सीधे कंटेंट पर जाएँ
तशरीह के साथ हदीसें

मुसीबत के समय के अज़कार

21 हदीसें

निश्चय यह निशानियाँ, जिन्हें अल्लाह भेजता है, किसी के मरने या जीने से सामने नहीं आतीं। बल्कि उन्हें वह अपने बंदों को डराने के लिए भेजता है। अतः जब उनमें से कोई चीज़ देखो, तो अल्लाह के ज़िक्र, दुआ और क्षमा याचना की ओर भागो।

عن أبي موسى الأشعري رضي الله عنه قال: خَسَفَت الشمس على زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم . فقام فَزِعًا، ويخشى أن تكون الساعة، حتى أتى المسجد، فقام، فصلى بأطول قيام وسجود، ما رأيته يفعله في صلاته قطُّ، ثم قال: إن هذه الآيات التي يُرْسِلُهَا الله عز وجل : لا تكون لموت أحد ولا لحياته، ولكن الله يُرْسِلُهَا يُخَوِّفُ بها عباده، فإذا رأيتم منها شيئا فَافْزَعُوا إلى ذكر الله و دُعَائِهِ وَاسْتِغْفَارِهِ.
अबू मूसा अशअरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैंः अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के समय में सूर्य ग्रहण हुआ, तो आप घबरा उठे, डर रहे थे कि कहीं क़यामत न आ जाए, यहाँ तक कि मस्जिद आए और सब से लंबे क़याम तथा सजदे के साथ नमाज़ पढ़ाई। मैंने आपको इतनी लंबी नमाज़ पढ़ाते कभी नहीं देखा था। फिर फ़रमायाः "निश्चय यह निशानियाँ, जिन्हें अल्लाह भेजता है, किसी के मरने या जीने से सामने नहीं आतीं। बल्कि उन्हें वह अपने बंदों को डराने के लिए भेजता है। अतः जब उनमें से कोई चीज़ देखो, तो अल्लाह के ज़िक्र, दुआ और क्षमा याचना की ओर भागो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के काल में जब सूर्य ग्रहण हुआ, तो घबराए हुए खड़े हुए क्योंकि आपकी अपने रब से पूर्ण आगाही यह अनिवार्य करती थी कि आप इनसानों की गुमराही एवं सरकशी के कारण अल्लाह से हद दरजा भयभीत रहें। भयभीत होने का एक कारण यह भी था कि शायद सूर में फूँक मारने का समय निकट आ गया हो। अतः आप मस्जिद गए और लोगों को सूर्य ग्रहण की नमाज़ पढ़ाई। तौबा और क्षमा याचना के इज़हार के लिए इतनी लंबी नमाज़ पढ़ी कि जो पहले देखी नहीं गई थी। फिर जब अपने रब से मुनाजात और फ़रियाद से फ़ारिग़ हो गए, तो लोगों की ओर मुतवज्जे हुए और उन्हें नसीहत की तथा यह स्पष्ट कर दिया कि इन निशानियों को अल्लाह, अपने बंदों की शिक्षा, याद दिहानी और चेतावनी के तौर पर भेजता है, ताकि लोग दुआ, क्षमा याचना और नमाज़ में जुट जाएँ।

हवाला

الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم، لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408 هـ. صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ. الموسوعة الفقهية الكويتية، صادر عن: وزارة الأوقاف والشئون الإسلامية، الكويت، الطبعة: (من 1404 - 1427 هـ).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

एक व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आकर बोला कि ऐ अल्लाह के रसूल! मैं यात्रा पर निकलना चाहता हूँ। अतः, मुझे कुछ पाथेय प्रदान कीजिए। आपने कहाः अल्लाह तुझे धर्मपरायणता का पाथेय प्रदान करे।

عن أنس بن مالك رضي الله عنه قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، إني أريد سَفَرًا، فَزَوِّدْنِي، فقال: «زَوَّدَكَ الله التقوى» قال: زِدْنِي قال: «وَغَفَرَ ذَنْبَكَ» قال: زِدْنِي، قال: «ويَسَّرَ لك الخيَر حَيْثُمَا كنتَ».
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं एक व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आकर बोला कि ऐ अल्लाह के रसूल! मैं यात्रा पर निकलना चाहता हूँ। अतः, मुझे कुछ पाथेय प्रदान कीजिए। आपने कहाः अल्लाह तुझे धर्मपरायणता (तक़वा) का पाथेय प्रदान करे। उसने कहाः कुछ और प्रदान करें। तो फ़रमायाः तेरे गुनाह माफ़ कर दे। उसने कहाः और कुछ प्रदान करें। तो फ़रमायाः तू जहाँ भी रहे, अल्लाह तेरे लिए भलाई की राह आसान कर दे।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।दर्जाह़सन ग़रीब
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى 1415هـ. تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذي، محمد عبد الرحمن بن عبد الرحيم المباركفورى، دار الكتب العلمية، بيروت. سنن الترمذي، محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق وتعليق: أحمد محمد شاكر، ومحمد فؤاد عبد الباقي، وإبراهيم عطوة عوض، شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي، مصر، الطبعة: الثانية، 1395هـ، 1975م. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين، محمد علي بن البكري بن علان، اعتنى بها: خليل مأمون شيحا، دار المعرفة، بيروت، الطبعة: الرابعة 1425هـ. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ. سنن الدارمي، تحقيق: حسين سليم أسد الداراني، دار المغني للنشر والتوزيع، المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى 1412هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشرة 1407هـ. الكلم الطيب/تقي الدين ابن تيمية -تحقيق: محمد ناصر الدين الألباني-المكتب الإسلامي - بيروت - الطبعة: الثالثة - 1977م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर यह व्यक्ति उसे पढ़ ले, तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाए। अगर इसने कहा : मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ। तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा।

عَنْ سُلَيْمَانَ بْنِ صُرَدٍ رضي الله عنه قَالَ: كُنْتُ جَالِسًا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَرَجُلاَنِ يَسْتَبَّانِ، فَأَحَدُهُمَا احْمَرَّ وَجْهُهُ، وَانْتَفَخَتْ أَوْدَاجُهُ، فَقَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «إِنِّي لَأَعْلَمُ كَلِمَةً لَوْ قَالَهَا ذَهَبَ عَنْهُ مَا يَجِدُ، لَوْ قَالَ: أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ، ذَهَبَ عَنْهُ مَا يَجِدُ» فَقَالُوا لَهُ: إِنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «تَعَوَّذْ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ»، فَقَالَ: وَهَلْ بِي جُنُونٌ؟
सुलैमान बिन सुरद रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ बैठा हुआ था और (निकट ही) दो व्यक्ति एक-दूसरे को गाली गलौज कर रहे थे। उनमें एक व्यक्ति का चेहरा ग़ुस्से के कारण लाल हो गया था और उसकी रगें फूल गई थीं। यह देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर यह व्यक्ति उसे पढ़ ले, तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाए। अगर इसने कहा : मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ। तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा।" अतः लोगों ने उससे कहा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "शैतान से अल्लाह की शरण माँग।" तो उसने उत्तर दिया : क्या मैं पागल हूँ?
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

दो व्यक्ति अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने एक-दूसरे को गाली-गलौज कर रहे थे। एक की हालत तो यह थी कि उसका चेहरा लाल हो चुका था और उसकी गर्दन की रगें फूल चुकी थीं। यह दृश्य देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर इस ग़ुस्से वाले व्यक्ति ने उसे कह लिया, तो उसका ग़ुस्सा दूर हो जाएगा। उसे "मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ।" कह लेना चाहिए। चुनांचे सहाबा ने उससे कहा कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने तुझे "मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ" पढ़ने के लिए कहा है। लेकिन उसने उत्तर दिया : क्या मैं पागल हूँ? उसे लगता था कि अल्लाह की शरण वही माँगता है, जो पागलपन का शिकार हो।

फ़ायदे
  1. जब कोई बात सामने आती, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उसके बारे में उचित मार्गदर्शन देने के लिए तैयार रहते थे।
  2. ग़ुस्सा के पीछे शैतान का हाथ हुआ करता है।
  3. यहां ग़ुस्सा आने पर धुतकारे हुए शैतान से अल्लाह की शरण माँगने का आदेश दिया गया है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "अगर आपके दिल में शैतान द्वारा कोई बुरा ख़्याल डाला जाए, तो अल्लाह की शरण माँग लिया कीजिए।"
  4. इस हदीस में गाली गलौज एवं लानत करने से सावधान किया गया है तथा उनसे नफ़रत दिलाई गई है। क्योंकि इन दोनों से संबंध ख़राब होता है।
  5. जो व्यक्ति उपदेश न सुन सके, उस तक उपदेश पहुँचा देनी चाहिए, ताकि उससे लाभान्वित हो सके।
  6. अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ग़ुस्सा से सावधान किया है, क्योंकि ग़ुस्सा बुराई और विनाश का कारण बनता है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को ग़ुस्सा केवल उसी समय आता था, जब अल्लाह के आदेशों एवं निर्देशों की अवहेलना की जाए। यह प्रशंसनीय ग़ुस्सा है।
  7. नववी इस हदीस में आए हुए व्यक्ति के शब्दों "क्या मैं पागल हूँ?" के बारे में कहते हैं : हो सकता है कि यह बात कहने वाला व्यक्ति मुनाफ़िक़ था या देहात का रहने वाला कोई अशिष्ट व्यक्ति।
हवाला

صحيح البخاري (4/ 124) (3282). صحيح مسلم (4/ 2015) (2610). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 110). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص50). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 270). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 78).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا"। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا"।

عن أبي أمامة رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم كَانَ إذا رَفَعَ مَائِدَتَهُ، قال: «الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا».
अबू उमामा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا" (अर्थात, सारी प्रशंसाएँ अल्लाह की हैं, बहुत ज़्यादा, स्वच्छ और बरकत वाली प्रशंसा, वह सबके लिए काफ़ी है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता, और ना ही कोई तेरी प्रशंसा से निस्पृह हो सकता है)।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الرابعة عشر، 1407ه 1987م. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي، نشر: دار ابن الجوزي, الدمام, 1415ه. تطريز رياض الصالحين، لفيصل الحريملي، نشر: دار العاصمة، الرياض، الطبعة: الأولى، 1423هـ - 2002م. تاج العروس من جواهر القاموس، للزبيدي، نشر: دار الهداية. صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. منار القاري شرح مختصر صحيح البخاري لحمزة محمد قاسم، راجعه: الشيخ عبد القادر الأرناؤوط، مكتبة دار البيان، دمشق، مكتبة المؤيد، الطائف ، ط 1410 هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास एक सवारी लाई गई, ताकि उसपर सवार हों। जब उन्होंने पायदान पर पाँव रखा, तो 'बिस्मिल्लाह' कहा।

عن علي بن ربيعة، قال: شهدت علي بن أبي طالب رضي الله عنه أتي بدابة ليركبها، فلما وضع رجله في الركاب، قال: بسم الله، فلما استوى على ظهرها، قال: الحمد لله الذي سخر لنا هذا وما كنا له مُقْرِنين، وإنا إلى ربنا لمنقلبون، ثم قال: الحمد لله، ثلاث مرات، ثم قال: الله أكبر، ثلاث مرات، ثم قال: سبحانك إني ظلمت نفسي فاغفر لي إنه لا يغفر الذنوب إلا أنت، ثم ضحك، فقيل: يا أمير المؤمنين، من أي شيء ضحكت؟ قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم فعل كما فعلت ثم ضحك، فقلت: يا رسول الله، من أي شيء ضحكت؟ قال: «إن ربك تعالى يَعجب من عبده إذا قال: اغفر لي ذنوبي، يعلم أنه لا يغفر الذنوب غيري»
अली बिन रबीआ कहते हैं कि मैंने देखा कि अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास एक सवारी लाई गई, ताकि उसपर सवार हों। जब उन्होंने पायदान पर पाँव रखा, तो 'बिस्मिल्लाह' कहा। फिर जब ठीक से बैठ गए, तो कहाः "सारी प्रशंसा अललाह की है, जिसने इसे हमारे वश में कर दिया, वरना हम इसे अपने क़ाबू में ला नहीं सकते थे तथा हम अपने प्रभु की ओर लौटने वाले हैं।" फिर तीन बार 'अल-हम्दु लिल्लाह' कहा और तीन बार 'अल्लाहु अकबर' कहा। फिर फ़रमायाः "ऐ अल्लाह, तू पाक है। मैंने अपने ऊपर अत्याचार किया है। अतः, मुझे माफ़ कर दे। तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।" फिर हँस दिए। कहा गया कि ऐ अमीरुल मोमेनीन, आप किस बात पर हँसे? तो फ़रमायाः मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा कि आपने वैसा ही किया, जैसा मैंने किया, फिर हँस पड़े। मैंने पूछाः ऐ अल्लाह के रसूल, आप किस बात पर हँसे? तो फ़रमायाः "तुम्हारे रब को आश्चर्य होता है, जब कोई बंदा कहता है कि मेरे पापों को क्षमा कर दे। वह जानता है कि मेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ नहीं कर सकता।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

سنن أبي داود-المحقق: محمد محيي الدين عبد الحميد-الناشر: المكتبة العصرية، صيدا - بيروت. مسند الإمام أحمد بن حنبل-المحقق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون إشراف: د عبد الله بن عبد المحسن التركي-الناشر: مؤسسة الرسالة-الطبعة: الأولى، 1421 هـ - 2001 م. سنن الترمذي- تحقيق وتعليق: أحمد محمد شاكر (جـ 1، 2) ومحمد فؤاد عبد الباقي (جـ 3) وإبراهيم عطوة عوض المدرس في الأزهر الشريف (جـ 4، 5) - الناشر: شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي - مصر - الطبعة: الثانية، 1395 هـ - 1975 م. دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, تأليف: محمد علي بن محمد البكري الصديقي, عناية: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة, ط 4 عام 1425. بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين, تأليف: سليم بن عيد الهلالي, دار ابن الجوزي. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين, تأليف: مصطفى الخن ومصطفى البغا ومحي الدين مستو وعلي الشربجي ومحمد لطفي, مؤسسة الرسالة, ط 14 عام 1407 - 1987. تطريز رياض الصالحين, تأليف: فيصل مبارك, دار العاصمة, ط1423 – 2002. صحيح وضعيف سنن أبي داود- محمد ناصر الدين الألباني - مصدر الكتاب: برنامج منظومة التحقيقات الحديثية - من إنتاج مركز نور الإسلام لأبحاث القرآن والسنة بالإسكندرية، 2002.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

कंजूस वह व्यक्ति है, जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझपर दरूद न भेजे।

عَنِ الحُسَينِ بنِ عَلِيٍّ بنِ أَبِي طَالِبٍ رضي الله عنهما قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الْبَخِيلُ مَنْ ذُكِرْتُ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيَّ».
हुसैन बिन अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "कंजूस वह व्यक्ति है, जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझपर दरूद न भेजे।"
इसे तिर्मिज़ी ने तथा नसई ने अल-सुनन अल-कुबरा में एवं अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस बात से सावधान किया है कि किसी के सामने आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का नाम, कुनयत या ज़िक्र आए और वह आपपर दरूद न भेजे। आपने कहा : वह व्यक्ति पूर्ण रूप से कंजूस है, जिसके सामने मेरा ज़िक्र हो और वह मुझपर दरूद न भेजे। इसके कई कारण हैं : 1- उसने एक ऐसी चीज़ खर्च करने में कंजूसी दिखाई, जिसमें ज़रा भी घाटा नहीं है। उसमें न माल खर्च होता है और न मेहनत लगती है। 2- उसने खुद को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजने के प्रतिफल से वंचित कर लिया। उसने आपपर दरूद न भेजकर एक ऐसे हक़ की अदायगी में कंजूसी दिखाई, जो इस संबंध में आए हुए आदेश के अनुपालन और प्रतिफल की प्राप्ति के लिए उसे अदा करना था। 3- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना हमारे ऊपर आपके अधिकारों में से एक अधिकार की अदायगी है। क्योंकि आपने हमें शिक्षा दी, हमारा मार्गदर्शन किया, हमें अल्लाह की ओर बुलाया और हमारे लिए वह्य (प्रकाशना) और एक भव्य शरीयत ले आए। अतः अल्लाह के पश्चात् आप ही हमारे मार्गदर्शन का सबब हैं। अतः जो आपपर दरूद नहीं भेजता, वह आपके प्रति कंजूसी कर रहा है और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक छोटा सा हक अदा करने में भी कंजूसी कर रहा है।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद न भेजना कंजूसी की निशानी है।
  2. वैसे तो अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजना हर समय नेकी का एक उत्कृष्ट कार्य है, लेकिन जब आपका उल्लेख हो, तो इसका महत्व बढ़ जाता है।
  3. नववी कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर दरूद भेजते समय दरूद व सलाम दोनों भेजे। किसी एक पर बस न करे। न केवल (सल्लल्लाहु अलैहि) कहे और न केवल (अलैहिस्सलाम) कहे।
  4. अबुल आलिया, अल्लाह के कथन "निःसंदेह अल्लाह एवं उसके फ़रिश्ते नबी पर सलात (दरूद) भेजते हैं।" के बारे में कहते हैं : 'सलात' शब्द जब अल्लाह की ओर से नबी के हक़ में इस्तेमाल हो, तो उसका अर्थ है प्रशंसा करना तथा जब फ़रिश्तों एवं इन्सानों की ओर से इस्तेमाल हो, तो उसका अर्थ होता है दुआ करना।
  5. हलीमी कहते हैं : इस तरह "अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मद" का अर्थ हुआ : ऐ अल्लाह! मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को दुनिया में महानता प्रदान कर, आपके ज़िक्र को ऊँचा करके, आपके दीन को प्रभुत्व प्रदान करके और आपकी शरीयत को बाक़ी रख कर। आख़िरत में भी महानता प्रदान कर, उम्मत के बारे में आपकी सिफ़ारिश को क़बूल फ़रमाकर, आप को बड़ा प्रतिफल प्रदान करके, आप को मक़ाम-ए- महमूद से सम्मानित करके, बाद के तमाम लोगों पर आपकी श्रेष्ठता व्यक्त करके, और उपस्थित निकटवर्तियों पर आपको तरजीह देकर।
हवाला

السنن الكبرى للنسائي (7/ 291) (8046). سنن الترمذي (5/ 513) (3546). مسند أحمد (3/ 257) (1736). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 486). فيض القدير شرح الجامع الصغير، لعبدالرؤوف المناوي (2/ 404). مشكاة المصابيح، لمحمد التبريزي (1/ 294). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 965).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

जिसने खाना खाने के बाद यह दुआ पढ़ीः 'الحمدُ للهِ الذي أَطْعَمَنِي هَذَا، وَرَزَقْنِيهِ مِنْ غَيرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلَا قُوَّةٍ' (अर्थात - सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खाना खिलाया तथा यह रोज़ी दी, जबकि इसमें मेरी शक्ति तथा सामर्थ्य का कोई दख़ल नहीं है) उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।

عَنْ سَهْلِ بْنِ مُعَاذِ بْنِ أَنَسٍ عَنْ أَبِيهِ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ أَكَلَ طَعَامًا فَقَالَ: الحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنِي هَذَا وَرَزَقَنِيهِ مِنْ غَيْرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلاَ قُوَّةٍ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ».
सह्ल बिन मुआज़ अपने पिता से रिवायत करते हैं, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने खाना खाने के बाद यह दुआ पढ़ीः 'الحمدُ للهِ الذي أَطْعَمَنِي هَذَا، وَرَزَقْنِيهِ مِنْ غَيرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلَا قُوَّةٍ' (अर्थात - सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खाना खिलाया तथा यह रोज़ी दी, जबकि इसमें मेरी शक्ति तथा सामर्थ्य का कोई दख़ल नहीं है) उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खाना खाने वाले को अल्लाह की प्रशंसा करने की प्रेरणा दे रहे हैं। क्योंकि अल्लाह के दिए हुए सुयोग एवं मदद के बिना इन्सान के पास न भोजन प्राप्त करने की शक्ति है और न खाने की क्षमता। उसके बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह दुआ करने वाले को सुसमाचार सुनाया है कि अल्लाह उसके पिछले छोटे गुनाहों को माफ़ कर देता है।

फ़ायदे
  1. खाना खाने के बाद अल्लाह की प्रशंसा करना मुसतहब है।
  2. अल्लाह के नितांत अनुग्रह का बयान कि उसने बंदों को रोज़ी दी, रोज़ी के साधन उपलब्ध किए और उसमें गुनाहों की क्षमा का सामान भी पैदा कर दिया।
  3. बंदो के सारे मामलात की बागडोर अल्लाह के हाथ में है। उनकी शक्ति एवं सामर्थ्य के आधार पर कुछ नहीं होता। जबकि बंदे को आदेश दिया गया है कि वह साधनों को अपनाए।
हवाला

سنن الترمذي (5/ 452) (3458). سنن أبي داود (6/ 138) (4023). سنن ابن ماجه (4/ 417) (3285). مسند أحمد (24/ 394) (15632). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين (1/ 602). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، للهلالي (2/ 54). تاج العروس من جواهر القاموس، للزبيدي (28/ 366).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने लगते, तो अपने दोनों हाथों में फूँकते और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़कर दोनों हाथों को शरीर पर फेरते।

عن عائشة رضي الله عنها أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أخذ مَضْجَعَهُ نَفَثَ في يديه، وقرأ بالمُعَوِّذَاتِ، ومسح بهما جسده. وفي رواية: أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أَوَى إلى فِرَاشِهِ كل ليلة جَمَعَ كَفَّيْهِ، ثم نَفَثَ فيهما فقرأ فيهما: «قل هو الله أحد، وقل أعوذ برب الفلق، وقل أعوذ برب الناس» ثم مسح بهما ما استطاع من جسده، يبدأ بهما على رأسه ووجهه، وما أَقْبَلَ من جسده، يفعل ذلك ثلاث مرات.
आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने लगते, तो अपने दोनों हाथों में फूँकते और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़कर दोनों हाथों को शरीर पर फेरते। जबकि एक रिवायत में है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- प्रत्येक रात जब बिस्तर पर जाते, तो दोनों हाथों को इकट्ठा करके उममें फूँकते और उनमें 'क़ुल हुवल्लाहु अह़द', 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल-फ़लक़' तथा 'क़ुल अऊज़ु बि रब्बिन-नास' पढ़ते और जहाँ तक हो हो पाता पूरे शरीर में उनको फेर देते। आरंभ सिर तथा चेहरे और शरीर के अगले भाग से करते थे। ऐसा तीन बार करते थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- जो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की दुनिया में भी पत्नी थीं और आख़िरत में भी होंगी, हमें आपकी एक सुन्नत बताती हैं कि आप हर रात सोते समय अपने दोनों हाथों को मिला लेते और उनमें हल्के से इस तरह फूँक मारते कि थूक न निकले और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़ते थे। आदमी इस सुन्नत पर अमल करते समय चाहे तो पहले फूँक मारे और उसके बाद इन सूरों को पढ़े या फिर पहले इन सूरों को पढ़े और उसके बाद फूँक मारे। क्योंकि यह हदीस तरतीब एवं दोनों कार्यों में से किसी को पहले और किसी को बाद में करने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं करती। उसके बाद आप दोनों हाथों को जहाँ तक हो पाता अपने शरीर पर फेरते। आरंभ सर एवं चेहरे तथा शरीर के अगले भाग से करते। तीनों सूरों को पढ़ने, फूँक मारने और हाथ फेरने का यह काम तीन बार करते थे।

हवाला

- رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، أبو زكريا محيي الدين النووي، تحقيق ماهر الفحل، دار ابن كثير، دمشق، بيروت، الطبعة: الأولى 1428هـ. - بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، سليم بن عيد الهلالي، دار ابن الجوزي، الدمام، الطبعة: الأولى 1415هـ. - نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين، مؤسسة الرسالة، بيروت، الطبعة: الرابعة عشر 1407هـ. - صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. - صحيح مسلم؛ مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب، الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - شرح رياض الصالحين، محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن، الرياض، 1426هـ. - كنوز رياض الصالحين، مجموعة من الباحثين برئاسة حمد بن ناصر العمار، كنوز إشبيليا، الرياض، الطبعة: الأولى1430هـ، 2009م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर
21 में से 8
21 हदीसें
  1. निश्चय यह निशानियाँ, जिन्हें अल्लाह भेजता है, किसी के मरने या जीने से सामने नहीं आतीं। बल्कि उन्हें वह अपने बंदों को डराने के लिए भेजता है। अतः जब उनमें से कोई चीज़ देखो, तो अल्लाह के ज़िक्र, दुआ और क्षमा याचना की ओर भागो।
  2. एक व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आकर बोला कि ऐ अल्लाह के रसूल! मैं यात्रा पर निकलना चाहता हूँ। अतः, मुझे कुछ पाथेय प्रदान कीजिए। आपने कहाः अल्लाह तुझे धर्मपरायणता का पाथेय प्रदान करे।
  3. मुझे एक ऐसा वाक्य मालूम है कि अगर यह व्यक्ति उसे पढ़ ले, तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाए। अगर इसने कहा : मैं शैतान से अल्लाह की शरण में आता हूँ। तो इसका ग़ुस्सा ठंडा हो जाएगा।
  4. अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا"। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब दस्तरख़्वान उठाते तो कहतेः "الحَمْدُ للهِ حَمْدًا كَثِيرًا طَيِّبًا مُبَارَكًا فِيهِ، غَيْرَ مَكْفِيٍّ، وَلَا مُوَدَّعٍ، وَلَا مُسْتَغْنًى عَنْهُ رَبَّنَا"।
  5. अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास एक सवारी लाई गई, ताकि उसपर सवार हों। जब उन्होंने पायदान पर पाँव रखा, तो 'बिस्मिल्लाह' कहा।
  6. कंजूस वह व्यक्ति है, जिसके सामने मेरा नाम लिया जाए और वह मुझपर दरूद न भेजे।
  7. जिसने खाना खाने के बाद यह दुआ पढ़ीः 'الحمدُ للهِ الذي أَطْعَمَنِي هَذَا، وَرَزَقْنِيهِ مِنْ غَيرِ حَوْلٍ مِنِّي وَلَا قُوَّةٍ' (अर्थात - सारी प्रशंसा अल्लाह की है, जिसने मुझे यह खाना खिलाया तथा यह रोज़ी दी, जबकि इसमें मेरी शक्ति तथा सामर्थ्य का कोई दख़ल नहीं है) उसके पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।
  8. अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सोने लगते, तो अपने दोनों हाथों में फूँकते और सूरा अल-इख़लास, सूरा अल-फ़लक़ और सूरा अन-नास पढ़कर दोनों हाथों को शरीर पर फेरते।
  9. सारी प्रशंसा उस अल्लाह की है, जिसने हमें खिलाया, पिलाया, पर्याप्ति प्रदान की तथा शरण दी। कितने ऐसे लोग हैं, जिनको न कोई पर्याप्ति प्रदान करने वाला है, न शरण देने वाला।
  10. जो किसी स्थान में उतरते समय कहे : 'मैं अल्लाह की पैदा की हुई चीज़ों की बुराई से उसके संपूर्ण शब्दों के द्वारा (उसकी) शरण माँगता हूँ', उसे कोई चीज़ वह स्थान छोड़ने तक नुक़सान नहीं पहुँचा सकती।
  11. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब किसी यात्रा पर निकलते तो यात्रा की कठिनाई, अप्रिय वापसी, बनाव के बाद बिगाड़, मज़लूम की बद्दुआ और परिवार तथा धन-माल में बुरी दृष्टि से अल्लाह की शरण माँगते थे।
  12. वायु को गाली मत दो। यदि कोई ऐसी बात देखो, जो पसंद न हो तो कहो : ऐ अल्लाह! हम तुझसे माँगते हैं इस वायु की भलाई, इसमें जो कुछ है उसकी भलाई और इसे जिसका आदेश दिया गया है उसकी भलाई। तथा ऐ अल्लाह! हम तुझसे शरण माँगते हैं इस वायु की बुराई से, इसमें जो कुछ है उसकी बुराई से और इसे जिसका आदेश दिया गया है उसकी बुराई से।
  13. उस व्यक्ति की नाक मिट्टी में मिल जाए जिसके सामने मेरा ज़िक्र किया जाए और वह मुझपर दरूद न पढ़े, उस व्यक्ति की नाक मिट्टी में मिल जाए जिसके सामने रमज़ान महीना आए एवं निकल जाए और वह क्षमा प्राप्ति का सामान न कर सके और उस व्यक्ति की नाक भी मिट्टी में मिल जाए जो अपने माता-पिता को बुढ़ापे की अवस्था में पाए और दोनों उसे जन्नत में दाख़िल न कर सकें।
  14. तुम में से कोई जब सोने के लिए बिस्तर में जाए तो अपनी लुंगी के अंदरूनी भाग से अपने बिस्तर को झाड़े, क्योंकि वह नहीं जानता कि उसके बाद वहाँ कौन-सी चीज़ आई है।
  15. क्या मैं तुम दोनों को उससे बेहतर चीज़ न बताऊँ, जो तुमने माँगा है? जब तुम अपने बिस्तर में जाओ (अथवा सोने का स्थान ग्रहण करो) तो तैंतीस बार 'सुबहानल्लाह' कहो, तैंतीस बार 'अल-हमदु लिल्लाह' कहो और चौंतीस बार 'अल्लाहु अकबर' कहो। यह तुम दोनों के लिए सेवक से बेहतर है।
  16. अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब पहली रात का चाँद देखते तो फ़रमातेः "اللّهمَّ أهِلَّهُ عليْنا بالأمْن والإيمان، وَالسَّلامَةِ وَالإسلامِ، ربِّي وربُّكَ اللهُ، هِلالُ رُشْدٍ وخيرٍ" अर्थात, ऐ अल्लाह! इसे शांति तथा ईमान के साथ हमारे सामने ला।
  17. जब हम किसी ऊँचे स्थान पर चढ़ते , तो अल्लाहु अकबर कहते और जब ढलान पर आते तो सुबहानल्लाह कहा करते थे
  18. अबू सालेह हमें आदेश दिया करते थे कि जब हममें से कोई सोने का इरादा करे, दाहिने करवट पर सोए।
  19. ऐ अल्लाह! मैं तुझसे इसकी भलाई तथा जो भलाई इसमें रखी गई है और जिस भलाई के साथ यह भेजी गई है, का सवाल करता हूँ और तेरी शरण माँगता हूँ, इसकी बुराई से तथा उस बुराई से जो इसमें रखी गई है और उस बुराई से जिस के साथ यह भेजी गई है
  20. हवा अल्लाह की रहमत है और रहमत और यातना दोनों लेकर आती है। तो जब तुम उसे देखो, गाली मत दो, बल्कि अल्लाह से उसकी भलाई माँगो और उसकी बुराई से अल्लाह की शरण माँगो
  21. यह एक शैतान है, जिसे ख़िंज़िब कहा जाता है। जब तुम्हें उसके व्यवधान डालने का आभास हो, तो उससे अल्लाह की शरण माँगो और तीन बार अपने बाएँ ओर थुत्कारो

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com