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तशरीह के साथ हदीसें

वसीयत

4 हदीसें

किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं है कि उसके पास कोई वस्तु हो, जिसकी वह वसीयत करना चाहता हो और वह वसीयतनामा लिखे बिना दो रात भी गुज़ारे।

عَنْ ابْنِ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنهُما أَنَّهُ سَمِعَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «مَا حَقُّ امْرِئٍ مُسْلِمٍ لَهُ شَيْءٌ يُوصِي فِيهِ، يَبِيتُ ثَلَاثَ لَيَالٍ، إِلَّا وَوَصِيَّتُهُ عِنْدَهُ مَكْتُوبَةٌ»، قَالَ عَبْدُ اللهِ بْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما: «مَا مَرَّتْ عَلَيَّ لَيْلَةٌ مُنْذُ سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ ذَلِكَ إِلَّا وَعِنْدِي وَصِيَّتِي».
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "किसी मुसलमान के लिए उचित नहीं है कि उसके पास कोई वस्तु हो, जिसकी वह वसीयत करना चाहता हो और वह वसीयतनामा लिखे बिना दो रात भी गुज़ारे।" अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- फ़रमाते हैं : "जबसे मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को यह फ़रमाते हुए सना है, मेरी कोई रात्रि वसीयतनामा लिखे बिना नहीं गुज़री।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिस मुसलमान के पास वसीयत करने लायक़ कोई धन या अधिकार आदि हो, चाहे मामूली ही क्यों न हो, उसकी तीन रातें इस अवस्था में नहीं गुज़रनी चाहिएँ कि उसके पास वसीयत लिखी हुई न हो। अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा कहते हैं : जबसे मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह हदीस सुनी है, तबसे मेरी एक रात भी ऐसी नहीं गुज़री कि वसीयत मेरे पास लिखी हुई न हो।

फ़ायदे
  1. इन्सान को वसीयत करनी चाहिए और इसमें देर नहीं करनी चाहिए, इससे पहले कि कोई बाधा उसे इस कार्य से रोक दे। ताकि सब को पता रहे कि उसपर किसका क्या अधिकार है, शरई आदेश का अनुपालन हो जाए, मौत की तैयारी रहे और इन्सान वसीयत तथा वसीयत के स्थानों अवगत रहे।
  2. वसीयत का अर्थ है वचन। यानी वह वचन, जिसके तहत कोई व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद किसी को अपनी कुछ संपत्ति का प्रबंधन करने, अपने छोटे बच्चों की देख-भाल करने या अपनी मृत्यु के बाद अपने स्वामित्व वाले किसी भी कार्य का प्रबंधन करने का ज़िम्मा सौंपता है।
  3. वसीयत के तीन प्रकार हैं : 1- मुसतहब वसीयत। यानी इस बात की वसीयत करना कि उसके धन का कुछ भाग नेकी तथा परोपकार के कार्यों में ख़र्च किया जाए, ताकि मौत के बाद उसे सवाब मिलता रहे। 2- वाजिब वसीयत। यानी अपने ऊपर अनिवार्य अधिकारों के बारे में वसीयत करना। अधिकार चाहे अल्लाह के हों, जैसे ज़कात जो अदा नहीं की गई या कफ़्फ़ारा जो दिया नहीं गया, या फिर इन्सान के हों, जैसे क़र्ज़ तथा अमानतों की अदायगी। 3- हराम वसीयत। जब इन्सान अपने एक तिहाई से अधिक धन के बारे में वसीयत कर दे और किसी वारिस के हक़ में वसीयत कर दे, तो इस प्रकार की वसीयत करना हराम है।
  4. अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा की फ़ज़ीलत तथा बिना देर किए नेकी का काम एवं शरई आदेश के अनुपालन का उनका जज़्बा।
  5. इब्न-ए-दक़ीक अल-ईद कहते हैं : दो या तीन दिनों की छूट दरअसल दिक़्क़त एवं परेशानी से बचाने के लिए दी गई है।
  6. महत्वपूर्ण बातों को लिखकर रखना चाहिए, क्योंकि इससे अधिकारों के नष्ट होने की संभावना कम हो जाती है।
हवाला

صحيح البخاري (4/ 2) (2738). صحيح مسلم (3/ 1250) (1627). الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (2/ 48). تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص548).

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यदि तुम पीछे रहकर भी अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारे दर्जे ऊँचे होंगे। यह भी संभव है कि तुम अभी जीवित रहो और बहुत-से लोगों को तुमसे लाभ हो और बहुत-से लोगों को हानि।

عن سعد بن أبي وقاص رضي الله عنه قال: جاءني رسول الله صلى الله عليه وسلم يَعُودُنِي عام حَجَّةِ الوداع من وَجَعٍ اشْتَدَّ بي، فقلت: يا رسول الله، قد بلغ بي من الوَجَعِ ما ترى، وأنا ذو مال، ولا يَرِثُنِي إلا ابنةٌ أَفَأَتَصَدَّقُ بثلثي مالي؟ قال: لا، قلت: فالشَّطْرُ يا رسول الله؟ قال: لا، قلت: فالثلث؟ قال: الثلث، والثلث كثير، إنك إن تَذَرَ وَرَثَتَكَ أغنياء خيرٌ من أن تَذَرَهُم عالَةً يَتَكَفَّفُونَ الناس، وإنك لن تنفق نفقة تبتغي بها وجه الله إلا أُجِرْتَ بها، حتى ما تجعل في فِيْ امرأتك. قال: قلت: يا رسول الله أُخَلَّفُ بعد أصحابي؟ قال: إنك لن تُخَلَّفُ فتعمل عملا تبتغي به وجه الله إلا ازْدَدْتَ به درجة ورِفْعَةً، ولعلك أن تُخَلَّفَ حتى ينتفع بك أقوام، ويُضَرُّ بك آخرون. اللهم أَمْضِ لأصحابي هجرتهم، ولا تَرُدَّهُم على أَعْقَابِهِم، لكنِ البَائِسُ سعد بن خَوْلَةَ (يَرْثِي له رسول الله صلى الله عليه وسلم أن مات بمكة).
साद बिन अबी वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हज्जतुल-वदा के अवसर पर मुझे देखने आए, जब मैं बहुत ज़्यादा बीमार था। मैंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, आप तो देख ही रहे हैं कि मेरी बीमारी कितनी बढ़ चुकी है। मैं एक धनी व्यक्ति हुँ और मेरा उत्तराधिकारी केवल एक बेटी है। ऐसे में क्या मैं अपने दो तिहाई धन दान कर दुँ? आपने फ़रमाया : नहीं। मैं ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, तो क्या आधे की अनुमति है? फ़रमाया : नहीं। मैंने कहा : तो फिर एक तिहाई की? फ़रमाया : हाँ, एक तिहाई कर सकते हो, लेकिन एक तिहाई भी बहुत है। देखो, यदि तुम अपने उत्तराधिकारियों को धनी छोड़ जाते हो, तो यह इस बात से अच्छा है कि तुम उन्हें निर्धन छोड़ जाओ और वे लोगों के सामने हाथ फैलाते फिरें। याद रखो, तुम जो कुछ भी अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए खर्च करोगे, तुम्हें उसकी नेकी मिलेगी। यहाँ तक कि जो निवाला तुम अपनी पत्नी के मुहँ में डालोगे, उसका भी। उनका कहना है कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, क्या मैं पीछे रह जाऊँगा और मेरे साथी मदीना चले जाएँगे? फ़रमायाः यदि तुम पीछे रहकर भी अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अच्छे कर्म करोगे, तो तुम्हारे दर्जे ऊँचे होंगे। यह भी संभव है कि तुम अभी जीवित रहो और बहुत-से लोगों को तुमसे लाभ हो और बहुत-से लोगों को हानि। ऐ अल्लाह , मेरे साथियों की हिजरत को बाक़ी रखना और उन्हें उलटे पावँ वापस न करना। लेकिन बेचारा साद बिन ख़ौला! दअसल अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इस बात पर शोक व्यक्त कर रहे थे कि उनकी मृत्यु मक्का में हो गई।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह

साद बिन अबू वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अनहु- हज्जतुल वदा के अवसर पर इतना ज़्यादा बीमार हो गए कि उन्हें लगा कि कहीं मौत न आ जाए। चूँकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की आदत थी कि आप अपने साथियों का हालचाल जानने तथा दुःख बाँटने जाया करते थे, इसलिए उनका भी हाल जानने पहुँचे। ऐसे में, साद -रज़ियल्लाहु अनहु- ने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के सामने कई ऐसे कारण रखे, जिनके आधार पर उनके ख़याल से उनके अधिकतर धन को दान कर देने की अनुमति मिल सकती थी। उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी बीमारी इतनी बढ़ चुकी है कि मुझे उसके कारण मौत का डर सताने लगा है। मैं एक धनी व्यक्ति हूँ। मेरे कमज़ोर उत्तराधिकारी भी नहीं हैं कि मुझे उनकी निर्धनता एवं नष्ट हो जाने का डर हो। उत्तराधिकारी के नाम पर बस एक बेटी है। ऐसे में, क्या मैं आख़िरत के लिए अपना दो तिहाई धन दान कर सकता हूँ? नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : नहीं। उन्होंने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल, तो क्या आधा कर सकता हूँ? फ़रमाया : नहीं। पूछा : तो फिर एक तिहाई? फ़रमाया : हाँ, दो तिहाई दान किया जा सकता है, लेकिन यह भी बहुत है। इसलिए उससे कम यानी एक चौथाई या पाँचवाँ भाग सदक़ा करना ही उत्तम है। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें अधिकतर धन सदक़ा करने के बजाय कम सदक़ा करने की हिकमत दो तरह से समझाई : 1- अगर वह मर गए और अपने उत्तराधिकारियों को मालदार अपने धन से लाभ उठाने की अवस्था में छोड़ गए, तो यह इससे कहीं बेहतर है कि अपना धन दूसरों के हवाले करके दुनिया से जाएँ और उनके बच्चे दूसरों के एहसान पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर हों। 2- अगर वह जीवित रह गए और उनका धन बचा रहा, तो उसे शरई तरीक़ों पर ख़र्च करके नेकी कमा सकते हैं। यहाँ तक कि यदि अपनी पत्नी पर खर्च करेंगे, जो कि उनका कर्तव्य भी है, तो उसका भी उनको सवाब मिलेगा। फिर साद बिन अबू वक़्क़ास -रज़ियल्लाहु अनहु- के मन में इस बात का भय पैदा हुआ कि कहीं वह मक्का ही में न मर जाएँ, जहाँ से वह हिजरत करके चले गए थे और जिसे अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए छोड़ गए थे तथा इससे उनके हिजरत के सवाब में कोई कमी न आ जाए। अतः, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें बताया कि यदि उन्हें न चाहते हुए भी मक्का में रहना पड़ता है, जहाँ से वह हिजरत करके चले गए थे, फिर यहाँ अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए कोई काम करते हैं, तो इससे उनका दर्जा और ऊँचा होगा। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें एक सुसमाचार सुनाया, जो इस बात का प्रमाण था कि वह स्वस्थ हो जाएँगे और अल्लाह उनके ज़रिए ईमान वालों को फ़ायदा पहुँचाएगा और काफ़िरों का हानि। बाद में हुआ भी यही। वह स्वस्थ हो गए और फ़ारसियों से लड़े जाने वाले युद्ध के सर्वोच्च कमांडर बने। अल्लाह ने उनसे इस्लाम तथा मुसलमानों को बड़ा फ़ायदा पहुँचाया कि उन्होंने कई विजय प्राप्त किए और शिर्क तथा मुश्रिकों को ज़बरदस्त हानि पहुँचाई। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने तमाम साथियों के लिए दुआ की कि अल्लाह उनको उनका उचित स्थान प्रदान करे, उनकी हिजरत को ग्रहण करे और उन्हें उनके धर्म से वापस न लौटाए या फिर उनको उन स्थानों की ओर वापस न करे, जहाँ से वे हिजरत करके आए हैं। चुनांचे अल्लाह ने आपकी इस दुआ को ग्रहण कर लिया। सारी प्रशंसा और उपकार अल्लाह है, जिसने सहाबा के माध्यम से इस्लमा को शक्तिशाली बनाया। फिर आपने साद बिन ख़ौला का ज़िक्र किया, जो मक्का से मदीना की ओर हिजरत करने वालों में शामिल थे, लेकिन अल्लाह का निर्णय यह हुआ कि वह मक्का में आकर मर जाएँ। आपने उनके मक्का में आकर मरने पर दुःख तथा खेद प्रकट किया। आम तौर पर सहाबा इस बात को नापसंद करते थे कि कोई उसी स्थान को जाकर मरे, जहाँ से उसने हिजरत की थी।

हवाला

الإلمام بشرح عمدة الأحكام، للشيخ إسماعيل الأنصاري -مطبعة السعادة- الطبعة الثانية 1392هـ. تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله البسام، تحقيق محمد صبحي حسن حلاق -مكتبة الصحابة- الشارقة- الطبعة العاشرة- 1426هـ. صحيح البخاري، نشر: دار طوق النجاة، (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم محمد فؤاد عبد الباقي)، الطبعة: الأولى، 1422هـ. صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. المعجم الوسيط، نشر: دار إحياء التراث العربي، بيروت – لبنان، الطبعة: الثانية.

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बेशक अल्लाह ने हर हक़ वाले को उसका हक़ दे दिया है और वारिस के लिए कोई वसीयत नहीं है। बिस्तर वाले के लिए बच्चा है और व्यभिचारी के लिए पत्थर है। जो पिता को छोड़कर दूसरे से अपने को मंसूब करता है अथवा मुक्त करने वाले को छोड़कर दूसरे की ओर निस्बत करता है, उसपर अल्लाह की लानत है। अल्लाह उसकी न फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत।

عن عمرو بن خارجة رضي الله عنه : أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب على ناقته وأنا تحت جِرَانِها وهي تَقْصَع بِجِرَّتِها، وإن لُعابها يَسِيل بين كتفيَّ فسمعتُه يقول: «إن الله أعطى كلِّ ذي حقٍّ حقَّه، ولا وصيَّةَ لِوارث، والولَد لِلْفِراش، وللعاهِرِ الحَجَر، ومن ادَّعى إلى غير أبِيهِ أو انْتمى إلى غير مَوَاليه رغبةً عنهم فعَلِيه لعنةُ الله، لا يَقْبَلُ الله منه صَرْفا ولا عَدْلا».
अम्र बिन खारिजा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपनी ऊँटनी पर सवार होकर ख़ुतबा दिया। उस समय मैं उसकी गरदन के नीचे खड़ा था, वह जुगाली कर रही थी तथा उसकी लार मेरे कंधों के बीच गिर रही थी। मैंने आपको फ़रमाते हुए सुना : “बेशक अल्लाह ने हर हक़ वाले को उसका हक़ दे दिया है और वारिस के लिए कोई वसीयत नहीं है। बिस्तर वाले के लिए बच्चा है और व्यभिचारी के लिए पत्थर है। जो पिता को छोड़कर दूसरे से अपने को मंसूब करता है अथवा मुक्त करने वाले को छोड़कर दूसरे की ओर निस्बत करता है, उसपर अल्लाह की लानत है। अल्लाह उसकी न फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

سنن الترمذي، تأليف: محمد بن عيسى الترمذي، تحقيق أحمد شاكر وغيره، الناشر: شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي، الطبعة: الثانية، 1395 هـ سنن ابن ماجه, ابن ماجة أبو عبد الله محمد بن يزيد القزويني، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي, الناشر: دار إحياء الكتب العربية - فيصل عيسى البابي الحلبي. مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. صحيح الجامع الصغير وزياداته, محمد ناصر الدين الأشقودري الألباني, الناشر: المكتب الإسلامي, , ط 3, 1408 هـ. الصحاح تاج اللغة وصحاح العربية, أبو نصر إسماعيل بن حماد الجوهري الفارابي, تحقيق: أحمد عبد الغفور عطار, دار العلم للملايين – بيروت, الطبعة: الرابعة 1407 هـ‍ - 1987 م. تاج العروس من جواهر القاموس, محمّد بن محمّد بن عبد الرزّاق الحسيني، أبو الفيض، الملقّب بمرتضى، الزَّبيدي, مجموعة من المحققين, الناشر: دار الهداية. معجم اللغة العربية المعاصرة، للدكتور أحمد مختار عبد الحميد عمر بمساعدة فريق عمل، الناشر: عالم الكتب، الطبعة: الأولى، 1429 هـ - 2008 م. معجم مقاييس اللغة، تأليف: أحمد بن فارس بن زكريا القزويني الرازي، تحقيق: عبد السلام محمد هارون، الناشر: دار الفكر عام النشر: 1399هـ - 1979م. شرح صحيح البخاري لابن بطال، تحقيق: أبي تميم ياسر بن إبراهيم، نشر: مكتبة الرشد، الرياض-السعودية، الطبعة: الثانية 1423ه، 2003م. توضيح الأحكام مِن بلوغ المرام، تأليف: عبد الله بن عبد الرحمن بن صالح البسام، الناشر: مكتبة الأسدي، مكة المكرّمة الطبعة: الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م. مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م. المصباح المنير في غريب الشرح الكبير, أحمد بن محمد بن علي الفيومي ثم الحموي، أبو العباس, المكتبة العلمية – بيروت. تحفة الأحوذي بشرح جامع الترمذي, أبو العلا محمد عبد الرحمن بن عبد الرحيم المباركفورى, دار الكتب العلمية - بيروت. النهاية في غريب الحديث والأثر, مجد الدين أبو السعادات المبارك بن محمد الشيباني الجزري ابن الأثير, المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م, تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي. شرح الطيبي على مشكاة المصابيح المسمى بـ (الكاشف عن حقائق السنن), شرف الدين الحسين بن عبد الله الطيبي, المحقق: د. عبد الحميد هنداوي, الناشر: مكتبة نزار مصطفى الباز (مكة المكرمة - الرياض), الطبعة: الأولى، 1417 هـ - 1997 م. بلوغ المرام من أدلة الأحكام، لابن حجر، دار القبس للنشر والتوزيع، الرياض - المملكة العربية السعودية، الطبعة: الأولى، 1435 هـ - 2014 م. فتاوى اللجنة الدائمة - المجموعة الأولى-: اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء- جمع وترتيب: أحمد بن عبد الرزاق الدويش. مجموع فتاوى العلامة عبد العزيز بن باز رحمه الله، أشرف على جمعه وطبعه: محمد بن سعد الشويعر- طبع وزارة الشؤون الإسلامية والأوقاف.

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ऐ अबा ह़िज़यम, तुम्हें कौन सी बात यहाँ खींच लाई है?

عن حنظلة بن حِذْيَم، أن جدَّه حَنِيفَة قال لحِذْيَم: اجمع لي بنيَّ، فإني أريد أن أُوصِي، فجَمَعهم، فقال: إنَّ أوَّل ما أوصي أنَّ ليَتِيمي هذا الذي في حَجْري مائة من الإبل، التي كنا نُسمِّيها في الجاهلية: المُطَيِّبة، فقال حِذْيَم: يا أبَتِ، إني سمعت بَنِيك يقولون: إنما نُقِرُّ بهذا عند أَبِينا، فإذا مات رجَعْنا فيه، قال: فبَيْني وبيْنكم رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فقال حِذيم: رَضِينا، فارْتَفَعَ حذيم، وحنيفة، وحنْظَلَة معهم غُلام، وهو رَدِيف لحذيم، فلما أتوا النبي صلى الله عليه وسلم ، سلَّموا عليه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم : «ما رَفَعَك يا أبا حذيم؟» قال: هذا، وضرَب بيده على فَخِذ حذيم، فقال: إني خَشِيتُ أن يَفْجَأَني الكِبَر، أو الموْت، فأردتُ أن أوصي، وإني قلتُ: إن أوَّل ما أوصي أن ليتيمي هذا الذي في حَجْري مائة من الإبل، كنا نُسَمِّيها في الجاهلية: المُطَيِّبة، فغَضِب رسول الله صلى الله عليه وسلم ، حتى رأَيْنا الغضب في وجهه، وكان قاعدًا فجَثَا على ركبتيه، وقال: «لا، لا، لا الصدقة خمس، وإلا فعشر، وإلا فخمس عشرة، وإلا فعشرون، وإلا فخمس وعشرون، وإلا فثلاثون، وإلا فخمس وثلاثون، فإن كَثُرت فأربعون» ، قال: فودَّعوه ومع اليتيم عصا، وهو يَضْرب جملا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم : «عَظُمَت هذه هراوة يتيم» ، قال حنظلة: فَدَنا بي إلى النبي صلى الله عليه وسلم ، فقال: إنَّ لي بَنِين ذوي لِحى، ودون ذلك، وإنَّ ذا أصغرُهم، فادع الله له، فَمَسَح رأسه، وقال: «بارك الله فيك» ، أو «بورك فيه» ، قال ذَيَّالٌ: فلقد رأيتُ حنظلة، يؤتى بالإنسان الوارِم وجهه، أو بالبهيمة الوارِمة الضَّرع، فيَتْفُل على يديه، ويقول: بسم الله، ويضع يده على رأسه، ويقول على موْضِع كف رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فَيَمْسحه عليه، وقال ذيال: فَيَذْهب الوَرَم.
ह़न्ज़ला बिन ह़िज़यम से वर्णित है कि उनके दादा ह़नीफा ने ह़िज़यम से कहाः मेरे बेटों को जमा करो, मैं उन्हें वसीयत करना चाहता हूँ, उन्होंने उन लोगों को जमा किया, तो (ह़नीफा) ने कहाः सर्वप्रथम मैं जिस चीज की वसीयत करता हूँ वह यह है कि मेरी देखरेख में पलने वाले इस अनाथ के लिए एक सौ ऊँट है जिस को हम लोग जाहिलीयत में मुत़ैयबा (उम्दा ऊँट) कहते थे, तो ह़िज़यम ने कहाः हे मेरे पिता, मैंने आप के बेटों को कहते हुऐ सुना है कि हम अपने पिता के समक्ष इसका इकरार कर लेते हैं किंतु पिता के मृत्यु पश्चात हम लोग अपनी बात से पलट जाएंगे। उन्होंने कहा कि तब मेरे और तुम्हारे बीच (गवाह के रूप में) अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हैं, तो ह़िज़यम ने कहाः हम संतुष्ट हैं, तो ह़िज़यम, ह़न्ज़ला और ह़नीफा उठ गए तथा उन के संग एक बालक भी था जो ह़िज़यम के पीछे बैठा था, जब वह लोग नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास पहुँचे तो आप को सलाम किया, नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमायाः ऐ ह़िज़यम, तुम्हें कौन सी बात यहाँ खींच लाई है? तो उन्होंने कहाः इसने और अपने हाथ से ह़िज़यम के जांघ पर हाथ मारा और कहाः मुझे डर है कि कहीं अचानक बुढ़ापा या मृत्यु मुझे पकड़ ले तो मैंने चाहा कि वसीयत कर दूँ तथा मैंने कहाः सर्वप्रथम मैं जिस चीज की वसीयत करता हूँ वह यह है कि मेरी देखरेख में पलने वाले इस अनाथ के लिए एक सौ ऊँट है जिसको हम लोग जाहिलीयत में मुत़ैयबा (उम्दा ऊँट) कहते थे। ये सुन कर अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- क्रोधित हो गए, यहाँ तक कि उस क्रोध का प्रभाव हमने आप के चेहरे पर भी देखा और अब तक आप इत्मीनान से बैठे हुए थे यह सुन कर घुटनों के बल बैठ गए और फरमायाः नहीं, नहीं, नहीं, सदक़ा पाँच ऊँट है, अथवा दस, अथवा पंद्रह, अथवा बीस, अथवा पचीस, अथवा तीस, अथवा पैंतीस तथा अधिकाधिक चालीस है, वह कहते हैंः उन लोगों ने आप से विदा लिया और यतीम (लड़के) के हाथ में लकड़ी थी जिस से वह ऊँटों को हाँक रहा था तो नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमायाः क्या ही बड़ी इस यतीम की लाठी है (अर्थात यह लड़का बड़ी आयु का है जिसे अब यतीम नहीं कहा जाना चाहिए), हन्ज़ला कहते हैंः मेरे दादा मुझे लेकर नबी - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के समीप गए और कहाः मेरे पास दाढ़ी वाले बड़ी उम्र के लड़के भी हैं और उन से कम आयु के भी, यह उन में सबसे छोटा है, आप इस के लिए अल्लाह से दुआ कर दीजिए, तो आप- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनके सर पर हाथ फेरा और यह दुआ कियाः अल्लाह तुझ में बरकत दे, या यह कहाः इस में बरकत दी जाए, ज़य्याल कहते हैंः मैंने अपनी आँखों से देखा है कि हन्ज़ला के पास ऐसा व्यक्ति लाया जाता जिस के चेहरे पर सूजन होता अथवा ऐसा पशु लाया जाता जिसके थन में सूजन होता, तो वह अपने हाथ पर थुकथुकाते और बिस्मिल्लाह (अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ) कहते तत्पश्चात अपना हाथ अपने सिर पर उस स्थान पर रखते जहाँ पर अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपनी हथेली रखी थी, फिर अपने हाथ को उस सूजन वाले स्थान पर रखते तो वह सूजन ठीक हो जाता।
इसे अह़मद ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

-مسند الإمام أحمد بن حنبل، تحقيق: شعيب الأرنؤوط - عادل مرشد، وآخرون، نشر: مؤسسة الرسالة، الطبعة: الأولى، 1421هـ - 2001م. -المصباح المنير في غريب الشرح الكبير، لأحمد بن محمد بن علي الفيومي، الناشر: المكتبة العلمية – بيروت. -مختار الصحاح، لزين الدين أبو عبد الله محمد بن أبي بكر بن عبد القادر الحنفي الرازي، تحقيق: يوسف الشيخ محمد، نشر: المكتبة العصرية - الدار النموذجية، بيروت – صيدا، لطبعة: الخامسة، 1420هـ / 1999م. -سلسلة الأحاديث الصحيحة وشيء من فقهها وفوائدها، تأليف محمد ناصر الدين الألباني، الناشر: مكتبة المعارف للنشر والتوزيع، الرياض، الطبعة: الأولى، لمكتبة المعارف. -معجم اللغة العربية المعاصرة، للدكتور أحمد مختار عبد الحميد عمر بمساعدة فريق عمل، الناشر: عالم الكتب، الطبعة: الأولى، 1429 هـ - 2008 م. -الفتح الرباني لترتيب مسند الإمام أحمد بن حنبل الشيباني ومعه بلوغ الأماني من أسرار الفتح الرباني, أحمد بن عبد الرحمن بن محمد البنا الساعاتي, دار إحياء التراث العربي, الطبعة: الثانية.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com