इसलाम ने लोगों और विशेष रूप से स्त्रियों के कंधों से जाहिलियत का बोझ उतारा है। जाहिलियत के ज़माने में लोग स्त्री जाति के साथ बुरा बर्ताव तथा उसपर अत्याचार करते थे। इसलाम ने ही उसके अधिकार की रक्षा की। चुनांचे इस हदीस में है कि एक स्त्री अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास यह बताने के लिए आई कि उसकी बेटी के पति का निधन हो गया है और वह उसका सोग मना रही है। सोग मनाने वाली स्त्री को सिंगार से बचना होता है, लेकिन उसकी आँखों में तकलीफ़ है। ऐसे में, क्या वह आँखों में सुरमा लगा सकती है? नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः नहीं! आपने ताकीद के तौर पर इस शब्द को कई बार दोहराया। फिर आपने चार महीना दस दिन की इस अवधि को, जो एक स्त्री अपने पति के सोग में गुज़ारती है, बहुत कम बताते हुए कहा कि क्या वह इस थोड़ी-सी अवधि में सब्र नहीं कर सकती, जिसमें कुछ आसानियाँ भी रखी गई हैं? जाहिलियत के ज़माने में तो स्त्रियों का हाल यह था कि सोग मनाने वाली स्त्री एक छोटे-से घर में प्रवेश कर जाती और सिंगार, ख़ुशबू, पानी तथा लोगों से लोगों से मेल-जोल से दूर रहती और एक साल तक इस हाल में रहने के कारण उसके शरीर पर गंदगियाँ जम जातीं। जब वह एक साल गुज़ार लेती, तो उसके हाथ में एक मेंगनी दी जाती, जिसे वह इस बात के संकेत के तौर फेंक देती कि उसने एक साल तक जिस परेशानी का सामना किया है, वह (उसके पति का अधिकार अदा करने की तुलना में) इस मेंगनी के बराबर भी नहीं है। इसलाम ने इस मशक़्क़त को नेमत और इस तंगी को आसानी में बदल दिया। इसके बावजूद भी क्या वह आँख में सुरमा लगाने से बच नहीं सकती? उसे इसकी अनुमति नहीं है। ताकि यह सोग मनाने वाली स्त्री के लिए सिंगार का चोर दरवाज़ा न साबित हो।
- صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ. - صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ. - الإلمام بشرح عمدة الأحكام للشيخ إسماعيل الأنصاري-مطبعة السعادة-الطبعة الثانية 1392ه. - تيسير العلام شرح عمدة الأحكام-عبد الله البسام-تحقيق محمد صبحي حسن حلاق- مكتبة الصحابة- الشارقة- الطبعة العاشرة- 1426ه. الإعلام بفوائد عمدة الأحكام لابن الملقن المحقق: عبد العزيز بن أحمد بن محمد المشيقح دار العاصمة للنشر والتوزيع، المملكة العربية السعودية الطبعة: الأولى، 1417 هـ - 1997 م.