حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ بُكَيْرٍ، حَدَّثَنَا مَالِكٌ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ ـ رضى الله عنهما ـ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأَصْحَابِ الْحِجْرِ " لاَ تَدْخُلُوا عَلَى هَؤُلاَءِ الْمُعَذَّبِينَ إِلاَّ أَنْ تَكُونُوا بَاكِينَ، أَنْ يُصِيبَكُمْ مِثْلُ مَا أَصَابَهُمْ ".
Narrated Ibn `Umar:Allah's Messenger (ﷺ) said to his companions who were at Al-Hijr, "Do not enter upon these people who are being punished, except in a weeping state, lest the same calamity as of theirs should befall you
स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।