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तशरीह के साथ हदीसें

भलाई का आदेश देने तथा बुराई से रोकने के आदाब

2 हदीसें

अल्लाह ने अपने रसूल को अनुमति दी थी, तुम्हें अनुमति नहीं दी है। वैसे भी, मुझे केवल दिन की एक घड़ी के लिए अनुमति दी थी। आज वह उसी तरह हराम है, जैसे कल थी। अतः, जो उपस्थित है, वह उसे पहुँचा दे, जो उपस्थित नहीं है।

عن أبي شُريح -خُوَيْلِدِ بن عمرو الخُزَاعي العدوي رضي الله عنه-: أنه قال لعمرو بن سعيد بن العاص -وهو يبعث الْبُعُوثَ إلى مكة- ائْذَنْ لي أيها الأمير أن أُحَدِّثَكَ قولا قام به رسول الله صلى الله عليه وسلم الغد من يوم الفتح؛ فسمعَتْه أُذُنَايَ ، وَوَعَاهُ قلبي، وأبصرته عيناي حين تكلم به أنه حمد الله وأثنى عليه، ثم قال: «إن مكة حَرَّمَهَا الله تعالى، ولم يُحَرِّمْهَا الناس، فلا يحل لِامْرِئٍ يؤمن بالله واليوم الآخر: أن يسفك بها دمًا، ولا يعضد بها شجرة، فإن أحد ترخص بقتال رسول الله صلى الله عليه وسلم فقولوا: إنَّ الله أذِن لرسوله ولم يأذن لكم. وإنما أذِنَ لي ساعة من نهار، وقد عادت حُرْمَتُهَا اليوم كَحُرمتها بالأمْسِ، فَلْيُبْلِغِ الشَّاهِدُ الغائب». فقيل لأبي شريح: ما قال لك؟ قال: أنا أعلم بذلك منك يا أبا شريح، إن الحرم لَا يُعِيذُ عاصيا، وَلَا فَارًّا بدمٍ، ولَا فَارًّا بِخَرْبَةٍ.
अबू शुरैह- खुवैलिद बिन अम्र खुज़ाई अदवी -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि उन्होंने अम्र बिन सईद बिन आस से, (जब वह मक्का की ओर सैन्यदल भेज रहा था) कहाः ऐ सालार! मुझे एक हदीस सुनाने की अनुमति दीजिए, जो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का विजय के दूसरे दिन सुब्ह खड़े होकर कही थी और उसे मेरे कानों ने सुना था, मेरे दिल ने याद कर लिया था और मेरी आँखों ने वह दृश्य देखा था, जब आपने इसे बयान करते समय अल्लाह की प्रशंसा करने के बाद कहा थाः मक्का को अल्लाह ने हराम क़रार दिया है, लोगों ने हराम करार नहीं दिया है। अतः, किसी व्यक्ति के लिए, जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखता हो, हलाल नहीं है कि यहाँ रक्तपात करे और इसका कोई पेड़ काटे। फिर यदि कोई अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाह अलैहि व सल्लम) के युद्ध को मिसाल बनाकर उसे उचित ठहराने का प्रयास करे तो उससे कह देना कि अल्लाह ने अपने रसूल को अनुमति दी थी, तुम्हें अनुमति नहीं दी है। वैसे भी, मुझे केवल दिन की एक घड़ी के लिए अनुमति दी थी। आज वह उसी तरह हराम है, जैसे कल थी। अतः, जो उपस्थित है, वह उसे पहुँचा दे, जो उपस्थित नहीं है। अबू शुरैह से पूछा गया कि उसने आपको क्या उत्तर दिया? तो उनका कहना था कि उसने कहाः ऐ अबू शुरैह! मैं यह बात आपसे अधिक जानता हूँ। हरम किसी अवज्ञाकारी, रक्तपात करके और फ़साद मचाकर भागने वाले को शरण नहीं देता।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

जब यज़ीद बिन मुआविया की ओर से नियुक्त मदीने के अमीर अम्र बिन सईद बिन आस ने, जो अशदक़ के नाम से प्रसिद्ध था, अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से युद्ध के लिए मक्का की ओर सेना भेजने का इरादा किया, तो उसे समझाने-बुझाने के लिए उसके पास अबू शुरैह ख़ुवैलिद बिन अम्र ख़ुज़ाई (रज़ियल्लाहु अंहु) आए। चूँकि सामने वाला व्यक्ति ख़ुद को एक बड़ा आदमी समझता था, इसलिए अबू शुरैह (रज़ियल्लाहु अंहु) ने हिकमत और समझदारी से काम लेते हुए उससे बड़ी नरमी से बात की, ताकि बात मानने की संभावना अधिक बन सके और कोई अप्रिय घटना भी न घटे। उन्होंने सबसे पहले अम्र बिन सईद जो सेना भेजना चाहता था, उसके बारे में बात करने की अनुमति माँगी और बताया कि वह जो हदीस सुनाने जा रहे हैं, उसके सही होने पर उन्हें पूर्ण विशवास है, क्योंकि उनके कानों ने उसे सुना है, दिल ने सुरक्षित रखा है और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब यह बात कह रहे थे, उस समय उनकी आँखों ने आपको देखा है। इतना सुनने के बाद अम्र बिन सईद ने उनको बात करने की अनुमति दे दी। चुनांचे अबू शुरैह ने कहा : नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का विजय के दिन सुबह के समय अल्लाह की स्तुति एवं प्रशंसा करने के बाद फ़रमाया : मक्का को अल्लाह ने उसी दिन हराम क़रार दिया है, जिस दिन आकाश एवं धरती की रचना की है। इसलिए वह सदा सम्मान एवं आदर का पात्र रहा है। उसे लोगों ने चरागाहों और घाटों की तरह अस्थायी रूप से हराम क़रार नहीं दिया है। अब, जब यह पता चल गया कि वह हमेशा से सम्मान एवं आदर का पात्र रहा है और उसे यह दरजा ख़ुद अल्लाह ने दिया है, तो किसी इनसान के लिए, जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर विश्वास रखता हो और अपने ईमान को सुरक्षित रखना चाहता हो, हलाल न होगा कि वहाँ खून बहाए और उसके पेड़ काटे। हाँ, यदि कोई मक्का विजय के दिन मेरे युद्ध को प्रमाण मानकर ख़ुद वहाँ युद्ध करने की योजना बनाए, तो उससे कह दो कि तुम्हारा मामला अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जैसा नहीं है। अल्लाह ने आपको अनुमति दी थी, तुम्हें नहीं दी है। एक बात और भी है। वहाँ सदा के लिए युद्ध की अनुमति नहीं दी गई थी। ज़रूरत के अनुसार बस कुछ देर के लिए अनुमति दी गई थी और फिर वह दोबारा पहले की तरह हराम हो गया। अतः, जो लोग उपस्थित हैं, वे उन लोगों को मेरी बात पहुँचा दें, जो उपस्थित नहीं हैं। चूँकि मैं उस दिन मौजूद था और आप मौजूद नहीं थे, इसलिए मैंने आपको नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का संदेश पहुँचा दिया। इतना सुनने के बाद लोगों ने अबू शुरैह से पूछा कि अम्र ने आपको क्या उत्तर दिया? तो उन्होंने कहा कि उसने उत्तर दिया : ऐ अबू शुरैह मैं इस मामले को आपसे अधिक समझता हूँ। हरम किसी अवज्ञाकारी और ग़द्दारी करके भागने वाले को शरण नहीं देता। इस तरह, उसने हदीस के मुक़ाबले में अपना मत पेश कर दिया और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से युद्ध के लिए सेना भेजने की योजना से पीछे हटने की बजाय उसपर डटा रहा।

हवाला

عمدة الأحكام، تأليف: عبد الغني بن عبد الواحد المقدسي، تحقيق: محمود الأرناؤوط، دار الثقافة العربية ومؤسسة قرطبة، الطبعة الثانية، 1408هـ. تيسير العلام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق محمد صبحي بن حسن حلاق، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة العاشرة، 1426 هـ. تأسيس الأحكام شرح عمدة الأحكام، تأليف: أحمد بن يحي النجمي: نسخة إلكترونية لا يوجد بها بيانات نشر. تنبيه الأفهام شرح عمدة الإحكام، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة ومكتبة التابعين، الطبعة الأولى: 1426هـ. الإفهام في شرح عمدة الأحكام، للشيخ عبد العزيز بن عبد الله بن باز، تحقيق: سعيد بن علي بن وهف القحطاني، الطبعة الأولى، 1435 هـ. خلاصة الكلام على عمدة الأحكام، تأليف: فيصل بن عبد العزيز آل مبارك، الطبعة الثانية، 1412 هـ الإلمام بشرح عمدة الأحكام، تأليف: إسماعيل الأنصاري، مطابع دار الفكر، الطبعة الأولى: 1381 هـ صحيح البخاري ، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري ، تحقيق: محمد زهير الناصر، الناشر: دار طوق النجاة الطبعة: الأولى، 1422هـ صحيح مسلم ، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، الناشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

ऐसे लोग तुम्हारे शासक बन जाएँगे, जो झूठ बोलेंगे और अत्याचार करेंगे। ऐसे में जो उनके झूठ की पुष्टि करेगा और अत्याचार में उनका सहयोग करेगा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है और मेरा उससे कोई संबंध नहीं है।

عَنْ حُذَيْفَةَ رَضيَ اللهُ عنهُ عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِنَّهَا سَتَكُونُ أُمَرَاءُ يَكْذِبُونَ وَيَظْلِمُونَ، فَمَنْ صَدَّقَهُمْ بِكَذِبِهِمْ وَأَعَانَهُمْ عَلَى ظُلْمِهِمْ فَلَيْسَ مِنَّي، وَلَسْتُ مِنْهُ، وَلَا يَرِدُ عَلَيَّ الْحَوْضَ، وَمَنْ لَمْ يُصَدِّقْهُمْ بِكَذِبِهِمْ وَلَمْ يُعِنْهُمْ عَلَى ظُلْمِهِمْ فَهُوَ مِنِّي، وَأَنَا مِنْهُ، وَسَيَرِدُ عَلَيَّ الْحَوْضَ».
हुज़ैफ़ा -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "ऐसे लोग तुम्हारे शासक बन जाएँगे, जो झूठ बोलेंगे और अत्याचार करेंगे। ऐसे में जो उनके झूठ की पुष्टि करेगा और अत्याचार में उनका सहयोग करेगा, उसका मुझसे कोई संबंध नहीं है और मेरा उससे कोई संबंध नहीं है। वह मेरे हौज़ पर पानी पीने नहीं आ सकेगा। तथा जो उनके झूठ की पुष्टि नहीं करेगा और अत्याचार पर उनका सहयोग नहीं करेगा, उसका मुझसे संबंध है और मेरा उससे संबंध है तथा वह मेरे हौज़ पर पानी पीने के लिए आएगा।"
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि आपकी मृत्यु के बाद लोगों के शासक ऐसे लोग बन जाएँगे, जो झूठ बोलेंगे, ऐसी बातें करेंगे जिनपर उनका ख़ुद अमल नहीं होगा और निर्णय करते समय अत्याचार करेंगे। जो व्यक्ति ऐसे लोगों के पास जाएगा, उनके झूठ की पुष्टि करेगा, या उनका सहयोग करेगा अत्याचार करके, या अपने कथन द्वारा मसलन उनकी निकटता प्राप्त करने और उनसे कुछ प्राप्त करने की आशा में उनके हक़ में फ़तवा देगा, ऐसे व्यक्ति से मैं बरी हूँ और ऐसा व्यक्ति मुझमें से नहीं है। ऐसा व्यक्ति क़यामत के दिन मेरे पास हौज़ पर नहीं आ सकेगा। इसके विपरीत जो उनके पास नहीं जाएगा, उनके झूठ की पुष्टि नहीं करेगा और उनके अत्याचार में सहयोग नहीं करेगा, वह मुझमें से है और मैं उसमें से हूँ। वह क़यामत के दिन मेरे पास हौज़ पर अवश्य आएगा।

फ़ायदे
  1. शासकों के पास जाकर जब उनको सही मार्ग दिखाया जाए, सही बात बताई जाए और उनकी बुराई को कम करने का प्रयास किया जाए, तो यह अपने कर्तव्य का पालन करना हुआ। लेकिन जब उनके पास जाकर उनके अत्याचार को सपोर्ट किया जाए और उनके झूठ की पुष्टि की जाए, तो यह बुरी बात है।
  2. किसी शासक के अत्याचार को सपोर्ट करने पर चेतावनी।
  3. यह चेतावनी बताती है कि ऐसा करना हराम और महा पाप है।
  4. नेकी और परहेज़गारी में सहयोग करने और गुनाह तथा अत्याचार में सहयोग न करने की प्रेरणा।
  5. क़यामत के दिन हमारे नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को हौज़ मिलेगा और आपकी उम्मत के लोग उससे जाकर पानी पी सकेंगे।
हवाला

مسند أحمد (38/ 295) (23260). ذخيرة العقبى في شرح المجتبى (32/ 334).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com