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तशरीह के साथ हदीसें

शरई झाड़-फूँक

9 हदीसें

मैं सईद बिन जुबैर के पास बैठा था कि उन्होंने कहाः किसने आज रात तारा टूटते देखा है? मैंने कहाः मैंने देखा है। फिर मैंने कहाः उस समय मैं नमाज़ में नहीं था, बल्कि मुझे किसी चीज़ ने डस लिया था।

عن حُصين بن عبد الرحمن قال: كنتُ عند سعيد بن جُبير فقال: أيكم رأى الكوكب الذي انقَضَّ البارحة؟ فقلتُ: أنا، ثم قلتُ: أما إني لم أكن في صلاة، ولكني لُدغْتُ، قال: فما صنعتَ؟ قلت: ارتقيتُ، قال: فما حَمَلك على ذلك؟ قلت: حديث حدَّثَناه الشعبي، قال: وما حدَّثَكم؟ قلتُ حدثنا عن بريدة بن الحُصيب أنه قال: "لا رُقْية إلا مِن عَيْن أو حُمَة"، قال: قد أحسَن مَن انتهى إلى ما سمع، ولكن حدثنا ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "عُرضت عليّ الأُمم، فرأيتُ النبي ومعه الرَّهط والنبي ومعه الرجل والرجلان، والنبي وليس معه أحد، إذ رُفع لي سواد عظيم فظننتُ أنهم أمَّتي، فقيل لي: هذا موسى وقومه، فنظرتُ فإذا سواد عظيم، فقيل لي: هذه أمَّتك، ومعهم سبعون ألفا يدخلون الجنة بغير حساب ولا عذاب، ثم نهض فدخل منْزله، فخاض الناس في أولئك؛ فقال بعضهم: فلعلهم الذين صحِبوا رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال بعضهم: فلعلهم الذين وُلِدُوا في الإسلام فلم يشركوا بالله شيئا، وذكروا أشياء، فخرج عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبروه، فقال: هم الذين لا يَسْتَرقون، ولا يَكْتَوُون، ولا يَتَطَيَّرون، وعلى ربهم يتوكلون، فقام عُكاشة بن مِحصَن فقال: ادع الله أن يجعلني منهم، قال: أنت منهم، ثم قام جل آخر فقال: ادع الله أن يجعلني منهم، فقال: سَبَقَك بها عكاشة".
हुसैन बिन अब्दुर्रहमान कहते हैंः मैं सईद बिन जुबैर के पास बैठा था कि उन्होंने कहाः किसने आज रात तारा टूटते देखा है? मैंने कहाः मैंने देखा है। फिर मैंने कहाः उस समय मैं नमाज़ में नहीं था, बल्कि मुझे किसी चीज़ ने डस लिया था। उन्होंने कहाः फिर तुमने क्या किया? मैंने कहाः मैंने दम किया। उन्होंने कहाः तुमने ऐसा क्यों क्या? मैंने कहाः एक हदीस, जो हमने शाबी से सुनी है। उन्होंने कहाः शाबी ने तुम्हें कौन-सी हदीस सुनाई है? मैंने कहाः उन्होंने हमें बुरैदा बिन हुसैब (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित एक हदीस सुनाई है कि "बुरी नज़र लगने अथवा किसी ज़हरीले कीड़े के काटने के अतिरिक्त किसी और मामले में दम करना उचित नहीं है।" उन्होंने कहाः सुनी हुई हदीस पर अमल करना बड़ी अच्छी बात है। परन्तु हमें अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के हवाले से बताया है कि आपने फ़रमायाः "मेरे सामने बहुत-सी उम्मतें लाई गईं। मैंने देखा कि किसी नबी के साथ बहुत बड़ा समूह है, किसी नबी के साथ एक-दो लोग हैं और किसी नबी के साथ एक भी आदमी नहीं है। इसी बीच मेरे सामने एक विशाल जनसमूह प्रकट हुआ। मैंने समझा कि यह मेरी उम्मत के लोग हैं। लेकिन मुझसे कहा गया कि यह मूसा और उनकी उम्मत के लोग हैं। फिर मैंने देखा तो और एक बड़ा जनसमूह था। मुझसे कहा गया कि यह आपकी उम्मत के लोग हैं। इनमें सत्तर हज़ार लोग ऐसे हैं, जो बिना किसी हिसाब और अज़ाब के जन्नत में प्रवेश करेंगे।" इतना कहने के बाद आप उठे और अपने घर के अंदर चले गए। इधर, लोग उन सत्तर हज़ार लोगों के बारे में बातें करने लगे कि वे कौन हो सकते हैं? किसी ने कहा कि शायद वह लोग होंगे, जो मुस्लिम घराने में पैदा हुए और कभी किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया। उनके अंदर इसी तरह की बातें चल रही थीं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बाहर आए। लोगों ने आपको उस चर्चे से अवगत कराया, तो फ़रमायाः "यह वह लोग हैं, जो न दम करवाते हैं, न अपने शरीर दागते हैं और न अपशगुन लेते हैं, बल्कि अपने रब पर भरोसा रखते हैं।" इतना सुनने के बाद उक्काशा बिन मेहसन (रज़ियल्लाहु अंहु) खड़े हो गए और कहाः अल्लाह से दुआ कीजिए कि मुझे उन लोगों में से बना दे। तो आपने फ़रमायाः "तुम उन लोगों में से हो।" फिर एक अन्य व्यक्ति खड़ा होकर कहने लगा कि मेरे बारे में भी दुआ करें कि अल्लाह मुझे उन लोगों में से बना दे। परन्तु आपने फ़रमायाः "इस मामले में तुमपर उक्काशा बाज़ी ले गया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

हुसैन बिन अब्दुर रहमान -अल्लाह की रहमत हो उनपर- ने दम करने से संबंधित एक वार्तालाप के बारे में बताया है, जो उनके और सईद बिन जुबैर -उनपर अल्लाह की रहमत हो- के बीच हुई थी। विवरण इस प्रकार है कि हुसैन को एक बिच्छू ने डस लिया था, जिसपर उन्होंने शरीयत के अनुसार दम किया। जब सईद -अल्लाह की रहमत हो उनपर- ने उनसे प्रमाण माँगा, तो शाबी की हदीस प्रस्तुत की, जो बुरी नज़र लगने तथा किसी ज़हरीले कीड़े के डसने पर दम करने को जायज़ ठहराती है। इसपर सईद ने उनकी प्रशंसा की, लेकिन साथ ही उन्हें एक हदीस सुनाई, जो दम न करने की प्रशंसा करती है। वह अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- की हदीस है, जिसमें है कि जिस बंदे के अंदर चार विशेषताएँ होंगी, वह बिना किसी हिसाब और अज़ाब के जन्नत का हक़दार होगा। वो चार विशेषताएँ हैं : दम न करवाना, दागने से बचना, अपशगुन न लेना तथा अल्लाह के ऊपर पूर्ण विश्वास रखना। फिर, जब उकाशा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अनुरोध किया कि अल्लाह से उन्हें ऐसे लोगों में शामिल करने की दुआ करें, तो फ़रमाया कि वह उन लोगों में से हैं। लेकिन जब एक अन्य व्यक्ति ने खड़े होकर यही अनुरोध किया, तो उन्हें प्यार से मना कर दिया, ताकि यह सिलसिला और आगे न बढ़े।

हवाला

-صحيح البخاري، المحقق: محمد زهير بن ناصر الناصر، الناشر: دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422ه. -صحيح مسلم، المحقق: محمد فؤاد عبد الباقي - الناشر: دار إحياء التراث العربي - بيروت. -الملخص في شرح كتاب التوحيد، دار العاصمة، الرياض، الطبعة: الأولى، 1422ه - 2001م. -الجديد في شرح كتاب التوحيد، مكتبة السوادي، جدة، المملكة العربية السعودية، الطبعة: الخامسة، 1424هـ - 2003م.

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निश्चय ही झाड़-फूंक करना, तावीज़ गंडे बाँधना और पति-पत्नी के बीच प्रेम पैदा करने के लिए जादूई अमल करना शिर्क है।

عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: «إنَّ الرُّقَى والتَمائِمَ والتِّوَلَةَ شِرْكٌ».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "निश्चय ही झाड़-फूंक करना, तावीज़ गंडे बाँधना और पति-पत्नी के बीच प्रेम पैदा करने के लिए जादूई अमल करना शिर्क है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ चीज़ें बयान की हैं, जिनमें संलिप्त होना शिर्क हैं। उनमें से कुछ चीज़ें इस प्रकार हैं : 1- झाड़-फूंक करना : यानी शिर्क पर आधारित ऐसी बातें जिनको पढ़कर अज्ञानता काल (जाहिलियत काल) के लोग बीमारी से शिफ़ा पाने के लिए दम किया करते थे। 2- मनकों आदि से बने हुए तावीज़, जिनको बुरी नज़र लगने से बचाव के लिए बच्चों और जानवरों के शरीर में बाँधा जाता है। 3- ऐसे जादूई अमल जो पति-पत्नी में स किसी एक को दूसरे के निकट प्रिय बनाने के लिए किए जाते हैं। यह सारी चीज़ें शिर्क हैं। क्योंकि इनके द्वारा ऐसी चीज़ों को सबब बना दिया जाता है, जिनका सबब होना किसी शरई दलील और किसी भौतिक तजुर्बा से प्रमाणित नहीं है। जहाँ तक शरई साधन, जैसे क़ुरआन पाठ करना या भौतिक साधन, जैसे ऐसी दवाएँ जिनका लाभकारी होना अनुभव या परीक्षण से प्रमाणित है, तो ये इस अक़ीदे (आस्था) के साथ जायज़ हैं कि ये केवल साधन हैं तथा लाभ एवं हानि अल्लाह के हाथ में है।

फ़ायदे
  1. तौहीद तथा अक़ीदे को उन तमाम चीज़ों से सुरक्षित रखना, जो उसे दूषित करते हैं।
  2. झाड़-फूंक करने के शिर्क पर आधारित सारे रूप, तावीज़-गंडे और पति-पत्नी के बीच प्रेम पैदा किए जाने वाले जादूई कार्य हराम हैं।
  3. इन तीन चीज़ों को साधन समझना छोटा शिर्क है, क्योंकि यह ऐसी चीज़ों को साधन मानना है, जो वास्तव में साधन हैं ही नहीं। लेकिन अगर इन तीन चीज़ों को अपने आपमें लाभाकरी तथा हानिकारक मान लिया जाए, तो यह बड़ा शिर्क है।
  4. इस हदीस में शिर्क पर आधारित तथा हराम साधनों को अपनाने से सावधान किया गया है।
  5. झाड़-फूंक करना भी शिर्क तथा हराम होता है। यह अलग बात है कि इसके कुछ जायज़ रूप भी हैं।
  6. दिल का संबंध केवल अल्लाह से होना चाहिए। वही लाभ तथा हानि का मालिक है। उसका कोई साझी नहीं है। जो भी अच्छी चीज़ मिलती है, उसी के पास से मिलती है और वही बुराई से बचाता है।
  7. झाड़-फूंक करने का जायज़ रूप वह है, जिसमें तीन शर्तें पाई जाएँ : 1- इस बात का विश्वास रखा जाए कि यह केवल साधन है और अल्लाह की अनुमति के बिना लाभकारी नहीं होता। 2- झाड़-फूंक क़ुरआन, अल्लाह के नामों, गुणों, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सिखाई हुई दुआओं और जायज़ दुआओं के द्वारा किया जाए। 3- जो शब्द कहे जाएँ, वो समझे जाने वाले हों। उनमें जादू-टोना न हो।
हवाला

سنن أبي داود (6/ 31) (3883). سنن ابن ماجه (4/ 554) (3530). مسند أحمد (6/ 110) (3615). الجديد في شرح كتاب التوحيد، لمحمد القرعاوي (ص91). الملخص في شرح كتاب التوحيد، لصالح الفوزان (ص79). القول المفيد على كتاب التوحيد، لابن عثيمين (1/ 180).

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कष्ट दूर कर दे ऐ लोगों के रब! तथा रोग से मुक्ति प्रदान कर, तू ही रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला है। तेरे सिवा कोई रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला नहीं है। रोग से ऐसा छुटकारा प्रदान कर कि फिर कोई रोग शेष न रहे।

عَنْ عَائِشَةَ أُمِّ المؤْمنينَ رَضيَ اللهُ عنها قَالَت: كَانَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِذَا أَتَى الْمَرِيضَ يَدْعُو لَهُ قَالَ: «أَذْهِبِ الْبَاسَ، رَبَّ النَّاسِ، وَاشْفِ أَنْتَ الشَّافِي، لَا شِفَاءَ إِلَّا شِفَاؤُكَ، شِفَاءً لَا يُغَادِرُ سَقَمًا».
मुसलमानों की माता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है, वह कहती हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब किसी रोगी के पास जाकर उसके लिए दुआ करते, तो फ़रमाते : "कष्ट दूर कर दे ऐ लोगों के रब! तथा रोग से मुक्ति प्रदान कर, तू ही रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला है। तेरे सिवा कोई रोग से मुक्ति प्रदान करने वाला नहीं है। रोग से ऐसा छुटकारा प्रदान कर कि फिर कोई रोग शेष न रहे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब किसी बीमार व्यक्ति के हाल जानने जाते, तो उसके लिए इन शब्दों में दुआ करते : हे अल्लाह! (दूर कर दे) और मिटा दे (तकलीफ़) और बीमारी की शिद्दत को, (ऐ इंसानों के रब) और उनके पैदा करने वाले तथा पालनहार, (और शिफ़ा दे) इस मरीज़ को, (तू ही) पाक है (शिफ़ा देने वाला है) और मैं तेरे शिफ़ा देने वाले नाम के ज़रिए तुझसे वसीला (दुआ) मांगता हूँ, (कोई शिफ़ा हासिल नहीं है) मरीज़ के लिए (सिवाय तेरी शिफ़ा के) और तेरी आफ़ियत के, (ऐसी शिफ़ा) मुकम्मल तौर पर (जो न छोड़े) और बाक़ी न रखे (कोई बीमारी) और न ही कोई दूसरी तकलीफ़।

फ़ायदे
  1. शिफ़ा देने वाला अल्लाह है। डॉक्टर एवं दवा दोनों साधन मात्र हैं। लाभ एवं हानि केवल अल्लाह की अनुमति से कर सकते हैं।
  2. बीमार व्यक्ति का हाल जानने जाना मुसलमानों का एक साझा अधिकार है। यदि रोगी रिश्तेदार हो तो यह अधिकार और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
  3. रोगी का हाल जानने जाने वाले को उसके लिए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित इन मुबारक शब्दों द्वारा दुआ करने की प्रेरणा।
  4. क़ुरआन की आयतें और दुआएँ पढ़कर इलाज करना भी अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षाओं का हिस्सा है। आप ख़ुद बीमार होते, तो इलाज के लिए क़ुरआन की आयतों और दुआओं का सहारा लेते और परिवार या बाहर का कोई व्यक्ति बीमार होता, तो यही पद्धति अपनाते।
  5. इब्न-ए-हजर कहते हैं : एक प्रश्न यह उठता है कि जब बीमारी गुनाहों का प्रायश्चित बनती है और उससे सवाब भी मिलता है, जैसा कि बहुत-सी हदीसों से पता चलता है, तो फिर बीमार व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य की दुआ क्यों की जाए? इसका उत्तर यह है कि दुआ इबादत है और यह सवाब तथा प्रायश्चित के विरुद्ध नहीं है। क्योंकि सवाब तथा प्रायश्चित बीमारी के आरंभ तथा उसपर सब्र से हासिल होते हैं, जबकि दुआ करने वाले को दो अच्छी चीज़ों में से एक ज़रूर मिलती है। या तो उसका कोई उद्देश्य पूरा हो जाता है या फिर बदले में उसे कोई भलाई मिल जाती है या बुराई से सुरक्षा प्राप्त हो जाती है। और यह सब कुछ अल्लाह का अनुग्रह एवं दया है।
हवाला

صحيح البخاري (7/ 134) (5750). صحيح مسلم (4/ 1721) (2191). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 162). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 477). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (11/ 539). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 687).

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अल्लाह का नाम लेकर मैं आपका इलाज करता हूँ, प्रत्येक उस चीज़ से जो आपको कष्ट दे, प्रत्येक प्राणी की बुराई अथवा ईर्ष्या करने वाली आँख से। अल्लाह आपको शिफ़ा दे। अल्लाह का नाम लेकर मैं आका इलाज करता हूँ।

عَنْ أَبِي سَعِيدٍ رَضيَ اللهُ عنه: أَنَّ جِبْرِيلَ أَتَى النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ: يَا مُحَمَّدُ اشْتَكَيْتَ؟ فَقَالَ: «نَعَمْ» قَالَ: «بِاسْمِ اللهِ أَرْقِيكَ، مِنْ كُلِّ شَيْءٍ يُؤْذِيكَ، مِنْ شَرِّ كُلِّ نَفْسٍ أَوْ عَيْنِ حَاسِدٍ، اللهُ يَشْفِيكَ بِاسْمِ اللهِ أَرْقِيكَ».
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) का वर्णन है कि जिबरील (अलैहिस्सलाम) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए और बोलेः ऐ मुहम्मद, क्या आपको तकलीफ़ है? आपने कहाः हाँ, तो उन्होंने यह दुआ पढ़ीः “अल्लाह का नाम लेकर मैं आपका इलाज करता हूँ, प्रत्येक उस चीज़ से जो आपको कष्ट दे, प्रत्येक प्राणी की बुराई अथवा ईर्ष्या करने वाली आँख से। अल्लाह आपको शिफ़ा दे। अल्लाह का नाम लेकर मैं आका इलाज करता हूँ।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

صحيح مسلم (4/ 1718) (2186). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 164). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص538). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 485). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (11/ 568). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 690).

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शरीर के जिस भाग में कष्ट हो, उसपर अपना हाथ रखो और तीन बार बिस्मिल्लाह (अल्लाह के नाम से) कहो और सात बार " أَعُوذُ بِاللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ" (मैं अल्लाह की और उसकी शक्ति की शरण में आता हूँ उस वस्तु की बुराई से, जो मैं महसूस करता हूँ और जिसका मुझे अंदेशा है।) पढ़ो।

عَنْ عُثْمَانَ بْنِ أَبِي الْعَاصِ الثَّقَفِيِّ رضي الله عنه أَنَّهُ شَكَا إِلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَجَعًا يَجِدُهُ فِي جَسَدِهِ مُنْذُ أَسْلَمَ، فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «ضَعْ يَدَكَ عَلَى الَّذِي تَأَلَّمَ مِنْ جَسَدِكَ، وَقُلْ بِاسْمِ اللهِ ثَلَاثًا، وَقُلْ سَبْعَ مَرَّاتٍ أَعُوذُ بِاللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ».
उसमान बिन अबुल आस सक़फ़ी रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है कि उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सामने अपने शरीर में इस्लाम ग्रहण करने के समय से ही महसूस होने वाले एक कष्ट की शिकायत की, तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "शरीर के जिस भाग में कष्ट हो, उसपर अपना हाथ रखो और तीन बार बिस्मिल्लाह (अल्लाह के नाम से) कहो और सात बार " أَعُوذُ بِاللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ" (मैं अल्लाह की और उसकी शक्ति की शरण में आता हूँ उस वस्तु की बुराई से, जो मैं महसूस करता हूँ और जिसका मुझे अंदेशा है।) पढ़ो।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उसमान बिन अबुल आस -रज़ियल्लाहु अनहु- के शरीर में एक कष्ट था, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी, ऐसा प्रतीत हो रहा था। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उन्हें देखने गए और एक दुआ सिखाई, जिससे अल्लाह उनका कष्ट दूर कर दे। आपने उन्हें बताया कि कष्ट वाले स्थान पर अपनी उंगली रखें, फिर तीन बार बिस्मिल्लाह कहें और उसके बाद सात बार यह दुआ पढ़ें : मैं अल्लाह और उसके सामर्थ्य की शरण माँगता हूँ उस कष्ट और दर्द की बुराई से जो मैं इस समय महसूस करता हूँ और जिसकी चिंता या भय आने वाले समय में मुझे अपने चंगुल में ले सकता है। या फिर मैं इस बात से अल्लाह की शरण माँगता हूँ कि यह बीमारी भविष्य में स्थायी हो जाए और पूरा शरीर उससे प्रभावित हो जाए।

फ़ायदे
  1. इन्सान का ख़ुद पर दम करना मुसतहब है, जैसा कि इस हदीस में आया हुआ है।
  2. शिकायत करना धैर्य और तवक्कुल के विपरीत नहीं है, जब तक उसके साथ विचलित होने और तक़दीर पर आपत्ति करने जैसी कोई बात न हो।
  3. दुआ भी साधनों के उपयोग के दायरे में आता है। इसलिए दुआ उन्हीं शब्दों के साथ होनी चाहिए, जो सिखाए गए हैं और निर्देशित संख्या का भी पालन करना चाहिए।
  4. यह दुआ शरीर में कहीं भी कोई कष्ट होने पर पढ़ी जा सकती है।
  5. इस दुआ को पढ़ते समय हाथ को कष्ट वाले स्थान पर रखना चाहिए।
हवाला

صحيح مسلم (4/ 1728) (2202). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 163). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 481). فيض القدير شرح الجامع الصغير، لعبدالرؤوف المناوي (1/ 284). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 689).

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अल्लाह के नाम से, हमारी धरती की मिट्टी, हममें से किसी के मुँह के थूक से मिलकर, हमारे रब के आदेश से, हमारे मरीज़ के रोगमुक्त होने का ज़रिया होगी।

عن عائشة رضي الله عنها : أنَّ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ إِذَا اشْتَكى الإنْسَانُ الشَّيْءَ مِنْهُ، أَوْ كَانَتْ بِهِ قَرْحَةٌ أَوْ جُرْح، قالَ النبيُّ صلى الله عليه وسلم بأُصبعِهِ هكذا - ووضع سفيان بن عيينة الراوي سبابته بالأرض ثم رفعها- وقالَ: «بِسمِ اللهِ، تُرْبَةُ أرْضِنَا، بِرِيقَةِ بَعْضِنَا، يُشْفَى بِهِ سَقِيمُنَا، بإذْنِ رَبِّنَا».
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि जब कोई व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपनी बीमारी के बारे में बताता या उसे कोई फोड़ा अथवा ज़ख्म होता, तो आप अपनी उंगली से इस तरह करते (सुफ़यान बिन उयैना जो कि इस हदीस के वर्णनकर्ता हैं ने अपनी उंगली को ज़मीन पर रखने के बाद उठाकर दिखाया) और फ़रमातेः "بِسمِ اللهِ، تُرْبَةُ أرْضِنَا، بِرِيقَةِ بَعْضِنَا، يُشْفَى بِهِ سَقِيمُنَا، بإذْنِ رَبِّنَا" अर्थात, अल्लाह के नाम से, हमारी धरती की मिट्टी, हममें से किसी के मुँह के थूक से मिलकर, हमारे रब के आदेश से, हमारे रोगी के रोगमुक्त होने का ज़रिया होगी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، تأليف سليم الهلالي، دار ابن الجوزي. رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين، للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير - دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. شرح رياض الصالحين، للشيخ محمد بن صالح العثيمين، مدار الوطن - الرياض، 1426هـ. شرح صحيح مسلم، للإمام محي الدين النووي، دار الريان للتراث - القاهرة، الطبعة الأولى، 1407هـ. صحيح البخاري، للإمام أبي عبدالله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبدالباقي، دار عالم الكتب - الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. كنوز رياض الصالحين، فريق علمي برئاسة أ.د. حمد العمار، دار كنوز إشبيليا - الرياض، الطبعة الأولى، 1430هـ. نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة - بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ.

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अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिन्नों और इनसानों की नज़र से अल्लाह की शरण माँगा करते थे।

عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَتَعَوَّذُ مِنَ الجَانِّ، وعَيْنِ الإنسان، حتى نَزَلَتْ المُعَوِّذتان، فلمَّا نَزَلَتا، أخذ بهما وتركَ ما سواهما.
अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिन्नों और इनसानों की बुरी नज़र से अल्लाह की शरण माँगा करते थे, यहाँ तक कि 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल-फ़लक़' और 'क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन-नास' उतरीं। जब यह दोनों सूरतें उतरीं तो इन्हें पढ़ने लगे और इनके सिवा अन्य चीज़ें छोड़ दीं।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

1-بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين؛ تأليف: سليم بن عيد الهلالي، الناشر: دار ابن الجوزي ، سنة النشر: 1418 هـ- 1997م 2-الجامع الصحيح –وهو سنن الترمذي-؛ للإمام محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق الشيخ أحمد شاكر، مكتبة الحلبي-مصر، الطبعة الثانية، 1388هـ. 3-رياض الصالحين من كلام سيد المرسلين؛ للإمام أبي زكريا النووي، تحقيق د. ماهر الفحل، دار ابن كثير-دمشق، الطبعة الأولى، 1428هـ. 4-سنن ابن ماجه؛ للحافظ محمد بن يزيد القزويني، حققه محمد فؤاد عبدالباقي، دار إحياء الكتب العربية. 5-السنن الصغرى للنسائي "المجتبى"، تحقيق: عبد الفتاح أبو غدة، نشر: مكتب المطبوعات الإسلامية – حلب، الطبعة: الثانية، 1406ه – 1986م. 6-كنوز رياض الصالحين؛ فريق علمي برئاسة أ.د. حمد العمار، دار كنوز إشبيليا-الرياض، الطبعة الأولى، 1430هـ. 7-مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م. 8-مشكاة المصابيح؛ تأليف محمد بن عبدالله التبريزي، تحقيق محمد ناصر الدين الألباني، المكتب الإسلامي-بيروت، الطبعة الثانية، 1399هـ. 9-نزهة المتقين شرح رياض الصالحين؛ تأليف د. مصطفى الخِن وغيره، مؤسسة الرسالة-بيروت، الطبعة الرابعة عشر، 1407هـ. 10- دليل الفالحين لطرق رياض الصالحين, محمد علي بن محمد البكري الصديقي الشافعي, اعتنى بها: خليل مأمون شيحا, الناشر: دار المعرفة للطباعة والنشر والتوزيع، بيروت – لبنان, الطبعة: الرابعة، 1425 هـ - 2004 م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

जो किसी ऐसे रोगी का हाल जानने के लिए जाता है, जिसकी मौत का अभी समय नहीं आया है और उसके पास सात बार यह दुआ पढ़ता है : (मैं महान अल्लाह, जो महान सिंहासन का रब है, से दुआ करता हूँ कि तुमको स्वस्थ कर दे।) तो उसे अल्लाह उस रोग से मुक्ति दे ही देता है।

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رضي الله عنهما عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَنْ عَادَ مَرِيضًا، لَمْ يَحْضُرْ أَجَلُهُ فَقَالَ عِنْدَهُ سَبْعَ مِرَارٍ: أَسْأَلُ اللَّهَ الْعَظِيمَ رَبَّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ أَنْ يَشْفِيَكَ، إِلَّا عَافَاهُ اللَّهُ مِنْ ذَلِكَ الْمَرَضِ».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो किसी ऐसे रोगी का हाल जानने के लिए जाता है, जिसकी मौत का अभी समय नहीं आया है और उसके पास सात बार यह दुआ पढ़ता है : (मैं महान अल्लाह, जो महान सिंहासन का रब है, से दुआ करता हूँ कि तुमको स्वस्थ कर दे।) तो उसे अल्लाह उस रोग से मुक्ति दे ही देता है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जब कोई मुसलमान किसी मुसलमान का हाल जानने ऐसी बीमारी के समय जाता है, जिसमें उसकी मृत्यु न लिखी हो, फिर उसके लिए यह दुआ पढ़ता है : "أسأل الله العظيم" अर्थात्, मैं अल्लाह से, जो अपनी ज़ात, गुणों एवं कार्यों में महान है, "رب العرش العظيم أن يشفيك" तथा महान अर्श (सिंहासन) का मालिक है, दुआ करता हूँ कि तुम्हें रोगमुक्त कर दे, साथ ही इस दुआ को सात बार दोहरता है, तो अल्लाह उसे उस बीमारी से स्वस्थ कर देता है।

फ़ायदे
  1. रोगी के लिए यह दुआ करना और इसे सात बार दोहराना मुसतहब है।
  2. जिसके लिए यह दुआ की जाए, उसे अल्लाह की अनुमति से स्वस्थ लाभ होगा, बशर्तेकि दुआ सच्ची नीयत और निष्ठा के साथ की जाए।
  3. यह दुआ धीमे और ज़ोर से दोनों तरह से करना जायज़ है। लेकिन रोगी को सुनाकर करना उत्तम और वांछित है, क्योंकि, इससे उसे ख़ुशी मिलेगी।
हवाला

سنن أبي داود (5/ 22) (3106). سنن الترمذي (3/ 593) (2083). السنن الكبرى للنسائي (9/ 385) (10820). مسند أحمد (4/ 40) (2137). بهجة الناظرين شرح رياض الصالحين، لسليم الهلالي (2/ 163). تطريز رياض الصالحين، لفيصل آل مبارك (ص537). شرح رياض الصالحين، لابن عثيمين (4/ 483). كنوز رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (11/ 559). نزهة المتقين شرح رياض الصالحين، لمجموعة من الباحثين (1/ 689).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

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