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सहीह बुख़ारी

नंबर 6399

नंबर 6399किताब 80, नंबर 94
حَدَّثَنَا مُحَمَّدُ بْنُ الْمُثَنَّى، حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ عَبْدِ الْمَجِيدِ، حَدَّثَنَا إِسْرَائِيلُ، حَدَّثَنَا أَبُو إِسْحَاقَ، عَنْ أَبِي بَكْرِ بْنِ أَبِي مُوسَى، وَأَبِي، بُرْدَةَ ـ أَحْسِبُهُ ـ عَنْ أَبِي مُوسَى الأَشْعَرِيِّ، عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ كَانَ يَدْعُو ‏ "‏ اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي خَطِيئَتِي وَجَهْلِي وَإِسْرَافِي فِي أَمْرِي، وَمَا أَنْتَ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، اللَّهُمَّ اغْفِرْ لِي هَزْلِي وَجِدِّي وَخَطَاىَ وَعَمْدِي، وَكُلُّ ذَلِكَ عِنْدِي ‏"‏‏.‏
Narrated Abu Musa Al-Ash`ari:The Prophet (ﷺ) used to invoke Allah, saying, "Allahumma ighfirli khati'ati wa jahli wa israfi fi `Amri, wa ma anta a-'lamu bihi minni. Allahumma ighfirli hazali wa jiddi wa khata'i wa amdi, wa kullu dhalika 'indi

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 80 · Invocations

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।