عَنْ أَبِي سَعِيدٍ الْخُدْرِيِّ قَالَ: خَرَجَ مُعَاوِيَةُ عَلَى حَلْقَةٍ فِي الْمَسْجِدِ، فَقَالَ: مَا أَجْلَسَكُمْ؟ قَالُوا: جَلَسْنَا نَذْكُرُ اللهَ، قَالَ آللَّهِ مَا أَجْلَسَكُمْ إِلَّا ذَاكَ؟ قَالُوا: وَاللهِ مَا أَجْلَسَنَا إِلَّا ذَاكَ، قَالَ: أَمَا إِنِّي لَمْ أَسْتَحْلِفْكُمْ تُهْمَةً لَكُمْ، وَمَا كَانَ أَحَدٌ بِمَنْزِلَتِي مِنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَقَلَّ عَنْهُ حَدِيثًا مِنِّي: وَإِنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ خَرَجَ عَلَى حَلْقَةٍ مِنْ أَصْحَابِهِ، فَقَالَ: «مَا أَجْلَسَكُمْ؟» قَالُوا: جَلَسْنَا نَذْكُرُ اللهَ وَنَحْمَدُهُ عَلَى مَا هَدَانَا لِلْإِسْلَامِ، وَمَنَّ بِهِ عَلَيْنَا، قَالَ: «آللَّهِ مَا أَجْلَسَكُمْ إِلَّا ذَاكَ؟» قَالُوا: وَاللهِ مَا أَجْلَسَنَا إِلَّا ذَاكَ، قَالَ: «أَمَا إِنِّي لَمْ أَسْتَحْلِفْكُمْ تُهْمَةً لَكُمْ، وَلَكِنَّهُ أَتَانِي جِبْرِيلُ فَأَخْبَرَنِي أَنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ يُبَاهِي بِكُمُ الْمَلَائِكَةَ».
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि मुआविया रज़ियल्लाहु अनहु मस्जिद में लोगों की एक सभा के पास आए और पूछा : तुम यहाँ किसलिए बैठे हो? लोगों ने जवाब दिया : हम अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए बैठे हैं। मुआविया रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : क़सम खाकर बताओ कि क्या तुम केवल इसी उद्देश्य से बैठे हो? लोगों ने कहा : अल्लाह की क़सम, हम केवल इसी उद्देश्य से बैठे हैं। इसपर मुआविया रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा कि मैंने तुमसे क़सम इस कारण नहीं उठवाई कि मुझे तुमपर संदेह था। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, मेरी तरह अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से निकट रहा हो और आपसे इतनी कम हदीसें रिवायत करता हो। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने साथियों की एक सभा में गए और फरमाया : "तुम लोग क्यों बैठे हुए हो?" उन लोगों ने कहा : हम लोग इसलिए बैठे हैं, ताकि अल्लाह को याद करें और इस बात पर उसकी प्रशंसा करें कि उसने हमें इस्लाम का रास्ता दिखाया और इस्लाम जैसा धर्म प्रदान किया। आपने कहा : "अल्लाह की क़सम तुम लोग इसी के लिए बैठे हो?" उन लोगों ने कहा : अल्लाह की क़सम हम इसी लिए बैठे हैं। आपने फरमाया: "मैं तुमसे क़सम इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि तुमपर कोई आरोप लगाना चाहता हूँ। दरअसल बात यह है कि जिबरील अलैहिस्सलाम मेरे पास आए और बताया कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह फ़रिश्तों के निकट तुम लोगों पर गर्व कर रहा है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
मुआविया बिन अबू सुफ़यान रज़ियल्लाहु अनहुमा मस्जिद में मौजूद लोगों की एक सभा के पास पहुँचे और सभा में मौजूद लोगों से पूछा कि वह किस उद्देश्य से बैठे हुए हैं? लोगों ने जवाब दिया : हम अल्लाह का ज़िक्र करने के लिए बैठे हुए हैं। तब उन्होंने उनको क़सम खाने को कहा कि क्या वाक़ई उनके बैठने और एकत्र होने का उद्देश्य अल्लाह के ज़िक्र के सिवा कुछ और नहीं है? जब उन्होंने क़सम खा ली, तो फ़रमाया : मैंने तुम लोगों को क़सम खाने को इसलिए नहीं कहा कि मैं तुम्हें झूठा समझता हूँ और तुम्हारे सच्चे होने में मुझे संदेह है। फिर उन्होंने बताया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के यहाँ उनको क्या स्थान प्राप्त था। बताया कि उनको आपसे जो निकटता प्राप्त थी, वह किसी और को नहीं थी। क्योंकि उनकी बहन उम्म-ए-हबीबा रज़ियल्लाहु अनहा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नी थीं और खुद वह वह्य लिखने वाले सहाबा में शामिल थे। इसके बावजूद उन्होंने आपसे बहुत कम हदीसें नक़ल की हैं। फिर उन्होंने बताया कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक दिन घर से निकले, तो देखा कि कुछ सहाबा मस्जिद में बैठकर अल्लाह का ज़िक्र और इस्लाम की राह दिखाने पर उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। तब आपने उनसे बैठने का उद्देश्य पूछा और क़सम भी खाने को कहा, जैसा कि मुआविया रज़ियल्लाहु अनहु ने किया था। फिर आपने अपने साथियों को बैठने का सबब पूछने और क़सम खाने को कहने का कारण भी बता दिया। बताया कि आपके पास जिबरील अलैहिस्सलाम आए थे और बता रहे थे कि अल्लाह फ़रिश्तों के सामने उनपर अभिमान एव फ़ख़्र कर रहा है, उनकी फ़ज़ीलत बता रहा है, उनकी प्रशंसा कर रहा है और फ़रिश्तों को उनका अच्छा अमल दिखा रहा है।
फ़ायदे
- मुआविया रज़ियल्लाहु अनहु की फ़ज़ीलत और अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पद्चिह्नों पर चलते हुए उनका ज्ञान के प्राचर-प्रसार का प्रयास करना।
- झूठ का संदेह न होने पर भी इस उद्देश्य से क़सम खिलाना जायज़ है कि सूचना का महत्व स्पष्ट हो जाए।
- ज़िक्र एवं ज्ञान पर आधारित सभाओं की फ़ज़ीलत। अल्लाह इस तरह की सभाओं से मोहब्बत रखता है और फ़रिश्तों के सामने इनपर अभिमान करता है।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2075) (2701).
نزهة المتقين (2/ 993).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 522).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 271).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي الدَّرْدَاءِ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَلاَ أُنَبِّئُكُمْ بِخَيْرِ أَعْمَالِكُمْ، وَأَزْكَاهَا عِنْدَ مَلِيكِكُمْ، وَأَرْفَعِهَا فِي دَرَجَاتِكُمْ وَخَيْرٌ لَكُمْ مِنْ إِنْفَاقِ الذَّهَبِ وَالوَرِقِ، وَخَيْرٌ لَكُمْ مِنْ أَنْ تَلْقَوْا عَدُوَّكُمْ فَتَضْرِبُوا أَعْنَاقَهُمْ وَيَضْرِبُوا أَعْنَاقَكُمْ؟» قَالُوا: بَلَى. قَالَ: «ذِكْرُ اللهِ تَعَالَى».
अबू दरदा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "क्या मैं तुम्हें तुम्हारा सबसे उत्तम कार्य न बताऊँ, जो तुम्हारे रब के निकट सबसे ज़्यादा सराहनीय, तुम्हारे दरजे को सबसे ऊँचा करने वाला, तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी दान करने से बेहतर तथा इस बात से भी बेहतर है कि तुम अपने शत्रु से भिड़ जाओ और तुम उनकी गर्दन मार दो और वह तुम्हारी गर्दन मार दें?" सहाबा ने कहा : अवश्य ऐ अल्लाह के रसूल! तो फ़रमाया : "उच्च एवं महानअल्लाह का ज़िक्र करना।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने साथियों से पूछा :
क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें बता दूँ और सिखा दूँ कि तुम्हारे सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के यहाँ
तुम्हारा कौन-सा कार्य सर्वोत्तम, सर्वाधिक सम्माननीय, सर्वाधिक विकसित, सर्वाधिक पवित्रऔर सर्वाधिक स्वच्छ है?
जन्नत में तुम्हारे स्थान को सबसे अधिक ऊँचा करने वाला है?
तुम्हारे लिए सोना एवं चाँदी सदक़ा करने से बेहतर है?
इस बात से भी उत्तम है कि तुम अविश्वासियों से युद्ध करो, फिर तुम उनकी गर्दन मारो और वह तुम्हारी गर्दन मारें?
सहाबा ने उत्तर दिया : हम अवश्य ही चाहेंगे कि आप हमें इस प्रकार का काम बताएँ।
तब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : सभी समयों एवं सभी परिस्थितियों में अल्लाह का ज़िक्र करना।
फ़ायदे
- आंतरिक एवं बाह्य रूप से हमेशा अल्लाह का ज़िक्र करते रहना एक बहुत बड़ा नेकी का काम और अल्लाह के यहाँ बड़ा ही लाभकारी अमल है।
- सारे शरई कार्य अल्लाह के ज़िक्र के लिए निर्धारित किए गए हैं। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "तुम नमाज़ मेरे ज़िक्र के लिए स्थापित करो।" इसी तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा है : "अल्लाह के घर काबा का तवाफ़, सफ़ा एवं मर्वा के बीच तेज़ चलना और शैतान को पत्थर मारना, यह सब अल्लाह के ज़िक्र के लिए निर्धारित किए गए हैं।" इस हदीस को इमाम अबू दाऊद एवं तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।
- इज़ बिन अब्दुस सलाम अपनी किताब "क़वाइद अल-अहकाम" में कहते हैं : यह हदीस उन शरई प्रमाणों में से एक है, जो बताते हैं कि सवाब तमाम इबादतों में थकान के अनुपात में ही मिला नहीं करता। कभी-कभी अल्लाह थोड़े कार्य का बदला अधिक कार्य से भी ज़्यादा दे दिया करता है। बात असल में यह है कि अमल का सवाब उसके महत्व के अनुसार मिला करते हैं।
- मुनावी अपनी किताब "फ़ैज़ुल क़दीर" में कहते हैं : इस हदीस का मतलब यह है कि ज़िक्र उन लोगों के हक़ में उत्कृष्ट था, जो उस समय आपके सामने उपस्थित थे। सामने अगर ऐसे बहादुर लोग मौजूद होते, जो जंग के मैदान में पहुँचकर इस्लाम और मुसलमानों के लिए लाभकारी साबित होते, तो उनको जिहाद उत्कृष्ट कार्य बताया जाता। अगर ऐसे मालदार लोग मौजूद होते, जिनके धन से ग़रीबों को फ़ायदा होता, उनको उत्कृष्ट अमल सदक़ा बताया जाता। हज करने का सामार्थ्य रखने वाले लोग मौजूद होते, तो उनको उत्कृष्ट अमल हज बताया जाता। अगर ऐसे लोग होते, जिनके माता-पिता मौजूद होते, तो उन्हें उनकी सेवा करना उत्कृष्ट अमल बताया जाता। इस संबंध में आई हुई विभिन्न हदीसों को मिलाकर देखने से यही मतलब निकलता है।
- सबसे संपूर्ण ज़िक्र वह है, जो ज़बान से किया जाए और साथ में हृदय चिंतन में लगा रहे। फिर उस ज़िक्र का दर्जा आता है, जो केवल हृदय से किया जाए। जैसे ग़ौर व फ़िक्र। फिर उस ज़िक्र का दर्जा आता है, जो केवल ज़बान से किया जाए। वैसे, किसी भी तरह हो, ज़िक्र करना नेकी का काम है।
- एक मुसलमान को विभिन्न समयों के अज़कार, जैसे सुबह एवं शाम के अज़कार और मस्जिद, घर एवं शौचालय में प्रवेश करने और निकलने के अज़कार की पाबंदी करनी चाहिए। इन अज़कार की पाबंदी इन्सान को अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले लोगों की पंक्ति में ला खड़ा कर देती है।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 389) (3377).
سنن ابن ماجه (4/ 705) (3790).
مسند أحمد (36/ 33) (21702).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 513).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 985).
كنوز رياض الصالحين لمجموعة من الباحثين.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَسِيرُ فِي طَرِيقِ مَكَّةَ، فَمَرَّ عَلَى جَبَلٍ يُقَالُ لَهُ جُمْدَانُ، فَقَالَ: «سِيرُوا هَذَا جُمْدَانُ، سَبَقَ الْمُفَرِّدُونَ» قَالُوا: وَمَا الْمُفَرِّدُونَ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَالَ: «الذَّاكِرُونَ اللهَ كَثِيرًا وَالذَّاكِرَاتُ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का के रास्ते में चल रहे थे कि जुमदान नामी एक पर्वत के पास से गुज़रे। अतः फ़रमाया : "चलते रहो, यह जुमदान है। अतुल्य विशेषता वाले लोग आगे हो गए।" सहाबा ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! यह अतुल्य विशेषता वाले लोग कौन हैं? फ़रमाया : "अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने वाले पुरुष और अल्लाह को बहुत-ज़्यादा याद करने वाली स्त्रियाँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अल्लाह का बहुत ज़्यादा ज़िक्र करने वालों का स्थान बयान फ़रमाया है और बताया है कि उनको यह विशिष्टता प्राप्त हो गई कि वे दूसरों से आगे बढ़कर जन्नत के ऊँचे दर्जे प्राप्त करने में कामयाब हो गए। आपने उनकी समानता जुमदान पहाड़ से दी है, जो दूसरे पहाड़ों से अलग पहचान रखता है।
फ़ायदे
- अल्लाह का बहुत ज़्यादा ज़िक्र करना और इस कार्य में व्यस्त रहना मुसतहब है। क्योंकि आख़िरत में आगे रहने का गौरव नेकी के कामों की प्रचुरता एवं इबादतों को केवल अल्लाह के लिए करने के जज़्बे के आधार पर प्राप्त होगा।
- अल्लाह का ज़िक्र केवल ज़बान से भी होता है, केवल दिल से भी होता है तथा ज़बान एवं दिल दोनों से भी होता है, जो कि ज़िक्र का सबसे ऊँचा दर्जा है।
- ज़िक्र का एक प्रकार वह अज़कार हैं, जो विभिन्न समयों से जुड़े हुए हैं। जैसे सुबह और शाम के अज़कार तथा फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद के अज़कार आदि।
- नववी कहते हैं : याद रखें की ज़िक्र की फ़ज़ीलत अल्लाह की पाकी बयान करने, उसके एकमात्र पूज्य होने का इक़रार करने, उसकी प्रशंसा करने और बड़ाई बयान करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए नेकी का काम करने वाला हर व्यक्ति अल्लाह का ज़िक्र कर रहा होता है।
- अल्लाह का ज़िक्र दीन पर सुदृढ़ रहने का एक बहुत बड़ा साधन है। उच्च एवं महान अल्लाह का फ़रमान है : "ऐ ईमाल वालो! जब तुम किसी (मुख़ालिफ़) फ़ौज से भिड़ जाओ, तो सुदृढ़ रहो और अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करते रहो, ताकि तुम्हें सफलता मिल सके।" [सूरा अल-अनफ़ाल : 45]
- अल्लाह का ज़िक्र करने वालों और जुमदान पहाड़ के बीच समानता इस बात के कारण दी गई है कि दोनों अकेले और दूसरों से अलग हैं। जिस प्रकार जुमदान पहाड़ अन्य पहाड़ों से अलग स्थित है, उसी प्रकार अल्लाह का ज़िक्र करने वाले लोग, यद्यपि लोगों की भीड़ में होते हैं, लेकिन उनके दिल और ज़बानें सबसे अलग-थलग अल्लाह के ज़िक्र में व्यस्त हुआ करती हैं, एकांत को पसंद करती हैं और लोगों से अधिक मिलने-जुलने से घबराती हैं। समानता का कारण यह भी हो सकता है कि जिस प्रकार पहाड़ धरती को स्थापित एवं मज़बूत रखते हैं, उसी प्रकार ज़िक्र इन्सान को दीन पर सुदृढ़ रखता है। समानता का कारण दुनिया एवं आख़िरत की भलाइयों की ओर आगे बढ़ना भी हो सकता है जिस प्रकार मदीने से मक्का की यात्रा पर निकले हुए व्यक्ति का जुमदान पहाड़ तक पहुँचना उसके मक्का पहुँचने की निशानी हुआ करता है, और जुमदान पहुँचने वाले को आगे बढ़ जाने वाला समझा जाता है, उसी प्रकार अल्लाह का ज़िक्र करने वाला अल्लाह को बहुत ज़्यादा याद करने के कारण दूसरों से आगे बढ़ने वाला शुमार होता है।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2062) (2676).
نزهة المتقين، لمجموعة من الباحثين (2/ 983).
تيسير الكريم الرحمن في تفسير كلام المنان، لابن سعدي (ص665).
بهجة الناظرين، لسليم الهلالي (2/ 510).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (5/ 516).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنِ ابْنِ مَسْعُودٍ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «لَقِيتُ إِبْرَاهِيمَ لَيْلَةَ أُسْرِيَ بِي فَقَالَ: يَا مُحَمَّدُ، أَقْرِئْ أُمَّتَكَ مِنِّي السَّلاَمَ، وَأَخْبِرْهُمْ أَنَّ الجَنَّةَ طَيِّبَةُ التُّرْبَةِ عَذْبَةُ الْمَاءِ، وَأَنَّهَا قِيعَانٌ، وَأَنَّ غِرَاسَهَا سُبْحَانَ اللهِ وَالحَمْدُ لِلَّهِ وَلاَ إِلَهَ إِلاَّ اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : "जिस रात मुझे मेराज कराई गई, उस रात मैं इब्राहीम अलैहिस्सलाम से मिला। तो इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मुझसे कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कहना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बड़ी अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। जन्नत एक चटियल मैदान है और उसमें पेड़ लगाने का काम "सुबहान अल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर" द्वारा होता है।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैदर्जाशवाहिद के आधार पर ह़सन
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि इस्रा एवं मेराज की रात आपकी मुलाक़ात अल्लाह के परम मित्र इब्राहीम अलैहिस्सलाम से हुई, तो उन्होंने कहा : ऐ मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरा सलाम कह देना और बता देना कि जन्नत की मिट्टी बहुत अच्छी है और उसका पानी बड़ा मीठा है। खारेपन का नाम व निशान तक नहीं है। जन्नत एक समतल, पेड़-पौधों से ख़ाली और बहुत बड़ा मैदान है, जिसमें पेड़ लगाने का काम कुछ पवित्र शब्दों द्वारा होता है। इन पवित्र शब्दों को "अल-बाक़ियात अल-सालिहात" यानी बाक़ी रह जानी वाली नेकियाँ भी कहा जाता है। ये शब्द हैं : "सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह एवं अल्लाहु अकबर", जब जब कोई मुसलमान इन शब्दों को कहता है और दुहराता है, तो उसके लिए जन्नत में पेड़ लगा दिया जाता है।
फ़ायदे
- जन्नत में अधिक से अधिक पेड़ लगें, इसके लिए अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा।
- इस्लामी उम्मत की यह फ़ज़ीलत कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उसे सलाम पहुँचाया।
- इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उम्मत-ए-मुहम्मदी को अधिक से अधिक अल्लाह का ज़िक्र करने की प्रेरणा दी है।
- तीबी कहते हैं : जन्नत एक चटियल मैदान है। उसमें अल्लाह अपने अनुग्रह से बंदों के कर्मों के अनुसार पेड़ों एवं महलों की व्यवस्था कर देता है। हर बंदे को यह दोनों चीज़ें उसके कर्म के अनुसार मिलेंगी। वैसे, अल्लाह हर बंदे को उन कार्यों का सुयोग प्रदान करता है, जिनके लिए उसे पैदा किया गया है, ताकि वह कर्मों का प्रतिफल पेड़ लगाने वाले की तरह प्राप्त कर सके।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 455) (3462).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين لسليم الهلالي (2/ 512).
الكاشف عن حقائق السنن (شرح المشكاة)، للطيبي (6/ 1831).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (17/ 186).
مشكاة المصابيح، للتبريزي (2/ 716).
مرعاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، للمباركفوري (7/ 476).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (2/ 985).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَا مِنْ قَوْمٍ يَقُومُونَ مِنْ مَجْلِسٍ لَا يَذْكُرُونَ اللَّهَ فِيهِ إِلَّا قَامُوا عَنْ مِثْلِ جِيفَةِ حِمَارٍ، وَكَانَ لَهُمْ حَسْرَةً».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो लोग किसी सभा से अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उठ जाते हैं, वे वैसे हैं जैसे मरे हुए गधे के पास से उठते हैं, और यह उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा।"
इसे अबू दावूद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जब कुछ लोग किसी जगह में बैठते हैं और अल्लाह का ज़िक्र किए बिना वहाँ से उठ खड़े होते हैं, तो वह उन लोगों की तरह होते हैं, जो किसी मरे हुए गंदे और बदबूदार गधे के शव के पास जमा हुए हों। कारण यह है कि वे बात में व्यस्त होकर अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल हो गए। ऐसी सभा क़यामत के दिन उनके लिए अफ़सोस, खेद और हानि का कारण सिद्ध होगी।
फ़ायदे
- अल्लाह के ज़िक्र को नज़रअंदाज़ करने के ख़िलाफ़ चेतावनी केवल सभाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दूसरी जगहें भी इसके दायरे में आती हैं। इमाम नववी कहते हैं : "किसी भी जगह बैठने वाले के लिए यह अप्रिय कार्य है कि वह अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उस जगह को छोड़ दे।"
- क़यामत के दिन पछतावा और शर्मिंदगी या तो अल्लाह की इबादत में समय न बिताने के कारण सवाब और प्रतिफल से वंचित होने के कारण होगा, या अल्लाह की अवज्ञा के कार्यों में समय बिताने के कारण होने वाले गुनाह और दंड के कारण होगा।
- अगर जायज़ कामों में व्यस्त होकर अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल होने की वजह से यह चेतावनी है, तो उन हराम सभाओं का क्या, जिनमें ग़ीबत और चुग़लख़ोरी होती है।
हवाला
سنن أبي داود (7/ 221) (4855).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 120).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 654).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي ذَرٍّ رضي الله عنه: أَنَّ نَاسًا مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالُوا لِلنَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: يَا رَسُولَ اللهِ، ذَهَبَ أَهْلُ الدُّثُورِ بِالْأُجُورِ، يُصَلُّونَ كَمَا نُصَلِّي، وَيَصُومُونَ كَمَا نَصُومُ، وَيَتَصَدَّقُونَ بِفُضُولِ أَمْوَالِهِمْ، قَالَ: «أَوَلَيْسَ قَدْ جَعَلَ اللهُ لَكُمْ مَا تَصَّدَّقُونَ؟ إِنَّ بِكُلِّ تَسْبِيحَةٍ صَدَقَةً، وَكُلِّ تَكْبِيرَةٍ صَدَقَةً، وَكُلِّ تَحْمِيدَةٍ صَدَقَةً، وَكُلِّ تَهْلِيلَةٍ صَدَقَةً، وَأَمْرٌ بِالْمَعْرُوفِ صَدَقَةٌ، وَنَهْيٌ عَنْ مُنْكَرٍ صَدَقَةٌ، وَفِي بُضْعِ أَحَدِكُمْ صَدَقَةٌ»، قَالُوا: يَا رَسُولَ اللهِ، أَيَأتِي أَحَدُنَا شَهْوَتَهُ وَيَكُونُ لَهُ فِيهَا أَجْرٌ؟ قَالَ: «أَرَأَيْتُمْ لَوْ وَضَعَهَا فِي حَرَامٍ أَكَانَ عَلَيْهِ فِيهَا وِزْرٌ؟ فَكَذَلِكَ إِذَا وَضَعَهَا فِي الْحَلَالِ كَانَ لَهُ أَجْرٌ».
अबू ज़र रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के कुछ सहाबा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा : हे अल्लाह के रसूल, धनवान लोग सवाब (पुण्य) ले गए; वे हमारी तरह नमाज़ पढ़ते हैं, हमारी तरह रोज़ा रखते हैं, और अपनी अतिरिक्त संपत्ति से सदक़ा (दान) करते हैं। नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया : “क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए वह चीज़ें नहीं बनाई हैं, जिनसे तुम सदक़ा कर सकते हो? हर तस्बीह (सुब्हानल्लाह कहना) सदक़ा है, हर तकबीर (अल्लाहु अकबर कहना) सदक़ा है, हर तहमीद (अल्ह़म्दु लिल्लाह कहना) सदक़ा है, हर तहलील (ला इलाहा इल्लल्लाह कहना) सदक़ा है, भलाई का आदेश देना सदक़ा है, बुराई से रोकना सदक़ा है, और तुम्हारे किसी के साथ वैवाहिक संबंध बनाना भी सदक़ा है।” सहाबा ने पूछा : हे अल्लाह के रसूल, क्या हम अपनी कामवासना पूरी करते हैं तो उसमें भी सवाब (पुण्य) मिलता है? नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा : “तुम्हारा क्या विचार है यदि वह इस कामवासना को हराम (अवैध) रूप से पूरी करता है, तो क्या उसे इस पर गुनाह नहीं होता? तो इसी तरह, जब वह इस कामवासना को हलाल (वैध) रूप से पूरी करताता है, तो उसे उस पर पुण्य मिलता है।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
कुछ निर्धन सहाबा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर अपनी ग़रीबी और अपने मालदार भाइयों की तरह सदक़ा करके बड़ा सवाब प्राप्त न कर पाने और नेकी के कामों में उनके बराबर न हो पाने की शिकायत की और कहा कि हम नमाज़ पढ़ते हैं तो वह भी नमाज़ पढ़ते हैं और हम रोज़ा रखते हैं तो वह भी रोज़ा रखते हैं, लेकिन इसके साथ ही वह अपने अतिरिक्त धन में से सदक़ा करके हम से आगे बढ़ जाते हैं, जबकि हमारे पास सदक़ा करने के लिए कुछ नहीं होता। अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको सदक़े के कुछ ऐसे रूप बता दिए, जो वे कर सकते थे। फ़रमाया : क्या अल्लाह ने तुम्हारे लिए सदक़ा करने की राहें निकाल नहीं रखी हैं? 'सुबहानल्लाह' कहना सदक़ा है, 'अल्लाहु अकबर' कहना सदक़ा है, 'अल-हम्दु लिल्लाह' कहना सदक़ा है, 'ला इलाहा इल्लल्लाह' कहना सदक़ा है, भलाई का आदेश देना सदक़ा है, बुराई से रोकना सदक़ा है, बल्कि अपनी पत्नी से संभोग करना भी सदक़ा है। सहाबा को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे : ऐ अल्लाह के रसूल! हमें अपनी वासना पूरी करने का भी सवाब मिलेग? आपने उत्तर दिया : अच्छा यह बताओ कि अगर वह हराम जगह से वासना पूरी करे, जैसे व्यभिचार आदि में लिप्त हो जाए, तो गुनाह होगा या नहीं? बस इसी तरह अगर वासना हलाल जगह से पूरी करता है, तो सवाब मिलेगा।
फ़ायदे
- सहाबा अच्छे कामों में प्रतिस्पर्धा किया करते थे और अल्लाह के यहाँ बड़ा प्रतिफल तथा उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए उत्सुक रहा करते थे।
- सत्कर्मों के अनेक रूप होते हैं तथा ये प्रत्येक उस कार्य को सम्मिलित हैं जो एक मुसलमान नेक नीयत तथा अच्छे उद्देश्य से करता है।
- इस्लाम की सरलता और सहजता यह है कि प्रत्येक मुसलमान को ऐसा कार्य मिल जाता है जिससे वह अल्लाह की आज्ञा का पालन कर सके।
- नववी कहते हैं : इसमें यह प्रमाण है कि वैध कार्य भी सच्ची नीयतों के कारण इबादत बन जाते हैं। इसीलिए, यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध भी पत्नी का हक़ अदा करने, अल्लाह के आदेश अनुसार उसके साथ अच्छा जीवन बिताने, नेक संतान की कामना करने, स्वयं को या पत्नी को पाप से बचाने या अन्य किसी नेक उद्देश्य से करता है, तो यह भी इबादत बन जाता है।
- श्रोता के लिए बात को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाने के लिए उदाहरण एवं तुलना का उपयोग करना।
हवाला
صحيح مسلم (2/ 697) (1006).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 201).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 161).
كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (3/ 31).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 150).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عَبْدِ اللهِ بْنِ بُسْرٍ رضي الله عنه أَنَّ رَجُلاً قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ إِنَّ شَرَائِعَ الإِسْلاَمِ قَدْ كَثُرَتْ عَلَيَّ، فَأَخْبِرْنِي بِشَيْءٍ أَتَشَبَّثُ بِهِ، قَالَ: «لاَ يَزَالُ لِسَانُكَ رَطْبًا مِنْ ذِكْرِ اللَّهِ».
अब्दुल्लाह बिन बुस्र रज़ियल्लाहु अनहुमा फ़रमाते हैं कि एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! इस्लाम के प्रावधान (आदेश एवं निर्देश ) मेरे लिए बहुत ज़्यादा हो गए हैं। अतः मुझे कोई ऐसी चीज़ बताएँ, जिसे मैं मज़बूती से पकड़ लूँ। आपने फ़रमाया : "तुम्हारी ज़बान हमेशा अल्लाह के ज़िक्र से तर रहे।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
एक व्यक्ति ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने शिकाय की कि उसके समाने नफ़ल इबादतें इतनी ज़्यादा मौजूद हैं कि अपनी दुर्बलता के कारण वह उन्हें कर नहीं सकता। फिर अनुरोध किया कि आप उसे कोई छोटा-सा अमल बता दें, जिससे बहुत सारे सवाब प्राप्त हो जाएँ और जिसे वह मज़बूती से पकड़े रहे।
अतः अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे निर्देश दिया कि हमेशा उसकी ज़बान अल्लाह के ज़िक्र से तर रहे और हर समय तथा हर परिस्थिति में अल्लाह के ज़िक्र, जैसे सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, अस्तग़फ़िरुल्लाह और दुआ आदि में व्यस्त रहे।
फ़ायदे
- पाबंदी से अल्लाह का ज़िक्र करने की फ़ज़ीलत।
- अल्लाह का एक बहुत बड़ा उपकार यह है कि उसने प्रतिफल दिलाने वाली चीज़ों को आसान कर दिया है।
- अच्छे और नेकी के कामों में बंदे अलग-अलग स्तर के हुआ करते हैं।
- जीभ द्वारा, मनोयोग के साथ, बहुत ज़्यादा अल्लाह का ज़िक्र करना, जैसे- सुबहानल्लाह, अल-हम्दु लिल्लाह, ला इलाहा इल्लल्लाह और अल्लाहु अकबर आदि कहना बहुत-सी नफ़ल इबादतों के बराबर है।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सवाल करने वालों को सामने रखते हुए हर सवाल करने वाले को वही जवाब देते, जो उसके लिए उपयुक्त होता।
हवाला
سنن الترمذي (5/ 388) (3375).
سنن ابن ماجه (4/ 707) (3793).
مسند أحمد (29/ 226) (17680).
جامع العلوم والحكم في شرح خمسين حديثا من جوامع الكلم، لابن رجب الحنبلي (2/ 510).
التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، لإسماعيل الأنصاري (ص104).
فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، للنووي وابن رجب (ص154).
الأحاديث الأربعون النووية وعليها الشرح الموجز المفيد، لعبد الله بن صالح المحسن (ص93).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن الْأَغَرِّ رضي الله عنه، وَكَانَ مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «يَا أَيُّهَا النَّاسُ تُوبُوا إِلَى اللهِ، فَإِنِّي أَتُوبُ فِي الْيَوْمِ إِلَيْهِ مِائَةَ مَرَّةٍ».
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के एक सहाबी अग़र्र -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "ऐ लोगो! अल्लाह के सामने तौबा करो, क्योंकि खुद मैं दिन में सौ बार तौबा करता हूँ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लोगों को अधिक से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करने का आदेश दे रहे हैं और ख़ुद अपने बारे में बता रहे हैं कि आप दिन में सौ बार से अधिक तौबा एवं क्षमा याचना करते हैं। जबकि आपके अगले एवं पिछले तमाम गुनाह माफ़ थे। यह दरअसल अल्लाह के सामने में अपनी बंदगी एवं हीनता के इज़हार का पराकाष्ठा है।
फ़ायदे
- प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे उसके ईमान का स्तर कुछ भी हो, सर्वशक्तिमान अल्लाह की ओर लौटने और तौबा के माध्यम से स्वयं को परिपूर्ण बनाने की आवश्यकता होती है। प्रत्येक व्यक्ति से अल्लाह के अधिकारों की अदायगी में कोताही हो ही जाया करती है। उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "ऐ मोमिनो! तुम सब अल्लाह के सामने तौबा करो।"
- तौबा का यह आदेश आम है। तौबा चाहे हराम कामों और गुनाह करने की हो या अनिवार्य कार्य करने में कोताही की।
- तौबा के क़बूल होने के लिए दिल में अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति की नीयत करना शर्त है। जिसने अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के अतिरिक्त किसी और उद्देश्य से गुनाह छोड़ा, वह तौबा करने वाला शुमार नहीं होगा।
- नववी कहते हैं : तौबा की तीन शर्तें हैं : 1- गुनाह को छोड़ देना। 2- गुनाह में संलिप्त होने पर शर्मिंदा होना। 3- इस बात की प्रतिज्ञा कर लेना कि दोबारा वह गुनाह नहीं करेगा। उपर्युक्त तीन शर्तें उस समय हैं, जब गुनाह का संबंध अल्लाह के किसी अधिकार के हनन से हो। अगर गुनाह का संबंध बंदों के अधिकारों में से किसी अधिकार के हनन से हो, तो तौबा के सही होने के लिए अधिकार वाले को उसका अधिकार लौटाना या माफ़ी-तलाफ़ी करा लेना चौथी शर्त होगी।
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क्षमा याचना करने का यह अर्थ नहीं है कि गुनाह होने के कारण ही आप क्षमा याचना किया करते थे। दरअसल आप ऐसा अल्लाह की इबादत में पूरी तरह समर्पित होने, अल्लाह के ज़िक्र से हार्दिक संबंध, अल्लाह के महान अधिकार से अवगत होने और अल्लाह का शुक्र अदा करने में हो जाने वाली कमियों का एहसास रखने के कारण किया करते थे। इसका एक उद्देश्य अपनी उम्मत के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना भी था।
हवाला
صحيح مسلم (4/ 2075) (2702).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 33).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (1/ 97).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 52).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com