عن ابن شماسة المهري قال: حَضَرنَا عَمرو بن العاص رضي الله عنه وهُو فِي سِيَاقَةِ الْمَوتِ، فَبَكَى طَوِيلاً، وَحَوَّلَ وَجهَهُ إِلَى الجِدَارِ، فَجَعَلَ ابنَهُ، يقول: يَا أَبَتَاهُ، أَمَا بَشَّرَكَ رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- بكَذَا؟ أمَا بشَّركَ رسول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- بِكَذَا؟ فَأَقبَلَ بِوَجهِهِ، فقَالَ: إِنَّ أَفضَلَ مَا نُعِدُّ شَهَادَةُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ الله، وَأَنَّ مُحَمَّدًا رسولُ الله، إِنِّي قَدْ كُنتُ عَلَى أَطْبَاقٍ ثَلاَثٍ: لَقَدْ رَأَيتُنِي وَمَا أَحَدٌ أَشَدَّ بُغْضًا لِرَسُولِ الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- مِنِّي، وَلاَ أَحَبَّ إِلَيَّ مِنْ أَنْ أَكُونَ قَدْ اسْتَمْكَنْتُ مِنْهُ فَقَتَلْتُهُ، فَلَوْ مُتُّ عَلَى تِلْكَ الحَالِ لَكُنْتُ مِنْ أَهْلِ النَّارِ، فَلَمَّا جَعَلَ اللهُ الإِسْلاَمَ فِي قَلْبِي أَتَيتُ النَبيَّ -صلَّى الله عليه وسلَّم-، فَقُلتُ: ابْسُطْ يَمِينَكَ فَلِأُبَايِعُكَ، فَبَسَطَ يَمِينَهُ فَقَبَضْتُ يَدِي، فقال: «مَا لَكَ يَا عَمرُو؟» قُلتُ: أَرَدْتُ أَنْ أَشْتَرِطَ، قال: «تَشْتَرِطُ مَاذَا؟» قُلتُ: أَنْ يُغْفَرَ لِي، قال: «أَمَا عَلِمتَ أَنَّ الإِسْلاَمَ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ، وَأَنَّ الهِجْرَةَ تَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهَا، وَأَنَّ الحَجَّ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ؟» وَمَا كَان أَحَدٌ أَحبَّ إِلَيَّ مِنْ رسُول الله -صلَّى الله عليه وسلَّم- وَلاَ أَجَلَّ فِي عَينِي مِنْهُ، وَمَا كُنْتُ أُطِيقُ أَنْ أَمْلَأَ عَينِي مِنْهُ؛ إِجْلاَلاً لَهُ، وَلَوْ سُئِلْتُ أَنْ أَصِفَهُ مَا أَطَقْتُ؛ لِأَنِّي لَمْ أَكُنْ أَمْلَأُ عَينِي مِنْهُ، وَلَوْ مِتُّ عَلَى تِلْكَ الحَالِ لَرَجَوْتُ أَنْ أَكُونَ مِنْ أَهْلِ الجَنَّةِ، ثُمَّ وَلِينَا أَشْيَاءَ مَا أَدْرِي مَا حَالِي فِيهَا؟ فَإِذَا أَنَا مِتُّ فَلاَ تَصْحَبْنِي نَائِحَةٌ وَلاَ نَارٌ، فَإِذَا دَفَنْتُمُونِي، فَشُنُّوا عَلَيَّ التُرَابَ شَنًّا، ثُمَّ أَقِيمُوا حَولَ قَبرِي قَدْرَ مَا تُنْحَرُ جَزُور، وَيُقْسَمُ لَحْمُهَا، حتَّى أَسْتَأْنِسَ بِكُم، وَأَنْظُر مَا أُرَاجِعُ بِهِ رُسُلَ رَبِّي.
बिन शुमासा महरी कहते हैं कि हम लोग अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास उस समय पहुँचे, जब वह मृत्युशय्या पर थे। वह देर तक रोते रहे और अपना चेहरा दीवार की ओर फेर लिया। यह देख उनका बेटा कहने लगाः ऐ मेरे पिता जान, क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आपको यह ख़ुशख़बरी नहीं दी थी? क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आपको यह ख़ुशख़बरी नहीं दी थी? तो उन्होंने अपना चेहरा उसकी ओर फेरा और फ़रमायाः हम अपने जिस अमल को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, वह इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं। दरअसल, मैं अब तक तीन परिस्थितियों से गुज़रा हूँ; मैंने ख़ुद को उस परिस्थिति में भी देखा है, जब मेरे निकट कोई अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक घृणित नहीं था। उस समय मेरे निकट सबसे प्रिय बात यह थी कि मैं आपपर क़ाबू पा लूँ और आपका वध कर दूँ। अगर मैं उस परिस्थिति में मर गया होता, तो जहन्नम में होता। फिर जब अल्लाह ने मेरे दिल में इसलाम को डाल दिया, तो मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और कहाः आप अपना दाहिना हाथ बढ़ाएँ, ताकि मैं आपकी बैअत करूँ। चुनांचे आपने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, तो मैंने अपना हाथ खींच लिया। आपने फ़रमायाः "तुमने ऐसा क्यों किया ऐ अम्र?" मैंने कहाः मैं एक शर्त रखना चाहता हूँ। फ़रमायाः "तुम कौन-सी शर्त रखना चाहते हो?" मैंने कहाः यह कि मुझे क्षमा कर दिया जाए। फ़रमायाः "क्या तुम नहीं जानते कि इसलाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है, हिजरत पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है और हज पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है?" उस समय मेरे निकट न कोई अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रिय था और न मेरी आँखों में कोई आपसे अधिक सम्मानित था। आपके प्रताप तथा सम्मान के कारण मैं कभी आपको आँख भरकर देख भी नहीं सकता था। यदि मुझे आपका हुलिया बयान करने को कहा जाए, तो मैं बयान नहीं कर सकता। इसलिए कि मैंने कभी आपको आँख भरकर देखा ही नहीं। यदि मेरी मृत्यु उसी हाल में हो गई होती, तो आशा करता हूँ कि मैं जन्नत में प्रवेश कर जाता। फिर हमने कुछ ज़िम्मेवारियाँ संभालीं। मैं नहीं जानता कि उन मामलों में मेरा क्या हाल रहा। देखो, जब मैं मर जाऊँ, तो मेरे साथ न कोई नौहा-मातम करने वाली स्त्री जाए और न आग। फिर जब मुझे दफ़न कर दो, तो मुझपर थोड़ी-थोड़ी करके मिट्टी डालना और मेरी क़ब्र के आस-पास उतनी देर रुकना, जितनी देर में एक ऊँट ज़बह करके उसके मांस को बाँटा जासके, ताकि मैं तुमसे घुला-मिला रहूँ और देखूँ कि अपने रब के भेजे हुए फ़रिश्तों को क्या उत्तर देता हूँ।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
सुसमाचार तथा बधाई देने के विषय पर आधारित अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- की इस हदीस से एक कहानी जुड़ी हुई है। इस महत्वपूर्ण कहानी का सार यह है कि अम्र -रज़ियल्लाहु अनहु- मृत्युशैया पर थे और दुनिया छोड़ जाने ही वाले थे कि उनके पास उनके कुछ साथी आए, तो वह बहुत ज़्यादा रोने लगे और अपना मुँह दीवार की ओर कर लिया। यह देख उनके बेटे ने उनसे कहा : आख़िर आप रो क्यों रहे हैं, जबकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आपको जन्नत का सुसमाचार सुनाया है? उन्होंने उत्तर दिया : ऐ मेरे बेटे! मैं अब तक तीन परिस्थितियों से गुज़र चुका हूँ। फिर तीनों परिस्थितियों को बयान करते हुए कहा कि पहले वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से बहुत ज़्यादा नफ़रत करते थे। उनको धरती के ऊपर रहने वाले किसी व्यक्ति से उतनी नफ़रत नहीं थी, जितनी आपसे थी। उनकी चाहत तो यह थी कि यदि बस चलता, तो आपका वध कर देते। यह सबसे परले दर्जे का कुफ़्र था। यहाँ तक कि यह परिस्थिति बदली और अल्लाह ने उनके दिल में इस्लाम को डाल दिया। फिर वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आप अपना हाथ बढ़ाइए, मैं इस्लाम पर आपसे बैअत करना चाहता हूँ। चूँकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सर्वोत्तम चरित्र के मालक थे, इसलिए अपना हाथ बढ़ा दिया। लेकिन अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अपना हाथ खींच लिया। उन्होंने ऐसा अभिमान के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी आशंकाओं को दूर करने के लिए किया था। चुनांचे आपने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उत्तर दिया कि मैं एक शर्त के साथ मुसलमान होना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारी शर्त किया है, तो उन्होंने जवाब दिया कि अल्लाह मेरे अब तक के अविश्वास एवं गुनाहों को माफ़ कर दे। उनकी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि उनके गुनाह माफ़ हो जाएँ, क्योंकि उन्हें लगता था कि उन्होंने इतने बड़े-बड़े पाप किए हैं कि अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनसे फ़रमाया : "क्या तुम नहीं जानते कि इस्लाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है, हिजरत पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है और हज पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है?" इस तरह आपने तीन बातों का ज़िक्र किया।
इस्लाम पहले के गुनाहों को नष्ट कर देता है, इसका उल्लेख खुद पवित्र क़ुरआन में भी हुआ है। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : "(हे नबी!) इन काफ़िरों से कह दो कि यदि वे रुक गए, तो जो कुछ हो गया है, वह उनसे क्षमा कर दिया जाएगा और यदि पहले जैसा ही करेंगे, तो अगली जातियों की दुर्गत हो चुकी है।"
इसी तरह जब कोई व्यक्ति अपना नगर, जहाँ वह रह रहा था और जो कुफ़्र का नगर था, त्याग कर निकल जाता है, तो उसके पहले के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
इसी प्रकार हज भी पहले के गुनाहों को नष्ट कर देता है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक अन्य हदीस में फ़रमाया है : "जिसने हज किया और इस दौरान कोई गंदी बात या गुनाह का काम नहीं किया, वह उस दिन की तरह गुनाहों से पवित्र होकर लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया है।"
इसके बाद उन्होंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हाथ पर बैअत की और आपसे इतना अधिक प्रेम किया कि आप उनके यहाँ दुनिया के सबसे प्रिय व्यक्ति बन गए और उनके दिल में आपका इतना सम्मान पैदा हो गया कि वह कभी आपको आँख भर कर देख नहीं सके। वह पाक प्रभु कितना महान है, जो दिलों को फेरता है। कल तक वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अशेष नफ़रत करते थे और अवसर मिलने पर आपका वध करने तक की इच्छा रखते थे और आज दिल में आपका इतना सम्मान उठाए फिरते हैं कि आपको आँख भर कर देख भी नहीं सकते और बाद में आपका हुलिया इसलिए बयान नहीं कर पाते थे कि आपके प्रभाव के कारण वह आपको ठीक से देख नहीं सके थे।
उनका कहना है कि यदि वह पहली अवस्था में मर जाते, तो जहन्नमी होते। जबकि अगर दूसरी अवस्था में मरते, तो उन्हें आशा है कि उन्हें जन्नत मिल जाती। उनकी सावधानी देखिए। वह विश्वास के साथ कहते हैं कि यदि पहली अवस्था में मर जाते, तो जहन्नमी होते, लेकिन दूसरी अवस्था के बारे में ऐसा नहीं कहते। यहाँ वह भय महसूस करते हैं और कहते हैं कि आशा करता हूँ कि जन्नत मिल जाती। क्योंकि जन्नत के बारे में विश्वास के साथ कुछ कहना बहुत मुश्किल है।
फिर उसके बाद उनके जीवन में तीसरी परिस्थिति आई। वह कई क्षेत्रों के अमीर तथा कई युद्धों के सेना नायक बने। मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु-वगैरा वाली युद्ध के दौरान कई घटनाएँ घटीं। फिर, वह अरब के एक चतुर व्यक्ति के रूप में भी प्रसिद्ध थे। वह कहते हैं कि बीच की अवस्था के बाद जो घटनाएँ घटीं, उन्हें देखते हुए डर लगता है कि कहीं उनके कारण मेरे सारे अच्छे कार्य दाँव पर न लग जाएँ।
फिर उन्होंने वसीयत की कि जब वह मर जाएँ, तो उनके साथ कोई नौहा-मातम करने वाली न जाए। उसके बाद आदेश दिया कि जब उनको दफ़न कर दिया जाए, तो वे उनकी क़ब्र के पास एक ऊँट ज़बह कर उसका मांस बाँटने के बराबर समय तक रुके रहें। ताकि वह इतनी देर में उन फ़रिश्तों का उत्तर दे लें, जो मुर्दे को दफ़न कर दिए जाने के बाद उसके पास आते हैं। क्योंकि मुर्दे को दफ़न कर दिए जाने के बाद उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं और उसे उसकी क़ब्र में बिठाने के बाद उससे तीन प्रश्न करते हैं। उससे पूछते हैं कि तेरा रब कौन है, तेरा धर्म क्या है और तेरा नबी कौन है?
यहाँ अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अपने परिवार के लोगों को आदेश दिया कि उनको दफ़न करने के बाद उनकी क़ब्र के पास एक ऊँट ज़बह करके उसका मांस बाँटने के बराबर समय तक रुके रहें, ताकि वह उनसे इतनी देर घुले-मिले रहें। इससे मालूम होता है कि मरा हुआ व्यक्ति अपने परिवार की उपस्थिति को महसूस करता है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की एक अन्य हदीस में आया है कि मरा हुआ व्यक्ति दफ़ने के बाद लौटने वाले लोगों के जूतों की चाप सुनता है।
एक हसन हदीस से साबित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब मरे हुए व्यक्ति को दफ़न कर देते, तो उसकी क़ब्र के पास खड़े हो जाते और कहते : "अपने भाई के लिए क्षमायाचना करो और सुदृढ़ रहने की दुआ करो, क्योंकि इस समय उससे प्रश्न हो रहे हैं।" अतः मुसतहब यह है कि मुर्दे को दफ़न करने के बाद आदमी उसकी क़ब्र के पास खड़ा हो जाए और कहे : "ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे।" क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सलाम करते, तो तीन बार सलाम करते थे और जब दुआ करते, तो तीन बार दुआ करते थे।
सारांश यह कि अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- के बेटे ने उनसे कहा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आपको जन्नत का सुसमाचार सुनाया है, जो अच्छी बात की खुशख़बरी देने और मुबारकबाद पेश करने के दायरे में आता है।
हवाला
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى 1415هـ.
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صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ.
صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر 1407هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، أن عبد الرحمن بن عوف رضي الله عنه أُتي بطعام وكان صائمًا، فقال: قُتِل مُصعب بن عمير رضي الله عنه وهو خيرٌ مني، فلم يوجد له ما يُكفَّن فيه إلا بُردة إن غُطِّيَ بها رأسه بَدَت رِجْلاه؛ وإن غُطِّيَ بها رجلاه بدا رأسه، ثم بُسِط لنا مِنَ الدنيا ما بُسِط، أو قال: أُعْطِينا من الدنيا ما أُعطِينا، قد خَشِينَا أن تكون حَسَنَاتُنا عُجِّلَت لنا، ثم جعل يبكي حتى ترك الطعام.
इबराहीम बिन अब्दुर्रहमान बिन औफ़ का वर्णन है कि अब्दुर्रहमान बिन औफ़ - रज़ियल्लाहु अन्हु- रोज़े से थे, जब उनके सामने (इफ़तार के समय) खाना परोसा गया, तो कहाः मुसअब बिन उमैर, जो कि मुझसे बेहतर थे, शहीद हुए, तो कफन के लिए एक चादर के सिवा कुछ न मिल सका। वह भी ऐसी कि सिर ढाँपा जाता तो दोनों पाँव खुल जाते और पाँव ढाँपे जाते तो सिर खुल जाता। फिर हमारे लिए दुनिया को फैला दिया गया, जो तुम देख रहे हो। या उन्होंने कहाः हमें दुनिया की वह सारी वस्तुएँ प्रदान की गईं, जो तुम देख रहे हो। हमें तो कभी-कभी भय लगता है कि कहीं हमारे अच्छे कर्मों का बदला दुनिया ही में न दे दिया गया हो। फिर रो पड़े और खाने को हाथ भी न लगाया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري، المؤلف: محمد بن إسماعيل أبو عبدالله البخاري الجعفي، المحقق: محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ.
بهجة الناظرين، الشيخ: سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي.
نزهة المتقين، د. مصطفى سعيد الخن، د. مصطفى البغا، محيي الدين مستو، علي الشرجبي، محمد أمين لطفي، مؤسسة الرسالة ، بيروت، الطبعة الأولى: 1397 هـ 1977 م، الطبعة الرابعة عشر 1407 هـ 1987م.
شرح رياض الصالحين، المؤلف: محمد بن صالح بن محمد العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، الرياض، الطبعة: 1426 هـ.
رياض الصالحين، د. ماهر بن ياسين الفحل، الناشر: دار ابن كثير للطباعة والنشر والتوزيع، دمشق - بيروت، الطبعة: الأولى، 1428 هـ - 2007 م.
مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، المؤلف: علي بن (سلطان) محمد، أبو الحسن نور الدين الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت - لبنان
الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي خبيب -بضم الخاء المعجمة- عبد الله بن الزبير رضي الله عنهما ، قال: لما وقف الزبير يوم الجمل دعاني فقمت إلى جنبه، فقال: يا بني، إِنَّهُ لاَ يُقْتَلُ اليوم إلا ظالم أو مظلوم، وإني لا أُرَانِى إلا سأقتل اليوم مظلوما، وإن من أكبر همي لديني، أفترى دَيْنَنَا يُبقي من مَالِنا شيئا؟ ثم قال: يا بني، بِعْ مَا لَنا واقض ديني، وأوصى بالثلث وثلثه لبنيه، يعني لبني عبد الله بن الزبير ثلث الثلث. قال: فإن فَضَلَ من مَالِنَا بعد قضاء الدين شيء فثلثه لبنيك. قال هشام: وكان بعض ولد عبد الله قد وَازَى بعض بني الزبير خُبَيْبٌ وعَبَّادٌ، وله يومئذ تسعة بنين وتسع بنات. قال عبد الله: فجعل يوصيني بدينه ويقول: يا بني، إن عجزت عن شيء منه فاستعن عليه بمولاي. قال: فوالله ما دريت ما أراد حتى قلت: يا أبت من مولاك؟ قال: الله. قال: فوالله ما وقعت في كربة من دينه إلا قلت: يا مولى الزبير اقض عنه دينه فيقضيه. قال: فقتل الزبير ولم يَدَع دينارا ولا درهما إلا أَرَضِينَ ، منها الغابة وإحدى عشرة دارا بالمدينة، ودارين بالبصرة، ودارا بالكوفة، ودارا بمصر. قال: وإنما كان دينه الذي كان عليه أن الرجل كان يأتيه بالمال، فيستودعه إياه، فيقول الزبير: لا، ولكن هو سلف إني أخشى عليه الضَّيْعَةَ ،وما ولي إمارة قط ولا جباية ولا خراجا ولا شيئا إلا أن يكون في غزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم أو مع أبي بكر وعمر وعثمان رضي الله عنهم قال عبد الله: فحسبت ما كان عليه من الدين فوجدته ألفي ألف ومئتي ألف! فلقي حكيم بن حزام عبد الله بن الزبير، فقال: يا ابن أخي، كم على أخي من الدين؟ فكتمته وقلت: مائة ألف. فقال حكيم: والله ما أرى أموالكم تسع هذه. فقال عبد الله: أرأيتك إن كانت ألفي ألف ومئتي ألف؟ قال: ما أراكم تطيقون هذا، فإن عجزتم عن شيء منه فاستعينوا بي، قال: وكان الزبير قد اشترى الغابة بسبعين ومئة ألف، فباعها عبد الله بألف ألف وستمئة ألف، ثم قام فقال: من كان له على الزبير شيء فليوافنا بالغابة، فأتاه عبد الله بن جعفر، وكان له على الزبير أربعمئة ألف، فقال لعبد الله: إن شئتم تركتها لكم؟ قال عبد الله: لا، قال: فإن شئتم جعلتموها فيما تؤخرون إن إخرتم، فقال عبد الله: لا، قال: فاقطعوا لي قطعة، قال عبد الله: لك من هاهنا إلى هاهنا. فباع عبد الله منها فقضى عنه دينه وأوفاه، وبقي منها أربعة أسهم ونصف، فقدم على معاوية وعنده عمرو بن عثمان، والمنذر بن الزبير، وابن زَمْعَةَ ، فقال له معاوية: كم قُوِّمَتِ الغابة؟ قال: كل سهم بمئة ألف، قال: كم بقي منها؟ قال: أربعة أسهم ونصف، فقال المنذر بن الزبير: قد أخذت منها سهما بمئة ألف، قال عمرو بن عثمان: قد أخذت منها سهما بمئة ألف. وقال ابن زمعة: قد أخذت سهما بمئة ألف، فقال معاوية: كم بقي منها؟ قال: سهم ونصف سهم، قال: قد أخذته بخمسين ومئة ألف. قال: وباع عبد الله بن جعفر نصيبه من معاوية بستمئة ألف، فلما فرغ ابن الزبير من قضاء دينه، قال بنو الزبير: اقسم بيننا ميراثنا، قال: والله لا أقسم بينكم حتى أنادي بالموسم أربع سنين: ألا من كان له على الزبير دين فليأتنا فلنقضه. فجعل كل سنة ينادي في الموسم، فلما مضى أربع سنين قسم بينهم ودفع الثلث. وكان للزبير أربع نسوة، فأصاب كل امرأة ألف ألف ومئتا ألف، فجميع ماله خمسون ألف ألف ومئتا ألف.
अबू खुबैब अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से वर्णित है, वह कहते हैं कि जब जंग-ए-जमल के दिन ज़ुबैर -रज़ियल्लाहु अन्हु- खड़े हुए, तो मुझे बुलाया। जब मैं उनके पास खड़ा हो गया, तो फ़रमाया : ऐ मेरे बेटे, आज या तो ज़ालिम मारा जाएगा या मज़लूम। जबकि मुझे लगता है कि आज मैं मज़लूम की हैसियत से मारा जाऊँगा। मुझे जिस चीज़ की चिंता सबसे अधिक है, वह मेरा क़र्ज़ है। क्या तुम्हें अंदाज़ा है कि मेरा क़र्ज़ अदा करने के बाद मेरा कुछ धन बच सकेगा? फिर फरमाया : ऐ मेरे बेटे! मेरा माल बेचकर मेरा कर्ज़ अदा देना। फिर उन्होंने एक तिहाई धन की वसीयत की और उस एक तिहाई के एक तिहाई की वसीयत अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर के बेटों के लिए की। फ़रमाया : यदि कर्ज़ अदा करने के पश्चात कुछ माल बच जाए, तो उसकी एक तिहाई का एक तिहाई भाग तेरे बेटों के लिए है। हिशाम कहते हैं कि अब्दुल्लाह के कुछ बेटे ज़ुबैर के बेटों के हमउम्र थे, जैसे ख़ुबैब और अब्बाद। उस समय उनको नौ लड़के और नौ लड़कियाँ थीं। अब्दुल्लाह कहते हैं : वह मुझे निरंतर अपने क़र्ज के बारे में वसीयत करते रहे और कहते रहे कि ऐ मेरे बेटे, यदि क़र्ज़ का कुछ भाग अदा करने से विवश हो जाओ, तो मेरे मालिक से सहायता माँगना। अब्दुल्लाह कहते हैं : अल्लाह की क़सम, मैं उनका इरादा समझ न सका। यही कारण है कि मैंने उनसे पूछ डाला कि आपका मालिक कौन है? उन्होंने उत्तर दिया : अल्लाह! वह कहते हैं कि अल्लाह की क़सम, मैं उनके क़र्ज़ के संबंध में जब भी किसी परेशानी में पड़ता, तो दुआ करता कि ऐ ज़ुबैरे के मालिक! उसकी ओर से उसका क़र्ज़ उतार दे। चुनांचे अल्लाह क़र्ज़ उतारने का रास्ता बना देता। अब्दुल्लाह कहते हैं : फिर ज़ुबैर शहीद कर दिए गए। उन्होंने दिरहम और दीनार नहीं छोड़े थे। केवल कुछ भूमि छोड़ी थी, जिस में 'अल-ग़ाबा' की भूमि भी शामिल थी। इसके अतिरिक्त मदीने में ग्यारह, बसरा में दो घर तथा कूफ़ा व मिस्र में एक-एक घर भी छोड़े थे। अब्दुल्लाह कहते हैं : उनका कर्ज़ इस प्रकार का था कि लोग उनके पास माल अमानत रखने के लिए आते, तो वह कह देते : उसे अमानत नहीं, बल्कि क़र्ज़ के तौर पर रहने दो। मुझे डर है कि वह नष्ट न हो जाए। वह न कभी अमीर बने थे, न कर तथा ख़राज वसूल करने की ज़िम्मदेवारी ली थी और न इस तरह का कोई दूसरा पद लिया था। हाँ, उन्होंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तथा अबू बक्र, उमर एवं उस़मान -रज़ियल्लाहु अन्हुम- के साथ युद्ध में भाग ज़रूर लिया था। अब्दुल्लाह कहते हैं : मैंने उनके क़र्ज़ का हिसाब लगया, तो वह 22 लाख हो रहा था। इसी बीच हकीम बिन हिज़ाम अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर से मिले और उनसे पूछा : ऐ मेरे भतीजे, मेरे भाई पर कितना क़र्ज़ है? अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैंने उनसे छुपाते हुए कहा : एक लाख। यह सुन उन्होंने कहा : अल्लाह की क़सम, मैं नहीं समझता कि तुम्हारे पास इतना क़र्ज़ चुकाने के लिए पर्याप्त धन होगा। इसपर अब्दुल्लाह ने कहा : यदि यह 22 लाख हो तो आप क्या कहेंगे? उन्होंने कहा : तुम भुगतान नहीं कर सकोगे। देखो, यदि तुम उसके कुछ भाग के भुगतान से विवश रहो, तो मुझसे सहायता माँग लेना। वर्णनकर्ता कहते हैं : ज़ुबैर ने अल-ग़ाबा को एक लाख सत्तर हज़ार में खरीद रखा था, जिसे अब्दुल्लाह ने 16 लाख में बेच दिया और खड़े होकर कहा : ज़ुबैर से जो भी कुछ पाएगा, वह हमसे अल-ग़ाबा में आकर मिले। चुनांचे अब्दुल्लाह बिन जाफ़र आए, जो उनसे चार लाख पाते थे। उन्होंने अब्दुल्लाह से कहा : यदि तुम चाहो, मैं तुम्हारे लिए उसे छोड़ देता हूँ? अब्दुल्लाह ने कहा : ऐसा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कहा : यदि चाहो, तो इसे बाद में अदा कर सकते हो। अब्दुल्लाह ने कहा : ऐसा भी नहीं हो सकता। उन्होंने कहा : तब अल-ग़ाबा का एक भाग मुझे दे दो। अब्दुल्लाह ने कहा : यहाँ से वहाँ तक तुम्हारा है। इस तरह, अब्दुल्लाह ने उनकी जायदादों का कुछ भाग बेचकर उनका पूरा क़र्ज़ चुका दिया और 'अल-ग़ाबा' के (कुल 16 भागों में से) साढ़े चार भाग शेष भी रह गए। इसके बाद वह मुआविया के पास आए। उस समय उनके पास अम्र बिन उस़मान, मुंज़िर बिन ज़ुबैर और इब्ने ज़मअा मौजूद थे। मुआविया ने उनसे पूछा : 'अल-ग़ाबा' की क़ीमत क्या रखी गई है? उन्होंने उत्तर दिया : प्रत्येक भाग का एक लाख। उन्होंने पूछा : कितने भाग बच गए हैं? जवाब दिया : साढ़े चार भाग। यह सुन मुंज़िर बिन ज़ुबैर ने कहा : मैंने एक भाग एक लाख में ले लिया। तब अम्र बिन उस़मान ने कहा : मैंने भी एक भाग एक लाख में ले लिया। फिर इब्ने ज़मअह ने कहा : मैंने भी एक भाग एक लाख में ले लिया। अंत में मुआविया ने पूछा : अब कितना बच गया है? उन्होंने उत्तर दिया : डेढ़ हिस्सा। मुआविया ने कहा : मैंने उसे डेढ़ लाख में खरीद लिया। वर्णनकर्ता का कहना है कि बाद में अब्दुल्लाह बिन जाफ़र ने अपना भाग मुआविया से छः लाख में बेच दिया था। जब अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर क़र्ज़ अदा करने का काम पूरा कर चुके, तो ज़ुबैर के अन्य बेटों ने कहा : अब हमारे बीच मीरास का विभाजन कर दीजिए। इसपर अब्दुल्लाह ने कहा : अल्लाह की क़सम, मैं चार साल तक हज के अवसर पर यह ऐलान करने के बाद ही मीरास तक़सीम करूँगा कि जिसका भी ज़ुबैर के ऊपर क़र्ज़ हो, वह हमारे पास आए, हम उसका क़र्ज़ अदा कर देंगे। फिर वह हर साल हज के अवसर पर ऐलान करने लगे। जब चार साल गुज़र गए, तो मीरास तक़सीम कर दिया और एक तिहाई भाग दे दिया। ज़ुबैर की चार पत्नियाँ थीं और हर पत्नी के हिस्से में बारह-बारह लाख की राशि आई। इस तरह, उनकी कुल संपत्ति पाँच करोड़ दो लाख की थी।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
الجامع المسند الصحيح (صحيح البخاري), تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري, تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر, دار طوق النجاة ترقيم محمد فؤاد عبدالباقي, ط 1422
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين, تأليف: سليم بن عيد الهلالي, دار ابن الجوزي.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين, تأليف: مصطفى الخن ومصطفى البغا ومحي الدين مستو وعلي الشربجي ومحمد لطفي, مؤسسة الرسالة, ط 14 عام 1407 - 1987
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, تأليف: محمد علي بن محمد البكري الصديقي, عناية: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة, ط 4 عام 1425
فيض الباري على صحيح البخاري, تأليف: أمالي محمد أنور شاه الكشميري الهندي, تحقيق: محمد بدر عالم الميرتهي, الناشر: دار الكتب العلمية, ط1 عام 1426
تيسير العزيز الحميد في شرح كتاب التوحيد, تأليف: سليمان بن عبدالله آل الشيخ, تحقيق: زهير شاويش, التاشر: المكتب الإسلامي, ط1 عام 1323
تعليق البغا على صحيح البخاري، دار ابن كثير ، اليمامة – بيروت، تحقيق : د. مصطفى ديب البغا، الطبعة الثالثة ، 1407 – 1987.
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