عَنْ مَالِكِ بْنِ أَوْسِ بْنِ الْحَدَثَانِ أَنَّهُ قَالَ: أَقْبَلْتُ أَقُولُ مَنْ يَصْطَرِفُ الدَّرَاهِمَ؟ فَقَالَ طَلْحَةُ بْنُ عُبَيْدِ اللهِ وَهُوَ عِنْدَ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنهما: أَرِنَا ذَهَبَكَ، ثُمَّ ائْتِنَا، إِذَا جَاءَ خَادِمُنَا، نُعْطِكَ وَرِقَكَ، فَقَالَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ: كَلَّا، وَاللهِ لَتُعْطِيَنَّهُ وَرِقَهُ، أَوْ لَتَرُدَّنَّ إِلَيْهِ ذَهَبَهُ، فَإِنَّ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «الْوَرِقُ بِالذَّهَبِ رِبًا، إِلَّا هَاءَ وَهَاءَ، وَالْبُرُّ بِالْبُرِّ رِبًا، إِلَّا هَاءَ وَهَاءَ، وَالشَّعِيرُ بِالشَّعِيرِ رِبًا، إِلَّا هَاءَ وَهَاءَ، وَالتَّمْرُ بِالتَّمْرِ رِبًا، إِلَّا هَاءَ وَهَاءَ».
मालिक बिन औस बिन हदसान से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं यह कहते हुए आया कि हमें दीनार से दिरहम बदलकर कौन देगा? चुनांचे तलहा बिन उबैदुल्लाह ने, जो उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- के पास मौजूद थे, कहा : मुझे अपना सोना दिखाओ और उसके बाद आओ, जब हमारा सेवक आ जाएगा, तो हम तुम्हें तुम्हारी चाँदी दे देंगे। यह सुनकर उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : अल्लाह की क़सम, ऐसा नहीं हो सकता, या तो तुम उसे उसकी चाँदी दे दो या फिर उसका सोना वापस कर दो। क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "चाँदी सोने के बदले में अगर नक़द न हो तो सूद हो जाता है। गेहूँ, गेहूँ के बदले में अगर नक़द न हो तो सूद हो जाता है। जौ, जौ के बदले में अगर नक़द न हो, तो सूद हो जाता है। खजूर, खजूर के बदले में अगर नक़द न हो, तो सूद हो जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
ताबेई मालिक बिन औस बता रहे हैं कि उनके पास कुछ सोने के दीनार थे, जिन्हें वह चाँदी के दिरहम से बदलना चाहते थे। अतः तलहा बिन उबैदुल्लाह ने उनसे कहा कि आप ज़रा मुझे अपने दीनार दें कि मैं उन्हें देख लूँ। फिर ख़रीदने का इरादा बन गया, तो फ़रमाया कि जब हमारे सेवक आए, तो आप आ जाएँ, हम आपको चाँदी के दिरहम दे देंगे। वहाँ उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- भी मौजूद थे। चुनांचे उन्होंने इस तरह के लेन-देन को ग़लत बताया और तलहा से अल्लाह की क़सम देकर कहा कि वह या तो चाँदी अभी दे दें या फिर लिया हुआ सोना वापस कर दें। उन्होंने इसका कारण यह बताया कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : सोने को चाँदी से या चाँदी को सोने से बेचना हो तो लेन-देन हाथों हाथ होना चाहिए, वरना लेन-देन सूद वाला हो जाएगा, जिसकी वजह से ख़रीद-फ़रोख़्त हराम हो जाएगी। सोने को चाँदी के बदले में या चाँदी को सोने के बदले में बेचना उसी समय ठीक होगा, जब लेनदेन हाथों-हाथ हो और दोनों ओर से क़ब्ज़ा हो जाए। इसी तरह गेहूँ को गेहूँ के बदले, जौ को जौ के बदले और खजूर को खजूर के बदले बेचना उसी समय दुरुस्त होगा, जब वज़न एवं माप बराबर हो और उसी समय दोनों अपने-अपने सामानों पर क़ब्ज़ा कर लें। इन चीज़ों में न तो एक तरफ़ नक़द और एक तरफ़ उधार को जायज़ कहा जा सकता है और न क़ब्ज़े से पहले एक-दूसरे से अलग हो जाने की अनुमति दी जा सकती है।
फ़ायदे
- इस हदीस में पाँच प्रकार की चीज़ों का उल्लेख किया गया है : सोना, चाँदी, गेहूँ, जौ और खजूर। जब ख़रीद-बिक्री के समय दोनों ओर एक ही प्रकार की चीज़ हो, तो उसके सही होने के लिए दो शर्तों का पाया जाना ज़रूरी है। एक यह कि जहाँ मामला तय हो उसी जगह दोनों अपने-अपने सामान पर क़ब्ज़ा कर लें और दूसरी यह कि वज़न बराबर हो जैसे कि सोना के बदले सोना। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह सूद होगा और इस प्रकार के सूद को रिबा अल-फ़ज़्ल कहा जाता है। लेकिन अगर दोनों चीज़ें अलग-अलग प्रकार की हों जैसे कि गेहूं के बदले चाँदी तो ख़रीद-बिक्री के सही होने के लिए एक ही शर्त होगी। वह शर्त है, ख़रीद-बिक्री के स्थान पर ही क़ीमत पर क़ब्ज़ा कर लेना। अगर यह शर्त पूरी नहीं होती, तो इसमें भी सूद आ जाएगा, इस प्रकार के सूद को रिबा अल-नसीया कहते हैं।
- ख़रीद - बिक्री के स्थान से मुराद वह स्थान है जहाँ ख़रीद-बिक्री हुई हो। इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दोनों बैठे हों, चल रहे हों या सवार हों। इसी तरह अलग होने से मुराद वही है, जिसे सामान्य प्रचलन में अलग होना माना जाए।
- इस हदीस में आई हुई मनाही के दायरे में हर प्रकार का सोना आ जाता है, ढला हुआ हो कि बिना ढला हुआ। ऐसे ही हर तरह की चाँदी भी आ जाती है, ढली हुई हो कि बिना ढली हुई।
- आधुनिक मुद्राओं का आदान-प्रदान करते समय, वही बात ध्यान में रखना ज़रूरी है जो सोने के बदले चाँदी का आदान-प्रदान करते समय ध्यान में रखना ज़रूरी है। यानी अगर पार्टियों की आपसी सहमति से कमी या बढ़ोतरी होती है, तो यह जायज़ है, लेकिन जहाँ बिक्री का मामला तय हो उसी जगह दोनों पक्षों का कब्ज़ा कर लेना ज़रूरी है। अगर ऐसा नहीं होता है, तो इसमें सूद आ जाएगा और बिक्री अमान्य होगी।
- सूदी लेन-देन जायज़ नहीं है और ऐसा अनुबंध अवैध है, भले ही दोनों पक्षों की सहमति हो। क्योंकि इस्लाम मानवता और समाज के अधिकारों की रक्षा करता है, भले ही वे अपने अधिकारों को छोड़ना चाहें।
- शक्ति होने पर ग़लत काम होता हुआ दिखने पर मना करना और रोकना ज़रूरी है।
- ग़लत काम से मना करते समय प्रमाण भी प्रस्तुत करना चाहिए। जैसे कि उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- ने किया।
हवाला
صحيح البخاري (3/ 68) (2134).
صحيح مسلم (3/ 1209) (1586).
الإلمام بشرح عمدة الأحكام، لإسماعيل الأنصاري (2/ 28).
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، لعبد الله البسام (ص496).
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي المنهال قال: «سألت البراء بن عازب، وزيد بن أرقم، عن الصَّرْفِ؟ فكل واحد يقول: هذا خير مني. وكلاهما يقول: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن بيع الذهب بالوَرِقِ دَيْنَاً».
अबू मिनहाल कहते हैं कि मैंने बरा बिन आज़िब और ज़ैद बिन अरक़म से सोने को चाँदी के बदले में बेचने के संबंध में पूछा तो दोनों में से हर एक दूसरे के बारे में यह कहने लगे कि वह मुझसे बेहतर हैं तथा दोनों कह रहे थे कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सोने को चाँदी के बदले में उधार बेचने से मना फ़रमाया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
अबू मिनहाल ने बरा बिन आज़िब और ज़ैद बिन अरक़म -रज़ियल्लाहु अंहुमा- से 'सर्फ़' अर्थात नक़द को नक़द के बदले बेचने के बारे में पूछा। लेकिन दोनों सहाबा की परहेज़गारी देखिए कि दोनों फ़तवा देने का काम एक-दूसरे पर टालते रहे और ख़ुद को दूसरे की तुलना में कमतर बताते रहे। हाँ, दोनों एक बात पर एकमत थे कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सोने को चाँदी के बदले में उधार बेचने से मना किया है। क्योंकि दोनों सूदी वस्तुएँ हैं। अतः, मामला जिस बैठक में तय हुआ है, उसी बैठक में क़ब्ज़ा हो जाना ज़रूरी है। वरना, मामला शरीयत की नज़र में वैध नहीं होगा और उधार के कारण सूद का मामला क़रार पाएगा।
ज्ञात हो कि सूद (ब्याज), धन संबंधी एक हराम लेनदेन है। और इसके दो प्रकार हैं;
प्रथमः उधार का ब्याजः इससे आशय यह है कि क़र्ज़ के परिमाण को, जिसे पहले अदा करना था, उसकी अवधि में इज़ाफ़े के बदले में बढ़ा दिया जाए।
द्वितीयः क्रय-बिक्रय का ब्याजः इससे आशय है विशेष वस्तुओं की ख़रीद-बिक्री के समय, जिन्हें सूदी वस्तु कहा जाता है, जैसे गेहूँ के बदले गेहूँ और जौ के बदले जौ, एक को अधिक देना या देर से अदा करना।
हवाला
- صحيح البخاري، للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
- منحة العلام في شرح بلوغ المرام، تأليف عبد الله الفوزان، طبعة دار ابن الجوزي -الطبعة الأولى- 1428
- توضيح الأحكام شرح بلوغ المرام، تأليف عبد الله البسام، مكتبة الأسدي -مكة المكرمة- الطبعة الخامِسَة، 1423 هـ - 2003 م.
- الإلمام بشرح عمدة الأحكام، للشيخ إسماعيل الأنصاري -مطبعة السعادة- الطبعة الثانية، 1392هـ.
- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله البسام، تحقيق محمد صبحي حسن حلاق -مكتبة الصحابة- الشارقة - الطبعة العاشرة- 1426.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي بكرة رضي الله عنه قال: «نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الفضة بالفضة، والذهب بالذهب، إلا سَوَاءً بسوَاءٍ، وأمرنا أن نشتري الفضة بالذهب، كيف شئنا. ونشتري الذهب بالفضة كيف شئنا، قال: فسأله رجل فقال: يدا بيد؟ فقال: هكذا سمعت».
अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चाँदी को चाँदी के बदले में और सोने को सोने के बदले में बेचने से मना फ़रमाया है। हाँ, यदि बराबर हो तो कोई बात नहीं है। और हमें आदेश दिया है कि हम चाँदी को सोने के बदले, जिस तरह चाहें खरीदें और सोने को चाँदी के बदले जिस तरह चाहें, खरीदें। वर्णनकर्ता कहते हैं कि एक व्यक्ति ने पूछाः क्या हाथों हाथ? तो फ़रमायाः मैंने ऐसा ही सुना है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
चूँकि सोने को सोने के बदले और चाँदी को चाँदी के बदले कमी-बेशी के साथ बेचना सूद है, इसलिए आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इससे मना फ़रमाया है। हाँ, यदि दोनों बराबर हों, तो कोई बात नहीं है। रही बात सोने को चाँदी के बदले या चाँदी को सोने के बदले बेचने की, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है, यद्यपि कमी-बेशी के साथ हो। अलबत्ता, इस मामले के सही होने के लिए अनिवार्य है कि जिस बैठक में मामला तय हुआ है, उसी बैठक में दोनों ओर से क़ब्ज़ा भी हो जाए। वरना, यह उधार का सूद क़रार पाएगा, जो कि हराम है। क्योंकि जब जिंस अलग-अलग हो, तो कमी-बेशी जायज़ होगी और क़ब्ज़े की शर्त बाक़ी रहेगी। क्योंकि दोनों के अंदर सूद का सबब एक है।
हवाला
- صحيح البخاري، للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
- صحيح مسلم، للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
- الإلمام بشرح عمدة الأحكام، للشيخ إسماعيل الأنصاري -مطبعة السعادة- الطبعة الثانية 1392هـ.
- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام، عبد الله البسام، تحقيق محمد صبحي حسن حلاق -مكتبة الصحابة- الشارقة، الطبعة العاشرة، 1426ه.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي سعيد الخدري- رضي الله عنه-: جاء بلال إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بتمر بَرْنِيٍّ، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم : «من أين لك هذا؟» قال بلال: كان عندنا تمر رديء، فبعتُ منه صاعين بصاع ليطعم النبي صلى الله عليه وسلم . فقال النبي صلى الله عليه وسلم عند ذلك: «أَوَّهْ، أَوَّهْ، عَيْنُ الربا، عين الربا، لا تفعل، ولكن إذا أردت أن تشتري فَبِعِ التمرَ ببيع آخر، ثم اشتر به».
अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है कि बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु), अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बरनी खुजूर (मदीने की एक उत्तम प्रकार की खुजूर) लेकर आए तो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनसे फ़रमायाः तुम्हें यह कहाँ से मिला? बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः हमारे पास रद्दी खुजूर थी। मैंने उसमें से दो साअ़ (साअ़ एक प्रकार का माप है) देकर एक साअ़ लिया ताकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खाएँ। यह सुनकर, अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः ओहो, यही तो सूद है। यही तो सूद है। ऐसा न करो, लेकिन जब तुम ख़रीदना चाहो तो अपने पास मौजूद खुजूर को बेच दो और उसके पैसे से ख़रीदो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास मदीने की उत्तम कोटि की बरनी खजूर लेकर आए, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसकी उत्कृष्टता पर आश्चर्य प्रकट किया और पूछा कि इसे खजूर कहाँ से ले आए?
बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उत्तर दियाः हमारे पास आम खजूर थी। हमने दो सा रद्दी खजूर देकर एक सा अच्छी खजूर ले ली, ताकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खिला सकें। उनकी यह बात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर बहुत भारी पड़ी और आपके मुँह से निकलाः 'ओह!' क्योंकि आपके निकट गुनाह ही सबसे बड़ी मुसीबत था।
फिर फ़रमायाः तुम्हारा बिलकुल सूद है, जो कि हराम है। ऐसा न करो। यदि रद्दी खजूर बदलना चाहते हो, तो रद्दी खजूर को दिरहम से बेचो। फिर दिरहम से अच्छी खजूर खरीद लो। यह जायज़ तरीक़ा है। हराम से बचने के लिए इसपर अमल करना है।
हवाला
- صحيح البخاري –الجامع الصحيح-؛ للإمام أبي عبد الله محمد بن إسماعيل البخاري، عناية محمد زهير الناصر، دار طوق النجاة، الطبعة الأولى، 1422هـ.
- صحيح مسلم؛ للإمام مسلم بن الحجاج، حققه ورقمه محمد فؤاد عبد الباقي، دار عالم الكتب-الرياض، الطبعة الأولى، 1417هـ.
- الإلمام بشرح عمدة الأحكام للشيخ إسماعيل الأنصاري-مطبعة السعادة-الطبعة الثانية 1392ه.
- تيسير العلام شرح عمدة الأحكام-عبد الله البسام-تحقيق محمد صبحي حسن حلاق- مكتبة الصحابة- الشارقة- الطبعة العاشرة- 1426ه.
- خلاصة الكلام شرح عمدة الأحكام - فيصل بن عبد العزيز بن فيصل ابن حمد المبارك الحريملي النجدي - الطبعة: الثانية، 1412 هـ - 1992 م.
यह हदीस HadeethEnc.com परعن أبي سعيد الخدري- رضي الله عنه- مرفوعاً: «لا تبيعوا الذهب بالذهب إلا مثِلْاً بمثل، ولا تُشِفُّوا بعضها على بعض، ولا تبيعوا الوَرِقَ بالوَرِقِ إلا مثلا بمثل، ولا تُشفوا بعضها على بعض، ولا تبيعوا منها غائبا بناجز».
وفي لفظ «إلا يدا بيد».
وفي لفظ «إلا وزنا بوزن، مثلا بمثل، سواء بسواء».
अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः सोना, सोने के बदले न बेचो, मगर बराबर-बराबर। एक को दूसरे से अधिक न करो। उसी तरह, चाँदी को चाँदी के बदले न बेचो, मगर बराबर-बराबर। एक को दूसरे से अधिक न करो। तथा इनमें से उपस्थित को अनुपस्थित के बदले न बेचो।
तथा एक रिवायत में हैः परन्तु, यह कि हाथों-हाथ हो।
एवं एक रिवायत में हैः परन्तु यह कि वज़न बराबर हो और दोनों एक समान तथा बराबर हों।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
तशरीह
इस हदीस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सूद के दोनों प्रकारों; दोनों में से एक वस्तु को अधिक देने अथवा बाद में अदा करने, से मना किया है।
चुनांचे आपने सोने को सोने के बदले, चाहे दोनों ढले हुए हों या गैर ढले हुए, बेचने की अनुमति उसी समय दी है, जब दोनों वज़न में बराबर में हों और जिस मजलिस में मामला तय हुआ है, उसी मजलिस में दोनों पर क़बज़ा हो जाए; क्योंकि यदि दोनों में से एक उपस्थित हो और दूसरा अनुपस्थित तो मामला जायज़ नहीं होगा।
इसी प्रकार चाँदी को चाँदी के बदले, वह ढला हुआ हो या ग़ैर ढला हुआ, उसी समय बेचना जायज़ है, जब वज़न बराबर हो और मामला तय होने की बैठक में ही दोनों पक्षों का क़ब्ज़ा हो जाए। इसमें कमी-बेशी जायज़ नहीं है और दोनों पक्षों की ओर से क़ब्ज़ा होने से पहले अलग होना भी जायज़ नहीं है।
हवाला
منحة العلَّام للشيخ عبد الله بن صالح الفوزان، ط1، دار ابن الجوزي، الدمام، 1427ه.
تيسير العلام شرح عمدة الأحكام للبسام، حققه وعلق عليه وخرج أحاديثه وصنع فهارسه: محمد صبحي بن حسن حلاق، ط10، مكتبة الصحابة، الإمارات - مكتبة التابعين، القاهرة، 1426 هـ.
الإلمام بشرح عمدة الأحكام لإسماعيل الأنصاري، ط1، دار الفكر، دمشق، 1381ه.
صحيح البخاري، تحقيق: محمد زهير بن ناصر الناصر، ط1، دار طوق النجاة (مصورة عن السلطانية بإضافة ترقيم: محمد فؤاد عبد الباقي)، 1422ه.
صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، دار إحياء التراث العربي، بيروت.
यह हदीस HadeethEnc.com परعَنْ عُبَادَةَ بْنِ الصَّامِتِ رَضيَ اللهُ عنهُ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ: «الذَّهَبُ بِالذَّهَبِ، وَالْفِضَّةُ بِالْفِضَّةِ، وَالْبُرُّ بِالْبُرِّ، وَالشَّعِيرُ بِالشَّعِيرِ، وَالتَّمْرُ بِالتَّمْرِ، وَالْمِلْحُ بِالْمِلْحِ، مِثْلًا بِمِثْلٍ، سَوَاءً بِسَوَاءٍ، يَدًا بِيَدٍ، فَإِذَا اخْتَلَفَتْ هَذِهِ الْأَصْنَافُ، فَبِيعُوا كَيْفَ شِئْتُمْ، إِذَا كَانَ يَدًا بِيَدٍ».
उबादा बिन सामित -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : सोना के बदले में सोना, चाँदी के बदले में चाँदी, गेहूँ के बदले में गेहूँ, जौ के बदले में जौ, खजूर के बदले में खजूर और नमक के बदले में नमक, बराबर बराबर और समपरिमाण में होना चाहिए और हाथों हाथ आदान-प्रदान होना चाहिए। अगर ये वर्ग अलग-अलग हों और ख़रीद-बिक्री नक़द हो, तो तुम जैसे चाहो ख़रीद-बिक्री कर सकते हो।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने छह सूद वाले वर्गों यानी सोना, चाँदी, गेहूँ, जौ, खजूर और नमक के क्रय-विक्रय का सही तरीक़ा बताया है। अगर क्रय-विक्रय एक ही वर्ग की दो चीज़ों, जैसे सोना के बदले में सोना और चाँदी के बदले में चाँदी बेची गई हो, तो दो शर्तों का पाया जाना ज़रूरी है : 1- वह चीज़ वज़न की जाने वाली जैसे सोना एवं चाँदी हो तो वज़न बराबर हो और मापी जाने वाली जैसे गेहूँ, जौ, खजूर और नमक हो तो माप बराबर हो। 2- ख़रीदने और बेचने वाले क्रय-विक्रय के स्थान में ही सामान पर क़ब्ज़ा कर लें। अगर ये वर्ग अलग-अलग हों, जैसे सोने को चाँदी तथा खजूर को गेहूँ के बदले में बेचा जाए, तो क्रय-विक्रय एक शर्त के साथ जायज़ है। शर्त यह है कि खरीदने और बेचने वाले क्रय-विक्रय के स्थान में ही सामान पर क़ब्ज़ा कर लें। अगर ऐसा नहीं होता, तो क्रय-विक्रय अमान्य होगा और ख़रीदने तथा बेचने वाले दोनों सूदी लेनदेन करने वाले माने जाएँगे।
फ़ायदे
- सूदी सामानों का बयान और उनके क्रय-विक्रय का तरीक़ा।
- सूद वाले क्रय-विक्रय की मनाही।
- सूद के मामले में काग़ज़ी मुद्रा पर भी सोने और चांदी के समान ही नियम लागू होते हैं।
- सूदी कोटी के छह सामानों के विक्रय-विक्रय की निम्नलिखित परिस्थितियाँ हैं : 1- सूदी सामान को उसी कोटी के सूदी सामान के बदले में बेचा जाए। जैसे सोने को सोने के बदले में और चाँदी को चाँदी के बदले में बेचा जाए। इस क्रय-विक्रय के सही होने की दो शर्तें हैं : वज़न तथा माप बराबर हो एवं क्रय-विक्रय स्थल पर ही क़ब्ज़ा हो जाए। 2- सूदी सामान को किसी सूदी सामान के बदले में बेचा जाए, जो उसकी कोटी से न हो, लेकिन दोनों के सूदी होने का कारण एक हो। जैसे सोने को चाँदी के बदले में और गेहूँ को जौ के बदले में बेचा जाए। इसके सही होने के लिए दोनों ओर से क़ब्ज़ा हो जाना शर्त है। समान होना नहीं। 3- एक सूदी सामान को दूसरे सूदी सामान के बदले में बेचा जाए, जो उस कोटि से न हो और दोनों के सूदी होने का कारण भी अलग-अलग हो। जैसे सोने को खजूर के बदले में बेचना। इसके लिए न तो दोनों ओर से क़ब्ज़ा होना ज़रूरी है और न समान होना।
- जब क्रय-विक्य ग़ैर-सूदी चीज़ों के दर्मियान हो, या फिर एक ओर सूदी चीज़ हो और दूसरी ओर ग़ैर-सूदी चीज़, जैसे सोने के बदले में जायदाद बेची जाए, तो न दोनों ओर क़ब्ज़ा होना शर्त है और न समान होना।
हवाला
صحيح مسلم (3/ 1210) (1587).
فيض القدير (3/ 571).
البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (27/ 623).
यह हदीस HadeethEnc.com परयहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com