अमुक नमाज़ अमुक समय में पढ़ो। जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।

عن أبي سليمان مالك بن الحويرث رضي الله عنه قال: أَتَينَا رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- ونَحنُ شَبَبَةٌ مُتَقَارِبُون، فَأَقَمْنَا عِندَهُ عِشْرِينَ لَيلَةً، وَكَان رَسُولُ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- رَحِيمًا رَفِيقًا، فَظَنَّ أَنَّا قَدْ اشْتَقْنَا أَهْلَنَا، فَسَألَنا عمَّنْ تَرَكْنا مِنْ أَهلِنا، فأَخبَرنَاه، فقال: «ارْجِعُوا إلى أَهْلِيكُم، فَأَقِيمُوا فيهم، وَعَلِّمُوهُم وَمُرُوهُم، وَصَلُّوا صَلاَةَ كَذَا في حِينِ كذَا، وصَلُّوا كَذَا في حِينِ كَذَا، فَإِذا حَضَرَتِ الصلاةُ فَلْيُؤذِّن لكم أَحَدُكُم وَلْيَؤُمَّكُم أكبركم». زاد البخاري في رواية له: «وصَلُّوا كَمَا رَأَيتُمُونِي أُصَلِّي».
अबू सुलैमान मालिक बिन हुवैरिस (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए। हम लोग उस समय लगभग समान आयु वाले जवान थे। हम आपके पास बीस दिन ठहरे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बहुत ही दयालु और नरम स्वभाव के मालिक थे। आपको लगा कि हम लोग अपने परिवार की ओर लौटने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हमसे हमारे परिवार के बारे में पूछा, तो हमने आपको बताया। इसपर आपने फ़रमायाः "अपने परिवार ओर वापस जाओ, उनके बीच रहो, उन्हें शिक्षा प्रदान करो, आदेश दो और अमुक नमाज़ अमुक समय में तथा अमुक नमाज़ अमुक समय में पढ़ो। जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد بن علان الشافعي، دار الكتاب العربي- بيروت - بدون تاريخ. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة - بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. صحيح البخاري، للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب - الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. كنوز رياض الصالحين، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا - الطبعة الأولى 1430هـ. شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.

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जब तुममें से किसी की पत्नी उससे मस्जिद जाने की अनुमति माँगे, तो वह उसे न रोके।

عن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما عَنِ النَّبيِّ - صلى الله عليه وسلم - قَالَ: «إذا اسْتَأذَنَت أَحَدَكُم امرَأَتُه إلى المسجِد فَلا يَمنَعهَا، قال: فقال بلال بن عبد الله: والله لَنَمنَعُهُنَّ، قال: فَأَقبَلَ عليه عبد الله، فَسَبَّهُ سَبًّا سَيِّئًا، ما سَمِعتُه سَبَّهُ مِثلَهُ قَطُّ، وقال: أُخبِرُك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وتقول: والله لَنَمنَعُهُنَّ؟». وفي لفظ: «لا تَمنَعُوا إِمَاء الله مسَاجِد الله...».
अबदुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जब तुममें से किसी की पत्नी उससे मस्जिद जाने की अनुमति माँगे, तो वह उसे न रोके।" वर्णनकर्ता कहते हैं कि यह सुन, बिलाल बिन अबदुल्लाह ने कहाः अल्लाह की क़सम, हम उन्हें अवश्य रोकेंगे। वर्णनकर्ता कहते हैं कि अब्दुल्लाह ने उनकी ओर मुँह करके उन्हें इतना बुरा-भला कहा कि मैंने उन्हें इस तरह बुरा-भला कहते कभी नहीं सुना था। साथ ही फ़रमायाः मैं तुम्हें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीस सुना रहा हूँ और तुम कहते हो कि हम उन्हें अवश्य रोकेंगे? तथा एक रिवायत के शब्द हैंः अल्लाह की बंदियों को अल्लाह की मस्जिदों से न रोको।
इसे दोनों रिवायतों के साथ बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अबदुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने एक हदीस सुनाई कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है कि यदि किसी की पत्नी उससे मस्जिद जाने की अनुमति माँगे, तो उसे न रोके; ताकि वह मस्जिद में जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ने की फज़ीलत से वंचित न हो। इससे पता चलता है कि महिला का मस्जिद जाना जायज़ है। अबदुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने जब यह हदीस सुनाई, तो उस समय वहाँ उनका एक बेटा उपस्थित था। उन्हें लग रहा था अब हालात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के समय जैसे नहीं रहे और स्त्रियों ने पहले की तुलना में अधिक बनाव-सिंगार शुरू कर दिया है। अतः, स्त्रियों की सुरक्षा के जज़्बे से ओत-प्रोत होकर कह उठे कि अल्लाह की क़सम, हम उन्हें ज़रूर रोकेंगे। (ज्ञात हो कि उनका उद्देश्य अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बात पर आपत्ति करना नहीं था।) लेकिन, उनके इस रवैये से उनके पिता यह समझ बैठे कि वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीस पर आपत्ति जता रहे हैं। इसलिए अल्लाह और उसके रसूल के विरोध के क्रोध से प्रभावित होकर उन्होंने अपने बेटे को बहुत ज़्यादा बुरा-भला कहा और फ़रमायाः मैं तुम्हें अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीस सुना रहा हूँ और तुम कहते हो कि अल्लाह की क़सम, हम उन्हें अवश्य रोकेंगे?

हवाला

تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة لأحكام، لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408 هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ.

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आदमी को जमात के साथ नमाज़ पढ़ने से घर तथा बाज़ार में नमाज़ पढ़ने की तुलना में पच्चीस गुना अधिक सवाब मिलता है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعًا: «صلاة الرجل في جماعة تَضعُفُ على صلاته في بيته وفِي سُوقِه خمسا وعشرين ضِعفًا، وذلك: أَنَّه إِذَا تَوَضَّأ، فَأَحسَن الوُضُوء، ثمَّ خرج إلى المسجد لاَ يُخرِجُهُ إلاَّ الصلاة؛ لَم يَخْطُ خُطوَةً إِلاَّ رُفِعَت له بِها درجة، وَحُطَّ عَنهُ بها خطيئة، فإذا صلَّى لم تزل الملائكة تُصَلِّي عليه، ما دام في مُصَلاَّه: اللهُمَّ صَلِّ عليه، اللهم اغفِر له، اللهم ارْحَمه، ولا يزال في صلاة ما انتظر الصلاة».
अबु हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "आदमी को जमात के साथ नमाज़ पढ़ने से घर तथा बाज़ार में नमाज़ पढ़ने की तुलना में पच्चीस गुना अधिक सवाब मिलता है। वह इसलिए कि जब अच्छी तरह वज़ू करता है, फ़िर मस्जिद सिर्फ नमाज़ के लिए ही निकलता है, तो प्रत्येक क़दम पर उसकी एक श्रेणी ऊँची की जाती है तथा उसका एक पाप मिटाया जाता है। फिर जब नमाज ख़त्म हो जाती है, तो फ़रिश्ते उसके लिए प्रार्थना करते रहते हैं, जब तक वह मस्जिद में होता है। वे कहते रहते हैंः ऐ अल्लाह, उसपर दया कर। ऐ अल्लाह, उसे क्षमा कर दे। ऐ अल्लह, उसपर रहम कर। तथा वह जब तक नमाज़ की प्रतीक्षा में रहता है, उस समय तक नमाज़ ही में होता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बताया है कि आदमी जब जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ता है, उसे उसकी घर अथवा बाज़ार में अकेले पढ़ी गई नमाज़ की तुलना में पच्चीस गुना अधिक नेकी मिलती है। यहाँ जमाअत में नमाज़ पढ़ने से तुलना यही बताती है कि घर में पढ़ी गई नमाज़ से आशय घर में अकेले पढ़ी गई नमाज़ है। वैसे भी, घर और बाज़ार में नमाज़ आम तौर पर अकेले ही पढ़ी जाती है। शब्द (وذلك) से यदि जमाअत वाली नमाज़ की अकेले पढ़ी जाने वाली नमाज़ से उत्तम होना मुराद है, तो इसका अभिप्राय यह है कि यह मस्जिद की जमाअत के साथ खास है। और शब्द (أنه) से आशय या तो परिस्थिति है या वह आदमी, जो अच्छी तरह, अर्थात सुन्नतों का ख़याल रखते हुए पूरे तौर पर वुज़ू करके केवल नमाज़ पढ़ने के उद्देश्य से मस्जिद के लिए निकलता है, (यदि वह किसी और उद्देश्य से निकलता है या कोई और उद्देश्य भी शामिल होता है, तो वह उस फ़ज़ीलत से वंचित रहेगा, जिसका ज़िक्र आगे आ रहा है) तो उसके हर क़दम के बदले में उसे एक श्रेणी ऊँचा कर दिया जाता है और उसका एक गुनाह मिटा दिया जाता है। वैसे, यहाँ गुनाह से आशय अल्लाह के हक़ से संबंधित छोटे गुनाह हैं। फिर जब वह नमाज़ पढ़ता है, तो फ़रिश्ते उसके लिए दया की दुआ तथा क्षमा याचना करते रहते हैं। यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब तक वह नमाज़ के स्थान में बैठा रहता है और उसका वुज़ू टूट नहीं जाता। यह भी संभव है कि यहाँ केवल नमाज़ के स्थान में होना मुराद हो, चाहे लेटा हुआ ही क्यों न हो। तथा वह जब तक वह नमाज़ की प्रतीक्षा में रहता है, नमाज़ ही में होता है।

हवाला

الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى، 1381هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة، 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام -صلى الله عليه وسلم-، لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، الطبعة: الثانية، 1408هـ. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.

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जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है।

عن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «صلاةُ الجَمَاعَة أَفضَلُ من صَلاَة الفَذِّ بِسَبعٍ وعِشرِين دَرَجَة».
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

यह हदीस़ जमाअत के साथ पढ़ी गई नमाज़ के अकेले पढ़ी गई नमाज़ से उत्तम होने का उल्लेख करते हुए कहती है कि जमाअत वाली नमाज़ (अन्य महत्वपूर्ण फ़ायदों और लाभों के अतिरिक्त) अकेले की नमाज़ से सत्ताईस गुना अधिक सवाब रखती है। क्योंकि दोनों नमाज़ों के बीच उद्देश्य की पूर्ति के मामले में ज़मीन आसमान का अंतर है तथा इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है कि जिसने इस बड़े लाभ को नष्ट कर दिया, वही वास्तव में वंचित व्यक्ति है।

हवाला

تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الإمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة، 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم، لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، الطبعة: الثانية، 1408هـ. صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.

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बनू सलमा! तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे। तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे।

عن جابر رضي الله عنه قال: أراد بنو سلمة أن ينتقلوا للسكن قرب المسجد فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال لهم: «إنه قد بلغني أنكم تُريدون أن تنتقلوا قُرب المسجد؟» فقالوا: نعم، يا رسول الله قد أردنا ذلك، فقال: «بَنِي سَلِمَة، دِيارَكُم، تُكتب آثارُكُم، ديارَكُم تُكتب آثاركُم». وفي رواية: «إن بكلِّ خَطْوَة درجة».
जाबिर- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि बनू सलमा ने अपने रहने का स्थान बदलकर मस्जिदे नबवी के निकट आ जाने का इरादा कर लिया। इसकी सूचना अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिली, तो फ़रमायाः "मुझे यह सूचना मिली है कि तुम मस्जिद के निकट आ जाना चाहते हो।" उन्होंने कहाः हाँ, ऐ अल्लाह के रसूल! हमने यह इरादा कर लिया है। आपने फ़रमायाः "बनू सलमा! तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे। तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे।" तथा एक रिवायत में हैः "हर क़दम के बदले में तुम्हारा एक दर्जा ऊँचा होगा।"
इसे बुखारी ने इन्हीं जैसे शब्दों के साथ रिवायत किया है । - इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

كنوز رياض الصالحين، أ. د. حمد بن ناصر بن عبد الرحمن العمار، دار كنوز اشبيليا، الطبعة الأولى، 1430هـ. بهجة الناظرين، الشيخ: سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الكتاب غير نازل في الشاملة وحملته من المكتبة الوقفية، ولم أجد بيانات غير ما ذكرنا. نزهة المتقين، د. مصطفى سعيد الخن، د. مصطفى البغا، محي الدين مستو، علي الشرجبي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة الأولى. 1397هـ - 1977م. شرح رياض الصالحين، الشيخ: محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن للنشر، طبع عام 1426هـ. رياض الصالحين، د. ماهر بن ياسين الفحل، الناشر: دار ابن كثير للطباعة والنشر والتوزيع، دمشق - بيروت، الطبعة: الأولى، 1428هـ - 2007م. صحيح البخاري، محمد بن اسماعيل البخاري، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، المؤلف: مسلم بن الحجاج أبو الحسن القشيري، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت. شرح الزرقاني على موطأ الإمام مالك، المؤلف: محمد بن عبد الباقي بن يوسف الزرقاني، تحقيق: طه عبد الرءوف سعد، الناشر: مكتبة الثقافة الدينية - القاهرة، الطبعة: الأولى، 1424هـ - 2003م. موطأ الإمام مالك، المؤلف: مالك بن أنس بن مالك الأصبحي، صححه ورقمه وخرج أحاديثه وعلق عليه: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت - لبنان، عام النشر: 1406هـ - 1985م. سنن أبي داود، المؤلف: أبو داود سليمان بن الأشعث الأزدي، المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد، الناشر: المكتبة العصرية، صيدا - بيروت. صحيح أبي داود - الأم، المؤلف: محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مؤسسة غراس للنشر والتوزيع، الكويت، الطبعة الأولى، 1423هـ - 2002م. مسند الإمام أحمد بن حنبل، المؤلف: أبو عبد الله أحمد بن محمد بن حنبل الشيباني، المحقق: شعيب الأرناؤوط - عادل مرشد، وآخرون، إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى، 1421هـ - 2001م.

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आदमी का जमात के साथ नमाज़ पढ़ना बाज़ार या घर में नमाज़ पढ़ने की तुलना में (पुण्य के मामले में) बीस से अधिक दर्जा बढ़ा हुआ होता है

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «صَلَاةُ الرَّجُلِ فِي جَمَاعَةٍ تَزِيدُ عَلَى صَلَاتِهِ فِي بَيْتِهِ وَصَلَاتِهِ فِي سُوقِهِ بِضْعًا وَعِشْرِينَ دَرَجَةً، وَذَلِكَ أَنَّ أَحَدَهُمْ إِذَا تَوَضَّأَ فَأَحْسَنَ الْوُضُوءَ، ثُمَّ أَتَى الْمَسْجِدَ لَا يَنْهَزُهُ إِلَّا الصَّلَاةُ، لَا يُرِيدُ إِلَّا الصَّلَاةَ، فَلَمْ يَخْطُ خَطْوَةً إِلَّا رُفِعَ لَهُ بِهَا دَرَجَةٌ، وَحُطَّ عَنْهُ بِهَا خَطِيئَةٌ، حَتَّى يَدْخُلَ الْمَسْجِدَ، فَإِذَا دَخَلَ الْمَسْجِدَ كَانَ فِي الصَّلَاةِ مَا كَانَتِ الصَّلَاةُ هِيَ تَحْبِسُهُ، وَالْمَلَائِكَةُ يُصَلُّونَ عَلَى أَحَدِكُمْ مَا دَامَ فِي مَجْلِسِهِ الَّذِي صَلَّى فِيهِ، يَقُولُونَ: اللهُمَّ ارْحَمْهُ، اللهُمَّ اغْفِرْ لَهُ، اللهُمَّ تُبْ عَلَيْهِ، مَا لَمْ يُؤْذِ فِيهِ، مَا لَمْ يُحْدِثْ فِيهِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "आदमी का जमात के साथ नमाज़ पढ़ना बाज़ार या घर में नमाज़ पढ़ने की तुलना में (पुण्य के मामले में) बीस से अधिक दर्जा बढ़ा हुआ होता है। इसका कारण यह है कि जब तुममें से कोई अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर नमाज़ के इरादे से मस्जिद आता है और नमाज़ के सिवा कोई चीज़ उसे घर से नहीं निकालती, तो मस्जिद पहुँचने तक वह जो भी क़दम उठाता है, उसके बदले में उसका एक दर्जा ऊँचा होता है और एक गुनाह मिटाया जाता है। फिर जब मस्जिद में प्रवेश करता है तो जब तक नमाज़ उसे रोके रखती है, वह नमाज़ में होता है। तथा फ़रिश्ते तुममें से किसी के लिए रहमत की दुआ करते रहते हैं, जब तक वह उस जगह में होता है, जहाँ नमाज़ पढ़ी है। वे कहते रहते हैं : ऐ अल्लाह! इसपर दया कर, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे और ऐ अल्लाह! इसकी तौबा कबूल कर। यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब तक वहाँ किसी को कष्ट न दे, जब तक वहाँ उसका वज़ू टूट न जाए।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब एक मुसलमान जमात के साथ नमाज़ पढ़ता है, तो उसकी वह नमाज़ घर या बाज़ार में पढ़ी गई नमाज़ से तेईस (२३) से अधिक गुणा उत्तम शुमार होती है। फिर आपने सबब बयान फ़रमाया। आपने बताया कि जब इन्सान संपूर्ण तरीक़े से और अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर मस्जिद की ओर चल पड़ता है, जिसका उद्देश्य नमाज़ पढ़ने के सिवा कुछ और नहीं होता, तो उसके बदले में उसका स्थान एक दर्जा ऊँचा कर दिया जाता है और उसका एक गुनाह मिटा दिया जाता है। फिर जब वह मस्जिद में प्रवेश करता है और नमाज़ की प्रतीक्षा में बैठ जाता है, तो प्रतीक्षा के दौरान भी उसे नमाज़ का प्रतिफल मिलता रहता है। साथ ही फ़रिश्ते उसके लिए उस समय तक दुआ करते रहते हैं, जब तक वह नमाज़ के स्थान में बैठा रहता है। फ़रिश्ते कहते हैं : "ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे ,ऐ अल्लाह! इसपर दया कर, और ऐ अल्लाह! इसकी तौबा कबूल कर।" यह सिलसिला उस समय तक जारी रहता है, जब तक उसका वज़ू टूट न जाए या कोई ऐसा काम न करे, जिससे इन्सानों या फ़रिश्तों को कष्ट हो।

फ़ायदे
  1. अपने घर या बाज़ार में अकेले पढ़ी गई नमाज़ भी सही है, परंतु किसी उचित कारण के बिना जमात छोड़ने का गुनाह होगा।
  2. मस्जिद के अंदर जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ से 25, 26 या 27 गुणा बेहतर है।
  3. फ़रिश्तों का एक काम मोमिनों के लिए दुआ करना भी है।
  4. वज़ू करके मस्जिद जाने का महत्व।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 103) (477). صحيح مسلم (1/ 459) (649). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين (1/ 26). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 178). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 72). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص15). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 43). المعجم الوسيط (1/ 60).

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जिसने लहसुन या प्याज़ खाया हो वह हमसे दूर रहे - या फ़रमाया : - हमारी मस्जिद से दूर रहे और अपने घर में बैठा रहे।

عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ رضي الله عنهما أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَنْ أَكَلَ ثُومًا أَوْ بَصَلًا، فَلْيَعْتَزِلْنَا -أَوْ قَالَ: فَلْيَعْتَزِلْ- مَسْجِدَنَا، وَلْيَقْعُدْ فِي بَيْتِهِ»، وَأَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أُتِيَ بِقِدْرٍ فِيهِ خَضِرَاتٌ مِنْ بُقُولٍ، فَوَجَدَ لَهَا رِيحًا، فَسَأَلَ فَأُخْبِرَ بِمَا فِيهَا مِنَ البُقُولِ، فَقَالَ قَرِّبُوهَا إِلَى بَعْضِ أَصْحَابِهِ كَانَ مَعَهُ، فَلَمَّا رَآهُ كَرِهَ أَكْلَهَا، قَالَ: «كُلْ فَإِنِّي أُنَاجِي مَنْ لاَ تُنَاجِي». ولِمُسْلِمٍ عَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللهِ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَنْ أَكَلَ مِنْ هَذِهِ الْبَقْلَةِ، الثُّومِ - وقَالَ مَرَّةً: مَنْ أَكَلَ الْبَصَلَ وَالثُّومَ وَالْكُرَّاثَ فَلَا يَقْرَبَنَّ مَسْجِدَنَا، فَإِنَّ الْمَلَائِكَةَ تَتَأَذَّى مِمَّا يَتَأَذَّى مِنْهُ بَنُو آدَمَ».
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने लहसुन या प्याज़ खाया हो वह हमसे दूर रहे - या फ़रमाया : - हमारी मस्जिद से दूर रहे और अपने घर में बैठा रहे।" अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास एक हांडी लाई गई, जिसमें कुछ सब्ज़ियाँ थीं। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को उनकी गंध आई, तो उनके बारे में पूछा। तब आपको उसमें मौजूद सब्ज़ियों के बारे में बताया गया, तो आपने उन्हें अपने किसी सहाबी के क़रीब कर देने को कहा, जो उस समय आपके साथ मौजूद थे। जब उस सहाबी ने (जिन्हें ये सब्ज़ियाँ दी गई थीं) उन्हें देखा, तो उन्होंने भी उन्हें खाने को नापसंद किया। इसपर आपने कहा : "तुम खा लो। क्योंकि मैं उस हस्ती से बात करता हूँ, जिससे तुम नहीं करते।" सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने यह सब्ज़ी यानी लहसुन खाई हो -एक बार फ़रमाया : जिसने प्याज़, लहसुन या गंदना खाई हो, वह हमारी मस्जिद के क़रीब न आए। क्योंकि फ़रिश्तों को भी उन चीज़ों से कष्ट होता है, जिनसे इन्सानों को कष्ट होता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम ने प्याज या लहसुन खाने वाले व्यक्ति को मस्जिद में आने से मना किया है, ताकि इन दोनों चीजों की दुरगंध से मस्जिद में नमाज़ पढ़ने आए अन्य भाइयों को परेशानी न हो। याद रहे कि यह मनाही खासकर मस्जिद जाने की है। खाने की नहीं। क्योंकि इन दोनों चीज़ों का खाना जायज़ है। एक बार ऐसा हुआ कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के समाने सब्ज़ियों की एक हांडी रखी गई। जब आपने सब्ज़ी के अंदर गंध महसूस की और आपको बताया गया कि उसमें क्या है, तो उन्हें खाया नहीं और अपने किसी सहाबी की ओर बढ़ा दिया कि वह खा लें। जब आपका अनुसरण करते हुए उन्होंने भी खाना पसंद नहीं किया और आपने यह दृश्य देखा तो उनसे कहा कि तुम खा लो। मैं इसलिए नहीं खा रहा हूँ कि मुझे फ़रिश्तों से बात करना होता है। आपने बताया कि इन्सानों की तरह फ़रिश्तों को भी बदबूदार चीज़ों से कष्ट होता है।

फ़ायदे
  1. ऐसे व्यक्ति के लिए मस्जिद आने की मनाही, जिसने लहसुन, प्याज़ या गंदना खाई हो।
  2. इन चीज़ों के साथ सिग्रेट एवं तंबाकू आदि उन तमाम बदबूदार चीज़ों को भी मिला दिया जाएगा, जो नमाज़ियों के लिए कष्ट का कारण बनती हैं।
  3. मनाही का कारण बदबू है। अगर अच्छे से पकाने या अन्य किसी कारण से बदबू दूर हो जाए, तो कराहत ख़त्म हो जाएगी।
  4. जिस व्यक्ति पर मस्जिद में आकर नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है, उसके लिए इन चीज़ों को खाना मकरूह है, ताकि मस्जिद में पढ़ी जाने वाली बाजमात नमाज़ उससे छूट न जाए। हालाँकि, अगर वह उपस्थित होने से बचने के लिए इन चीजों को खाता है, तो उसके लिए इन्हें खाना हराम होगा।
  5. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इन चीज़ों को खाने से परहेज़ इसलिए नहीं करते थे कि यह चीज़ें हराम हैं। परहेज़ इसलिए करते थे कि आप जिब्रील अलैहिस्सलाम से बात किया करते थे।
  6. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उत्कृष्ट शिक्षण शैली कि आप आदेश के साथ-साथ उसका कारण भी समझा देते थे, ताकि हिकमत समझ लेने के बाद सामने वाला पूरी तरह आश्वस्त हो जाए।
  7. क़ाज़ी कहते हैं : उलेमा ने नमाज़ पढ़ने की दूसरी जगहों, जैसे ईदगाह और जनाज़ा गाह तथा इबादत के अन्य सामूहिक स्थानों को भी इसपर क़यास किया है। इसी तरह ज्ञान, ज़िक्र और वलीमे आदि की सभाओं को भी इसी पर क़यास किया जाएगा। लेकिन बाज़ारों आदि को नहीं।
  8. उलेमा कहते हैं : यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि लहसुन आदि खाने वाले को ख़ाली मस्जिद में जाने से भी रोका जाएगा। क्योंकि मस्जिद में फ़रिश्ते रहते हैं और हदीसों की व्यापकता भी यही कहती है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 170) (855). صحيح مسلم (1/ 394) (564)، (1/ 395) (564). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص204). تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (2/ 260). تاج العروس من جواهر القاموس، للزَّبيدي (5/ 332).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

जो सुबह के समय या शाम के समय मस्जिद की ओर जाता है, तो वह सुबह या शाम को जब भी जाता है, उसके बदले अल्लाह उसके लिए जन्नत में सत्कार का सामान तैयार करता है।

عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ غَدَا إِلَى الْمَسْجِدِ أَوْ رَاحَ أَعَدَّ اللهُ لَهُ فِي الْجَنَّةِ نُزُلًا، كُلَّمَا غَدَا أَوْ رَاحَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो सुबह के समय या शाम के समय मस्जिद की ओर जाता है, तो वह सुबह या शाम को जब भी जाता है, उसके बदले अल्लाह उसके लिए जन्नत में सत्कार का सामान तैयार करता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इबादत, ज्ञान अर्जित करने या इस तरह के किसी नेक उद्देश्य की ख़ातिर किसी भी समय, दिन के पहले भाग में हो कि अंतिम भाग में, मस्जिद आने वाले को सुसमाचार सुनाया है कि वह रात या दिन के समय जब भी मस्जिद आता है, तो अल्लाह उसके लिए जन्नत में स्थान एवं आतिथ्य तैयार कर देता है।

फ़ायदे
  1. मस्जिद जाने की फ़ज़ीलत तथा वहाँ पाबंदी से फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने की प्रेरणा। मस्जिदों से दूर रहने वाला व्यक्ति अनगिनत भलाइयों, फ़ज़ीलतों, प्रतिफल और अल्लाह की ओर से तैयार आतिथ्य से वंचित हो जाता है।
  2. जब हम इन्सान अपने घर आए हुए अतिथि का सत्कार करते हैं और उसे खाना खिलाते हैं, तो अल्लाह तो अपने बंदों की तुलना में कहीं बड़ा दाता एवं सम्मान देने वाला है। वह भी अपने घर आने वाले अतिथि का सत्कार करता है और उसके लिये एक महान और भव्य आतिथ्य तैयार करता है।
  3. मस्जिद जाना ख़ुशी और रश्क का काम है। क्योंकि इन्सान जितनी बार मस्जिद जाता है, उतनी बार उसके लिए मेहमानी तैयार की जाती है।
हवाला

صحيح البخاري (1/ 133) (662). صحيح مسلم (1/ 463) (669). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 153). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 166). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 204).

यह हदीस HadeethEnc.com पर
16 में से 8
16 हदीसें
  1. अपने परिवार ओर वापस जाओ, उनके बीच रहो, उन्हें शिक्षा प्रदान करो, आदेश दो और अमुक नमाज़ अमुक समय में तथा अमुक नमाज़ अमुक समय में पढ़ो। जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।
  2. जब तुममें से किसी की पत्नी उससे मस्जिद जाने की अनुमति माँगे, तो वह उसे न रोके।
  3. आदमी को जमात के साथ नमाज़ पढ़ने से घर तथा बाज़ार में नमाज़ पढ़ने की तुलना में पच्चीस गुना अधिक सवाब मिलता है।
  4. जमात के साथ पढ़ी गई नमाज़ अकेले पढ़ी गई नमाज़ के मुक़ाबले में सत्ताईस दरजा श्रेष्ठ है।
  5. बनू सलमा! तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे। तुम अपने अस्ल घरों ही में रहो, तुम्हारे क़दमों के निशान लिखे जाएँगे।
  6. आदमी का जमात के साथ नमाज़ पढ़ना बाज़ार या घर में नमाज़ पढ़ने की तुलना में (पुण्य के मामले में) बीस से अधिक दर्जा बढ़ा हुआ होता है
  7. जिसने लहसुन या प्याज़ खाया हो वह हमसे दूर रहे - या फ़रमाया : - हमारी मस्जिद से दूर रहे और अपने घर में बैठा रहे।
  8. जो सुबह के समय या शाम के समय मस्जिद की ओर जाता है, तो वह सुबह या शाम को जब भी जाता है, उसके बदले अल्लाह उसके लिए जन्नत में सत्कार का सामान तैयार करता है।
  9. ऐ लोगों! तुम यह दोनों पदार्थ- प्याज़ एवं लहसुन- खाते हो, मैं इनको बुरा समझता हूँ
  10. “जमात के साथ नमाज़ अकेले की नमाज़ से सवाब में पच्चीस दर्जे ज़्यादा है और रात दिन के फरिश्ते फज्र की नमाज़ में जमा होते हैं।”
  11. क्या तुम नमाज़ के लिए पुकारी जाने वाली अज़ान को सुनते हो?” उसने कहा : हाँ, सुनता हूँ, तो आप ने फ़रमाया : “फिर तो तुम अवश्य उसको ग्रहण करो (अर्थाथ; माज़ पढ़ने के लिए मस्जिद आओ)।”
  12. जो अज़ान सुने लेकिन नमाज़ पढ़ने के लिए (मस्जिद) न आए, उसकी नमाज़ नहीं, सिवाय तब जब कि उसके पास कोई उज़्र (मजबूरी) हो।
  13. ''पुरुषों के लिए सर्वोत्तम सफ़ सबसे प्रथम सफ है और सबसे बुरी सफ़ सबसे अंतिम सफ़ है। जबकि महिलाओं के लिए सबसे अच्छी सफ़ अंतिम सफ़ है तथा सबसे बुरी सफ़ सबसे प्रथम सफ़ है।
  14. “यह दो नमाज़ें मुनाफिकों के लिए सर्वाधिक कठिन हैं और यदि वह जान लेते कि इनमें कितना सवाब है, तो वे अवश्य आते, चाहे (हाथ एवं) घुटनों के बल घिसटते हुए ही क्यों न हो।
  15. अगली सफ़ को पूरा करो, फिर उसके बाद वाली को, और यदि (नमाज़ियों की संख्या कम होने के कारण) सफ़ में कोई कमी रह जाए, तो वह सबसे पिछली सफ़ में होनी चाहिए।
  16. जब नमाज़ खड़ी हो जाए, तो फ़र्ज़ नमाज़ के सिवा कोई नमाज़ ही नहीं।

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com