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तशरीह के साथ हदीसें

क़समें और सन्नतें

23 हदीसें

साद बिन उबादा ने अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-से पूछा कि उनकी माँ ने एक मन्नत मानी थी, परन्तु उसे पूरा करने से पहले ही गुज़र गई। अब उन्हें क्या करना है? आपने फ़रमायाः उसे तुम पूरा कर दो।

عن عَبْدُ الله بْنُ عَبَّاسٍ رضي الله عنه قال: «استَفْتَى سعد بن عُبَادَةَ رسول الله في نَذْرٍ كان على أمِّه، تُوُفِّيَتْ قبل أَنْ تقضيَهُ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : فاقْضِهِ عنها».
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि साद बिन उबादा ने अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि उनकी माँ ने एक मन्नत मानी थी, परन्तु उसे पूरा करने से पहले ही गुज़र गई। अब उन्हें क्या करना है? आपने फ़रमायाः उसे तुम पूरा कर दो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

साद की माता की मृत्यु हुई और वह अपनी नज़र पूरी नहीं कर पाईं, तो उनके बेटे साद ने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - से उनकी ओर से उस नज़र को पूरा करने की अनुमति माँगी, तो आप ने उन्हें अनुमति दे दी, और फ़रमायाः उनकी तरफ़ से अदा कर दो।

हवाला

صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ. الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381هـ. عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه.

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अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मन्नत मानने से मना किया है और कहा है : "मन्नत कोई भलाई नहीं लाती। इसके द्वारा केवल कंजूस का धन निकाला जाता है।

عَنِ ابْنِ عُمَرَ رضي الله عنهما: عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ نَهَى عَنِ النَّذْرِ، وَقَالَ: «إِنَّهُ لَا يَأْتِي بِخَيْرٍ، وَإِنَّمَا يُسْتَخْرَجُ بِهِ مِنَ الْبَخِيلِ».
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है कि : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मन्नत मानने से मना किया है और कहा है : "मन्नत कोई भलाई नहीं लाती। इसके द्वारा केवल कंजूस का धन निकाला जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मन्नत मानने से मना किया है। मन्नत यह है कि इन्सान अपने ऊपर ऐसी कोई चीज़ वाजिब कर ले, जिसे अल्लाह ने उसपर वाजिब न किया हो। आपने आगे फ़रमाया कि मन्नत न किसी चीज़ को आगे करती है, न पीछे। उसके द्वारा तो केवल कंजूस व्यक्ति से, जो बस अनिवार्य कार्य ही पर खर्च करता हो, कुछ भलाई निकाली जाती है। मन्नत कोई ऐसी चीज़ नहीं लाती, जो तक़दीर में न लिखी हो।

फ़ायदे
  1. मन्नत मानना शरीयत सम्मत नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति मन्नत मान ले और उसमें कोई गुनाह न पाया जाए, तो उसे पूरा उसपर करना वाजिब होगा।
  2. मन्नत मानने से मनाही का कारण यह बताया गया है कि मन्नत कोई भलाई नहीं लाती। यानी अल्लाह के किसी निर्णय को बदलती नहीं है। साथ ही यह कि मन्नत मानने वाला यह न समझे कि उसकी मुराद मन्नत के कारण ही पूरी हुई, जबकि अल्लाह इससे निस्पृह है।
  3. क़ुर्तुबी कहते हैं : ऐसा करना उस समय मना है जब कोई व्यक्ति कहे : अगर अल्लाह ने मेरे रोगी को स्वस्थ कर दिया, तो मैं इतना सदक़ा करूँगा। इसके नापसंदीदा होने का कारण यह है कि किसी नेकी के काम को किसी उद्देश्य की पूर्ति के साथ जोड़ना यह दर्शाता है कि नेकी के कार्य का उद्देश्य विशुद्ध रूप से अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति नहीं है। यहाँ मामला मुआवज़े का हो जाता है। मामला और अधिक स्पष्ट इससे हो जाता है कि यदि रोगी स्वस्थ नहीं हुआ, तो सदक़ा भी नहीं किया जाएगा। ज़ाहिर सी बात है कि यह रवैया कंजूस व्यक्ति का हुआ करता है, जो अपना धन उसी समय खर्च करता है, जब उसे उसके बदले में कुछ मिले, जो आम तौर पर खर्च किए हुए धन से अधिक हुआ करता है।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 124) (6608). صحيح مسلم (3/ 1261) (1639). خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص353). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص693).

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जहाँ तक मेरी बात है, तो अल्लाह की क़सम, अगर अल्लाह ने चाहा, तो जब भी मैं किसी बात की क़सम खाऊँगा और दूसरी बात को उससे बेहतर देखूँगा, तो अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा अदा कर दूँगा और वही करूँगा, जो बेहतर हो।

عَنْ أَبِي مُوسَى الأَشْعَرِيِّ رضي الله عنه قَالَ: أَتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فِي رَهْطٍ مِنَ الأَشْعَرِيِّينَ أَسْتَحْمِلُهُ، فَقَالَ: «وَاللَّهِ لاَ أَحْمِلُكُمْ، مَا عِنْدِي مَا أَحْمِلُكُمْ» ثُمَّ لَبِثْنَا مَا شَاءَ اللَّهُ فَأُتِيَ بِإِبِلٍ، فَأَمَرَ لَنَا بِثَلاَثَةِ ذَوْدٍ، فَلَمَّا انْطَلَقْنَا قَالَ بَعْضُنَا لِبَعْضٍ: لاَ يُبَارِكُ اللَّهُ لَنَا، أَتَيْنَا رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَسْتَحْمِلُهُ فَحَلَفَ أَنْ لاَ يَحْمِلَنَا فَحَمَلَنَا، فَقَالَ أَبُو مُوسَى: فَأَتَيْنَا النَّبِيَّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَذَكَرْنَا ذَلِكَ لَهُ، فَقَالَ: «مَا أَنَا حَمَلْتُكُمْ، بَلِ اللَّهُ حَمَلَكُمْ، إِنِّي وَاللَّهِ -إِنْ شَاءَ اللَّهُ- لا أَحْلِفُ عَلَى يَمِينٍ، فَأَرَى غَيْرَهَا خَيْرًا مِنْهَا، إِلَّا كَفَّرْتُ عَنْ يَمِينِي، وَأَتَيْتُ الَّذِي هُوَ خَيْرٌ».
अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैं अल्लाह के रसूल सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास अशअर क़बीले के कुछ लोगों के साथ पहुँचा। मैंने आपसे सवारी माँगी, तो आपने कहा : "अल्लाह की क़सम, मैं तुम्हें सवारी नहीं दे सकता और न मेरे पास कोई सवारी है, जो तुम्हें दे सकूँ।" फिर हम वहाँ जितनी देर अल्लाह ने चाहा, उतनी देर रुके। इसी बीच आपके पास कुछ ऊँट आ गए, तो आपने हमें तीन ऊँट देने का आदेश दिया। जब हम चल पड़े, तो हमारे बीच के कुछ लोगों ने अन्य लोगों से कहा : अल्लाह हमारे लिए बरकत न दे। हमने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आकर सवारी माँगी और आपने क़सम खाकर बताया कि हमें सवारी दे नहीं सकेंगे और फिर दे दी। अबू मूसा कहते हैं : चुनांचे हम अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए और आपके सामने इसका ज़िक्र किया, तो आपने कहा : "सवारी मैंने तुम्हें नहीं दी है। सवारी तो तुम्हें अल्लाह ने दी है। जहाँ तक मेरी बात है, तो अल्लाह की क़सम, अगर अल्लाह ने चाहा, तो जब भी मैं किसी बात की क़सम खाऊँगा और दूसरी बात को उससे बेहतर देखूँगा, तो अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा अदा कर दूँगा और वही करूँगा, जो बेहतर हो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए। उनके साथ उनके क़बीले के कुछ और लोग भी मौजूद थे। उद्देश्य यह था कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उन्हें सवारी के लिए कुछ ऊँट दें, ताकि वे जिहाद में शरीक हो सकें। लेकिन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने क़सम खाकर बता दिया कि आप उन्हें सवारी नहीं दे सकते। आपके पास उन्हें देने के लिए सवारी की व्यवस्था नहीं है। अतः वापस हो गए। कुछ समय रुके। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास तीन ऊँट आए, तो उनकी ओर भेज दिए। यह देख अशअर क़बीले के उन लोगों ने एक-दूसरे से कहा : अल्लाह हमारे लिए इन ऊँटों में बरकत न दे। क्योंकि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हमें सवारी न देने की क़सम खा ली थी। अतः वह आपके पास आए और पूछा, तो आपने कहा : तुम्हें सवारी तो दरअसल अल्लाह ने दी है। क्योंकि प्रबंध उसी ने किया है और सुयोग उसी ने प्रदान किया है। मैं तो बस एक माध्यम हूँ कि यह काम मेरे द्वारा संपन्न हुआ। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आगे फ़रमाया : जहाँ तक मेरी बात है, तो अल्लाह की क़सम, जब भी मैं किसी काम के करने या न करने की क़सम खाऊँगा और बाद में देखूँगा कि मैंने जिस काम के करने या न करने की क़सम खाई थी, उससे बेहतर काम दूसरा है, तो क़सम खाए हुए काम को छोड़कर दूसरा काम, जो बेहतर है, उसे करूँगा और अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा दे दूँगा।

फ़ायदे
  1. किसी सूचना की पुष्टि के लिए, चाहे वह भविष्य काल से जुड़ी हुई ही क्यों न हो, क़सम के मुतालबे के बिना भी क़सम खाना जायज़ है।
  2. क़सम खाने के बाद "अगर अल्लाह ने चाहा" कहकर कुछ चीज़ों को क़सम के दायरे से बाहर रखना जायज़ है। कुछ चीज़ों को अलग करने का यह काम अगर क़सम के साथ ही कर दिया जाए, तो वह चीज़ें क़सम के दायरे के अंदर नहीं आएँगी।
  3. इस बात की प्रेरणा कि जब कोई व्यक्ति किसी चीज़ की क़सम खा ले और उसके बाद दूसरी चीज़ को उससे उत्तम देखे, तो अपनी क़सम तोड़ दे और क़सम का कफ़्फ़ारा अदा करे।
हवाला

صحيح البخاري (8/ 146) (6718). صحيح مسلم (3/ 1268) (1649). خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام، لفيصل آل مبارك (ص345). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص682).

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सुलैमान बिन दाऊद (अलैहिमस्सलाम) ने फ़रमायाः आज रात मैं सत्तर स्त्रियों के पास जाऊँगा, उनमें से हर स्त्री से एक-एक लड़का होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा

عن أبي هُريرة رضي الله عنه عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال: "قال سليمان بن داود -عليهما السلام-: لَأَطُوفنَّ الليلةَ على سَبْعينَ امرأةً، تَلِدُ كلُّ امرأةٍ منهن غُلامًا يقاتلُ في سبيلِ الله، فقِيل له: قل: إن شاءَ الله، فلم يَقُلْ، فطافَ بهنَّ، فلم تَلِدْ منهن إلا امرأةٌ واحدةٌ نصفَ إنسانٍ". قال: فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم : "لو قالَ: إن شاء الله لم يَحْنَثْ، وكان دَرَكًا لحاجتهِ".
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: सुलैमान बिन दाऊद (अलैहिमस्सलाम) ने फ़रमायाः आज रात मैं सत्तर स्त्रियों के पास जाऊँगा, उनमें से हर स्त्री से एक-एक लड़का होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा। उनसे कहा गया कि 'इन शा अल्लाह' बोलिए, लेकिन वे नहीं बोले। अतः, सब पत्नियों के पास गए तो सही, परंतु एक के सिवा किसी ने संतान नहीं दिया, एक ने दिया भी तो अधूरा। वर्णनकर्ता का कहना है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः यदि उन्होंने 'इन शा अल्लाह' कहा होता, तो उनकी क़सम न टूटती और उनकी ज़रुरत भी पूरी हो जाती।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सुलैमान -अलैहिस्सलाम- ने अपने साथ बैठे एक आदमी से फ़रमाया कि वह एक ही रात में अपनी सत्तर पत्नियों से सहवास करेंगे। याद रहे कि इतनी संख्या में शादी या तो उनकी शरियत में जायज़ थी या फिर यह उनकी विशेषता थी। नीयत यह थी कि सारी पत्नियों से एक-एक बच्चा होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा। यह सुन उनके साथ बैठे आदमी ने कहा कि इन शा अल्लाह कह लें। लेकिन वह इन शा अल्लाह कहना भूल गए और सारी पत्नियों से सहवास किया। लेकिन केवल एक पत्नी के सिवा किसी ने बच्चे का जन्म नहीं दिया। उसने भी जन्म दिया तो एक अधूरे बच्चे को। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि यदि सुलैमान -अलैहिस्सलाम- ने इन शा अल्लाह कह दिया होता, तो उनकी क़सम भी नहीं टूटती और उनकी चाहत भी पूरी हो जाती।

हवाला

-صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. -صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ. -عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ. -تأسيس الأحكام، للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه. -تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. -الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري، ط. دار الفكر بدمشق، الطبعة الأولى 1381هـ.

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अपने पास कुछ माल जमा रखो, यह तुम्हारे हित में बेहतर है

عن كَعْب بن مالك رضي الله عنه قال: قلتُ: يا رسولَ الله، إن مِن تَوبتي أن أَنْخَلِعَ مِنْ مالي؛ صدقةً إلى الله وإلى رسولِه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم : "أمسِكْ عليك بعضَ مالِكَ؛ فهو خيرٌ لكَ".
काब बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपनी तौबा क़बूल होने की खुशी में अपना सारा धन अल्लाह और उसके रसूल की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदक़ा करता हूँ। उनकी बात सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपना कुछ माल रखे रहो, यह तुम्हारे लिए बेहतर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

काब बिन मालिक -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- उन तीन सहाबा में से एक हैं, जो बिना किसी उचित कारण और बिना निफ़ाक़ के तबूक युद्ध से पीछे रह गए थे। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- युद्ध से वापस आए, तो उनका बहिष्कार किया तथा लोगों को भी उनके बहिष्कार का आदेश दिया। इस तरह, वे अलग-थलग पड़े रहे, यहाँ तक कि उनकी क्षमा से संबंधित आयत अवतरित हुई और अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया। फिर, रसूल और सहाबा भी उनसे संतुष्ट हो गए। चुनांचे काब -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के प्रसन्न होने और उनकी तौबा स्वीकार होने से इतना उत्साहित हुए कि अपना सारा धन अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए सदक़ा कर देने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी रहनुमाई करते हुए फ़रमाया कि कुछ धन अपने पास रख लो। क्योंकि अल्लाह ने उनकी सच्ची नीयत एवं पूरी निष्ठा के साथ क्षमा याचना के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था और अब इसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। साथ ही अल्लाह किसी पर उसकी ताक़त से अधिक बोझ भी नहीं डालता। इसके बाद उन्होंने अपना कुछ धन अल्लाह की प्रसन्नता से संतुष्ट होकर और आख़िरत के लिए जमा रखने के इरादे से खर्च कर दिया और कुछ अपने पास रखा, ताकि अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा दयालु है।

हवाला

-صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه. -صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، 1423هـ. -عمدة الأحكام من كلام خير الأنام صلى الله عليه وسلم لعبد الغني المقدسي، دراسة وتحقيق: محمود الأرناؤوط، مراجعة وتقديم: عبد القادر الأرناؤوط، ط2، دار الثقافة العربية، دمشق ، بيروت، مؤسسة قرطبة، 1408هـ. -تأسيس الأحكام للنجمي، ط2، دار علماء السلف، 1414ه. -تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426هـ. -الإلمام بشرح عمدة الأحكام, إسماعيل الأنصاري, الطبعة الثانية 1392هـ. -الشرح الممتع على زاد المستقنع، محمد بن صالح بن محمد العثيمين، دار ابن الجوزي، الطبعة: الأولى، 1422- 1428هـ.

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जिसने किसी मुसलमान का माल हड़पने के लिए झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि अल्लाह उससे सख़्त क्रोधित होगा।

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «مَنْ حَلَفَ عَلَى يَمِينٍ وَهُوَ فِيهَا فَاجِرٌ لِيَقْتَطِعَ بِهَا مَالَ امْرِئٍ مُسْلِمٍ، لَقِيَ اللَّهَ وَهُوَ عَلَيْهِ غَضْبَانُ». قَالَ: فَقَالَ الْأَشْعَثُ: فِيَّ وَاللَّهِ كَانَ ذَلِكَ؛ كَانَ بَيْنِي وَبَيْنَ رَجُلٍ مِنَ الْيَهُودِ أَرْضٌ، فَجَحَدَنِي، فَقَدَّمْتُهُ إِلَى النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ فَقَالَ لِي رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «أَلَكَ بَيِّنَةٌ؟» قُلْتُ: لَا. قَالَ: فَقَالَ لِلْيَهُودِيِّ: «احْلِفْ». قَالَ: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِذَنْ يَحْلِفَ وَيَذْهَبَ بِمَالِي. فَأَنْزَلَ اللَّهُ تَعَالَى: {إِنَّ الَّذِينَ يَشْتَرُونَ بِعَهْدِ اللَّهِ وَأَيْمَانِهِمْ ثَمَنًا قَلِيلًا}. إِلَى آخِرِ الْآيَةِ.
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिसने किसी मुसलमान का माल हड़पने के लिए झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि अल्लाह उससे सख़्त क्रोधित होगा।" वर्णनकर्ता कहते हैं कि अशअस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने फ़रमाया : यह बात दरअसल मेरे ही बारे में कही गई थी। हुआ यह कि मेरे एवं एक यहूदी के बीच एक ज़मीन को लेकर झगड़ा था। उसने मुझे ज़मीन देने से इनकार कर दिया, तो मैं मामले को अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास लेकर गया। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझसे पूछा : "क्या तेरे पास कोई प्रमाण है?" मैंने उत्तर दिया : नहीं। आपने यहूदी से कहा : "तुम क़सम खाओ।" वह कहते हैं कि मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! ऐसा है तो यह क़सम खा लेगा और मेरा धन लेकर चला जाएगा। तो अल्लाह ने यह आयत उतारी : (निःसंदेह जो लोग अल्लाह के वचन तथा अपनी क़समों के बदले तनिक मूल्य प्राप्त करते हैं।) आयत के अन्त तक।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने किसी का धन हड़पने के लिए जान-बूझकर झूठी क़सम खाने से सावधान किया है और बताया है कि ऐसा व्यक्ति जब अल्लाह से मिलेगा, तो अल्लाह उससे सख़्त क्रोधित होगा। अशअस बिन क़ैस रज़ियल्लाहु अनहु ने इस हदीस का परिप्रेक्ष्य बयान करते हुए बताया कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने यह बात इसलिए फ़रमाई कि उनके और एक यहूदी के बीच एक ज़मीन के मालिकाना अधिकार को लेकर झगड़ा था। दोनों निर्णय के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास पहुँचे, तो आपने अशअस से कहा : तुम अपने दावा के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करो। अगर तुम प्रमाण नहीं दे सके, तो तुम्हारा विरोधी क़सम खाकर बरी हो जाएगा। यह सुन अशअस ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! अगर ऐसा है, तो यहूदी अल्लाह का ख़ौफ़ खाए बिना क़सम खा लेगा और मेरा धन लेकर निकल जाएगा। चुनांचे इसी की पुष्टि के लिए अल्लाह ने यह आयत उतारी : निःसंदेह जो लोग अल्लाह के वचन (तथा अमानत की अदायगी से संबंधित ईमान वालों को दिए गए उसके आदेश) तथा (अल्लाह के नाम की) अपनी (झूठी) क़समों के बदले तनिक मूल्य प्राप्त करते हैं, उनका आख़िरत में कोई हिस्सा नहीं। न अल्लाह उनसे बात करेगा और न क़यामत के दिन (दया तथा उपकार की दृष्टि से) उनकी ओर देखेगा और न उनकी प्रशंसा करके उनके साफ़-सुथरे होने की घोषणा करेगा और न उन्हें (गुनाहों तथा गंदगियों से) पवित्र करेगा। तथा (उनके कर्मों के कारण) उनके लिए दुःखदायी यातना है।

फ़ायदे
  1. ग़लत तरीक़े से दूसरे का धन अपने लिए हलाल कर लेने की मनाही।
  2. मुसलमानों का हक़ मारना बहुत बड़ा पाप है। हक़ छोटा हो या बड़ा।
  3. प्रमाण मुद्दई को प्रस्तुत करना है। अगर वह इनकार कर दे, तो जिसके विरुद्ध दावा किया गया है, उसे क़सम खानी है।
  4. हक़ दो गवाहों से साबित होता है। अगर मुद्दई के पास प्रमाण न हो, तो जिसके विरुद्ध दावा किय गया है, उसे क़सम खानी होगी।
  5. किसी का हक़ छीनने के लिए झूठी क़सम खाना हराम तथा कबीरा गुनाह है, जिससे इन्सान अल्लाह के क्रोध तथा दंड का हक़दार बन जाता है।
  6. शासक को दूसरे फ़रीक़ को समझाना चाहिए, ख़ास तौर पर जब वह क़सम खाने जा रहा हो।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 121) (2416). صحيح مسلم (1/ 123) (138). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (2/ 136). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام (ص687). فتاوى اللجنة الدائمة - اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء (23/ 513).

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जिसने किसी बात पर जान-बूझकर इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की झूठी क़सम खाई, तो वह वैसा ही होगा, जैसा उसने कहा

عن ثابِت بْن الضَّحَاكِ رضي الله عنه أنه بايع رسول الله صلى الله عليه وسلم تحت الشجرة، وأن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: «من حلف على يمين بملة غير الإسلام، كاذبا مُتَعَمِّدًا فهو كما قال، ومن قتل نفسه بشيء عُذِّبَ به يوم القيامة، وليس على رجل نَذْرٌ فيما لا يملك» وَفِي رِوَايَة: «ولَعْنُ المؤمنِ كَقَتْلِهِ». وفي رواية: «من ادَّعَى دَعْوَى كَاذِبَةً لِيَتَكَثَّرَ بها لم يَزِدْهُ اللهُ -عزَّ وجل- إلا قِلَّةً».
साबित बिन ज़ह्हाक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि उन्होंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पेड़ के नीचे बैअत की थी और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा थाः जिसने किसी बात पर जान-बूझकर इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की झूठी क़सम खाई, तो वह वैसा ही होगा, जैसा उसने कहा। और जिसने किसी वस्तु से अपनी हत्या कर ली, उसे क़यामत के दिन उसी के द्वारा यातना दी जाएगी। तथा किसी व्यक्ति के लिए ऐसी मन्नत को पूरा करना आवश्यक नहीं है, जिसका वह मालिक नहीं है। तथा एक रिवायत में हैः मोमिन पर लानत करना उसकी हत्या समान है। एक अन्य रिवायत में हैः जिसने धन बढ़ाने के लिए झूठा दावा किया, अल्लाह उसकी तंगी को और बढ़ा देता है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

साबित बिन ज़ह्हाक अंसारी -रज़ियल्लाहु अनहु- (जो हुदैबिया के दिन पेड़ के नीचे बैअत करने वालों में शामिल थे) अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से वर्णन करते हैं कि आपने कई बातें कहीं हैं, जिनमें एक यह है कि जो इस्लाम के सिवा किसी दूसरे धर्म की क़सम खाए, जैसे जान-बूझकर झूठी क़सम खाते हुए कहे कि अगर ऐसा और ऐसा है, तो वह यहूदी, ईसाई, मजूसी, काफ़िर अथवा अल्लाह तथा उसके रसूल से बरी है, तो वह सचमुच उन काफ़िर धर्मों में से किसी एक का मानने वाला ठहरेगा, जिनकी ओर अपनी निसबत की है। इसी तरह जो तलवार, छुरी, गोली अथवा किसी अन्य हथियार से आत्महत्या करेगा, उसे क़यामत के दिन उसी के द्वारा यातना दी जाएगी। जो ऐसी वस्तु की मन्नत माने, जिसका वह मालिक नहीं है, जैसे किसी और के दास को मुक्त करने की मन्नत माने अथवा किसी दूसरे के धन से सदक़ा करने की मन्नत माने, उसकी मन्नत सही नहीं होगी, इसलिए कि उसका मन्नत मानना ही उचित नहीं था। जो किसी मोमिन पर लानत करता है, मानो वह उसकी हत्या करता है। इसलिए कि लानत करने वाला और हत्या करने वाला दोनों अल्लाह की पवित्रता को पामाल करने वाले तथा पापी और यातना के हक़दार हैं। जो झूठे दावे करता है, जैसे धन, ज्ञान, वंश अथवा मनसब का झूठा दावा करके अभिमान करता है, अल्लाह उसे रुसवा तथा अपमानित करेगा। इसलिए कि उसने स्वयं को ऐसी वस्तु द्वारा ऊँचा करना चाहा, जो उसके पास नहीं है, इसलिए उसका बदला भी उसी के अनुसार होगा।

हवाला

1- صحيح البخاري، دار طوق النجاة ط 1422هـ. 2- صحيح مسلم، ط دار إحياء التراث العربي، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي. 3- الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري.ط دار الفكر، بدمشق، الطبعة الأولى 1381هـ. 4- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، للبسام، تحقيق: محمد صبحي بن حسن حلاق، نشر: الناشر: مكتبة الصحابة، الأمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة، 1426 هـ - 2006 م. 5- تأسيس الأحكام للنجمي، ط دار المنهاج، 1427هـ.

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जिसने किसी मुसलमान व्यक्ति का माल हड़पने के लिए अकाट्य एवं झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि वह उससे सख़्त क्रोधित होगा

عن عبد الله بن مسعودٍ رضي الله عنه مرفوعًا: (من حلف على يَمِينِ صَبْرٍ يَقْتَطِعُ بها مال امرئ مسلم، هو فيها فاجر، لقي الله وهو عليه غضبان)، ونزلت: (إن الذين يشترون بعهد الله وأيمانهم ثمنا قليلا) إلى آخر الآية".
अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ियल्लाहु अनहु) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से मरफ़ूअन वर्णन करते हैं कि जिसने किसी मुसलमान व्यक्ति का माल हड़पने के लिए अकाट्य एवं झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि वह उससे सख़्त क्रोधित होगा। इसी के बारे में यह आयत उतरीः "إن الذين يشترون بعهد الله وأيمانهم ثمنا قليلا" (अर्थात्ः जो लोग अल्लाह के वचन और अपनी क़समों के बदले में तनिक मूल्य खरीदते हैं) से आख़िर तक।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

इस हदीस में उन लोगों को बड़ी सख़्त धमकी दी गई है, जो ग़लत तरीक़े से लड़-झगड़कर और झूठी क़समें खाकर किसी का धन हड़प लेते हैं। ऐसा व्यक्ति अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि वह उससे नाराज़ होगा।और जिससे अल्लाह नाराज़ हो गया, उसका विनाश तय है। फिर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस सख़्त धमकी की पुष्टि के लिए क़ुरआन एक आयत पढ़कर सुनाई।

हवाला

- صحيح البخاري، محمد بن إسماعيل البخاري الجعفي، تحقيق: محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى 1422هـ. - صحيح مسلم، مسلم بن الحجاج القشيري النيسابوري، تحقيق محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت، الطبعة: 1423هـ. - الإلمام بشرح عمدة الأحكام، إسماعيل بن محمد الأنصاري، دار الفكر، دمشق، الطبعة: الأولى 1381هـ. - تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله بن عبد الرحمن البسام، تحقيق: محمد صبحي حلاق، مكتبة الصحابة، الأمارات، مكتبة التابعين، القاهرة، الطبعة: العاشرة 1426هـ. - تأسيس الأحكام، أحمد بن يحيى النجمي، دار المنهاج، القاهرة، الطبعة: الأولى 1427هـ.

यह हदीस HadeethEnc.com पर
18 में से 8
18 हदीसें
  1. साद बिन उबादा ने अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम-से पूछा कि उनकी माँ ने एक मन्नत मानी थी, परन्तु उसे पूरा करने से पहले ही गुज़र गई। अब उन्हें क्या करना है? आपने फ़रमायाः उसे तुम पूरा कर दो।
  2. अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मन्नत मानने से मना किया है और कहा है : "मन्नत कोई भलाई नहीं लाती। इसके द्वारा केवल कंजूस का धन निकाला जाता है।
  3. जहाँ तक मेरी बात है, तो अल्लाह की क़सम, अगर अल्लाह ने चाहा, तो जब भी मैं किसी बात की क़सम खाऊँगा और दूसरी बात को उससे बेहतर देखूँगा, तो अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा अदा कर दूँगा और वही करूँगा, जो बेहतर हो।
  4. सुलैमान बिन दाऊद (अलैहिमस्सलाम) ने फ़रमायाः आज रात मैं सत्तर स्त्रियों के पास जाऊँगा, उनमें से हर स्त्री से एक-एक लड़का होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा
  5. अपने पास कुछ माल जमा रखो, यह तुम्हारे हित में बेहतर है
  6. जिसने किसी मुसलमान का माल हड़पने के लिए झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस हाल में मिलेगा कि अल्लाह उससे सख़्त क्रोधित होगा।
  7. जिसने किसी बात पर जान-बूझकर इस्लाम के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की झूठी क़सम खाई, तो वह वैसा ही होगा, जैसा उसने कहा
  8. जिसने किसी मुसलमान व्यक्ति का माल हड़पने के लिए अकाट्य एवं झूठी क़सम खाई, वह अल्लाह से इस अवस्था में मिलेगा कि वह उससे सख़्त क्रोधित होगा
  9. मेरी बहन ने यह मन्नत मानी कि वह नंगे पाँव पैदल अल्लाह के पवित्र घर की यात्रा करेगी। फिर मुझसे कहा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछकर आऊँ। मैंने आपसे पूछा तो फ़रमायाः वह चले भी और सवार भी हो।
  10. ऐ अब्दुर्रहमान बिन समुरा! सत्ता न माँगो, क्योंकि यदि माँगने पर सत्ता दिए गए, तो तुम उसी के हवाले कर दिए जाओगे
  11. जो किसी बात पर क़सम खा ले, फिर उससे अधिक परहेज़गारी वाली बात देखे, तो परहेज़गारी वाला कार्य करे।
  12. वयस्क हो जाने के बाद आदमी अनाथ नहीं रहता और रात होने तक दिन भर ख़ामोश रहने का कोई औचित्य नहीं है।
  13. अबू बकर सिद्दीक़ -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- अहमस समुदाय की ज़ैनब नामी एक महिला के पास गए, तो देखा कि वह बात नहीं कर रही है।
  14. आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) का अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से बात न करने तथा मन्नत मानने का क़िस्सा
  15. जिसने क़सम खाते हुए कहा: बेशक मैं इस्लाम से बरी हूँ, और वह झूठा है, तो वह वैसा ही है, जैसा कि उसने कहा है और यदि वह सच्चा है, तो इस्लाम में सुरक्षित नहीं लौट सकेगा
  16. ईसा बिन मरयम -अलैहिस्सलाम- ने एक व्यक्ति को चोरी करते देखा, तो उससे कहाः क्या तूने चोरी की है? उसने कहाः बिलकुल नहीं, उस अल्लाह की क़सम, जिसके सिवा कोई वंदनीय नहीं है। इस पर ईसा -अलैहिस्सलाम- ने कहाः मैं अल्लाह पर ईमान लाया और अपनी आँख को झुठलाया।
  17. यह आयत {لا يؤاخذكم الله باللغو في أيمانكم} (अल्लाह तुम्हारी निरर्थक क़समों पर तुम्हारी पकड़ नहीं करेगा।) [सूरा बक़रा : 225] लोगों की इस तरह की बातों के बारे में उतरी है : नहीं अल्लाह की क़सम तथा क्यों नहीं अल्लाह की क़सम।
  18. “मन्नत का कफ़्फ़ारा, क़सम का कफ़्फ़ारा ही है।”

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com