عَنْ أُمِّ عَطِيَّةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا قَالَتْ: نُهِينَا عَنِ اتِّبَاعِ الجَنَائِزِ، وَلَمْ يُعْزَمْ عَلَيْنَا.
उम्मे अतिय्या- रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैंः हमें जनाज़े के पीछे चलने से मना किया गया है, लेकिन इस मामले में हमपर सख़्ती नहीं बरती गई है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
उम्मे अतिय्या अंसारी एक वरिष्ठ सहाबिया हैं। उनका कहना है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने स्त्रियों को जनाज़े के साथ चलने से मना किया है। इसका कारण यह है कि उनका दिल बड़ा नर्म होता है। उनके पास पुरुषों जैसा धैर्य और सहन शक्ति नहीं होती। अतः, उनके निकलने से रोने-धोने और फ़ितने का डर रहता है। परंतु, इसके बावजूद उन्होंने क़रीनों से यह समझा है कि यह मनाही ताकीद वाली नहीं है और इससे उसका हराम होना साबित नहीं होता। लेकिन सही यह है कि स्त्रियाँ जनाज़े के पीछे चल नहीं सकतीं। इब्ने दक़ीक़ अल-ईद कहते हैंः स्त्रियों के जनाज़े के पीछे चलने से मनाही के बारे में कई हदीसें मौजूद हैं, जो इस हदीस से अधिक सख़्ती पर दलालत करती हैं।
हवाला
صحيح البخاري (2/ 78) (1278).
صحيح مسلم (2/ 646) (938).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص285).
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، لابن عثيمين (2/ 366).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رضي الله عنه عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم قَالَ: «دَعُونِي مَا تَرَكْتُكُمْ، إِنَّمَا هَلَكَ مَنْ كَانَ قَبْلَكُمْ بِسُؤَالِهِمْ وَاخْتِلَافِهِمْ عَلَى أَنْبِيَائِهِمْ، فَإِذَا نَهَيْتُكُمْ عَنْ شَيْءٍ فَاجْتَنِبُوهُ، وَإِذَا أَمَرْتُكُمْ بِأَمْرٍ فَأْتُوا مِنْهُ مَا اسْتَطَعْتُمْ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जो बातें मैं तुम्हें बताना छोड़ दूँ, उनके बारे में तुम मुझे मेरे हाल पर रहने दो, क्योंकि तुमसे पहले के लोगों को केवल इसी बात ने विनष्ट किया कि वे अत्यधिक प्रश्न करते और अपने नबियों से मतभेद करते थे। अतः, जब मैं किसी चीज़ से मना करूँ तो उससे बचते रहो और जब किसी चीज़ का आदेश दूँ तो जहाँ तक हो सके, उसका पालन करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया कि शरीयत के विधान तीन प्रकार के हैं : वो विधान जिनके बारे में ख़ामोशी बरती गई है, वो विधान जो मनाही के रूप में हैं और वो विधान जो आदेश के रूप में हैं।
पहला प्रकार : वो विधान जिनके बारे में शरीयत ख़ामोश है। कोई निर्देश नहीं देती। इस प्रकार के विधानों के बारे में इस्लाम का यह उसूल याद रखना चाहिए कि असलन कोई भी चीज़ वाजिब नहीं हुआ करती। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दौर में इस शंका के कारण कि कहीं आकाश से वाजिब या हराम होने से संबंधित आदेश न उतर आए, किसी ऐसी चीज़ के बारे में प्रश्न करने से बचना ज़रूरी था, जो सामने न आई हो। क्योंकि अल्लाह ने उसे बंदों पर दया के तौर पर छोड़े रखा है। लेकिन आपकी मृत्यु के बाद प्रश्न अगर फ़तवा लेने या दीन के आवश्यक मसायल का ज्ञान प्राप्त करने के इरादे से किया जाए, तो न केवल जायज़ है, बल्कि इसका आदेश दिया गया है। लेकिन प्रश्न अगर बाल की खाल निकालने के इरादे से किया जाए, तो इस हदीस के आलोक में इस तरह से प्रश्न करना मना होगा। क्योंकि इस प्रकार का प्रश्न अंततः उसी प्रकार की परिस्थिति सामने ला सकता है, जो बनी इसराईल के लिए उत्पन्न हो गई थी। हुआ यह था कि उनको एक गाय ज़बह करने का आदेश दिया गया था। ऐसे में अगर कोई भी गाय ज़बह कर देते, तो आदेश का पालन हो जाता, लेकिन उन्होंने बाल की खाल निकालनी शुरू की, तो उनकी परेशानी बढ़ती चली गई।
दूसरा : वो विधि-विधान, जिनसे मना किया गया है। इनसे दूर रहने वाले को सवाब मिलेगा और इनमें संलिप्त होने वाले को दंड। अतः इस प्रकार की तमाम चीज़ों से बचना ज़रूरी है।
तीरा प्रकार : वो विधि-विधान जिनका आदेश दिया गया है। इनका पालन करने वाले को सवाब मिलेगा, और इन्हें छोड़ने वाले को दंड। अतः इन्हें क्षमता अनुसार करना ज़रूरी है।
फ़ायदे
- इन्सान को ध्यान ऐसे कामों पर देना चाहिए, जो ज़्यादा अहम और आवश्यक हों। ऐसे कामों से बचना चाहिए, जो फ़िल-हाल ज़रूरी न हों। ऐसी चीज़ों के बारे में प्रश्न करने से बचना चाहिए, जो अभी सामने नहीं आई हैं।
- ऐसे प्रश्न पूछने से मना किया गया है, जो मसायल को जटिल बनाते हैं, संदेहों का द्वार खोलते हैं, और अत्यधिक मतभेद का कारण बनते हैं।
- यहाँ मना की गई चीज़ों को छोड़ने का आदेश दिया गया है। क्योंकि उन्हें छोड़ना कोई मुश्किल काम नहीं है। यही कारण है कि मनाही को आम रखा गया है।
- जिन कामों को करने का आदेश दिया गया है, उन्हें करने का आदेश सामर्थ्य के साथ जुड़ा हुआ है। क्योंकि कभी-कभी ऐसा भी होता है कि उन्हें करना मशक़्क़त भरा होता है, या फिर इन्सान के वश में होता ही नहीं।
- इस हदीस में बहुत ज़्यादा सवाल करने से मना किया गया है। दरअसल उलेमा ने प्रश्न के दो प्रकार बताए हैं : पहले प्रकार में दीन के ज़रूरी मसायल से जुड़े हुए ऐसे प्रश्न आते हैं, जिनका उद्देश सीखना हो, इस प्रकार का प्रश्न करने का आदेश दिया गया है, और सहाबा के प्रश्न इसी प्रकार के हुआ करते थे। दूसरे प्रकार में ऐसे प्रश्न आते हैं, जो बाल की खाल निकालने के लिए किए जाते हैं। इस प्रकार का सवाल करना मना है।
- इस उम्मत को सावधान किया गया है कि वह पिछली उम्मतों की तरह अपने नबी की मुख़ालफ़त न करे।
- अनावश्यक बहुत ज़्यादा प्रश्न और नबियों की मुख़ालफ़त विनाश का सबब है। जैसे उन बातों के बारे में प्रश्न, जिनकी जानकारी लेना संभव न हो। जैसे ग़ैब के मसायल, जिन्हें अल्लाह के अतिरिक्त कोई नहीं जानता और क़यामत के दिन के हालात।
- कठिन मसायल के बारे में पूछने की मनाही। औज़ाई कहते हैं : जब अल्लाह बंदे को ज्ञान की बरकत से वंचित करना चाहता है, तो उसकी ज़बान पर बहुत सारी ग़लत बातें डाल देता है। इस प्रकार के लोग सबसे अल्प ज्ञानी होते हैं। इब्न वह्ब कहते हैं : मैंने मालिक को कहते हुए सुना है : ज्ञान में विवाद इन्सान के दिल से ज्ञान का नूर ख़तम कर देता है।
हवाला
صحيح البخاري (9/ 94) (7288).
صحيح مسلم (2/ 975) (1337).
بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (1/ 236).
نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 181).
شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (2/ 268).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «ما نهيتكم عنه فاجتنبوه، وما أمرتكم به فأْتُوا منه ما استطعتم، فإنما أَهلَكَ الذين من قبلكم كثرةُ مسائلهم واختلافهم على أنبيائهم».
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते हुए सुनाः मैं तुम्हें जिस चीज़ से रोकूँ, उससे बचते रहो और जिस चीज का आदेश दूँ, उसे जहाँ तक हो सके किए जाओ, क्योंकि तुमसे पहले के लोगों को उनके अधिक प्रश्नों और नबियों के विरोध ने हलाक किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें बताया है कि जब वह हमें किसी चीज़ से मना करे, तो उससे बिना किसी अपवाद के बचना पड़ेगा और जब किसी बात का आदेश दे, तो उसे शक्ति भर करना पड़ेगा।
फिर हमें इस बात से सावधान किया कि हम उन पिछले समुदायों की तरह न हो जाएँ, जो अपने नबियों पर सवाल पर सवाव दागते गए और उनका विरोध भी करते रहे। परिणामस्वरूप अल्लाह ने उन्हें सज़ा के तौर पर तरह-तरह की हलाकतों में डाल दिया। अतः, हमें उनकी तरह नहीं होना चाहिए, ताकि उसी तरह की हलाकतों का सामना न करना पड़े।
फ़ायदे
- आदेशों का पालन करने तथा निषेधों से बचने का आदेश।
- मना की हुई चीज़ों से बचने के मामले में कोई छूट नहीं है। जबकि जिन चीज़ों को करने का आदेश है, उनके पालन के साथ शक्ति की क़ैद लगी हुई है। क्योंकि बचना इनसान की क्षमता के अंदर की चीज़ है, जबकि करने के लिए आदेशित कार्य को करने की शक्ति की आवश्यकता होती है।
- अधिक प्रश्न करने की मनाही। उलेमा ने प्रश्न के दो प्रकार बताए हैं : पहला वह प्रश्न जो धर्म से संबंधित मामलों में जानकारी प्राप्त करने के लिए किया गया हो। इस तरह के प्रश्न का आदेश दिया गया है और सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- के प्रश्न इसी प्रकार के दायरे में आते थे। दूसरा वह प्रश्न जो बाल की खाल निकालने के लिए किया गया हो। इसी प्रकार के प्रश्न से मना किया गया है।
- इस उम्मत को अपने नबी की मुख़ालिफ़त से मना किया गया है, जैसा कि पिछली उम्मतों में होता आया है।
- निषेध के अंदर कम और अधिक दोनों शामिल हैं। क्योंकि उससे बचने के आदेश का पालन उसी समय हो पाएगा, जब उसके कम एवं अधिक दोनों से बचा जाए। मिसाल के तौर पर सूद (ब्याज) से जब मना कर दिया गया, तो उसमें कम और अधिक दोनों शामिल हैं।
- हराम कामों की ओर ले जाने वाले असबाब को छोड़ना। क्योंकि यह बचने के अर्थ का एक अंश है।
- इनसान के पास क्षमता एवं सामर्थ्य होता है, क्योंकि आपका फ़रमान है : "जहाँ तक तुम्हारी शक्ति हो।" इस तरह, इसमें जबरिया संप्रदाय का खंडन है, जो कहते हैं कि इनसान की कोई क्षमता नहीं होती और वह अपने अमल पर मजबूर होता है। यहाँ तक कि इनसान बात करते समय अपना हाथ भी हिलाता है, तो अपनी मर्ज़ी से नहीं हिलाता, बल्कि उसपर मजबूर होता है। सच्चाई यह है कि यह एक असत्य मत है, जिसके अंदर बहुत-से दोष मौजूद हैं।
- इनसान जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का आदेश सुने, तो उसे क्या यह वाजिब है या मुसतहब है, नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आपने कहा है : "فَأْتُوا مِنْهُ مَا استَطَعْتُمْ" यानी जहाँ तक हो सके, उसका पालन करो।
- अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जिस बात का आदेश दिया है या जिससे रोका है, वह शरीयत है। चाहे वह क़ुरआन में मौजूद हो या न हो। इसलिए क़ुरआन के अतिरिक्त सुन्नत का भी पालन किया जाएगा, चाहे वह आदेश के रूप में हो या निषेध के रूप में।
- अधिक प्रश्न करना विनाश का कारण है। विशेष रूप से उन बातों के बारे में जिनकी जानकारी प्राप्त करना संभव नहीं है। जैसे परोक्ष की बातें, अल्लाह के नाम एवं गुण क़यामत के दिन के हालात आदि। इन मामलों में अधिक सवाल हलाकत का कारण है और इस तरह का व्यक्ति बाल की खाल निकालने वाला समझा जाएगा।
- पिछली उम्मतें अधिक प्रश्न करने तथा अपने नबियों से अधिक मतभेद के कारण हलाक हो गईं।
हवाला
-التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثًا النووية، مطبعة دار نشر الثقافة، الإسكندرية، الطبعة: الأولى، 1380 هـ.
-شرح الأربعين النووية، للشيخ ابن عثيمين، دار الثريا للنشر.
-فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، دار ابن القيم، الدمام المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى، 1424هـ/2003م.
-الفوائد المستنبطة من الأربعين النووية، للشيخ عبد الرحمن البراك، دار التوحيد للنشر، الرياض.
-شرح الأربعين النووية، للشيخ صالح آل الشيخ، دار الحجاز، الطبعة: الثانية، 1433هـ.
-الأربعون النووية وتتمتها رواية ودراية، للشيخ خالد الدبيخي، ط. مدار الوطن.
-الجامع في شروح الأربعين النووية، للشيخ محمد يسري، ط. دار اليسر.
-صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ.
-صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت.
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