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सहीह बुख़ारी

नंबर 565

नंबर 565किताब 9, नंबर 42
حَدَّثَنَا مُسْلِمُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ، قَالَ حَدَّثَنَا شُعْبَةُ، عَنْ سَعْدِ بْنِ إِبْرَاهِيمَ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو ـ هُوَ ابْنُ الْحَسَنِ بْنِ عَلِيٍّ ـ قَالَ سَأَلْنَا جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ عَنْ صَلاَةِ النَّبِيِّ، صلى الله عليه وسلم فَقَالَ كَانَ يُصَلِّي الظُّهْرَ بِالْهَاجِرَةِ، وَالْعَصْرَ وَالشَّمْسُ حَيَّةٌ، وَالْمَغْرِبَ إِذَا وَجَبَتْ، وَالْعِشَاءَ إِذَا كَثُرَ النَّاسُ عَجَّلَ، وَإِذَا قَلُّوا أَخَّرَ، وَالصُّبْحَ بِغَلَسٍ‏.‏
Narrated Muhammad bin `Amr:We asked Jabir bin `Abdullah about the prayers of the Prophet (ﷺ) . He said, "He used to pray Zuhr prayer at midday, the `Asr when the sun was still hot, and the Maghrib after sunset (at its stated time). The `Isha was offered early if the people gathered, and used to be delayed if their number was less; and the morning prayer was offered when it was still dark

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 9 · Times of the Prayers

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।