अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जब नमाज़ी के पेट में कोई चीज़ इधर से उधर जाए और वह इस बात को सुनिश्चित न कर सके कि उसके पेट से कुछ निकला है या नहीं, तो दोबारा वज़ू करने के लिए नमाज़ छोड़कर उस समय तक बाहर न जाए, जब तक यह यक़ीन न हो जाए कि वज़ू टूट ही गया है। मसलन आवाज़ न सुन ले या बदबू महसूस न कर ले। क्योंकि यक़ीन शक के आधार पर नष्ट नहीं होता और यहाँ पवित्रता हासिल की गई थी, यह यक़ीनी बात है, जबकि टूटी है या नहीं इस बात में संदेह है।
- यह हदीस इस्लाम का एक सिद्धांत तथा फ़िक़्ह का एक उसूल प्रस्तुत करती है। उसूल यह है कि यक़ीन शक के आधार पर नष्ट नहीं होता। असल यह है कि जो जिस अवस्था में था, वह उसी अवस्था में रहेगा, जब तक उसके विपरीत साबित न हो जाए।
- शक का पवित्रता (तहारत) पर कोई प्रभावन नहीं पड़ता और नमाज़ पढ़ रहा व्यक्ति अपनी पवित्रता पर बाक़ी रहेगा, जब तक इस बात का यक़ीन न हो जाए कि वज़ू टूट गया है।
صحيح مسلم (1/ 276) (362)، البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (8/ 374)، المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (1/ 608).