अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ विशेष गुनाहों के अतिरिक्त अन्य गुनाहों में किसी को दस कोड़े से अधिक मारने से मना किया है। यहाँ मुराद कोड़े लगाने या मारने की वह निर्धारित संख्या विशेष दंड या विशेष दण्ड नहीं है, जो शरई तौर पर साबित है। इस हदीस का मतलब बस इतना है कि किसी को शिष्टाचार के दायरे में रखने के लिए मारना हो, तो अधिक से अधिक दस कोड़े लगा सकते हैं, उससे ज़्यादा नहीं। जैसे कि पत्नी या बेटे को सुधार के लिए मारना।"
- अल्लाह की निर्धारित सीमाएँ, जिनके पालन का अल्लाह ने आदेश दिया है या जिनके उल्लंघन से उसने रोका है, उनके कुछ दंड हैं, जो उनके उल्लंघन से रोकते हैं। ये दंड या तो शरीयत द्वारा निर्धारित हैं या मसलहत पर निर्धारित हैं जो शासक के विवेक पर निर्भर करते हैं।
- अनुशासन के तौर पर दिया जाने वाला दंड हल्का और बस इतना होना चाहिए कि निर्देश देने और डराने का काम हो जाए। अगर दंड देना ही पड़े, तो दस कोड़ों से अधिक न हो। बेहतर यह है कि अनुशासन के लिए मार-पीट की बजाय निर्देश तथा शिक्षा देने एवं प्रेरित करने के रास्ते अपनाए जाएँ। इससे बात मानने की संभावना बढ़ जाती है, और सिखलाने में दयालुता भी है। वैसे, इस विषय में परिस्थितियाँ बड़ी भिन्न-भिन्न होती हैं, इसलिए जहाँ जो तरीक़ा अधिक सुधारात्मक लगे, वहाँ उसे अपनाना चाहिए।
صحيح البخاري (8/ 174) (6850). صحيح مسلم (3/ 1332) (1708). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص677). توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، لعبد الله البسام (5/ 465).