عَنْ أَنَسٍ رَضيَ اللهُ عنهُ قَالَ: ضَحَّى النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِكَبْشَيْنِ أَمْلَحَيْنِ أَقْرَنَيْنِ، ذَبَحَهُمَا بِيَدِهِ، وَسَمَّى وَكَبَّرَ، وَوَضَعَ رِجْلَهُ عَلَى صِفَاحِهِمَا.
अनस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो चितकबरे, सींग वाले मेढ़ों की क़ुरबानी की। दोनों को अपने हाथ से ज़बह किया, बिस्मिल्लाह कहा, अल्लाहु अकबर कहा और अपना पाँव दोनों की गरदनों पर रखा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अनस रज़ियल्लाहु अनहु बयान करते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईद अल-अज़हा के दिन सींगों वाले दो चितकबरे मेंढ़े ज़बह किए और फ़रमाया : अल्लाह के नाम से जबह करता हूँ और अल्लाह सबसे बड़ा है। ज़बह करते समय आपने अपना पाँव मेंढ़े की गर्दन पर रख दिया।
फ़ायदे
- क़ुरबानी करना एक शरई कार्य है। इसपर तमाम मुसलमान एकमत भी हैं।
- बेहतर यह है कि क़ुर्बानी का जानवर उसी तरह का हो, जिस तरह का जानवर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ज़बह किया है। क्योंकि यह देखने में अच्छा होता है, इसमें चर्बी हुआ करती है और इसका मांस स्वादिष्ट हुआ करता है।
- नववी कहते हैं : इस हदीस के आलोक में क़ुरबानी का जानवर किसी और से ज़बह करवाने के बजाय ख़ुद अपने ही हाथ से ज़बह करना मुसतहब है। अलबत्ता, कोई मजबूरी हो तो बात अलग है। लेकिन, उसे ऐसी स्थिति में भी ख़ुद मौजूद रहना चाहिए। वैसे, किसी और से ज़बह करवाना भी जायज़ है। इसमें सर्वसम्मति है।
- इब्न-ए-हजर कहते हैं : इस हदीस से मालूम हुआ कि ज़बह करते समय बिस्मिल्लाह कहने के साथ-साथ अल्लाहु अकबर कहना और जानवर की गर्दन के दाएँ भाग पर अपना पाँव रखना मुसतहब है। उलेमा इस बात पर एकमत हैं कि जानवर को बाएँ पहलू के बल लिटाकर उसकी गर्दन पर पाँव रख दिया जाएगा, ताकि ज़बह करने वाले को दाएँ हाथ से छुरी पकड़ने और बाएँ हाथ से सर को पकड़े रहने में आसानी हो।
- सींग वाले जानवर की क़ुर्बानी मुसतहब है। वैसे, बिना सींग वाले जानवर की क़ुर्बानी भी की जा सकती है।
हवाला
صحيح البخاري (7/ 102) (5565).
صحيح مسلم (3/ 1556) (1966).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص724).
الإعلام بفوائد عمدة الأحكام، لابن الملقن (10/ 179).
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ رَافِعِ بْنِ خَدِيجٍ رَضيَ اللهُ عنهُ قَالَ: كُنَّا مَعَ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِذِي الحُلَيْفَةِ، فَأَصَابَ النَّاسَ جُوعٌ، فَأَصَابُوا إِبِلًا وَغَنَمًا، قَالَ: وَكَانَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي أُخْرَيَاتِ القَوْمِ، فَعَجِلُوا، وَذَبَحُوا، وَنَصَبُوا القُدُورَ، فَأَمَرَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بِالقُدُورِ، فَأُكْفِئَتْ، ثُمَّ قَسَمَ، فَعَدَلَ عَشَرَةً مِنَ الغَنَمِ بِبَعِيرٍ فَنَدَّ مِنْهَا بَعِيرٌ، فَطَلَبُوهُ، فَأَعْيَاهُمْ وَكَانَ فِي القَوْمِ خَيْلٌ يَسِيرَةٌ، فَأَهْوَى رَجُلٌ مِنْهُمْ بِسَهْمٍ، فَحَبَسَهُ اللَّهُ، ثُمَّ قَالَ: «إِنَّ لِهَذِهِ البَهَائِمِ أَوَابِدَ كَأَوَابِدِ الوَحْشِ، فَمَا غَلَبَكُمْ مِنْهَا فَاصْنَعُوا بِهِ هَكَذَا»، فَقَالَ أي رافع: إِنَّا نَرْجُو -أَوْ نَخَافُ- العَدُوَّ غَدًا، وَلَيْسَتْ مَعَنَا مُدًى، أَفَنَذْبَحُ بِالقَصَبِ؟ قَالَ: «مَا أَنْهَرَ الدَّمَ، وَذُكِرَ اسْمُ اللَّهِ عَلَيْهِ فَكُلُوهُ، لَيْسَ السِّنَّ وَالظُّفُرَ، وَسَأُحَدِّثُكُمْ عَنْ ذَلِكَ: أَمَّا السِّنُّ فَعَظْمٌ، وَأَمَّا الظُّفُرُ فَمُدَى الحَبَشَةِ».
राफ़े बिन ख़दीज -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : हम लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ ज़ुल हुलैफा नामी स्थान में थे। लोगों को अत्यधिक भूख लगी। और उन्हें ग़नीमत में ऊँट और बकरियाँ मिलीं। वर्णनकर्ता का कहना है कि उस समय अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पीछे थे। अतः उन्होंने जल्दबाज़ी से काम लिया, जानवर ज़बह कर दिए और हाँडियाँ चूल्हों पर चढ़ा दीं। परन्तु अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के आदेश पर हाँडियों को उलट दिया गया। फिर आपने ग़नीमत का माल बाँटा और दस बकरियों को एक ऊँट के बराबर ठहराया। इसी बीच उनमें से एक ऊँट बिदक कर भाग खड़ा हुआ। लोगों ने उसका पीछा किया, लेकिन उसने उन्हें विवश कर दिया। लोगों के पास घोड़े बहुत कम थे। अंत में उनमें से एक व्यक्ति ने तीर चलाया और अल्लाह ने उसे रोक दिया। अब आपने फ़रमाया : "ये चौपाए भी जंगली जानवरों की तरह भाग खड़े होते हैं। इनमें से जिनपर तुम्हारा बस न चले उनके साथ ऐसा ही करो।" चुनांचे राफ़े ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! कल हमारा सामना शत्रुओं से होने वाला है और हमारे पास छुरियाँ नहीं हैं। ऐसे में क्या हम बाँस की फाँक से ज़बह कर लें? फ़रमाया : "जो चीज़ रक्त बहा दे और उससे ज़बह करते समय जिसपर अल्लाह का नाम लिया गया हो, उसे खाओ। हाँ, मगर दाँत और नाखून से नहीं। मैं तुम्हें इसका कारण भी बता देता हूँ। जहाँ तक दाँत की बात है, तो यह हड्डी है और जहाँ तक नाखून की बात है, तो यह हब्शियों की छुरी है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
राफ़े बिन ख़दीज रज़ियल्लाहु अनहु बयान कर रहे हैं कि सहाबा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ ज़ुल-हुलैफ़ा में रुके। लोगों को भूख़ लगी हुई थी और मुश्रिकों से माल-ए-ग़नीमत के तौर पर ऊँट एवं बकरियाँ प्राप्त हुई थीं। अतः उन्होंने माल-ए-ग़नीमत के वितरण की प्रतीक्षा किए बिना ही कुछ जानवर ज़बह कर दिए और हाँडियाँ चढ़ा दीं। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से अनुमति भी नहीं ली गई। आपकी आदत यह थी कि सेना के पिछले भाग में चला करते थे। आपको पता चला तो हाँडियों को पक रहे गोश्त समेत उलट देने का आदेश दिया। फिर माल-ए-ग़नीमत का वितरण किया। वितरण के समय दस बकरियों को एक ऊँट के बराबर रखा। इसी बीच हुआ यह कि एक ऊँट भाग निकला और सहाबा उसे पकड़ नहीं सके। घोड़ों की कमी थी। अतः एक व्यक्ति ने तीर चलाया और अल्लाह ने उसे रोक दिया। इसपर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : इन पालतू जानवरों के अंदर भी जंगली जानवरों जैसा स्वभाव पाया जाता है। इसलिए जो जानवर तुम्हारे वश से बाहर हो जाए और पकड़ में न आए, उसके साथ यही किया करो। इसके बाद राफ़े ने कहा : ऐसा लगता है कि कल दुश्मन से हमारा मुक़ाबला होने वाला है, और इस बात का डर है कि हम जिन हथियारों से जानवर ज़बह करते हैं, उनकी धार क्षतिग्रस्त हो जाए। जबकि हमें जानवर ज़बह तो करना ही होगा और हमारे पास चाक़ू भी नहीं है। ऐसे में क्या बाँस से ज़बह कर सकते हैं? आपने उत्तर दिया : जो चीज़ बड़ी मात्रा में रक्त बहा दे और उससे ज़बह करते समय अल्लाह का नाम ले लिया जाए, तो तुम ज़बह किए हुए जानवर का मांस खा सकते हो। बस दाँत और नाख़ून से ज़बह किया हुआ नहीं। मैं तुम्हें इसका कारण भी बता देता हूँ। जहाँ तक दाँत की बात है, तो वह हड्डी है और जहाँ तक नाख़ून की बात है, तो हब्शा के रहने वाले अविश्वासी उसका प्रयोग करते हैं।
फ़ायदे
- अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की विनम्रता कि आप सेना के पिछले भाग में चलते, सिपाहियों की देख-भाल करते और लोगों के प्रामर्शों को स्वीकार करते थे।
- शासक अपनी प्रजा तथा सेना को अनुशासन के दायरे में रखे। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब देखा कि कुछ सहाबा ने जल्दबाज़ी से काम लिया है और आपसे अनुमति लिए बिना ही जानवर ज़बह कर दिए हैं, तो उन्हें दंड देते हुए जानवरों का मांस खाने से वंचित कर दिया।
- सहाबा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेशों का पालन करने में ज़रा भी देर नहीं करते थे।
- ग़नीमत का धन वितरण से पहले लेना मना है।
- न्याय से काम लेना चाहिए। विशेष रूप से दुश्मनों एवं अविश्वासियों से जिहाद के समय तो और ज़्यादा। क्योंकि यह विजय प्राप्ति का एक कारण है।
- नववी कहते हैं : जब कोई पालतू जानवर जंगली जानवरों जैसा व्यवहार करने लगे, मसलन कोई ऊँट, गाय, घोड़ा या बकरी बिदक जाए और वश में न आए, तो वह शिकार के समान है। तीर मारने से हलाल हो जाता है।
- जानवर का मांस खाना हलाल हो, इसके लिए उसे ज़बह करना ज़रूरी है। वैसे, जानवर के अंदर निम्नलिखित शर्तों का पाया जाना ज़रूरी है : 1- जानवर ऐसा हो कि उसका मांस खाना जायज़ हो। 2- वह वश में हो। अगर वश में न हो, तो वह शिकार के समान माना जाएगा। 3- जानवर थलीय हो। जलीय जानवर को ज़बह करना ज़रूरी नहीं है।
- ज़बह सही होने की शर्तें : 1- ज़बह करने वाले के अंदर ज़बह करने की योग्यता हो। यानी अक़्मंद, भले-बुरे का ज्ञान रखने वाला, मुसलमान या किसी पूर्ववर्ती आकाशीय ग्रंथ को मानने वाला हो। 2- ज़बह आरंभ करते समय अल्लाह का नाम ले। 3- ज़बह करने के लिए उपयोग किया जाने वाला उपकरण उपयुक्त हो। यानी वह बना हुआ किसी भी चीज़ का हो, लेकिन धारदार हो। हाँ, दाँत और नाख़ून का न हो। 4- जानवर अगर वश में हो, तो ज़बह, ज़बह या नह्र के स्थान पर किया जाए। यानी ग्रासनली, गर्दन की दो मोटी रक्त वाहिकाओं तथा श्वास नली को काट दिया जाए।
हवाला
صحيح البخاري (3/ 138) (2488).
صحيح مسلم (3/ 1558) (1968).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص721).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أَسْمَاء بِنْت أَبِي بَكْرٍ رضي الله عنهما قالت: «نَحَرْنَا عَلَى عَهْدِ رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم فَرَسًا فَأَكَلْنَاهُ». وَفِي رِوَايَةٍ «وَنَحْنُ بِالْمَدِينَةِ».
असमा बिंत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहती हैं कि हमने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवनकाल में एक घोड़ा ज़िबह किया और उसे खाया। एक रिवायत में है कि उस समय हम मदीने में थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
असमा बिंत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि लोगों ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में एक घोड़ा ज़बह किया और उसे खाया। इस हदीस से मालूम होता है कि घोड़े का मांस खाना जायज़ है। कोई यह न समझे कि चूँकि क़ुरआन की इस आयत में घोड़े का ज़िक्र गधा तथा खच्चर के साथ किया गया है, इसलिए इसे खाना जायज़ नहीं है। अल्लाह का फ़रमान हैः {घोड़े, खच्चर और गधों को (हमने इसलिए पैदा किया है) ताकि तुम इनपर सवारी करो और ये शोभा का सामान भी हैं और वह ऐसी वस्तु सृष्टि करता है, जो तुम नहीं जानते।} [सीरा अन-नह्लः 8]
हवाला
1- صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ.
2- صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
3- خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، فيصل بن عبد العزيز المبارك، الطبعة: الثانية 1412هـ، 1992م.
4- الإفهام في شرح عمدة الأحكام، لابن باز، تحقيق: سعيد القحطاني، مؤسسة عبد العزيز بن باز الخيرية، الرياض، الطبعة: الأولى 1435هـ.
5- الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى 1381هـ.
6- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، دار الميمان، الطبعة: الأولى 1426هـ، 2005م.
7- تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار المنهاج، الطبعة: 1427هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن علي بن أبي طالب رضي الله عنه قال: «أَمَرَنِي رَسُول اللَّهِ -صلَّى الله عليه وسلَّم- أَن أَقُومَ عَلَى بُدْنِهِ، وَأَن أَتَصَدَّقَ بِلَحمِهَا وَجُلُودِهَا وَأَجِلَّتِهَا، وَأَن لا أُعْطِيَ الجَزَّارَ مِنهَا شَيْئًا».
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है, कहते हैंः मुझे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आदेश दिया कि मैं आपकी कुरबानी के जानवरों की देखरेख करूँ तथा उनके मांस, खालों (चमड़ों) और झूलों को सदक़ा कर दूँ और कसाई को उनमें से कुछ भी न दूँ।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'हज्जतुल वदा' के अवसर पर मक्का आए। साथ में कुरबानी के जानवर थे। अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अन्हु) यमन से आए। उनके साथ भी कुरबानी के जानवर थे। चूँकि कुरबानी फ़कीरों और मिस्कीनों के लिए सदका है, अतः कुरबानी करने वाले का यह हक़ नहीं बनता कि उसका कुछ भाग मुआवज़ा के तौर पर किसी को दे। यही कारण है कि आपने कसाई को उसके कार्य के बदले में उसमें से कुछ देने से मना किया है। हाँ, उसे मांस, खाल और झूल आदि के सिवाय और कोई चीज़ देना चाहे, तो दे सकता है।
हवाला
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام لابن عثيمين، ط1، مكتبة الصحابة، الإمارات، 1426هـ.
عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ.
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن زياد بن جبير قال: رَأَيتُ ابنَ عُمَرَ أَتَى عَلَى رجل قد أَنَاخَ بَدَنَتَهُ، فَنَحَرَهَا، فَقَالَ: ابْعَثْهَا قِيَاماً مُقَيَّدَةً، سُنَّةَ مُحَمَّدٍ -صلَّى الله عليه وسلَّم-.
ज़ियाद बिन जुबैर कहते हैं कि मैंने अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) को देखा कि वह एक व्यक्ति के पास से गुज़रे, जो अपनी ऊँटनी को बिठाकर ज़बह कर रहा था, तो फ़रमायाः उसे खड़ा करके (तथा उसकी बाईं टाँग को) बाँधकर ज़बह करो। यही मुहम्मद( सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
गाय तथा बकरी इत्यादि को ज़बह करने का सुन्नत तरीक़ा यह है कि उन्हें बाएँ पहलू के बल, क़िबला की ओर मुँह करके लिटाकर उनके गले को काटा जाए। जबकि ऊँट को ज़बह करने का सुन्नत तरीक़ा यह है कि उसे खड़े करके, अगले बाएँ पाँव को बाँधकर, उसके सीने में छुरी डाली जाए। क्योंकि इससे जल्दी जान निकलने के कारण कष्ट कम होता है। इसी कारण जब अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) एक व्यक्ति के पास से गुज़रे, जो एक ऊँट को लिटाकर ज़बह करना चाहता था, तो फ़रमाया कि इसे खड़ा करके अगली बाईं टाँग को बाँधकर ज़बह करो। यही अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का तरीक़ा है, जिसका उल्लेख क़ुरआन की इस आत में हैः "فإذا وجبت جنوبها" (अर्थात, फिर जब उनके पहलू गिर जाएँ)। क्योंकि गिरने की बात उसी समय आएगी, जब खड़ा हो।
हवाला
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة، 1426هـ.
تنبيه الأفهام شرح عمدة الأحكام، محمد بن صالح العثيمين، مكتبة الصحابة، الإمارات، الطبعة: الأولى، 1426هـ.
عمدة الأحكام من كلام خير الأنام -صلى الله عليه وسلم-، لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، الطبعة: الثانية، 1408هـ.
صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ.
صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن شداد بن أوس رضي الله عنه قال: ثِنْتَانِ حَفِظْتُهُمَا عَنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «إِنَّ اللهَ كَتَبَ الْإِحْسَانَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ، فَإِذَا قَتَلْتُمْ فَأَحْسِنُوا الْقِتْلَةَ، وَإِذَا ذَبَحْتُمْ فَأَحْسِنُوا الذَّبْحَ، وَلْيُحِدَّ أَحَدُكُمْ شَفْرَتَهُ، فَلْيُرِحْ ذَبِيحَتَهُ».
शद्दाद बिन औस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : दो बातें मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से याद की हैं। आपने फ़रमाया है : "अल्लाह ने हर चीज़ के साथ अच्छे बर्ताव को अनिवार्य किया है। अतः जब तुम (मृत्यु दण्ड आदि के लिए) किसी का वध करो तो अच्छे ढंग से वध करो और जब (पशुओं को) ज़बह करो तो अच्छे ढंग से ज़बह करो। तुम अपनी छुरी की धार को तेज़ कर लो और अपने ज़बीहा -ज़बह किए जाने वाले पशु- को आराम पहुँचाओ।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह हम पर हर काम में एहसान को फ़र्ज़ किया है। एहसान का अर्थ है, अपने हर कार्य में सदैव अल्लाह का ध्यान रखना। अल्लाह की इबादत (उपासना) में, भला काम करते समय, और लोगों को कष्ट से बचाते समय भी। वध और ज़बह करते समय एहसान भी इसी के संदर्भ में आता है।
अतः क़िसास (प्रतिशोध) के तौर पर वध करते समय एहसान यह है कि वध करने का सबसे आसान, हल्का और जल्दी जान लेने वाला तरीक़ा अपनाया जाए।
जबकि ज़बह करते समय एहसान यह है कि जानवर पर रहम करते हुए हथियार को तेज़ कर लिया जाए, जानवर की नज़रों के सामने हथियार को तेज़ न किया जाए और दूसरे जानवरों के सामने इस तरह ज़बह न किया जाए कि वह देख रहे हों।
फ़ायदे
- सृष्टि पर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की दया तथा कृपा।
- वध और ज़बह में एहसान यह है कि दोनों काम शरई तरीक़े से किए जाएँ।
- शरीयत की संपूर्णता और अपने अंदर हर भलाई को समेटे रखना। यही कारण है कि वह जानवरों के साथ भी दया करने का आदेश देता है।
- इन्सान का वध करने के बाद उसके शरीर के अंगों को काटना मना है।
- हर वह काम हराम है, जो जानवर की यातना का कारण बने।
हवाला
صحيح مسلم (3/ 1548) (1955).
التحفة الربانية في شرح الأربعين حديثا النووية (ص38).
شرح الأربعين النووية، لابن عثيمين (ص185).
فتح القوي المتين في شرح الأربعين وتتمة الخمسين، للعباد (ص65).
فتح الباري، لابن حجر (9/ 644).
شرح النووي على مسلم (13/ 107).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن كعب بن مالك، أنّ امرأةً ذَبحَت شاةً بِحَجَر، «فسُئل النبيُّ صلى الله عليه وسلم عن ذلك فأمَرَ بِأكلها».
काब बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि एक महिला ने एक बकरी को पत्थर से ज़बह किया और जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से उसके बारे में पूछा गया, तो आपने उसे खाने का आदेश दिया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ.
- بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض، المملكة العربية السعودية الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م.
- تسهيل الإلمام بفقه الأحاديث من بلوغ المرام، تأليف: صالح بن فوزان بن عبد الله الفوزان، الطبعة: الأولى، 1427 هـ 2006 م.
- منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان، دار ابن الجوزي، ط1 1428هـ.
- فتح ذي الجلال والاكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية، الطبعة الأولى 1427 هـ.
- توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام، مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي سعيد قال: سألْنا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الجَنِينِ فقال: «كُلُوهُ إنْ شِئْتُم، فإنَّ ذَكاتَه، ذَكاةُ أُمِّهِ».
अबू सईद -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से जानवर के गर्भ के बारे में पूछा, तो फ़रमाया : “यदि चाहो तो उसे खा सकते हो। क्योंकि उसकी माँ को ज़बह करना ही उसके लिए काफ़ी है।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला
- سنن أبي داود، تحقيق: محمد محي الدين, المكتبة العصرية
- سنن الترمذي، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، مكتبة ومطبعة مصطفى البابي، الطبعة: الثانية، 1395 هـ
- سنن ابن ماجه، المؤلف: تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي, دار إحياء الكتب العربية
- مسند أحمد، تحقيق شعيب الأرنؤوط، الناشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421 هـ - 2001 م
- بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض - المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م
- منحة العلام في شرح بلوغ المرام، لعبد الله الفوزان، دار ابن الجوزي، ط1 1428هـ
- فتح ذي الجلال والاكرام بشرح بلوغ المرام، للشيخ ابن عثيمين، المكتبة الإسلامية - الطبعة الأولى 1427
- توضِيحُ الأحكَامِ مِن بُلوُغ المَرَام، للبسام، مكتَبة الأسدي، مكّة المكرّمة، الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ
- إرواء الغليل في تخريج أحاديث منار السبيل، للألباني، المكتب الإسلامي، الطبعة: الثانية 1405 هـ.
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com