عَن أَبِي أُمَامَةَ قَالَ: حَدَّثَنِي عَمْرُو بْنُ عَبَسَةَ رضي الله عنه أَنَّهُ سَمِعَ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَقُولُ: «أَقْرَبُ مَا يَكُونُ الرَّبُّ مِنَ العَبْدِ فِي جَوْفِ اللَّيْلِ الآخِرِ، فَإِنْ اسْتَطَعْتَ أَنْ تَكُونَ مِمَّنْ يَذْكُرُ اللَّهَ فِي تِلْكَ السَّاعَةِ فَكُنْ».
अबू उमामा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मुझे अम्र बिन अबसा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया है कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "अल्लाह अपने बंदे से सबसे निकट रात के अंतिम भाग में होता है। अतः यदि उस समय अल्लाह का स्मरण करने वालों में शामिल हो सको, तो हो जाओ।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदा अपने रब से सबसे ज़्यादा निकट रात के अंतिम तिहाई भाग में हुआ करता है। इसलिए हर व्यक्ति का प्रयास होना चाहिए कि रात के उस भाग में जागकर अल्लाह की इबादत करे, नमाज़ पढ़े, ज़िक्र में व्यस्त रहे और तौबा करे।
फ़ायदे
- रात के अंतिम भाग में ज़िक्र करने की प्रेरणा।
- ज़िक्र, दुआ और नमाज़ों के समयों की फ़ज़ीलत में कमी-बेशी हुआ करती है।
- मीरक दो हदीसों के दो वाक्यों, "पाक रब अपने बंदे से सबसे ज़्यादा निकट रात के अंतिम तिहाई भाग में हुआ करता है" और "बंदा अपने पाक रब से सबसे ज़्यादा निकट सजदे की अवस्था में हुआ करता है" का अंतर बताते हुए लिखते हैं : पहली हदीस में उद्देश्य यह बयान करना है कि पाक रब अपने बंदे से सबसे निकट कब होता है। इसका उत्तर है, रात का अंतिम भाग। जबकि दूसरी हदीस में उद्देश्य यह बयान करना है कि बंदा अपने पाक रब से सबसे निकट किस अवस्था में हुआ करता है। इसका उत्तर है, सजदे की अवस्था।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 537) (3579).
سنن أبي داود (2/ 454) (1277).
سنن النسائي (1/ 279) (572).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1019).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 509).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 535).
مشكاة المصابيح، للتبريزي (1/ 387).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن جابر رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إن في الليل لساعة، لا يُوَافِقُهَا رجُلٌ مُسلم يَسأل الله تعالى خيرًا من أمْرِ الدنيا والآخرة، إلا أعْطَاه إِياه، وذلك كُلَّ ليلة».
जाबिर- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को फ़रमाते हुए सुनाः "रात में एक समय होता है कि जो मुसलमान उसमें अल्लाह से दुनिया एवं आख़िरत से संबंधित कोई भलाई माँगता हुआ पाया जाएगा, अल्लाह उसे ज़रूर प्रदान करेगा। यह घड़ी हर रात आती है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشرة، 1407هـ.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي.
- كنوز رياض الصالحين»، لحمد بن ناصر العمار، دار كنوز إشبيليا- الطبعة الأولى1430ه.
- شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين/محمد علي بن محمد بن علان البكري -اعتنى بها: خليل مأمون شيحا- دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان- الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَيُّهَا النَّاسُ، إِنَّ اللهَ طَيِّبٌ لَا يَقْبَلُ إِلَّا طَيِّبًا، وَإِنَّ اللهَ أَمَرَ الْمُؤْمِنِينَ بِمَا أَمَرَ بِهِ الْمُرْسَلِينَ، فَقَالَ: {يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا، إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} [المؤمنون: 51] وَقَالَ: {يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} [البقرة: 172] ثُمَّ ذَكَرَ الرَّجُلَ يُطِيلُ السَّفَرَ أَشْعَثَ أَغْبَرَ، يَمُدُّ يَدَيْهِ إِلَى السَّمَاءِ: يَا رَبِّ، يَا رَبِّ، وَمَطْعَمُهُ حَرَامٌ، وَمَشْرَبُهُ حَرَامٌ، وَمَلْبَسُهُ حَرَامٌ، وَغُذِيَ بِالْحَرَامِ، فَأَنَّى يُسْتَجَابُ لِذَلِكَ؟».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “निस्संदेह, अल्लाह पवित्र है और केवल पवित्र चीज़ों को ही स्वीकार करता है। अल्लाह ने ईमान वालों को वही आदेश दिया है, जो उसने रसूलों को दिया था। अल्लाह ने फ़रमाया है : يَا أَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنْ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا [सूरा अल-मोमिनून : 51] (हे रसूलो! पवित्र चीज़ें खाओ और अच्छे कर्म करो।) और फ़रमाया है : يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ, [सूरा अल-बक़रा : 172] (हे ईमान वालो! हमने तुम्हें जो पवित्र चीज़ें दी हैं, उनमें से खाओ।) फिर एक व्यक्ति का उल्लेख किया, जो लंबी यात्रा करता है, जिसके बाल बिखरे हुए तथा शरीर धूल-धूसरित है, वह अपने हाथ आकाश की ओर उठाता है और कहता है : ‘हे मेरे रब! हे मेरे रब!’ जबकि उसका भोजन हराम का है, उसका पेय हराम का है, उसका वस्त्र हराम का है और उसका पोषण हराम से हुआ है, ऐसे में उसकी दुआ कैसे स्वीकार की जाएगी?”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि अल्लाह पाक एवं पुनीत है, कमियों एवं दोषों से मुक्त तथा हर एतबार से परिपूर्ण है। वह केवल उन्हीं कार्यों, शब्दों और विश्वासों को स्वीकार करता है जो शुद्ध हों और जो केवल अल्लाह की प्रसन्नता के लिए और उसके पैगंबर के तरीक़े के अनुसार किए गए हों। अल्लाह की निकटता केवल इसी प्रकार की इबादतों के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए। याद रखें कि अपने कर्मों को शुद्ध करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन हलाल भोजन खाना है। हलाल भोजन खाने से व्यक्ति के कर्म शुद्ध होते हैं। इसीलिए जिस प्रकार अल्लाह ने रसूलों को हलाल भोजन खाने और अच्छे कर्म करने का आदेश दिया, उसी प्रकार उसने ईमान वालों को भी इसका आदेश दिया है। उसका कथन है : (ऐ रसूलो! हलाल चीज़ें खाओ और नेक अमल करो। निःसंदेह मैं वह सब जानता हूं जो तुम करते हो।) [सूरा मोमिनून : 51] एक अन्य स्थान में उसने कहा है : (ऐ ईमान वालो! हमारी दी हुई हलाल चीज़ें खाओ।) [सूरा बक़रा : 172]
फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हराम भोजन करने से सावधान किया। क्योंकि हराम भोजन कर्म को नष्ट कर देता है और उसे अल्लाह के यहाँ क़बूल होने नहीं देता। चाहे क़बूल होने के ज़ाहिरी सबब जितने भी पाए जाएँ। मसलन :
1- किसी नेक काम, जैसे हज, जिहाद और रिश्ते का हक़ अदा करने आदि के लिए लंबा सफ़र करना।
2- इन्सान का परेशान हाल होना। जैसे उसके बाल बिखरे हुए हों और धूल मिट्टी लगने के कारण उसके शरीर और कपड़े का रंग बदला हुआ हो। यह सब कुछ इस बात का प्रमाण है कि आदमी बहुत परेशान है।
3- दुआ के लिए आकाश की ओर हाथ उठाना।
4- अल्लाह के नामों को वसीला बनाना और गिड़गिड़ाकर दुआ करना। मसनल ऐ मेरे रब ! ऐ मेरे रब! कहना।
दुआ क़बूल होने के इन कारणों के पाए जाने के बावजूद उसकी दुआ क़बूल नहीं होती। क्योंकि उसका खाना हराम का, उसका पीना हराम का, उसका वस्त्र हराम का है और उसका पालन-पोषण हराम भोजन से हुआ है। ऐसे में उसकी दुआ क़बूल हो भी तो हो कैसे?
फ़ायदे
- सर्वशक्तिमान अल्लाह अपनी ज़ात, गुणों, कार्यों और आदेशों में परिपूर्ण है।
- केवल अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए तथा उसके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम द्वारा बताए गए तरीक़े के अनुसार कार्य करने का आदेश।
- ऐसी शैली अपनाना जो अमल के लिए उत्साह और प्रेरणा पैदा करे। इसका प्रमाण अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह कथन है : "अल्लाह ने ईमान वालों को उसी बात का आदेश दिया है, जिसका आदेश रसूलों को दिया है।" क्योंकि जब ईमान वाले को यह एहसास होगा कि जो काम वह करने जा रहा है, उसका आदेश रसूलों को भी दिया गया था, तो उसके मन में रसूलों के पदचिन्हों पर चलते हुए यह काम करने की परबल इच्छा पैदा होगी।
- दुआ की स्वीकृति में बाधा डालने वाली चीजों में से एक है हराम भोजन खाना।
- इस हदीस में पाँच चीज़ों का ज़िक्र है, जो दुआ के क़बूल होने का कारण बनती हैं : 1- लंबी यात्रा। क्योंकि इससे विनम्रता पैदा होती है, जो दुआ स्वीकार होने का एक प्रमुख कारण है। 2- परेशानी की हालत। 3- हाथों को आसमान की ओर उठाना। 4. बार-बार अल्लाह की रुबुबीयत (उसके स्रष्टा, स्वामी और प्रबंधक होने) का हवाला देते हुए आग्रह के साथ दुआ करना। दुआ के क़बूल होने का यह भी एक बड़ा कारण है। 5- हलाल चीज़ें खाना और पीना।
- हलाल भोजन खाने से नेक कामों में मदद मिलती है।
- क़ाज़ी कहते हैं : अरबी शब्द 'तैयिब' इसी भाषा के एक और शब्द 'ख़बीस' के विपरीत है। जब शब्द 'तैयिब' अल्लाह की विशेषता के रूप में आता है, तो इसका अर्थ यह है कि अल्लाह सभी कमियों से पाक है और सभी बुराइयों से स्वच्छ है। जब यह किसी व्यक्ति के गुण के रूप में आता है, तो इसका मतलब यह है कि वह बुरे आचरण और बुरे कर्मों से दूर है तथा अच्छे आचरण और कर्मों से युक्त है। जब यह धन के रूप में आए, तो इसका अर्थ यह होता है कि धन वैध और उत्कृष्ट है।
हवाला
صحيح مسلم (2/ 703) (1015).
التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، لإسماعيل الأنصاري (ص27).
شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص141).
الأحاديث الأربعين النووية مع ما زاد عليها ابن رجب وعليها الشرح الموجز المفيد (ص22).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن سهل بن سعد رضي الله عنهما مرفوعاً: «ثنتان لا تُرَدَّانِ، أو قلما تردان: الدعاء عند النداء وعند البأس حِينَ يُلْحِمُ بَعْضُهُ بَعْضًا».
सह्ल बिन साद (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हुए कहते हैंः "दो दुआएँ लौटाई नहीं जातीं या कम ही लौटाई जाती हैं; अज़ान के समय की दुआ और युद्ध के समय की दुआ, जब लोग एक-दूसरे से गुथ जाएँ।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن أبي داود، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد: المكتبة العصرية، صيدا - بيروت.
كنوز رياض الصالحين بإشراف حمد العمار, دار كنوز إشبيليا, الطبعة الأولى, 1430ه.
دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين لمحمد بن علان الصديقي,تحقيق خليل مأمون شيحا-دار المعرفة-بيروت-الطبعة الرابعة 1425ه.
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين, مؤسسة الرسالة, الطبعة الرابعة عشرة, 1407ه.
صحيح أبي داود، للشيخ الألباني ، مؤسسة غراس، الكويت. الطبعة : الأولى ، 1423 هـ - 2002 م.
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي- الطبعة الأولى1418ه.
شرح رياض الصالحين؛ للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «أَقْرَبُ مَا يَكُونُ الْعَبْدُ مِنْ رَبِّهِ وَهُوَ سَاجِدٌ، فَأَكْثِرُوا الدُّعَاءَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "बंदा अपने रब से सबसे अधिक निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। अतः तुम उसमें ख़ूब दुआएँ किया करो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि बंदा अपने रब से सबसे ज़्यादा निकट उस समय होता है, जब वह सजदे में होता है। इसका कारण यह है कि सजदे की हालत में बंदा अपने शरीर के सबसे उत्कृष्ट अंग को अल्लाह के लिए विनम्रता धारण करके ज़मीन पर रख देता है।
आपने सजदे की हालत में अधिक से अधिक दुआ करने का आदेश दिया है, ताकि अल्लाह के लिए धारण की जाने वाली इस विनम्रता और विनयशीलता में कार्य के साथ-साथ कथन भी शामिल हो जाए।
फ़ायदे
- नेकी के काम बंदे को पवित्र एवं महान अल्लाह से निकट ले जाते हैं।
- सजदे की हालत में प्रचुर मात्रा में दुआ करना मुसतहब है। क्योंकि सजदा दुआ क़बूल होने की जगहों में से एक जगह है।
हवाला
صحيح مسلم (1/ 350) (482).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 509).
تطريز رياض الصالحين، لفيصل المبارك (ص780).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 506).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الدُّعَاءُ لاَ يُرَدُّ بَيْنَ الأَذَانِ وَالإِقَامَةِ».
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अज़ान तथा इक़ामत के बीच की जाने वाली दुआ रद्द नहीं होती।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और नसई ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अज़ान और इक़ामत के बीच की जाने वाली दुआ की फ़ज़ीलत बयान की है और बताया है कि इस समय की जाने वाली दुआ इस लायक़ है कि क़बूल हो जाए। अतः इस समय अल्लाह से दुआ किया करो।
फ़ायदे
- इस समय दुआ करने की फ़ज़ीलत।
- दुआ करने वाला जब दुआ के आदाब का पालन करे, दुआ क़बूल होने के स्थानों एवं समयों का लिहाज़ करते हुए दुआ करे, अल्लाह की अवज्ञा से दूर रहे, संदेह में डालने वाली जगहों में क़दम रखने से बचे और अल्लाह के प्रति अच्छा गुमान रखे, तो यदि ईश्वर की इच्छा हो तो उसकी दुआ क़बूल कर लिए जाने के लाएक़ होती है।
- मुनावी दुआ क़बूल होने के बारे में कहते हैं : दुआ उस समय क़बूल होती है, जब उसकी शर्तों, स्तंभों और आदाब का ख़्याल रखा जाए। अगर इनमें से किसी चीज़ का ख़्याल नहीं रखा गया, तो इन्सान ख़ुद अपने आपको कोसे।
- दुआ क़बूल होने का मतलब यह है कि या तो इन्सान को उसकी माँगी हुई चीज़ दे दी जाए या उससे उसके समान बुराई दूर कर दी जाए या फिर उसे उसकी आख़िरत के लिए जमा करके रख दिया जाए। यह सब कुछ अल्लाह की हिकमत और उसकी कृपा के अनुसार होता है।
हवाला
سنن الترمذي (1/ 253) (212).
سنن أبي داود (1/ 392) (521).
السنن الكبرى للنسائي (9/ 32) (9812).
الثمر المستطاب في فقه السنة والكتاب، الألباني (1/ 200).
توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، لعبد الله البسام (1/ 548).
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (2/ 309).
فتح ذي الجلال والإكرام شرح بلوغ المرام، لابن عثيمين (1/ 486).
سبل السلام، لمحمد الصنعاني (2/ 707).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن بريدة رضي الله عنه قال: سمع النبي صلى الله عليه وسلم رجلاً يقول: اللهم إني أسألك بأني أشهد أنك أنت الله لا إله إلا أنت، الأحد الصمد، الذي لم يلد، ولم يولد، ولم يكن له كفوًا أحد.
فقال: «لقد سأل الله باسمه الذي إذا سُئِلَ به أعطى، وإذا دُعِيَ به أجاب»
बुरैदा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को यह दुआ करते हुए सुनाः "ऐ अल्लाह, मैं तुझसे अपनी इस गवाही के वसीले से माँगता हूँ कि तू ही अल्लाह है, तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं, तू अकेला और बेनियाज़ है, जिसकी न कोई संतान है और न वह किसी की संतान है, और न कोई उसका समकक्ष है।"
तो आपने फरमायाः “इसने अल्लाह से उसके ऐसे नाम के द्वारा माँगा है कि जिसके द्वारा जब माँगा जाए तो अल्लाह देता है, और जब पुकारा जाए तो अल्लाह क़बूल करता है।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
سنن أبي داود، لسليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد: المكتبة العصرية، صيدا - بيروت.
سنن الترمذي، لمحمد بن عيسى الترمذي، تحقيق وتعليق:أحمد محمد شاكر ومحمد فؤاد عبد الباقي وإبراهيم عطوة عوض، شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي -مصر- الطبعة الثانية، 1395 هـ - 1975م.
مسند الإمام أحمد بن حنبل، المحقق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي - مؤسسة الرسالة - الطبعة الأولى، 1421 هـ - 2001 م.
السنن الكبرى للنسائي، حققه وخرج أحاديثه: حسن عبد المنعم شلبي، أشرف عليه: شعيب الأرناءوط مؤسسة الرسالة -بيروت- الطبعة الأولى، 1421 هـ - 2001 م.
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، تأليف: عبد الله الفوزان، طبعة دار ابن الجوزي-الطبعة الأولى 1428
توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، تأليف عبد الله البسام، مكتبة الأسدي -مكة المكرمة - الطبعة الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م.
تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف الشيخ صالح الفوزان، مؤسسة الرسالة.
فتح ذي الجلال والإكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين- المكتبة الإسلامية القاهرة، تحقيق صبحي رمضان وأم إسراء بيومي- الطبعة الأولى 1427هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه مرفوعاً: «ثلاثُ دَعواتٍ مُستجابات لا شك فِيهن: دعوةُ المظلومِ، ودعوةُ المسافرِ، ودعوةُ الوالدِ على وَلدِه».
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- वर्णित है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "तीन प्रकार की दुआएँ क़बूल होती हैं। उनके क़बूल होने में कोई संदेह नहीं है। मज़लूम की दुआ, यात्री की दुआ और पिता की बददुआ जो संतान के हक़ में की जाए।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन
तशरीह
तीन प्रकार के लोगों द्वारा की जाने वाली तीन दुआएँ हैं, जिन्हें अल्लाह ग्रहण करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पहली, अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति की दुआ। यहाँ तक कि किसी काफ़िर व्यक्ति पर भी यदि अत्याचार किया जाए और वह अल्लाह से दुआ करे, तो अल्लाह उसकी दुआ ग्रहण करता है। दूसरी, यात्री यदि यात्रा के दौरान अल्लाह से दुआ करे, तो उसकी दुआ ग्रहण होती है और तीसरी दुआ है माता-पिता की दुआ। दुआ चाहे माता करे या पिता। इसी तरह दुआ करें या बददुआ।
हवाला
- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، الطبعة الأولى، 1428ه.
- بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي - الطبعة الأولى، 1418ه.
- نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة - بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.
- سنن أبي داود، لأبي داود السجستاني، تحقيق محمد محيي الدين، المكتبة العصرية.
- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، لمحمد علي بن محمد بن علان بن إبراهيم البكري الصديقي الشافعي، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة.
- شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ.
- سنن الترمذي، لمحمد بن عيسى الترمذي، تحقيق وتعليق:أحمد محمد شاكر ومحمد فؤاد عبد الباقي وإبراهيم عطوة عوض - شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي – مصر، الطبعة الثانية، 1395هـ - 1975م.
- سنن ابن ماجه، لابن ماجه أبو عبد الله محمد بن يزيد القزويني، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي- دار إحياء الكتب العربية - فيصل عيسى البابي الحلبي.
- مسند الإمام أحمد بن حنبل المحقق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي، مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م.
- صحيح أبي داود -الأم- لمحمد ناصر الدين الألباني - مؤسسة غراس للنشر والتوزيع، الكويت، الطبعة الأولى، 1423هـ - 2002م.
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com