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तशरीह के साथ हदीसें

अवतरण के कारण (असबाब)

5 हदीसें

अगर वह मेरे निकट आता, तो फ़रिश्ते उसकी बोटी- बोटी उचक लेते

عن أبي هريرة رضي الله عنه ، قال أبو جهل: هل يُعَفِّر محمدٌ وجهَه بين أَظْهُركم؟ قال فقيل: نعم، فقال: واللَّات والعُزَّى لَئِن رأيتُه يفعل ذلك لأَطَأَنَّ على رقبتَه، أو لأُعَفِّرنَّ وجهَه في التراب، قال: فأتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وهو يصلِّي، زَعَم لَيَطَأ على رقبته، قال: فما فَجِئَهم منه إلا وهو يَنْكِصُ على عَقِبَيْه ويتَّقي بيديْه، قال: فقيل له: ما لك؟ فقال: إنَّ بيْني وبيْنه لخَنْدَقًا من نار وهَوْلًا وأجنِحة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «لو دنا منِّي لاخْتَطفَتْه الملائكةُ عُضْوًا عُضْوًا» قال: فأنزل اللهُ -عزَّ وجلَّ- -لا ندري في حديث أبي هريرة، أو شيء بلغه -: {كَلَّا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَيَطْغَى، أَنْ رَآهُ اسْتَغْنَى، إِنَّ إِلَى رَبِّكَ الرُّجْعَى، أَرَأَيْتَ الَّذِي يَنْهَى، عَبْدًا إِذَا صَلَّى، أَرَأَيْتَ إِنْ كَانَ عَلَى الْهُدَى، أَوْ أَمَرَ بِالتَّقْوَى، أَرَأَيْتَ إِنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّى} [العلق: 7]- يعني أبا جهل - {أَلَمْ يَعْلَمْ بِأَنَّ اللَّهَ يَرَى، كَلَّا لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ لَنَسْفَعًا بِالنَّاصِيَةِ، نَاصِيَةٍ كَاذِبَةٍ خَاطِئَةٍ، فَلْيَدْعُ نَادِيَهُ، سَنَدْعُ الزَّبَانِيَةَ، كَلَّا لَا تُطِعْهُ} [العلق: 14]، زاد عبيد الله -أحد الرواة- في حديثه قال: وأمره بما أمره به. وزاد ابن عبد الأعلى -راوٍ آخر-: {فَلْيَدْعُ نَادِيَهُ} [العلق: 17]، يعني قومه.
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अबू जह्ल ने कहा: क्या मुहम्मद तुम्हारे सामने ज़मीन पर अपना चेहरा रखता है? वर्णनकर्ता का कहना है कि उससे कहा गया: हाँ। इसपर उसने कहा: लात तथा उज़्ज़ा की क़सम! यदि मैंने उसे ऐसा करते देखा, तो उसकी गर्दन पर पाँव रख दूँगा या उसके चेहरे को मिट्टी में सान दूँगा। वर्णनकर्ता का कहना है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नमाज़ पढ़ रहे थे कि वह आपके पास आया। वह इस भ्रम में था कि आपकी गर्दन को रौंदेगा। वर्णनर्ता का कहना है: लेकिन लोगों ने देखा कि वह अचानक पीछे हटने लगा और अपने दोनों हाथों से अपना बचाव करने लगा। वर्णनकर्ता कहता है: उससे पूछा गया कि तुम्हारे साथ क्या हुआ? तो उसने कहा: मेरे और उसके बीच आग की खाई, भय तथा बहुत-से पर थे। इसपर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: अगर वह मेरे निकट आता, तो फ़रिश्ते उसकी बोटी- बोटी उचक लेते। वर्णनकर्ता का कहना है कि इसके बाद (सर्वशक्तिमान एवं महान) अल्लाह ने यह आयतें उतारीं (हम नहीं जानते कि यह अबू हुरैरा की रिवायत में है या किसी अन्य स्रोत से उनके पास पहुँची है): {كَلَّا إِنَّ الْإِنْسَانَ لَيَطْغَى، أَنْ رَآهُ اسْتَغْنَى، إِنَّ إِلَى رَبِّكَ الرُّجْعَى، أَرَأَيْتَ الَّذِي يَنْهَى، عَبْدًا إِذَا صَلَّى، أَرَأَيْتَ إِنْ كَانَ عَلَى الْهُدَى، أَوْ أَمَرَ بِالتَّقْوَى، أَرَأَيْتَ إِنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّى، أَلَمْ يَعْلَمْ بِأَنَّ اللَّهَ يَرَى، كَلَّا لَئِنْ لَمْ يَنْتَهِ لَنَسْفَعًا بِالنَّاصِيَةِ، نَاصِيَةٍ كَاذِبَةٍ خَاطِئَةٍ، فَلْيَدْعُ نَادِيَهُ، سَنَدْعُ الزَّبَانِيَةَ، كَلَّا لَا تُطِعْهُ} अर्थात, वास्तव में, इंसान सरकशी करता है, क्योंकि वह ख़ुद को धनवान् समझता है। निस्संदेह, फिर तेरे पालनहार की ओर लौटकर जाना है। क्या तुमने उसको देखा, जो एक बंदे को रोकता है, जब वह नमाज़ पढ़ता है? भला देखो तो, यदि वह सीधे मार्ग पर हो या अल्लाह से डरने का आदेश देता हो? और देखो तो यदि उसने झुठलाया और मुँह फेरा हो? क्या वह नहीं जानता कि अल्लाह उसे देख रहा है? निश्चित तौर पर यदि वह नहीं रुका, तो हम उसे माथे के बल घसीटेंगे। झूठे और पापी माथे के बल। तो वह अपनी सभा को बुला ले। हम भी नरक के फ़रिश्तों को बुलाएँगे। (ऐ मेरे बंदे!) हरगिज़ उसकी बात न सुनो। [सूरा अल-अलक़ः 6-19] यहाँ झुठलाने और मुँह फेरने वाले से आशय अबू जह्ल है। इस हदीस के एक वर्णनकर्ता उबैदुल्लाह ने अपनी रिवायत में यह इज़ाफ़ा किया है : फिर उसे आदेश दिया, जो आदेश दिया। तथा एक और वर्णनकर्ता इब्ने अब्दुल आला ने {فَلْيَدْعُ نَادِيَهُ} का अर्थ बताया है कि वह अपनी जाति को बुलाए।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।दर्जासह़ीह़
हवाला

- صحيح مسلم، تحقيق: محمد فؤاد عبد الباقي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت. - المنهاج شرح صحيح مسلم بن الحجاج، للنووي، نشر: دار إحياء التراث العربي – بيروت، الطبعة: الثانية، 1392ه. - النهاية في غريب الحديث والأثر، لابن الأثير، نشر: المكتبة العلمية - بيروت، 1399هـ - 1979م، تحقيق: طاهر أحمد الزاوى - محمود محمد الطناحي. - مرقاة المفاتيح شرح مشكاة المصابيح، لعلي بن سلطان الملا الهروي القاري، الناشر: دار الفكر، بيروت – لبنان، الطبعة: الأولى، 1422هـ - 2002م. - الإفصاح عن معاني الصحاح، ليحيى بن هبيرة بن محمد بن هبيرة الذهلي الشيباني، المحقق: فؤاد عبد المنعم أحمد، الناشر: دار الوطن، سنة النشر: 1417هـ. - كشف المشكل من حديث الصحيحين، لجمال الدين أبي الفرج عبد الرحمن بن علي بن محمد الجوزي، المحقق: علي حسين البواب، الناشر: دار الوطن – الرياض. - تاج العروس من جواهر القاموس، للزبيدي، نشر: دار الهداية. - تفسير الطبري = جامع البيان عن تأويل آي القرآن, محمد بن جرير بن يزيد بن كثير بن غالب الآملي، أبو جعفر الطبري, تحقيق: الدكتور عبد الله بن عبد المحسن التركي, دار هجر, الطبعة: الأولى، 1422 هـ - 2001 م. - إكمال المعلم بفوائد مسلم لعياض بن موسى بن عياض بن عمرون اليحصبي السبتي، المحقق: الدكتور يحيى إسماعيل، الناشر: دار الوفاء للطباعة والنشر والتوزيع، مصر، الطبعة: الأولى، 1419 هـ - 1998 م.

यह हदीस HadeethEnc.com पर

निः संदेह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने उतारा है : {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْكَافِرُونَ}

عَنِ ابْنِ عَبَّاسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُما قَالَ: إِنَّ اللهَ عَزَّ وَجَلَّ أَنْزَلَ: {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْكَافِرُونَ} [المائدة: 44] وَ {فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ} [المائدة: 45] وَ {فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ} [المائدة: 47] ، قَالَ: قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: أَنْزَلَهَا اللهُ فِي الطَّائِفَتَيْنِ مِنَ اليَهُودِ، وَكَانَتْ إِحْدَاهُمَا قَدْ قَهَرَتِ الأُخْرَى فِي الجَاهِلِيَّةِ، حَتَّى ارْتَضَوْا وَاصْطَلَحُوا عَلَى أَنَّ كُلَّ قَتِيلٍ قَتَلَتْهُ العَزِيزَةُ مِنَ الذَّلِيلَةِ فَدِيَتُهُ خَمْسُونَ وَسْقًا، وَكُلَّ قَتِيلٍ قَتَلَتْهُ الذَّلِيلَةُ مِنَ العَزِيزَةِ فَدِيَتُهُ مِائَةُ وَسْقٍ، فَكَانُوا عَلَى ذَلِكَ حَتَّى قَدِمَ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ المَدِينَةَ، وَذَلَّتِ الطَّائِفَتَانِ كِلْتَاهُمَا لِمَقْدَمِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، ورَسُولُ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمَئِذٍ لَمْ يَظْهَرْ، وَلَمْ يُوطِئْهُمَا عَلَيْهِ، وَهُوَ فِي الصُّلْحِ، فَقَتَلَتِ الذَّلِيلَةُ مِنَ العَزِيزَةِ قَتِيلًا، فَأَرْسَلَتِ العَزِيزَةُ إِلَى الذَّلِيلَةِ: أَنِ ابْعَثُوا إِلَيْنَا بِمِائَةِ وَسْقٍ، فَقَالَتِ الذَّلِيلَةُ: وَهَلْ كَانَ هَذَا فِي حَيَّيْنِ قَطُّ دِينُهُمَا وَاحِدٌ، وَنَسَبُهُمَا وَاحِدٌ، وَبَلَدُهُمَا وَاحِدٌ، دِيَةُ بَعْضِهِمْ نِصْفُ دِيَةِ بَعْضٍ؟ إِنَّا إِنَّمَا أَعْطَيْنَاكُمْ هَذَا ضَيْمًا مِنْكُمْ لَنَا، وَفَرَقًا مِنْكُمْ، فَأَمَّا إِذْ قَدِمَ مُحَمَّدٌ فَلَا نُعْطِيكُمْ ذَلِكَ، فَكَادَتِ الحَرْبُ تَهِيجُ بَيْنَهُمَا، ثُمَّ ارْتَضَوْا عَلَى أَنْ يَجْعَلُوا رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بَيْنَهُمْ، ثُمَّ ذَكَرَتِ العَزِيزَةُ، فَقَالَتْ: وَاللهِ مَا مُحَمَّدٌ بِمُعْطِيكُمْ مِنْهُمْ ضِعْفَ مَا يُعْطِيهِمْ مِنْكُمْ، وَلَقَدْ صَدَقُوا، مَا أَعْطَوْنَا هَذَا إِلَّا ضَيْمًا مِنَّا، وَقَهْرًا لَهُمْ، فَدُسُّوا إِلَى مُحَمَّدٍ مَنْ يَخْبُرُ لَكُمْ رَأْيَهُ: إِنْ أَعْطَاكُمْ مَا تُرِيدُونَ حَكَّمْتُمُوهُ، وَإِنْ لَمْ يُعْطِكُمْ حَذِرْتُمْ فَلَمْ تُحَكِّمُوهُ، فَدَسُّوا إِلَى رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ نَاسًا مِنَ المُنَافِقِينَ لِيَخْبُرُوا لَهُمْ رَأْيَ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَلَمَّا جَاءَ رَسُولَ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَخْبَرَ اللهُ رَسُولَهُ بِأَمْرِهِمْ كُلِّهِ وَمَا أَرَادُوا، فَأَنْزَلَ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ {يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الذِينَ قَالُوا آمَنَّا} [المائدة: 41] إِلَى قَوْلِهِ: {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْفَاسِقُونَ} [المائدة: 47] ثُمَّ قَالَ فِيهِمَا: وَاللهِ نَزَلَتْ، وَإِيَّاهُمَا عَنَى الله عَزَّ وَجَلَّ.
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से वर्णित है, वह कहते हैं : निः संदेह सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने उतारा है : {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْكَافِرُونَ} (सूरा माइदा : 44) और {فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ} (सूरा माइदा : 45) तथा {فَأُولَئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ} (सूरा अल-माइदा : 47)। इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने कहा है : अल्लाह ने इन्हें यहूदियों के दो गुटों के बारे में उतारा है, जिनमें से एक ने अज्ञानता के युग में दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया था, यहाँ तक कि वे इस बात पर सहमत और राज़ी हो गए कि शक्तिशाली गुट द्वारा मारे गए कमज़ोर गुट के हर व्यक्ति का दियत (ख़ून बहा) पचास वस्क़ होगा, और कमज़ोर गुट द्वारा मारे गए शक्तिशाली गुट के हर व्यक्ति का दियत सौ वस्क़ होगा। वे इसी पर क़ायम रहे यहाँ तक कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मदीना तशरीफ़ लाए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आगमन पर दोनों गुट आपके अधीन हो गए। हालाँकि उन दिनों रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का प्रभुत्व स्थापित नहीं हुआ था और आपने दोनों क़बीलों को अपने अधीन होने पर मजबूर भी नहीं किया था। दरअसल वे संधि की स्थिति में थे। ऐसे में कमज़ोर गुट ने शक्तिशाली गुट के एक व्यक्ति की हत्या कर दी। इस पर शक्तिशाली गुट ने कमज़ोर गुट को संदेश भेजा कि हमारे पास सौ वस्क़ भेजो। लेकिन कमज़ोर गुट ने कहा : क्या कभी दो ऐसे क़बीलों में ऐसा हुआ है, जिनका धर्म एक हो, वंश एक हो और देश एक हो कि उनमें से एक का दियत दूसरे के दियत का आधा हो? हमने तो यह तुम्हें केवल तुम्हारे ज़ुल्म और तुम्हारे डर की वजह से दिया था। लेकिन अब जब मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आ गए हैं, तो हम तुम्हें यह नहीं देंगे। इस बात पर उन दोनों के बीच युद्ध छिड़ने ही वाला था। फिर वे इस बात पर राज़ी हो गए कि वे रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपने बीच निर्णयकारी बनाएँगे। फिर शक्तिशाली गुट ने सोचा और कहा : अल्लाह की क़सम, मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुम्हें उनके मुक़ाबले में दोगुना दियत नहीं देंगे। और उन्होंने (कमज़ोर गुट ने) सच ही कहा था, उन्होंने हमें यह केवल हमारे ज़ुल्म और उनपर हमारे प्रभुत्व के कारण ही दिया था। अतः मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास किसी को चुपके से भेज दो, जो तुम्हारे लिए उनकी राय मालूम करे। यदि वह तुम्हें वह दें जो तुम चाहते हो, तो उन्हें निर्णकारी मान लेना, और यदि वह तुम्हें वह न दें, तो सावधान रहना और उन्हें निर्णकारी न बनाना। अतः उन्होंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की राय जानने के लिए कुछ मुनाफ़िक़ों को चुपके-से रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास भेजा दिया। जब वे रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, तो अल्लाह ने अपने रसूल को उनके पूरे मामले और उनके इरादों के बारे में सूचित कर दिया। इसी संदर्भ में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने {يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الذِينَ قَالُوا آمَنَّا} (सूरा माइदा : 41) से लेकर {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْفَاسِقُونَ} (सूरा माइदा : 47) तक की आयतें उतारीं। फिर आपने उन दोनों गुटों के बारे में फ़रमाया : अल्लाह की क़सम, यह आयतें उन्हीं के बारे में उतरी हैं तथा सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का तात्पर्य उन्हीं से था।
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैदर्जाह़सन
तशरीह

मदीना के यहूदियों के दो क़बीले बनू कुरैज़ा और बनू नज़ीर थे। अज्ञानता काल में उनमें से एक ने दूसरे पर क़ब्ज़ा कर लिया था और उस पर हावी हो गए। चुनांचे, उन्होंने आपस में यह समझौता कर लिया कि शक्तिशाली और विजयी क़बीले द्वारा कमज़ोर और पराजित क़बीले के किसी व्यक्ति को क़त्ल किए जाने पर उसका दियत केवल पचास वस्क़ होगा, और कमज़ोर क़बीले द्वारा शक्तिशाली क़बीले के किसी व्यक्ति को क़त्ल किए जाने पर उसका दियत दोगुना, यानी सौ वस्क़ होगा। यहाँ यह ध्यान रहे कि एक वस्क़ साठ साअ् का होता है। उनकी यही स्थिति बनी रही, यहाँ तक कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हिजरत करके मदीना आए। आपके आगमन पर दोनों ही गिरोह आपके अधीन हो गए, जबकि उस समय तक आपने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त नहीं की थी और न ही उन दोनों को अपनी आज्ञाकारिता के लिए विवश किया था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि यह हिजरत के शुरुआती दिनों की बात है और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) संधि की स्थिति में थे। ऐसे में पराजित क़बीले ने विजयी क़बीले के एक व्यक्ति को क़त्ल कर दिया। इस पर विजयी क़बीले ने पराजित क़बीले को संदेश भेजा कि समझौते के अनुसार हमारे लिए सौ वस्क़ भेज दो। लेकिन परास्त क़बीले ने कहा : क्या कभी दो ऐसे क़बीलों के बीच भी ऐसा हुआ है, जिनका दीन, नसब और वतन एक हो, फिर भी एक का दियत दूसरे से आधी हो?! हमने तुम्हें यह केवल तुम्हारे ज़ुल्म और तुम्हारे डर से दिया था। लेकिन अब जब मुहम्मद आ गए हैं, तो हम तुम्हें यह हरगिज़ नहीं देंगे। अतः दोनों के बीच युद्ध छिड़ने ही वाला था कि वे इस बात पर राज़ी हो गए कि वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने बीच निर्णयकारी बनाएँगे। फिर विजयी समूह ने ग़ौर किया और कहा : अल्लाह की क़सम, ऐसा नहीं होगा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जो कुछ उन्हें तुमसे दिलाएँ, उसका दोगुना तुम्हें उनसे दिला दें। यह बात सही भी है। उन्होंने हमें यह सब हमारे ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के कारण ही दिया है। इसलिए मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास चुपके से किसी को भेजो, जो उनकी राय लेकर आए। अगर वह तुम्हारी मर्ज़ी के मुताबिक़ फ़ैसला दें, तो उन्हें अपना निर्णयकारी मान लेना, और अगर वह तुम्हारी इच्छा के अनुसार फ़ैसला न दें, तो उन्हें छोड़ देना और अपने बीच निर्णयकारी मत बनाना। अतः उन्होंने कुछ मुनाफ़िक़ों को गुप्त रूप से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास भेजा, ताकि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की राय जान सकें। अतः, जब वे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास आए, तो अल्लाह ने वह्य उतारी और अपने रसूल को उनके पूरे मामले और उनके इरादे से अवगत करा दिया। चुनांचे सूरा माइदा की यह आयतें उतारीं : {يَا أَيُّهَا الرَّسُولُ لَا يَحْزُنْكَ الَّذِينَ يُسَارِعُونَ فِي الْكُفْرِ مِنَ الذِينَ قَالُوا آمَنَّا} (ऐ रसूल! वे लोग आपको दुखी न करें जो कुफ़्र (अविश्वास) की दौड़ में एक-दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं, उन लोगों में से जिन्होंने अपने मुख से तो कह दिया कि हम ईमान लाए)। [सूरा माइदा : 41]। आगे यहाँ तक : {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْفَاسِقُونَ} (तथा जो कोई अल्लाह के उतारे हुए आदेशों के अनुसार न्याय न करे तो वही लोग गुनाहगार हैं।) [अल-माइदा : 47] फिर इब्न-ए-अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा बयान करते हैं : अल्लाह की क़सम, इन्हीं दोनों के विषय में अल्लाह का यह फ़रमान {وَمَنْ لَمْ يَحْكُمْ بِمَا أَنْزَلَ اللهُ فَأُولَئِكَ هُمِ الْكَافِرُونَ} (तथा जो कोई अल्लाह के उतारे हुए आदेशों के अनुसार न्याय न करे तो वही लोग काफिर हैं) [सूरा माइदा : 44] उतरा है। तथा ''...तो वही लोग अत्याचारी हैं।'' [सूरा माइदा : 45] और {...तो वही लोग गुनाहगार हैं।} [सूरा माइदा : 47], और सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह का अभिप्राय इन्हीं दोनों से है।

फ़ायदे
  1. यहूदियों को नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सच्चाई और अमानतदारी की जानकारी थी।
  2. यहूदियों का षड्यंत्र और ज़ुल्म, यहाँ तक कि स्वयं अपने ऊपर भी।
  3. अल्लाह का यह बताना कि यहूदियों के लिए दुनिया में अपमान और आख़िरत में बड़ी यातना है।
  4. अल्लाह द्वारा अवतरित विधान के अनुसार फ़ैसला न करना और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फ़ैसले पर राज़ी न होना कुफ़्र, ज़ुल्म और फ़िस्क़ की दलील है।
  5. मुनाफ़िक़ों का ख़तरा और यहूदियों के साथ उनका सहयोग।
हवाला

مسند أحمد (4/ 88) (2212). النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 972،978،702،1017،305).

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{क्या तुम हाजियों को पानी पिलाने और सम्मानित मस्जिद की सेवा को, उसके (ईमान के) बराबर समझते हो, जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया।} [सूरा तौबा : 19] आयत के अंत तक।

عَنِ النُّعْمَانِ بْنِ بَشِيرٍ رَضيَ اللهُ عنهُما قَالَ: كُنْتُ عِنْدَ مِنْبَرِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ، فَقَالَ رَجُلٌ: مَا أُبَالِي أَلَّا أَعْمَلَ عَمَلًا بَعْدَ الإِسْلَامِ إِلَّا أَنْ أُسْقِيَ الحَاجَّ، وَقَالَ آخَرُ: مَا أُبَالِي أَلَّا أَعْمَلَ عَمَلًا بَعْدَ الإِسْلَامِ إِلَّا أَنْ أَعْمُرَ المَسْجِدَ الحَرَامَ، وَقَالَ آخَرُ: الجِهَادُ فِي سَبِيلِ اللهِ أَفْضَلُ مِمَّا قُلْتُمْ، فَزَجَرَهُمْ عُمَرُ، وَقَالَ: لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ عِنْدَ مِنْبَرِ رَسُولِ اللهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ وَهُوَ يَوْمُ الجُمُعَةِ، وَلَكِنْ إِذَا صَلَّيْتُ الجُمُعَةَ دَخَلْتُ فَاسْتَفْتَيْتُهُ فِيمَا اخْتَلَفْتُمْ فِيهِ، فَأَنْزَلَ اللهُ عَزَّ وَجَلَّ: {أَجَعَلْتُمْ سِقَايَةَ الْحَاجِّ وَعِمَارَةَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ كَمَنْ آمَنَ بِاللهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ} [التوبة: 19] الآيَةَ إِلَى آخِرِهَا.
नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है, वह कहते हैं : मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास था, तो एक व्यक्ति ने कहा : मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं इस्लाम के बाद हाजियों को पानी पिलाने के सिवा कोई और काम न करूँ। और दूसरे ने कहा : मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं इस्लाम के बाद सम्मानित मस्जिद (काबा) की सेवा करने के सिवा कोई और काम न करूँ। जबकि एक अन्य व्यक्ति ने कहा : अल्लाह की राह में जिहाद करना तुम दोनों की कही हुई बातों से उत्तम है। तो उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उन्हें डाँटा और कहा : रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास अपनी आवाज़ें ऊँची न करो। दरअसल वह जुमे का दिन था। लेकिन जब मैं जुमे की नमाज़ पढ़ लूँगा, तो (अंदर जाकर) आपसे उस बात के बारे में पूछूँगा जिसमें तुम लोगों ने मतभेद किया है। चुनांचे इसी संदर्भ में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने यह आयत उतारी : {क्या तुम हाजियों को पानी पिलाने और सम्मानित मस्जिद की सेवा को, उसके (ईमान के) बराबर समझते हो, जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया।} [सूरा तौबा : 19] आयत के अंत तक।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

नौमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने वर्णन किया है कि वह नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास बैठे हुए थे कि एक आदमी को कहते हुए सुना : मुझे कोई परवाह नहीं कि मैं इस्लाम लाने के बाद हाजियों को पानी पिलाने के सिवा कोई और अमल न करूँ। एक दूसरे व्यक्ति ने कहा : मुझे इसकी कोई परवाह नहीं कि इस्लाम लाने के बाद मैं कोई और काम न करूँ, सिवाय इसके कि मैं मस्जिद-ए-हराम को आबाद रखूँ। एक तीसरे व्यक्ति ने कहा : अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना तुम दोनों की कही हुई बातों से उत्तम है। अतः उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु ने उन्हें नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मिंबर के पास आवाज़ बुलंद करने पर डाँटा। यह जुमा के दिन की सुबह थी। उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : लेकिन जब मैं जुमा की नमाज़ पढ़ लूँगा तो अंदर जाकर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से उस बारे में पूछ लूँगा जिसमें तुम लोगों का इख़्तिलाफ़ है। चुनांचे इसी संदर्भ में सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : {क्या तुम हाजियों को पानी पिलाने और सम्मानित मस्जिद (काबा) की सेवा को, उसके (ईमान के) बराबर समझते हो, जो अल्लाह और अन्तिम दिन पर ईमान लाया तथा अल्लाह की राह में जिहाद किया? अल्लाह के समीप दोनों बराबर नहीं हैं तथा अल्लाह अत्याचारियों को सुपथ नहीं दिखाता।} [सूरा तौबा : 19]

फ़ायदे
  1. कार्यों के अज्र और सवाब में भिन्नता पाई जाती है।
  2. कर्मों की श्रेष्ठता में भिन्नता शरीयत के बयान के अनुसार पाई जाती है, लोगों के व्यक्तिगत विचारों के अनुसार नहीं।
  3. अल्लाह तथा आख़िरत के दिन पर ईमान की शर्त के साथ अल्लाह के मार्ग में जिहाद की फ़ज़ीलत।
  4. नववी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि जुमा के दिन और दूसरे दिनों में मस्जिदों में आवाज़ बुलंद नहीं करनी चाहिए, और जब लोग नमाज़ के लिए एकत्र हों, तो ज्ञान या किसी और कारण से भी आवाज़ बुलंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे नमाज़ पढ़ने वालों और ज़िक्र करने वालों को परेशानी होती है।
हवाला

صحيح مسلم (3/ 1499) (1879). المفهم لما أشكل من تلخيص كتاب مسلم (3/ 720). البحر المحيط الثجاج في شرح صحيح الإمام مسلم بن الحجاج (32/ 395). النهاية في غريب الحديث والأثر (ص 897).

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अगर कोई व्यक्ति (यमन के) अदन (नगर) में रहकर भी इसमें किसी अधर्म का इरादा करेगा, उसे अल्लाह कष्टदायक अज़ाब चखाएगा।

عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ رَفَعَهُ: فِي قَوْلِ اللَّهِ عَزَّ وَجَلَّ: {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} [الحج: 25] قَالَ: «لَوْ أَنَّ رَجُلًا هَمَّ فِيهِ بِإِلْحَادٍ وَهُوَ بِعَدَنِ أَبْيَنَ لَأَذَاقَهُ اللَّهُ عَذَابًا أَلِيمًا».
अब्दुल्लाह बिन मसऊद -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हवाले से अल्लाह के इस कथन के बारे में कहते हैं : (तथा जो उसमें अत्याचार से अधर्म का विचार करेगा, हम उसे दुःखदायी यातना चखायेंगे।) [सूरा हज्ज : 25] फ़रमाया : "अगर कोई व्यक्ति (यमन के) अदन (नगर) में रहकर भी इसमें किसी अधर्म का इरादा करेगा, उसे अल्लाह कष्टदायक अज़ाब चखाएगा।"
इसे अह़मद और ह़ाकिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु ने सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के कथन : {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} [सूरा हज्ज : 25] के बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बारे में नक़ल किया है कि आपने कहा है : अगर किसी व्यक्ति ने हरम-ए-मक्का के अंदर कोई ऐसी बात कहने या ऐसा काम करने का इरादा किया, जिससे अल्लाह की हराम की हुई चीज़ हलाल होती है और जानता भी हो कि यह अत्याचार है, तो वह इस बात का हक़दार बन जाता है कि अल्लाह इसके कारण उसे कष्टदायी अज़ाब दे। चाहे उसने यह इरादा यमन के अदन शहर में रहकर ही क्यों न किया हो। वह यह काम न भी कर सके, तो उसका इरादा कर लेना मात्र ही गुनाहगार होने के लिए काफ़ी है।

फ़ायदे
  1. हरम की विशेषता एवं सम्मान का बयान।
  2. सादी कहते हैं : इस हदीस से मालूम होता है कि हरम का सम्मान करने की ज़रूरत बताई गई है तथा उसमें गुनाह के काम का इरादा करने तथा गुनाह के काम करने से सावधान किया गया है।
  3. ज़ह्हाक कहते हैं : किसी-किसी दूसरी जगह रहकर भी मक्का में गुनाह का काम करने का इरादा करे और गुनाह का काम न भी कर सके, तब भी उसके लिए गुनाह लिख दिया जाता है।
हवाला

مسند أحمد (7/ 155) (4071). المستدرك على الصحيحين للحاكم (2/ 420) (3461). إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري (10/ 52). جامع العلوم والحكم (2/ 327). النهاية في غريب الحديث والأثر ( ص 829،1012، 597).

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सुन लो! शराब हराम कर दी गई है।

عَنْ أَنَسٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ قَالَ: كُنْتُ سَاقِيَ القَوْمِ فِي مَنْزِلِ أَبِي طَلْحَةَ، وَكَانَ خَمْرُهُمْ يَوْمَئِذٍ الفَضِيخَ، فَأَمَرَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ مُنَادِيًا يُنَادِي: أَلاَ إِنَّ الخَمْرَ قَدْ حُرِّمَتْ، قَالَ: فَقَالَ لِي أَبُو طَلْحَةَ: اخْرُجْ، فَأَهْرِقْهَا، فَخَرَجْتُ فَهَرَقْتُهَا، فَجَرَتْ فِي سِكَكِ المَدِينَةِ، فَقَالَ بَعْضُ القَوْمِ: قَدْ قُتِلَ قَوْمٌ وَهِيَ فِي بُطُونِهِمْ، فَأَنْزَلَ اللَّهُ: {لَيْسَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ جُنَاحٌ فِيمَا طَعِمُوا} [المائدة: 93] الآيَةَ.
अनस रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं अबू तलहा के घर में लोगों को शराब पिला रहा था और उन दिनों उनकी शराब फ़ज़ीख़ नामी शराब हुआ करती थी, कि इसी बीच अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने एक व्यक्ति को यह आवाज़ लगाने का आदेश दिया : सुन लो! शराब हराम कर दी गई है। उनका कहना है कि (यह आवाज़ सुनते ही) अबू तलहा ने मुझसे कहा : बाहर जाओ और इसे बहा दो। चुनांचे मैं बाहर गया और उसे बहा दिया। देखते ही देखते मदीने की गलियों से शराब बहने लगी। ऐसे में किसी ने कहा : कुछ लोग क़त्ल कर दिए गए और उनके पेट में शराब मौजूद थी। चुनांचे अल्लाह ने यह आयत उतारी : (ईमान लाने और अच्छे अमल करने वालों पर उन चीज़ों का कोई गुनाह नहीं है, जो वे खा चुके।) [अल-माइदा : 93]
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैदर्जास़ह़ीह़
तशरीह

अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि वह अपनी माता के पति अबू तलहा के घर में उपस्थित लोगों को शराब पिला रहे थे और उस दिन लोग पकी हुई एवं अधपकी खजूरों से बनी शराब पी रहे थे कि इसी बीच अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर से भेजे हुए एक व्यक्ति ने ऐलान कर दिया : सुन लो! शराब हराम कर दी गई है, उनका कहना है कि ऐलान सुनने के बाद अबू तलहा ने मुझसे कहा : बाहर जाओ और शराब को बहा दो। चुनांचे मैं बाहर गया और उसे बहा दिया। फिर देखते ही देखते मदीने की गलियों में शराब बहने लगी। ऐसे में किसी ने कहा : कुछ सहाबा शराब हराम होने से पहले इस अवस्था में मार दिए गए कि उनके पेट में शराब मौजूद थी। चुनांचे अल्लाह ने यह आयत उतारी : {ईमान लाने और अच्छे अमल करने वालों पर उन चीज़ों का कोई गुनाह नहीं है, जो वे खा चुके।} [अल-माइदा : 93] यानी ईमान वालों ने शराब का निषेध उतरने से पहले जो कुछ खाया और पिया, उन्हें उसका गुनाह नहीं होगा।

फ़ायदे
  1. अबू तलहा और सहाबा रज़ियल्लाहु अनहुम की यह खूबी है कि उन्होंने बिना किसी संकोच के अल्लाह के आदेश को तुरंत मान लिया। यही एक सच्चे मुसलमान का कर्तव्य है।
  2. ख़म्र : एक सारगर्भित शब्द जिसके दायरे में सारे नशीले पदार्थ आ जाते हैं।
  3. फ़ज़ीख़ : पकी एवं अधपकी खजूरों से आग में पकाए बिना बनने वाली शराब। बुस्र : अधपकी खजूर।
  4. इब्न-ए-हजर कहते हैं : मुहल्लब ने कहा है : शराब को रास्ते में इसलिए बहा दिया गया, ताकि उसे ठुकरा देने और छोड़ देने की बात हर तरफ़ फैल जाए। वैसे, सड़क पर शराब डालने से लोगों को कष्ट हो सकता है, लेकिन ऊपर बताई गई मसलहत इस कष्ट से कहीं अधिक महत्वूर्ण है।
  5. बंदों पर अल्लाह के अनुग्रह का बयान और यह कि आदेश उतरने से पहले किए गए किसी कार्य की पकड़ नहीं होगी।
  6. अल्लाह ने शराब को इसलिए हराम कर दिया है कि इससे विवेक एवं धन को होने वाली क्षति के कारण कई बुराइयाँ सामने आती हैं और विवेक छिन जाने के कारण इन्सान शराब पीकर बहुत-से गुनाह के काम करने लगता है।
हवाला

صحيح البخاري (3/ 132) (2464). صحيح مسلم (3/ 1570) (1980). النهاية في غريب الحديث والأثر (709) (1006). فتح الباري لابن حجر (1/ 133). إرشاد الساري لشرح صحيح البخاري (4/ 267).

यह हदीस HadeethEnc.com पर

यहाँ हर हदीस, दर्जा, तशरीह और फ़ायदा ठीक वैसे ही दिखाया गया है जैसे HadeethEnc.com उसे शाया करता है, दोबारा इशाअत की उसकी शर्तों के तहत। दर्जे के साथ हुक्म लगाने वाले का नाम दर्ज नहीं है। तर्जुमे और तशरीहें उसके मुसन्निफ़ों की अपनी हैं, और कुछ में अहकाम बयान हुए हैं; सबील के जाँचने वालों ने इन्हें नहीं परखा है। अरबी हदीस ही असल टेक्स्ट है। स्रोत: HadeethEnc.com