حَدَّثَنَا أَبُو مَعْمَرٍ ـ هُوَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عَمْرٍو ـ قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْوَارِثِ، عَنِ الْحُسَيْنِ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بُرَيْدَةَ، قَالَ حَدَّثَنِي عَبْدُ اللَّهِ الْمُزَنِيُّ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَالَ " لاَ تَغْلِبَنَّكُمُ الأَعْرَابُ عَلَى اسْمِ صَلاَتِكُمُ الْمَغْرِبِ ". قَالَ الأَعْرَابُ وَتَقُولُ هِيَ الْعِشَاءُ.
Narrated `Abdullah Al-Muzani:The Prophet (ﷺ) said, "Do not be influenced by bedouins regarding the name of your Maghrib prayer which is called `Isha' by them
स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।