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सहीह बुख़ारी

नंबर 546

नंबर 546किताब 9, नंबर 23
حَدَّثَنَا أَبُو نُعَيْمٍ، قَالَ أَخْبَرَنَا ابْنُ عُيَيْنَةَ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، عَنْ عُرْوَةَ، عَنْ عَائِشَةَ، قَالَتْ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي صَلاَةَ الْعَصْرِ وَالشَّمْسُ طَالِعَةٌ فِي حُجْرَتِي لَمْ يَظْهَرِ الْفَىْءُ بَعْدُ‏.‏ وَقَالَ مَالِكٌ وَيَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ وَشُعَيْبٌ وَابْنُ أَبِي حَفْصَةَ وَالشَّمْسُ قَبْلَ أَنْ تَظْهَرَ‏.‏
Narrated Aisha:The Prophet (ﷺ) used to pray the `Asr prayers at a time when the sunshine was still inside my chamber and no shadow had yet appeared in it

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 9 · Times of the Prayers

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।