अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अनहु का हाथ पकड़ा और उनसे फ़रमाया : अल्लाह की क़सम, मैं तुमसे मोहब्बत रखता हूँ और तुमको वसीयत करता हूँ कि हर नमाज़ के आख़िर में यह दुआ हरगिज़ न छोड़ना : "اللهم أَعِنّي على ذكرك" यानी ऐ अल्लाह! आज्ञापालन से क़रीब करने वाले हर कथन एवं कार्य में तेरा ज़िक्र करने, "وشُكْرِك" नेमतें प्राप्त होने और आपदाओं से बचे रहने पर तेरा शुक्र करने, "وحُسْن عبادتك" और इख़्लास के साथ तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ बेहतर अंदाज़ में अपनी इबादत करने पर।
- किसी इन्सान से यह बताना शरीयत सम्मत है कि वह उससे अल्लाह की ख़ातिर मोहब्बत रखता है।
- हर फ़र्ज़ नमाज़ के अंत में यह दुआ पढ़ना मुसतहब है।
- इन चंद शब्दों में जो दुआ सिखाई गई है, उसमें दुनिया एवं आख़िरत की तमाम वांछित चीज़ें सिमट आई हैं।
- मोहब्बत जब अल्लाह के लिए हो, तो इन्सान एक-दूसरे को सच पर क़ायम रहने की वसीयत करता है, एक-दूसरे का शुभचिंतन करता है और अच्छे कामों में एक-दूसरे का सहयोग करता है।
- तीबी कहते हैं : अल्लाह का ज़िक्र आंतरिक प्रफुल्लता की भूमिका, अल्लाह का शुक्र नेमतों की प्राप्ति का साधन और इबादत की सुंदरता से मुराद उन तमाम चीज़ों से ख़ुद को अलग कर लेना है, जो इन्सान को अल्लाह से दूर करके कहीं और व्यस्त कर दें।
سنن أبي داود (2/ 630) (1522). سنن النسائي (3/ 53) (1303). مسند أحمد (36/ 429) (22119). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 450). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص259). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (3/ 264). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (6/ 284). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 353).