حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ بُكَيْرٍ، حَدَّثَنَا اللَّيْثُ، عَنْ عُقَيْلٍ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ، عَنْ عُبَيْدِ اللَّهِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عَبَّاسٍ ـ رضى الله عنهما ـ عَنْ أُمِّ الْفَضْلِ بِنْتِ الْحَارِثِ، قَالَتْ سَمِعْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقْرَأُ فِي الْمَغْرِبِ بِ ـ {الْمُرْسَلاَتِ عُرْفًا} ثُمَّ مَا صَلَّى لَنَا بَعْدَهَا حَتَّى قَبَضَهُ اللَّهُ.
Narrated Um Al-Fadl bint Al-Harith:I heard the Prophet (ﷺ) reciting Surat-al-Mursalat `Urfan (77) in the Maghrib prayer, and after that prayer he did not lead us in any prayer till he died
स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।