अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक ही कपड़े में नमाज़ पढ़ने वाले को इस बात से मना किया है कि अपने दोनों कंधों को नंगा छोड़ दे और उनपर कुछ न रखे। क्योंकि दोनों कंधे यद्यपि शरीर के उन भागों में से नहीं हैं, जिनको छुपाए रखना वाजिब है, लेकिन उनपर कपड़ा रख देने के बाद शरीर के उन भागों को छुपाने का काम बेहतर तौर पर संपन्न होता है, जिनको छुपाने का आदेश दिया गया है और इससे अल्लाह के सामने खड़े होते समय उसका सम्मान भी बेहतर तौर पर प्रदर्शित होता है।
- एक कपड़ा पहनकर नमाज़ पढ़ना जायज़ है, जब कपड़ा शरीर के उतने भाग को छुपा ले, जितने भाग को छुपाना ज़रूरी है।
- दो कपड़ों में नमाज़ पढ़ना जायज़ है, जब एक कपड़ा शरीर के ऊपरी भाग को छुपाए और दूसरा निचले भाग को।
- नमाज़ पढ़ने के लिए जा रहे व्यक्त की वेशभूषा अच्छी होनी चाहिए।
- नमाज़ पढ़ते समय दोनों कंधों या उनमें से किसी एक को ढाँपना आवश्यक है, जब सामर्थ्य हो। जबकि कुछ लोगों के अनुसार इस हदीस में आई हुई मनाही हलकी है (अर्थात यहाँ मना किए हुए काम को छोड़ना आवश्यक नहीं है)।
- सहाबा की निर्धनता का हाल कि उनमें से बहुतों के पास दो कपड़े भी नहीं हुआ करते थे।
- नववी इस हदीस का अर्थ बयान करते हुए लिखते हैं : इसके पीछे रहस्य यह है कि जब किसी व्यक्ति के पास एक ही चादर हो और उसे लुंगी के तौर इस्तेमाल कर ले और कंधे पर कुछ न हो, तो शरीर के उन अंगों के खुल जाने की संभावना बाक़ी रह जाती है, जिनका छुपाना आवश्यक है। जबकि कंधे पर कुछ होने की स्थिति में इसकी संभावना नहीं रहती। दूसरी बात यह है कि कंधे पर कुछ न होने की अवस्था में ऐसा हो सकता है कि नीचे पहने हुए चादर को एक हाथ या दोनों हाथों से पकड़ने की ज़रूरत पड़ जाए, जिससे एक तो नमाज़ से तवज्जो हटेगी और दूसरा दाएँ हाथ को बाएँ हाथ पर सीने के नीचे रखने और जहाँ-जहाँ दोनों हाथों को उठाना सुन्नत है, वहाँ-वहाँ उठाने की सुन्नत छूट जाएगी। एक बात यह भी है कि कंधे पर कुछ न रखना दरअसल शरीर के ऊपरी भाग तथा शोभा के स्थान को ढाँपने से गुरेज़ करना है, जबकि पवित्र एवं महान अल्लाह ने कहा है : "हर नमाज़ के समय उपलब्ध शोभा धारण कर लिया करो"। [सूरा आराफ़ : 31]
صحيح البخاري (1/ 81) (359). صحيح مسلم (1/ 368) (516). سبل السلام، لمحمد الصنعاني (1/ 198). توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، لعبد الله البسام (2/ 8). فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام، لابن عثيمين (1/ 501). منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (2/ 330). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص203).