عن حذيفة بن اليمان رضي الله عنه قال: حَدَثَنا رسول الله صلى الله عليه وسلم حدِيثَين قَد رَأَيتُ أَحَدَهُما وأنا أنتظر الآخر: حدثنا أنَّ الأمَانة نَزَلَت في جَذر قُلُوب الرِّجال، ثمَّ نزل القرآن فَعَلِموا مِن القرآن، وعَلِمُوا مِن السُنَّة، ثمَّ حدَّثنا عن رفع الأمانة، فقال: «يَنَامُ الرَّجُلُ النَّومَة فَتُقْبَضُ الأَمَانَةُ مِنْ قَلْبِهِ، فَيَظَلُّ أَثَرُهَا مِثلَ الوَكْتِ، ثُمَّ يَنَامُ النَّومَةَ فَتُقبَض الأَمَانَة مِن قَلْبِه، فَيَظَلُّ أَثَرُها مِثل أَثَر المَجْلِ، كَجَمْرٍ دَحْرَجْتَهُ عَلى رِجْلِكَ فَنَفِطَ، فَتَرَاهُ مُنْتَبِراً وَلَيس فِيه شَيء»، ثم أَخَذ حَصَاةً فَدَحْرَجَه على رجله «فَيَصبَح النَّاس يَتَبَايَعُون، فَلاَ يَكَاد أَحَدٌ يُؤَدِّي الأَمَانَةَ حَتَّى يُقَال: إِنَّ فِي بَنِي فُلاَن رَجُلاً أَمِيناً، حَتَّى يُقَال للرَّجُل: مَا أَجْلَدَهُ! مَا أَظْرَفَه! مَا أَعْقَلَه! وَمَا فِي قَلبِه مِثْقَالُ حَبَّة مِن خَرْدَل مِنْ إيمان»، ولَقَد أتى عَلَيَّ زَمَان وما أُبَالي أَيُّكُم بَايعت: لئِن كان مُسلِمًا لَيَرُدَنَّه عَلَيَّ دِينه، وَإِن كان نصرانيا أو يهوديا ليَرُدنَّه عَلَيَّ سَاعِيه، وأَمَّا اليوم فَمَا كُنت أَبَايِعُ مِنكُم إِلاَّ فُلاَنا وفُلاَناً».
हुज़ैफ़ा बिन यमान (रज़ियल्लाहु अहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें दो बातें बताई थीं। एक मैंने देख ली है और दूसरी की प्रतीक्षा में हूँ। आपने हमें बताया कि अमानत लोगों के दिलों की जड़ में उतरी। फिर क़ुरआन उतरा और लोगों ने उसे क़ुरआन और सुन्नत से सीखा और जाना। फिर हमें अमानत के उठ जाने के बारे में बताते हुए कहाः "आदमी एक नींद सोएगा और उसके दिल से अमानत उठा ली जाएगी। केवल असका धुंधला- सा निशान रह जाएगा। फिर और एक नींद लेगा, जिसके साथ उसके दिल से अमानत समाप्त कर दी जाएगी। केवल फफोले की तरह उसका निशान बाक़ी रह जाएगा, जैसे तुम अपने पाँव पर कोई अंगारा लुढ़का दो और उसमें छाला पड़ जाए, जिसके कारण तुम्हें उभार दिखाई देने लगे, हालाँकि उसके अंदर कुछ नहीं होता।" फिर आपने दिखाने के लिए एक कंकड़ लिया और उसे अपने पाँव पर लुढ़का दिया। "फिर हाल यह होगा कि लोग क्रय-विक्रय करेंगे, लेकिन कोई अमानत का पालन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कहा जाएगा कि अमुक क़बीले में एक अमानतदार व्यक्ति है। एक व्यक्ति के बारे में कहा जाएगा कि वह कितना साहसी, शिष्ट और होशियार है! लेकिन उसके दिल में राई के दाने बराबर भी ईमान न होगा।" एक समय था, जब मुझे कोई चिंता नहीं होती थी कि मैं तुममें से किससे क्रय- विक्रय कर रहा हूँ। अगर मुसलमान होगा, तो उसका धर्म उसे मेरी ओर वापस करेगा और अगर यहूदी या नसरानी होगा, तो उसका शासक उसे मेरी ओर वापस करेगा। परन्तु, आज यह हालत है कि मैं तुममें से अमुक और अमुक के सिवा किसी से मामला नहीं करता।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح البخاري، تأليف: محمد بن إسماعيل البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، دار طوق النجاة ترقيم محمد فؤاد عبدالباقي، ط 1422هـ.
صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن حجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء التراث العربي.
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف: مصطفى الخن ومصطفى البغا ومحي الدين مستو وعلي الشربجي ومحمد لطفي، مؤسسة الرسالة، ط 14، عام 1407 - 1987.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، تأليف: محمد علي بن محمد البكري الصديقي، عناية: خليل مأمون شيحا، الناشر: دار المعرفة، ط.4، 1425هـ.
رياض الصالحين، للنووي، نشر: دار ابن كثير للطباعة والنشر والتوزيع، دمشق – بيروت، تحقيق: ماهر ياسين الفحل، الطبعة الأولى، 1428هـ - 2007م.
كنوز رياض الصالحين، نشر: دار كنوز إشبيليا، الطبعة: الأولى، 1430ه 2009م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إن أول الناس يُقضى يوم القيامة عليه رجُل اسْتُشْهِدَ، فأُتي به، فعرَّفه نِعمته، فعرَفَها، قال: فما عَمِلت فيها؟ قال: قَاتَلْتُ فيك حتى اسْتُشْهِدْتُ. قال: كَذبْتَ، ولكنك قَاتَلْتَ لأن يقال: جَرِيء! فقد قيل، ثم أُمِرَ به فَسُحِب على وجهه حتى أُلقي في النار. ورجل تعلم العلم وعلمه، وقرأ القرآن، فأُتي به فعرَّفه نِعَمه فعرَفَها. قال: فما عملت فيها؟ قال: تعلمت العلم وعلمته، وقرأت فيك القرآن، قال: كَذَبْتَ، ولكنك تعلمت ليقال: عالم! وقرأت القرآن ليقال: هو قارئ؛ فقد قيل، ثم أُمِر به فَسُحِب على وجهه حتى ألقي في النار. ورجل وَسَّعَ الله عليه، وأعطاه من أصناف المال، فأُتي به فعرَّفه نِعَمه، فعرَفَها. قال: فما عملت فيها؟ قال: ما تركت من سبيل تُحِبُّ أن يُنْفَقَ فيها إلا أنفقت فيها لك. قال: كَذَبْتَ، ولكنك فعلت ليقال: جواد! فقد قيل، ثم أُمِر به فَسُحِب على وجهه حتى ألقي في النار».
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना: क़यामत के दिन सर्वप्रथम जिस व्यक्ति के बारे में निर्णय लिया जाएगा, वह दुनिया में शहीद हुआ होगा। उसे लाया जाएगा, फिर अल्लाह तआला उसे अपनी नीमतों का इक़रार कराएगा, तो वह उन नीमतों का इक़रार कर लेगा। तब (अल्लाह तआला) कहेगा: तूने इन नीमतों का कैसा उपयोग किया? वह कहेगा: मैं तेरे लिए जिहाद करता रहा, यहाँ तक कि शहीद कर दिया गया। अल्लाह कहेगा: तूने झूठ कहा। सच्चाई यह है कि तुमने जंग इसलिए की, ताकि तुम्हें वीर कहा जाए और यह कहा जा चुका, फिर उसके प्रति आदेश दिया जाएगा और उसे चेहरे के बल घसीट कर जहन्नम में डाल दिया जाएगा। इसी प्रकार, एक वह व्यक्ति होगा, जिसने ज्ञान सीखा और सिखाया और क़ुरआन पढ़ा था। उसे लाया जाएगा और उससे भी नीमतों की पहचान करवाई जाएगी, तो वह पहचान लेगा और इक़रार कर लेगा। अल्लाह तआला कहेगा: तुमने उनका क्या किया? वह कहेगा : मैंने ज्ञान सीखा और सिखाया और तेरे लिए क़ुरआन पढ़ा। तब अल्लाह कहेगा: तूने झूठ कहा, बल्कि तूने ज्ञान इसलिए प्राप्त किया ताकि तुझे ज्ञानी कहा जाए और क़ुरआना इस लिए पढ़ा ताकि क़ुरआन- वाचक (क़ारी) कहा जाए और यह सब कहा जा चुका। फिर आदेश होगा, तो उसे मुँह के बल घसीट कर जहन्नम में डाल दिया जाएगा। एक और व्यक्ति को लाया जाएगा, जिसे अल्लाह ने धन बहुत दिया था। अल्लाह तआला उसे भी अपनी नीमतों की पहचान कराएगा, तो वह पहचान लेगा। अल्लाह कहेगा: तूने इनका क्या किया? वह कहेगा: मैंने प्रत्येक वह कार्य जिसमें तू खर्च करना पसंद करता है, उसमें खर्च किया। अल्लाह कहेगा: तूने झूठ कहा, बल्कि तूने ऐसा इसलिए किया ताकि कहा जाए कि तू दानवीर है और यह सब कहा जा चुका। फिर आदेश होगा और उसे भी चेहरे के बल घसीट कर जहन्नम में डाल दिया जाएगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
نزهة المتقين، تأليف: جمعٌ من المشايخ، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة الأولى: 1397 هـ الطبعة الرابعة عشر 1407 هـ.
بهجة الناظرين، تأليف: سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي، سنة النشر: 1418 هـ - 1997م.
صحيح مسلم، تأليف: مسلم بن الحجاج النيسابوري، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي الناشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
رياض الصالحين، تأليف: محيي الدين يحيى بن شرف النووي، تحقيق: د. ماهر بن ياسين الفحل، الطبعة: الأولى، 1428 هـ.
شرح رياض الصالحين، تأليف: محمد بن صالح العثيمين، الناشر: دار الوطن للنشر، 1426 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن حذيفة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إنَّ ما أَتَخوَّفُ عليكم رجلٌ قَرَأ القرآنَ حتى إذا رُئِيَتْ بَهْجتُه عليه، وكان رِدْئًا للإِسلام، غَيَّرَه إلى ما شاء الله، فانْسَلَخَ مِنْه ونَبَذَه وراءَ ظَهْرِه، وسَعَى على جاره بالسَّيف، ورمَاه بالشِّرك»، قال: قلتُ: يا نبيَّ الله، أيُّهما أوْلى بالشِّرك، المَرْمِي أم الرَّامي؟ قال: «بل الرَّامي».
ह़ुज़ैफा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “मुझे तुमपर जिन चीज़ों का डर है, उनमें से एक वह आदमी है, जो क़ुरआन पढ़ेगा, यहाँ तक कि जब क़ुरआन की चमक उसके ऊपर दिखने लगेगी और वह इसलाम का सहारा बन जाएगा, तो वह स्वयं को बदलकर वह बना लेगा, जो अल्लाह चाहे। चुनांचे वह इसलाम से निकल जाएगा और उसे अपने पीछे डाल देगा एवं अपने पड़ोसी पर तलवार लेकर चढ़ दौड़ेगा तथा उसपर शिर्क का लांछन लगाएगा।” हुज़ैफ़ा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के नबी, उन दोनों में से कौन शिर्क के अधिक समीप होगा, लांछन लगाने वाला अथवा जिसपर लांछन लगाया गया होगा वह? आपने फ़रमायाः “लांछन लगाने वाला।”
इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया है ।दर्जाह़सन
हवाला
-الإحسان في تقريب صحيح ابن حبان، المؤلف: محمد بن حبان بن أحمد بن حبان بن معاذ البُستي، ترتيب: الأمير علاء الدين علي بن بلبان الفارسي، حققه وخرج أحاديثه وعلق عليه: شعيب الأرنؤوط، الناشر: مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الأولى، 1408 هـ - 1988 م.
-سلسلة الأحاديث الصحيحة وشيء من فقهها وفوائدها، تأليف محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مكتبة المعارف للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى، لمكتبة المعارف.
-مختار الصحاح، لزين الدين أبو عبد الله محمد بن أبي بكر بن عبد القادر الحنفي الرازي، تحقيق: يوسف الشيخ محمد، نشر: المكتبة العصرية - الدار النموذجية، بيروت – صيدا، لطبعة: الخامسة، 1420هـ - 1999م.
-معجم اللغة العربية المعاصرة، للدكتور أحمد مختار عبد الحميد عمر بمساعدة فريق عمل، الناشر: عالم الكتب، الطبعة: الأولى، 1429 هـ - 2008 م.
-شرح مشكل الآثار, أبو جعفر أحمد بن محمد الطحاوي, تحقيق: شعيب الأرنؤوط, مؤسسة الرسالة, الطبعة: الأولى - 1415 هـ، 1494 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ جَابِرِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ رضي الله عنهما أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «لَا تَعَلَّمُوا الْعِلْمَ لِتُبَاهُوا بِهِ الْعُلَمَاءَ، وَلَا لِتُمَارُوا بِهِ السُّفَهَاءَ، وَلَا تَخَيَّرُوا بِهِ الْمَجَالِسَ، فَمَنْ فَعَلَ ذَلِكَ، فَالنَّارُ النَّارُ».
जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "ज्ञान इसलिए न अर्जित करो कि उलेमा से बहस कर सको और अज्ञान लोगों से झगड़ सको। इसके द्वारा सभाओं में श्रेष्ठ स्थानों पर क़ब्ज़ा न करो। जिसने ऐसा किया, उसका ठिकना जहन्नम है, उसका ठिकाना जहन्नम है।"
इसे इब्ने माजह ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस उद्देश्य से ज्ञान अर्जित करने से मना किया है कि उलेमा से बहस की जाए और बताया जाए कि मैं भी तुम्हारे जैसा आलिम हूँ अथवा अज्ञान तथा नादान लोगों से बहस की जाए। इस नीयत से भी ज्ञान अर्जित करने से मना किया है कि सभाओं में आगे बैठने का अवसर मिले। जिसने ऐसा किया वह अपनी रियाकारी (दिखावा) के कारण जहन्नम का हक़दार होगा।
फ़ायदे
- उस व्यक्ति को जहन्नम में जाने की चेतावनी दी गई है, जो अभिमान करने, बहस करने और सभाओं में आगे बैठने की नीयत से ज्ञान प्राप्त करे।
- ज्ञान सीखने तथा सिखाने का काम अल्लाह के लिए करने का महत्व।
- सारे कर्मों का आधार नीयत पर है और उसी के अनुसार प्रतिफल मिलता है।
हवाला
سنن ابن ماجه (1/ 170) (254)، مرشد ذوي الحجا والحاجة (2/378)، مشارق الأنوار الوهاجة ومطالع الأسرار البهاجة في شرح سنن الإمام ابن ماجه (4/ 482).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللهُ عَنْهَا قَالَتْ: تَلَا رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَذِهِ الْآيَةَ: {هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ، وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ، وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ} [آل عمران: 7]. قَالَتْ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «فَإِذَا رَأَيْتِ الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ فَأُولَئِكَ الَّذِينَ سَمَّى اللهُ، فَاحْذَرُوهُمْ».
आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी (आयतें) मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की ओर से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" [सूरा आल-ए-इमरान : 7] उनका कहना है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की सदृश आयतों का अनुसरण करते हों, तो जान लो कि उन्हीं का नाम अल्लाह ने लिया है। अतः उनसे सावधान रहना।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह आयत पढ़ी : "(ऐ नबी!) वही है जिसने आप पर यह पुस्तक उतारी, जिसमें से कुछ आयतें मुहकम हैं, वही पुस्तक का मूल हैं, तथा कुछ दूसरी आयतें मुतशाबेह हैं। फिर जिनके दिलों में टेढ़ है, तो वे फ़ितने की तलाश में तथा उसके असल आशय की तलाश के उद्देश्य से, सदृश अर्थों वाली आयतों का अनुसरण करते हैं। हालाँकि उनका वास्तविक अर्थ अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। तथा जो लोग ज्ञान में पक्के हैं, वे कहते हैं हम उसपर ईमान लाए, सब हमारे रब की और से है। और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं।" इस आयत में अल्लाह पाक ने बताया है कि उसी ने अपने नबी पर क़ुरआन उतारा है, जिसकी कुछ आयतों का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट है और यही आयतें क़ुरआन का मूल हैं तथा विभेद के समय इन्हीं की ओर लौटा जाएगा। जबकि उसकी कुछ आयतें एक से अधिक मायनों की संभावना रखती हैं, कुछ लोगों के सामने उनका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता या ऐसा लगता है कि उनके तथा अन्य आयतों के बीच में टकराव है। फिर अल्लाह ने बताया कि इन आयतों के बारे में लोगों का रवैया कैसा रहता है? जिन लोगों के दिल सत्य से हटे हुए हैं, वे स्पष्ट अर्थ वाली आयतों को छोड़ कर एक से अधिक अर्थ की संभावना रखने वाली आयतों को लेते हैं। इससे उनका उद्देश्य संदेह पैदा करना और लोगों को गुमराह करना होता है। वे इन आयतों का अर्थ अपनी इच्छा अनुसार निकालते हैं। इसके विपरीत गहरे ज्ञान वाले लोगों को पता होता है कि यह आयतें एक से अधिक अर्थ की संभावना वाली हैं, इसलिए वे इनकी व्याख्या स्पष्ट अर्थ वाली आयतों के आलोक में करते हैं और इस बात पर विश्वास रखते हैं कि यह सारी आयतें उच्च एवं पवित्र अल्लाह की उतारी हुई हैं, इसलिए इनमें परस्पर टकराव नहीं हो सकता। लेकिन इससे शिक्षा वही लोग प्राप्त कर सकते हैं, जो स्वच्छ विवेक रखते हैं। फिर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईमान वालों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से कहा कि जब तुम ऐसे लोगों को देखो, जो क़ुरआन की मुतशाबेह आयतों के पीछे पड़ते हों, तो समझ जाओ कि यही वह लोग हैं, जिनका ज़िक्र अल्लाह ने इन शब्दों में किया है : "फिर जिनके दिलों में टेढ़ है।" अतः इन लोगों से सचेत रहो और इनकी बात पर ध्यान न दो।
फ़ायदे
- क़ुरआन की मुहकम आयतों से मुराद वह आयतें हैं, जिनका अर्थ स्पष्ट हो। जबकि मुतशाबेह से मुराद वह आयतें हैं, जिनके एक से अधिक मायने होने की संभावना हो और जिनमें ग़ौर व फ़िक्र करने की ज़रूरत हो।
- इस हदीस में गुमराहों, बिदअतियों और लोगों को गुमराह करने और संदेह में डालने के लिए उलझनें खड़ी करने वालों के साथ उठने-बैछने से सावधान किया है।
- आयत के अंत में "और शिक्षा वही लोग ग्रहण करते हैं, जो बुद्धि वाले हैं" कहकर गुमराह लोगों की भर्त्सना और मज़बूत ज्ञान वाले लोगों की प्रशंसा की गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिसने शिक्षा ग्रहण नहीं की और मनमानी करता रहा, वह बुद्धिमान नहीं है।
- मुतशाबेह आयतों का अनुसरण दिल की गुमराही का कारण है।
- मुतशाबेह आयतों को मुहकम आयतों के आलोक में देखा एवं समझा जाना ज़रूरी है।
- अल्लाह ने क़ुरआन की कुछ आयतों को मुहकम और कुछ आयतों को मुतशाबेह बनाया है, ताकि इस बात की परख हो सके कि कौन ईमान वाला है और कौन ईमान वाला नहीं है।
- क़ुरआन के अंदर मुतशाबेह आयतों की उपस्थिति दरअसल उलेमा की ग़ैर-उलेमा पर उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है और मानव विवेक के सीमित होने को इंगित करती है। ताकि मनुष्य अपने पैदा करने वाले के आगे नतमस्तक होजाए, और अपनी अक्षमता को स्वीकार करे।
- मज़बूत ज्ञान की फ़ज़ीलत तथा उसपर जमे रहने की आवश्यकता।
- अल्लाह के कथन { وما يعلم تأويله إلا الله والراسخون في العلم } में {الله} शब्द पर रुकने के संबंध में मुफ़स्सिरों के दो मत हैं। जो लोग {الله} शब्द पर रुकते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद किसी चीज़ की हक़ीक़त और वास्तविकता तथा ऐसी बातों को जानना है, जिनको जानना इन्सान के लिए संभव नहीं है, जैसे आत्मा और क़यामत आदि चीज़ें, जिनका ज्ञान अल्लाह ने अपने पास रखा है। गहरे ज्ञान वाले लोग इन चीज़ों पर विश्वास रखते हैं और इनकी हक़ीक़त की जानकारी को अल्लाह के हवाले कर देते हैं। दूसरी तरफ़ जो लोग {الله} शब्द पर रुकते नहीं हैं और उसे आगे से मिलाकर पढ़ते हैं, उनकी नज़र में {تأويل} से मुराद तफ़सीर एवं व्याख्या है। उनके मुताबिक इन आयतों की व्याख्या अल्लाह के साथ-साथ गहरे ज्ञान वाले लोग भी जानते हैं, जो मुहकम आयतों के आलोक में उनकी व्याख्या करते हैं और उनपर विश्वास रखते हैं।
हवाला
صحيح البخاري (6/ 33) (4547)، صحيح مسلم (4/ 2053) (2665)، فتح الباري (8/211)، شرح النووي على مسلم (16/217)، النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 407، 465)، فتح الودود في شرح سنن أبي داود (4/415)، تحفة الأبرار شرح مصابيح السنّة (1/129)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (41/ 559).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com