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तशरीह के साथ हदीसें

तजवीद विद्या

4 हदीसें

क़ुरआन को अपनी आवाज़ के द्वारा सँवारकर पढ़ो।

عن البراء بن عازب رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «زَيِّنُوا القرآنَ بأصواتِكم».
बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “क़ुरआन को अपनी आवाज़ के द्वारा सँवारकर पढ़ो।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

क़ुरआन पढ़ते समय अपनी आवाज़ को सुंदर बनाकर उसकी शोभा बढ़ाओ। क्योंकि सुंदर आवाज़ से सुंदर वाणी की सुंदरता एवं शोभा और बढ़ जाती है। इस आदेश का उद्देश्य क़ुरआन के अर्थ पर अच्छी तरह ग़ौर व फिक्र करना तथा उसकी आयतों में निहित आदेशों, निषेधों, वचनों एवं चेतावनियों को समझना है। क्योंकि अच्छी आवाज़ से प्रेम इन्सान की प्रकृति में मौजूद है। फिर जब आवाज़ अच्छी होती है, तो इन्सान का चिंतन इधर-उधर से हटकर उसी पर केंद्रित हो जाता है, और जब चिंतन केंद्रित हो जाता है, तो वांछित विनीति एवं विनम्रता भी प्राप्त हो जाती है। याद रहे कि यहाँ आवाज़ सुंदर बनाने से मुराद ऐसी सुंदरता लाना है, जिससे विनीति एवं विनम्रता पैदा हो। गानों की धुनों की आवाज़ नहीं, जो क़िरात के दायरे ही में न आती हो।

हवाला

- سنن أبي داود، تحقيق: محمد محيي الدين عبد الحميد، نشر: المكتبة العصرية، صيدا – بيروت. - السنن الصغرى للنسائي "المجتبى"، تحقيق: عبد الفتاح أبو غدة، نشر: مكتب المطبوعات الإسلامية – حلب، الطبعة: الثانية، 1406ه – 1986م. - مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. - سنن ابن ماجه، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء الكتب العربية - فيصل عيسى البابي الحلبي. - صحيح الجامع الصغير وزياداته، للألباني، نشر: المكتب الإسلامي. - شرح كتاب التوحيد من صحيح البخاري، لعبد الله بن محمد الغنيمان، الناشر: مكتبة الدار، المدينة المنورة، الطبعة: الأولى، 1405 هـ. - الميسر في شرح مصابيح السنة, فضل الله بن حسن شهاب الدين التُّورِبِشْتِي, المحقق: د. عبد الحميد هنداوي, مكتبة نزار مصطفى الباز, الطبعة: الثانية، 1429 هـ - 2008 هـ. - شرح سنن النسائي المسمى «ذخيرة العقبى في شرح المجتبى»، المؤلف: محمد بن علي بن آدم الإثيوبي الوَلَّوِي، الناشر: دار المعراج الدولية للنشر - دار آل بروم للنشر والتوزيع, الطبعة الأولى, 1416- 1424. - شرح الطيبي على مشكاة المصابيح المسمى بـ (الكاشف عن حقائق السنن), شرف الدين الحسين بن عبد الله الطيبي, المحقق: د. عبد الحميد هنداوي, الناشر: مكتبة نزار مصطفى الباز - مكة المكرمة - الرياض - الطبعة: الأولى، 1417 هـ - 1997 م. - إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري, أحمد بن محمد بن أبى بكر القسطلاني القتيبي المصري, الناشر: المطبعة الكبرى الأميرية، مصر, الطبعة: السابعة، 1323 هـ.

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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दस आयतें पढ़ते और दूसरी दस आयतों को पढ़ना उस समय तक शुरू नहीं करते, जब तक उन दस आयतों के ज्ञान एवं अमल को सीख न लेते

عَنْ أَبِي عَبْدِ الرَّحْمَنِ السُّلَمي رحمه الله قَالَ: حَدَّثَنَا مَنْ كَانَ يُقْرِئُنَا مِنْ أَصْحَابِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُمْ كَانُوا يَقْتَرِئُونَ مِنْ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَشْرَ آيَاتٍ، فَلَا يَأْخُذُونَ فِي الْعَشْرِ الْأُخْرَى حَتَّى يَعْلَمُوا مَا فِي هَذِهِ مِنَ الْعِلْمِ وَالْعَمَلِ، قَالُوا: فَعَلِمْنَا الْعِلْمَ وَالْعَمَلَ.
अबू अब्दुर रहमान सुलमी कहते हैं : हमें अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उन सहाबा ने बताया, जो हमें पढ़ाया करते थे कि वे अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दस आयतें पढ़ते और दूसरी दस आयतों को पढ़ना उस समय तक शुरू नहीं करते, जब तक उन दस आयतों के ज्ञान एवं अमल को सीख न लेते। सहाबा ने कहा : हमने ज्ञान और अमल दोनों सीखा।
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

सहाबा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से दस आयतें प्राप्त करते और दूसरी दस आयतें प्राप्त करना उस समय तक शुरू नहीं करते, जब तक पहली दस आयतों के ज्ञान को पूरी तरह सीख न लेते और उसपर अमल करने न लगते। इस तरह वे ज्ञान तथा अमल दोनों को एक साथ सीखते थे।

फ़ायदे
  1. सहाबा की फ़ज़ीलत तथा क़ुरआन सीखने के प्रति उनकी तत्परता।
  2. क़ुरआन पढ़ने का अर्थ है उसका प्राप्त करना और उसपर अमल करना। केवल उसका पढ़ना और उसे याद करना नहीं।
  3. कुछ कहने तथा कुछ करने से पहले ज्ञान ज़रूरी है।
हवाला

مسند أحمد (38/ 466) (23482).

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अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से पूछा गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़िरात कैसी थी? तो उन्होंने उत्तर दिया : "ख़ूब खींचकर पढ़ते थे।

عَنْ قَتَادَةَ قَالَ: سُئِلَ أَنَسٌ كَيْفَ كَانَتْ قِرَاءَةُ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ؟ فَقَالَ: «كَانَتْ مَدًّا»، ثُمَّ قَرَأَ: {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ} [الفاتحة: 1] يَمُدُّ بِبِسْمِ اللَّهِ، وَيَمُدُّ بِالرَّحْمَنِ، وَيَمُدُّ بِالرَّحِيمِ.
क़तादा से वर्णित है, वह कहते हैं : अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) से पूछा गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की क़िरात कैसी थी? तो उन्होंने उत्तर दिया : "ख़ूब खींचकर पढ़ते थे।", फिर {बिस्मिल्लाहिर्रह़मानिर्रह़ीम} [सूरह फ़ातिह़ाः 1] पढ़कर बताया कि बिस्मिल्लाह, अर-रह़मान और अर-रह़ीम को खींचकर पढ़ा करते थे।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से पूछा गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन की क़िरात (पाठ) कैसे करते थे? तो उन्होंने जवाब दिया : आप अपनी आवाज़ को खींचकर क़िरात करते थे; आप लफ़्ज़ -ए- जलाला (अल्लाह) में 'हा' से पहले 'लाम' को, 'अर-रह़मान' में 'नून' से पहले 'मीम' को और 'अर-रह़ीम' में 'ह़ा' को खींचते थे।

फ़ायदे
  1. मद्द, मद्द के अक्षरों, यानी अलिफ़, वाव और या, को खींचकर (लंबा करके) पढ़ना है, जब वे साकिन हों और उनसे पहले उनके अनुकूल हरकत (स्वर) मौजूद हो।
  2. क़ुरआन पढ़ने के विषय में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़े का बयान।
  3. नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पढ़ने के तरीक़े का व्यावहारिक नमूना।
  4. सिंधी कहते हैं : "يمد صوته مدًا" का अर्थ यह है कि आप खींचने योग्य अक्षरों को लंबा करते, ताकि उन्हें चिंतन-मनन करने और नसीहत हासिल करने वालों को नसीहत देने में मदद मिले।
  5. तज्वीद और क़ुरआन से संबंधित विज्ञान को जानने का महत्व।
  6. नुसूस (धार्मिक ग्रंथों) को समझने के लिए उलेमा से संपर्क किया जाएगा, जैसे कि अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से संपर्क किया गया, तो उन्होंने मसले को स्पष्ट कर दिया।
हवाला

صحيح البخاري (6/ 195) (5046). عمدة القاري (20/55).

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उनसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पढ़ने के तरीक़े के बारे में पूछा गया

عَنِ ابْنِ أَبِي مُلَيْكَةَ: عَنْ بَعْضِ أَزْوَاجِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ -قَالَ: أَبُو عَامِرٍ، قَالَ نَافِعٌ: أُرَاهَا حَفْصَةَ- أَنَّهَا سُئِلَتْ عَنْ قِرَاءَةِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَتْ: إِنَّكُمْ لَا تَسْتَطِيعُونَهَا قَالَ: فَقِيلَ لَهَا أَخْبِرِينَا بِهَا. قَالَ: فَقَرَأَتْ قِرَاءَةً تَرَسَّلَتْ فِيهَا قَالَ أَبُو عَامِرٍ: قَالَ نَافِعٌ: فَحَكَى لَنَا ابْنُ أَبِي مُلَيْكَةَ {الحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ} [الفاتحة: 2] ثُمَّ قَطَّعَ {الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ} [الفاتحة: 1] ثُمَّ قَطَّعَ {مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ}.
इब्ने अबी मुलैका का वर्णन है : नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की किसी पत्नी से रिवायत है (अबू आमिर ने कहा, नाफ़े कहते हैं कि मेरा ख़याल है कि वह हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा थीं) उनसे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पढ़ने के तरीक़े के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फ़रमाया : तुम लोग इसकी ताक़त नहीं रखते । उनसे कहा गया : हमें उसके बारे में बताएँ। तो उन्होंने ठहर-ठहर कर पढ़कर दिखाया। अबू आमिर कहते हैं कि नाफ़े ने कहा : तो इब्ने अबू मुलैका ने हमें इस तरह पढ़कर सुनाया : 'अलह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन' यहाँ रुक गए। फिर 'अर-रह़मानिर-रह़ीम' पढ़ने के बाद रुक गए और 'मालिकि यौमिद्दीन' पढ़ने के बाद रुक गए।
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

उम्मुल मोमिनीन (मोमिनों की माता) हफ़्सा रज़ियल्लाहु अन्हा से पूछा गया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम क़ुरआन की क़िरात किस तरह करते थे? उन्होंने उत्तर दिया : तुम लोग ऐसा नहीं कर सकते, तो लोगों ने उनसे कहा : हमें बताइए तो सही। नाफ़े कहते हैं कि इब्ने अबी मुलैका ने हमें ठहर-ठहर कर सुनाया, ताकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पाठ का तरीक़ा बता और उसे समझा सकें। चुनांचे उन्होंने {الحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ} 'अलह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन' पढ़ा, फिर रुक गए, फिर {الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ} 'अर-रह़मानिर-रह़ीम' पढ़ा, फिर रुक गए और फिर {مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ} 'मालिकि यौमिद्दीन' पढ़ा।

फ़ायदे
  1. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पाठ के तरीक़े का बयान।
  2. अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के क़ुरआन पाठ के तरीक़े का व्यावहारिक नमूना।
  3. क़ुरआन को ठहर-ठहर कर पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह उसपर चिंतन-मनन करने में अधिक सहायक है।
  4. सलफ़-ए-सालेहीन क़ुरआन तथा अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के अमल से ख़ास दिलचस्पी रखते थे।
  5. तज्वीद और क़ुरआन से संबंधित विज्ञान को जानने का महत्व।
हवाला

مسند أحمد (44/ 70) (26470). الفتح الرباني لترتيب مسند أحمد الشيباني (3/237).

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यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com