عَن أُمِّ الدَّرْدَاءِ وَ أَبِي الدَّرداءِ رَضيَ اللهُ عنهما أَنَّ النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ كَانَ يَقُولُ: «دَعْوَةُ الْمَرْءِ الْمُسْلِمِ لِأَخِيهِ بِظَهْرِ الْغَيْبِ مُسْتَجَابَةٌ، عِنْدَ رَأْسِهِ مَلَكٌ مُوَكَّلٌ كُلَّمَا دَعَا لِأَخِيهِ بِخَيْرٍ، قَالَ الْمَلَكُ الْمُوَكَّلُ بِهِ: آمِينَ وَلَكَ بِمِثْلٍ».
उम्मे दरदा- रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है कि नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः मुसलमान की, अपने भाई के हक़ में, उसकी अनुपस्थिति में की गई दुआ क़बूल होती है। उसके सिर के निकट एक फ़रिश्ता नियुक्त होता है। वह जब भी अपने भाई के लिए कोई अच्छी दुआ करता है, वह नियुक्त फ़रिश्ता कहता है कि अल्लाह इसे ग्रहण करे तथा तुझे भी ऐसी ही भलाई मिले।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2094) (2733).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 585).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 1018).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (6/ 48).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 510).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن النعمان بن بَشِير رضي الله عنه قال: سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول: «الدُّعَاءُ هُوَ الْعِبَادَةُ»، ثُمَّ قَرَأَ: «{وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ} [غافر: 60]».
नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : “दुआ ही इबादत है।” फिर यह आयत पढ़ी : "तथा तुम्हारे रब ने कहा है : तुम मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।" [सूरा ग़ाफ़िर : 60]
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि दुआ ही इबादत है। इसलिए दुआ अल्लाह ही से की जानी चाहिए। चाहे दुआ ऐसी हो कि उसमें अल्लाह से कुछ माँगा जाए, जैसे अल्लाह से दुनिया और आख़िरत की ऐसी चीज़ें माँगना जो बंदे के लिए लाभकारी हों और ऐसी चीज़ों से सुरक्षा माँगना जो उसके लिए दोनों जहानों में हानिकारक हों, या फिर दुआ ऐसी हो कि इबादत के तौर पर की जाए, जैसे हर वह ज़ाहिरी एवं बातिनी कार्य तथा बात जो अल्लाह को प्रिय एवं पसंद हो तथा हार्दिक, शारीरिक या आर्थिक इबादत।
फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इसका एक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए फ़रमाया : अल्लाह ने कहा है : "तथा तुम्हारे रब ने कहा है : तुम मुझे पुकारो। मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा। निःसंदेह जो लोग मेरी इबादत से अहंकार करते हैं, वे शीघ्र ही अपमानित होकर जहन्नम में प्रवेश करेंगे।"
फ़ायदे
- दुआ ही मूल इबादत है, इसलिए अल्लाह के अतिरिक्त किसी और से दुआ करना जायज़ नहीं है।
- दुआ के अंदर वास्तविक बंदगी तथा अल्लाह के निस्पृह एवं शक्तिशाली होने एवं बंदे के उसके अधीन होने की स्वीकृत पाई जाती है।
- अल्लाह की इबादत से अभिमान करने और उससे दुआ करने से रुकने वाले के लिए बड़ी सख़्त चेतावनी, और इस बात का स्पष्ट उल्लेख कि जो अल्लाह से दुआ करने से अभिमान करते हैं, वे अपमान के साथ जहन्नम में प्रवेश करेंगे।
हवाला
سنن أبي داود (2/ 603) (1479).
سنن الترمذي (5/ 292) (3247).
سنن ابن ماجه (5/ 5) (3828).
مسند أحمد (30/ 297) (18352).
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، للبسام (7/ 546).
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (10/ 416).
فتح ذي الجلال والإكرام، لابن عثيمين (6/ 480).
سبل السلام بشرح بلوغ المرام، للصنعاني (2/ 707).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «لَيْسَ شَيْءٌ أَكْرَمَ عَلَى اللهِ تَعَالَى مِنَ الدُّعَاءِ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : “अल्लाह के निकट दुआ से अधिक सम्मानित कोई चीज नहीं है।”
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि अल्लाह के निकट कोई भी चीज़ दुआ से उत्तम नहीं है। क्योंकि इसमें एक तरफ़ अल्लाह की निस्पृहता का एतराफ़ है, तो दूसरी तरफ़ बंदे की विवशता तथा ज़रूरतमंदी का इक़रार।
फ़ायदे
- दुआ की फ़ज़ीलत तथा यह कि अल्लाह से दुआ करने वाला वास्तव में अल्लाह का सम्मान कर रहा होता है; वह इस बात का इक़रार कर रहा होता है कि अल्लाह धनवान् है, क्योंकि निर्धन से कुछ माँगा नहीं जा सकता; अल्लाह सुनता है, क्योंकि बहरे को पुकारा नहीं जाता; अल्लाह दाता है, क्योंकि कंजूस के सामने हाथ फैलाया नहीं जाता और अल्लाह निकट है, क्योंकि दूर वाला सुनता नहीं है। इस हदीस से अल्लाह के ये तथा इस प्रकार के अन्य गुण साबित होते हैं।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 385) (3370).
سنن ابن ماجه (5/ 6) (3829).
مسند أحمد (14/ 360) (8748).
توضيح الأحكام من بلوغ المرام، للبسام (7/ 546).
منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان (10/ 416).
فتح ذي الجلال والإكرام، لابن عثيمين (6/ 481).
سبل السلام بشرح بلوغ المرام، للصنعاني (2/ 707).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «إِذَا مَاتَ الْإِنْسَانُ انْقَطَعَ عَنْهُ عَمَلُهُ إِلَّا مِنْ ثَلَاثَةٍ: إِلَّا مِنْ صَدَقَةٍ جَارِيَةٍ، أَوْ عِلْمٍ يُنْتَفَعُ بِهِ، أَوْ وَلَدٍ صَالِحٍ يَدْعُو لَهُ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है: ''जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो उसके कर्मों का सिलसिला रुक जाता है, सिवाय तीन चीज़ों के : स़दक़ा जारिया (अनवरत चलने वाला दान), ऐसी विद्या छोड़कर जाना जिससे लोग लाभांवित हों अथवा ऐसी नेक (सदाचारी) संतान, जो उसके लिए (मरने के बाद) दुआ करे।''
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यहाँ बताया है कि इन्सान की मृत्यु के साथ उसके अमल का सिलसिला रुक जाता है। उसे मौत के बाद सवाब केवल तीन चीज़ों का मिलता है, क्योंकि वही इनका कारण होता है। यह तीन चीज़ें इस प्रकार हैं :
1- ऐसा सदक़ा जिसका सवाब निरंतर जारी रहता है। कभी बंद नहीं होता। जैसे वक़्फ़, मस्जिद का निर्माण एवं कुआँ खुदवाना आदि।
2- इन्सान का छोड़ा हुआ ऐसा ज्ञान जिससे बाद में भी लोग लाभान्वित होते रहें। जैसे विद्वतापूर्ण किताबें लिखना या किसी व्यक्ति को ज्ञान सिखा देना, जो उसे अन्य लोगों को सिखाने का काम करे।
3- मोमिन और सदाचारी संतान, जो अपने माता-पिता के लिए दुआ करती रहे।
फ़ायदे
- मुस्लिम विद्वानों का इजमा है कि इन्सान को मौत के बाद जिन चीज़ों का सवाब मिलता रहता है, उनमें सदक़ा-ए-जारिया, लाभदायक ज्ञान एवं दुआ शामिल हैं। कुछ हदीसों में हज का भी ज़िक्र हुआ है।
- इन तीन चीज़ों का ज़िक्र खास तौर से इसलिए किया गया है कि यह चीज़ें अच्छी चीज़ों की बुनियाद की हैसियत रखती हैं और आम तौर पर नेक लोग चाहते हैं कि यह चीज़ें उनके बाद बाक़ी रहें।
- वैसे तो हर लाभदायक ज्ञान का प्रतिफल मिलता है, लेकिन इस मामले में शरीयत का ज्ञान और उसकी प्राप्ति में सहायक ज्ञान सबसे ऊपर हैं।
- इन तीन चीज़ों में भी सबसे लाभकारी चीज़ शरीयत का ज्ञान है। क्योंकि उसे सीखने वाला तो उससे लाभान्वित होता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ शरीयत की रक्षा हो जाती है और सारी सृष्टि फ़ायदा उठाती है। ज्ञान की एक बड़ी विशेषता यह है कि उससे आपके दौर के लोगों के साथ-साथ आपके बाद के लोग भी लाभान्वित हो सकते हैं।
- बच्चों की अच्छी तरबियत की प्रेरणा। क्योंकि नेक संतान अपने माता-पिता को आख़िरत में फ़ायदा पुहँचाती है। इस फ़ायदा पहुँचाने का एक रूप यह है कि नेक संतान अपने माता-पिता के लिए दुआ करती है।
- माता-पिता की मृत्यु के पश्चात भी उनके साथ अच्छे बर्ताव की प्रेरणा। जो कि धार्मिकता का एक रूप है, जिससे बच्चे को लाभ होता है।
- वैसे तो संतान के सिवा कोई और करे, तब भी मरे हुए व्यक्ति को लाभ मिलता है, लेकिन आपने विशेष रूप से संतान का ज़िक्र इसलिए किया है कि किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी संतान ही अंतिम सांस तक दुआ करती रहती है।
हवाला
صحيح مسلم (3/ 1255) (1631)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (28/ 413).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com