عَنْ صُهَيْبٍ رَضيَ اللهُ عنه أَنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: "كَانَ مَلِكٌ فِيمَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ، وَكَانَ لَهُ سَاحِرٌ، فَلَمَّا كَبِرَ، قَالَ لِلْمَلِكِ: إِنِّي قَدْ كَبِرْتُ، فَابْعَثْ إِلَيَّ غُلَامًا أُعَلِّمْهُ السِّحْرَ، فَبَعَثَ إِلَيْهِ غُلَامًا يُعَلِّمُهُ، فَكَانَ فِي طَرِيقِهِ إِذَا سَلَكَ رَاهِبٌ فَقَعَدَ إِلَيْهِ وَسَمِعَ كَلَامَهُ، فَأَعْجَبَهُ، فَكَانَ إِذَا أَتَى السَّاحِرَ مَرَّ بِالرَّاهِبِ وَقَعَدَ إِلَيْهِ، فَإِذَا أَتَى السَّاحِرَ ضَرَبَهُ، فَشَكَا ذَلِكَ إِلَى الرَّاهِبِ، فَقَالَ: إِذَا خَشِيتَ السَّاحِرَ، فَقُلْ: حَبَسَنِي أَهْلِي، وَإِذَا خَشِيتَ أَهْلَكَ فَقُلْ: حَبَسَنِي السَّاحِرُ، فَبَيْنَمَا هُوَ كَذَلِكَ إِذْ أَتَى عَلَى دَابَّةٍ عَظِيمَةٍ قَدْ حَبَسَتِ النَّاسَ، فَقَالَ: الْيَوْمَ أَعْلَمُ آلسَّاحِرُ أَفْضَلُ أَمِ الرَّاهِبُ أَفْضَلُ؟ فَأَخَذَ حَجَرًا، فَقَالَ: اللهُمَّ إِنْ كَانَ أَمْرُ الرَّاهِبِ أَحَبَّ إِلَيْكَ مِنْ أَمْرِ السَّاحِرِ فَاقْتُلْ هَذِهِ الدَّابَّةَ، حَتَّى يَمْضِيَ النَّاسُ، فَرَمَاهَا فَقَتَلَهَا، وَمَضَى النَّاسُ، فَأَتَى الرَّاهِبَ فَأَخْبَرَهُ، فَقَالَ لَهُ الرَّاهِبُ: أَيْ بُنَيَّ أَنْتَ الْيَوْمَ أَفْضَلُ مِنِّي، قَدْ بَلَغَ مِنْ أَمْرِكَ مَا أَرَى، وَإِنَّكَ سَتُبْتَلَى، فَإِنِ ابْتُلِيتَ فَلَا تَدُلَّ عَلَيَّ، وَكَانَ الْغُلَامُ يُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ، وَيُدَاوِي النَّاسَ مِنْ سَائِرِ الْأَدْوَاءِ، فَسَمِعَ جَلِيسٌ لِلْمَلِكِ كَانَ قَدْ عَمِيَ، فَأَتَاهُ بِهَدَايَا كَثِيرَةٍ، فَقَالَ: مَا هَاهُنَا لَكَ أَجْمَعُ، إِنْ أَنْتَ شَفَيْتَنِي، فَقَالَ: إِنِّي لَا أَشْفِي أَحَدًا إِنَّمَا يَشْفِي اللهُ، فَإِنْ أَنْتَ آمَنْتَ بِاللهِ دَعَوْتُ اللهَ فَشَفَاكَ، فَآمَنَ بِاللهِ فَشَفَاهُ اللهُ، فَأَتَى الْمَلِكَ فَجَلَسَ إِلَيْهِ كَمَا كَانَ يَجْلِسُ، فَقَالَ لَهُ الْمَلِكُ: مَنْ رَدَّ عَلَيْكَ بَصَرَكَ؟ قَالَ: رَبِّي، قَالَ: وَلَكَ رَبٌّ غَيْرِي؟ قَالَ: رَبِّي وَرَبُّكَ اللهُ، فَأَخَذَهُ فَلَمْ يَزَلْ يُعَذِّبُهُ حَتَّى دَلَّ عَلَى الْغُلَامِ، فَجِيءَ بِالْغُلَامِ، فَقَالَ لَهُ الْمَلِكُ: أَيْ بُنَيَّ قَدْ بَلَغَ مِنْ سِحْرِكَ مَا تُبْرِئُ الْأَكْمَهَ وَالْأَبْرَصَ، وَتَفْعَلُ وَتَفْعَلُ، فَقَالَ: إِنِّي لَا أَشْفِي أَحَدًا، إِنَّمَا يَشْفِي اللهُ، فَأَخَذَهُ فَلَمْ يَزَلْ يُعَذِّبُهُ حَتَّى دَلَّ عَلَى الرَّاهِبِ، فَجِيءَ بِالرَّاهِبِ، فَقِيلَ لَهُ: ارْجِعْ عَنْ دِينِكَ، فَأَبَى، فَدَعَا بِالْمِئْشَارِ، فَوَضَعَ الْمِئْشَارَ فِي مَفْرِقِ رَأْسِهِ، فَشَقَّهُ حَتَّى وَقَعَ شِقَّاهُ، ثُمَّ جِيءَ بِجَلِيسِ الْمَلِكِ فَقِيلَ لَهُ: ارْجِعْ عَنْ دِينِكَ، فَأَبَى فَوَضَعَ الْمِئْشَارَ فِي مَفْرِقِ رَأْسِهِ، فَشَقَّهُ بِهِ حَتَّى وَقَعَ شِقَّاهُ، ثُمَّ جِيءَ بِالْغُلَامِ فَقِيلَ لَهُ ارْجِعْ عَنْ دِينِكَ، فَأَبَى فَدَفَعَهُ إِلَى نَفَرٍ مِنْ أَصْحَابِهِ، فَقَالَ: اذْهَبُوا بِهِ إِلَى جَبَلِ كَذَا وَكَذَا، فَاصْعَدُوا بِهِ الْجَبَلَ، فَإِذَا بَلَغْتُمْ ذُرْوَتَهُ، فَإِنْ رَجَعَ عَنْ دِينِهِ، وَإِلَّا فَاطْرَحُوهُ، فَذَهَبُوا بِهِ فَصَعِدُوا بِهِ الْجَبَلَ، فَقَالَ: اللهُمَّ اكْفِنِيهِمْ بِمَا شِئْتَ، فَرَجَفَ بِهِمِ الْجَبَلُ فَسَقَطُوا، وَجَاءَ يَمْشِي إِلَى الْمَلِكِ، فَقَالَ لَهُ الْمَلِكُ: مَا فَعَلَ أَصْحَابُكَ؟ قَالَ: كَفَانِيهِمُ اللهُ، فَدَفَعَهُ إِلَى نَفَرٍ مِنْ أَصْحَابِهِ، فَقَالَ: اذْهَبُوا بِهِ فَاحْمِلُوهُ فِي قُرْقُورٍ، فَتَوَسَّطُوا بِهِ الْبَحْرَ، فَإِنْ رَجَعَ عَنْ دِينِهِ وَإِلَّا فَاقْذِفُوهُ، فَذَهَبُوا بِهِ، فَقَالَ: اللهُمَّ اكْفِنِيهِمْ بِمَا شِئْتَ، فَانْكَفَأَتْ بِهِمِ السَّفِينَةُ فَغَرِقُوا، وَجَاءَ يَمْشِي إِلَى الْمَلِكِ، فَقَالَ لَهُ الْمَلِكُ: مَا فَعَلَ أَصْحَابُكَ؟ قَالَ: كَفَانِيهِمُ اللهُ، فَقَالَ لِلْمَلِكِ: إِنَّكَ لَسْتَ بِقَاتِلِي حَتَّى تَفْعَلَ مَا آمُرُكَ بِهِ، قَالَ: وَمَا هُوَ؟ قَالَ: تَجْمَعُ النَّاسَ فِي صَعِيدٍ وَاحِدٍ، وَتَصْلُبُنِي عَلَى جِذْعٍ، ثُمَّ خُذْ سَهْمًا مِنْ كِنَانَتِي، ثُمَّ ضَعِ السَّهْمَ فِي كَبِدِ الْقَوْسِ، ثُمَّ قُلْ: بِاسْمِ اللهِ رَبِّ الْغُلَامِ، ثُمَّ ارْمِنِي، فَإِنَّكَ إِذَا فَعَلْتَ ذَلِكَ قَتَلْتَنِي، فَجَمَعَ النَّاسَ فِي صَعِيدٍ وَاحِدٍ، وَصَلَبَهُ عَلَى جِذْعٍ، ثُمَّ أَخَذَ سَهْمًا مِنْ كِنَانَتِهِ، ثُمَّ وَضَعَ السَّهْمَ فِي كَبْدِ الْقَوْسِ، ثُمَّ قَالَ: بِاسْمِ اللهِ، رَبِّ الْغُلَامِ، ثُمَّ رَمَاهُ فَوَقَعَ السَّهْمُ فِي صُدْغِهِ، فَوَضَعَ يَدَهُ فِي صُدْغِهِ فِي مَوْضِعِ السَّهْمِ فَمَاتَ، فَقَالَ النَّاسُ: آمَنَّا بِرَبِّ الْغُلَامِ، آمَنَّا بِرَبِّ الْغُلَامِ، آمَنَّا بِرَبِّ الْغُلَامِ، فَأُتِيَ الْمَلِكُ فَقِيلَ لَهُ: أَرَأَيْتَ مَا كُنْتَ تَحْذَرُ؟ قَدْ وَاللهِ نَزَلَ بِكَ حَذَرُكَ، قَدْ آمَنَ النَّاسُ، فَأَمَرَ بِالْأُخْدُودِ فِي أَفْوَاهِ السِّكَكِ، فَخُدَّتْ وَأَضْرَمَ النِّيرَانَ، وَقَالَ: مَنْ لَمْ يَرْجِعْ عَنْ دِينِهِ فَأَحْمُوهُ فِيهَا، أَوْ قِيلَ لَهُ: اقْتَحِمْ، فَفَعَلُوا حَتَّى جَاءَتِ امْرَأَةٌ وَمَعَهَا صَبِيٌّ لَهَا فَتَقَاعَسَتْ أَنْ تَقَعَ فِيهَا، فَقَالَ لَهَا الْغُلَامُ: يَا أُمَّهْ اصْبِرِي فَإِنَّكِ عَلَى الْحَقِّ".
सुहैब बिन सिनान रूमी (रज़ियल्लाहु अन्हु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "तुमसे पहले के लोगों में एक राजा था, जिसके पास एक जादूगर था। जब जादूगर बूढ़ा हो गया, तो उसने राजा से कहा कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ, इसलिए मेरे पास एक बालक भेजिए, जिसको मैं जादू सिखा दूँ। राजा ने उसके पास एक बालक भेजा, जिसे वह जादू सिखा सके। बालक जब जादूगर की ओर चला, तो रास्ते में उसे एक राहिब मिला। वह उसके पास बैठा और उसकी बातें सुना, तो उसे अच्छी लगीं। अब, जब भी वह जादूगर के पास जाता, राहिब के यहाँ आता और उसके पास बैठ जाता। परन्तु, जब जादूगर के पास जाता, तो वह उसे मारता। उसने इसकी शिकायत राहिब से की, तो उसने कहाः जब जादूगर से डर लगे, तो कह देना कि घर वालों ने रोक लिया था तथा जब घर वालों से डर लगे, तो कह देना कि जादूगर ने रोक लिया था।
वह ऐसा ही कर रहा था कि अचानक उसने एक विशाल पशु देखा, जिसने लोगों की आवाजाही रोक रखी थी। अतः, उसने कहाः आज मुझे पता चल जाएगा कि जादूगर बेहतर है या राहिब? चुनांचे, उसने एक पत्थर उठाया और कहा कि ऐ अल्लाह, यदि राहिब का मामला तेरे पास जादूगर के मामले से अधिक पसंदीदा है, तो इस पशु को मार दे, ताकि लोग आ-जा सकें। चुनांचे, उसने एक पत्थर फेंका, जिसने पशु का वध कर दिया तथा लोगों का रास्ता खुल गया। अब वह लड़का राहिब के पास आया तथा इस विषय में उसको बताया, तो राहिब ने उससे कहाः ऐ मेरे प्यारे पुत्र, आज तू मुझसे भी बेहतर है। आज मैं देख रहा हूँ कि तुम्हारा मामला कहाँ पहुँच चुका है। अब तुमको आज़माइश में डाला जाएगा। किन्तु, जब तुमको आज़माया जाए, तो मेरा पता मत बताना। वह लड़का जन्मजात अंधे तथा सफ़ेद दाग वालो को ठीक कर देता था तथा विभिन्न प्रकार की औषधियों से लोगों का उपचार करता था। इसकी चर्चा राजा के एक निकटवर्ती ने भी सुनी, जो अंधा हो चुका था। अतः, वह उसके पास बहुत सारे उपहार लेकर आया तथा बोलाः यदि तुमने मुझे ठीक कर दिया, तो यहाँ जो कुछ भी है, सब तेरा है। बालक बोलाः मैं किसी को ठीक नहीं करता, बल्कि ठीक करने वाला केवल अल्लाह है। यदि तू अल्लाह पर ईमान ले आए, तो मैं तेरे लिए अल्लाह से दुआ करूँगा कि वह तुझे चंगा कर दे। सो, वह अल्लाह पर ईमान ले आया तथा अल्लाह ने उसे ठीक कर दिया। फिर वह राजा के पास आकर उसी प्रकार बैठा, जिस प्रकार प्रत्येक दिन बैठा करता था। राजा ने उससे पूछाः तेरी आँखें किसने ठीक कर दीं? उसने उत्तर दियाः मेरे रब ने। राजा बोलाः क्या मेरे सिवा भी तेरा कोई रब है? उसने उत्तर दियाः मेरा तथा तेरा रब केवल अल्लाह है। यह सुन, राजा ने उसे पकड़ लिया तथा यातनाएँ देता रहा, यहाँ तक कि उसने राजा को बालक का पता बता दिया। तब बालक को बुलाया गया तथा राजा ने उससे कहाः ऐ पुत्र, तूने जादू में इतनी कुशलता पैदा कर ली है कि तू जन्मजात अंधे तथा सफ़ेद दाग वाले को भी ठीक करने लगा है तथा ऐसा और ऐसा करने लगा है? बालक बोलाः मैं किसी को ठीक नहीं करता, बल्कि ठीक करने वाला केवल अल्लाह है। यह सुन, राजा उसको पकड़कर यातनाएँ देने लगा, यहाँ तक कि उसने राजा को राहिब का पता बता दिया। राहिब को पकड़कर लाया गया तथा कहा गया कि अपना धर्म छोड़ दो। परन्तु, उसने इनकार कर दिया। तब एक आरी मँगवाई गई और उसे उसकी माँग पर रखकर उसके दो टुकड़े कर दिए गए। फिर राजा के निकटवर्ती को बुलाया गया तथा उससे भी कहा गया कि अपना धर्म छोड़ दो। उसने भी इनकार कर दिया, तो एक आरी लाई गई और उसकी माँग पर रखकर उसे भी चीर दिया गया। फिर बालक को बुलाया गया तथा कहा गया कि अपना धर्म छोड़ दो, लेकिन उसने इनकार कर दिया, तो राजा ने उसे अपने लोगों के हवाले करते हुए कहाः इसको अमुक पहाड़ पर ले जाओ और जब तुम पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाओ, तो देखो, यदि वह अपना धर्म छोड़ देता है, तो ठीक, अन्यथा इसे वहाँ से लुढ़का देना। चुनांचे, जब वे पहाड़ पर चढ़े, तो बालक ने दुआ की कि ऐ अल्लाह, तू जैसे चाहे मुझे इनसे बचा ले। सो, अचानक पहाड़ में कंपन पैदा हुई, जिससे सारे लोग गिर गए और बालक चलते हुए राजा के पास आ गया। राजा ने पूछाः तेरे साथियों का क्या हुआ? बालक ने जवाब दियाः अल्लाह ने मुझे उनसे बचा लिया। राजा ने उसे पुनः अपने लोगों के हावाले करते हुए कहाः इसको जहाज़ में लेकर बीच समुद्र में चले जाओ। यदि वह अपना धर्म त्याग दे, तो ठीक, अन्यथा इसे वहाँ फेंक देना। वह लोग उसको लेकर चले गए। तब बालक ने दुआ की कि ऐ अल्लाह, तू जैसे चाहे मुझे इनसे बचा ले। चुनांचे, जहाज़ सवारों समेत पलट गया एवं सभी लोग डूब गए, लेकिन बालक चलते हुए राजा के पास आ गया। राजा ने पूछाः तेरे साथियों का क्या हुआ? बालक ने जवाब दिया कि अल्लाह ने मुझे उनसे बचा लिया। फिर उसने राजा से कहाः जब तक तू वैसा न करे, जैसा मैं कहूँ, तू मुझे मार नहीं सकता। उसने पूछाः वह क्या है? बालक ने कहा कि लोगों को एक मैदान में इकट्ठा करो। तत्पश्चात मुझे एक पेड़ के तने से बाँध दो, फिर मेरे तरकश से एक तीर लो और उस तीर को कमान के बीच में रखो और कहोः "अल्लाह के नाम से, जो इस बालक का रब है।" फिर मेरी ओर तीर चलाओ। यदि तुम ऐसा करोगे, तो मुझे मार सकते हो। चुनांचे राजा ने लोगों को एक मैदान में इकट्ठा किया। फिर बालक को एक पेड़ के तने से बाँधा। फिर उसके तरकश से एक तीर लेकर उसे कमान के बीच में रखा और यह कहा कि "अल्लाह के नाम से, जो इस बालक का रब है।" फिर बालक पर तीर चलाया, जो उसकी कन्पट्टी में लगा। बालक ने कन्पट्टी पर अपना हाथ रखा तथा मर गया। यह देख, सब लोगों ने कहाः हम इस बालक के रब (पालनहार) पर ईमान ले आए। चुनांचे, राजा आया, तो उससे कहा गया कि अल्लाह की क़सम, वही हुआ, जिसका आपको भय था। लोग ईमान ले आए। चुनांचे, राजा ने गलियों के मुहानों पर लंबे-चौड़े गड्ढे खोदने का आदेश दिया। गड्ढे खोदे गए तथा उनमें अग्नि दहकाई गई, तो राजा नेः जो अपना धर्म न छोड़े, उसे इस अग्निकुंड में डाल दो या उससे कहा जाए कि इसमें कूद जाओ। उन्होंने ऐसा ही किया। यहाँ तक कि एक स्त्री आई, जिसके पास एक बच्चा था। वह उसमें कूदने से थोड़ा हिचकिचाई, तो बच्चे ने कहाः हे माता, सब्र से काम ले, क्योंकि तू हक़ पर है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2299) (3005).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 86).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص39).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 412).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 210).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 62).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن البراء رضي الله عنه قال: بعث النبي صلى الله عليه وسلم خالد بن الوليد إلى أهل اليمن يَدْعُوهُمْ إلى الإسلام فَلَمْ يُجِيبُوهُ، ثم إنَّ النبي صلى الله عليه وسلم بعث علي بن أبي طالب، وأمره أن يَقْفُلَ خالد ومن كان معه إلا رجل ممن كان مع خالد أحب أن يُعَقِّبَ مع علي رضي الله عنه فَلْيُعَقِّبْ معه قال البراء فَكُنْتُ مِمَّنْ عَقَّبَ مَعَهُ، فَلَمَّا دَنَوْنَا مِنَ القوم خرجوا إلينا فصلى بنا عليٌّ رضي الله عنه وَصَفَّنَا صَفًّا واحدا، ثم تقدَّم بين أيدينا، فقرأ عليهم كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فَأَسْلَمَتْ هَمْدَانُ جَمِيعًا، فكتب علي رضي الله عنه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بإسلامهم، فلمَّا قرأ رسول الله صلى الله عليه وسلم الكتاب خَرَّ ساجدا، ثم رفع رأسه، فقال: السَّلَامُ عَلَى هَمْدَانَ، السلامُ على هَمْدَانَ.
बरा बिन आज़िब -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ख़ालिद बिन वलीद -रज़ियल्लाहु अन्हु- को यमन की ओर भेजा कि यमन वालों को इसलाम का निमंत्रण दें। लेकिन यमन वालों ने उनकी बात नहीं मानी, तो आपने अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अन्हु- को भेजा तथा उनके हाथों कहला भेजा कि ख़ालिद बिन वलीद -रज़ियल्लाहु अन्हु- और उनके साथी वापस आ जाएँ। यह और बात है कि ख़ालिद बिन वलीद -रज़ियल्लाहु अन्हु- के साथियों में से कोई यदि अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- के साथ रहना चाहे, तो वह उनके साथ रह सकता है। बरा बिन आज़िब -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- के साथ जो लोग वहाँ रह गए थे, उनमें मैं भी शामिल था। जब हम यमन वालों के निकट पहुँच गए, तो वे भी हमारी ओर निकल कर आए। अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने हमें नमाज़ पढ़ाई, फिर हमें एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया तथा हमारे सामने खड़े होकर उन्हें अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का पत्र पढ़कर सुनाया। पत्र सुन हमदान क़बीले के सारे लोग मुसलामन हो गए। अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उनके इसलाम ग्रहण करने की ख़बर लिख कर भेज दी। जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पत्र पढ़ा, तो सजदे में गिर गए, फिर अपना सर उठाया और फ़रमायाः "हमदान पर शांति की धारा बरसे, हमदान पर शांति की धारा बरसे।"
इसे बैहक़ी ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
हवाला
سنن البيهقي الكبرى، لأحمد بن الحسين بن علي بن موسى أبو بكر البيهقي، مكتبة دار الباز، مكة المكرمة ، 1414 – 1994، تحقيق: محمد عبد القادر عطا.
إرواء الغليل في تخريج أحاديث منار السبيل، محمد ناصر الدين الألباني، المكتب الإسلامي – بيروت، ط. الثانية -1405 – 1985.
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، لعبدالله بن عبد الرحمن البسام، مكتبة الأسدي، مكة، ط. الخامسة 1423هـ.
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن صالح الفوزان، ط 1، 1427هـ، دار ابن الجوزي.
تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، شرحه الشيخ د. صالح بن فوزان الفوزان، اعتنى بإخراجه: عبد السلام السليمان،ط 1، 1427هـ - 2006م.
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