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सहीह बुख़ारी

नंबर 3387

नंबर 3387किताब 60, नंबर 61
حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ مُحَمَّدِ بْنِ أَسْمَاءَ ابْنِ أَخِي جُوَيْرِيَةَ حَدَّثَنَا جُوَيْرِيَةُ بْنُ أَسْمَاءَ، عَنْ مَالِكٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، أَنَّ سَعِيدَ بْنَ الْمُسَيَّبِ، وَأَبَا، عُبَيْدٍ أَخْبَرَاهُ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ـ رضى الله عنه ـ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم ‏ "‏ يَرْحَمُ اللَّهُ لُوطًا، لَقَدْ كَانَ يَأْوِي إِلَى رُكْنٍ شَدِيدٍ، وَلَوْ لَبِثْتُ فِي السِّجْنِ مَا لَبِثَ يُوسُفُ ثُمَّ أَتَانِي الدَّاعِي لأَجَبْتُهُ ‏"‏‏.‏
Narrated Abu Huraira:Allah's Messenger (ﷺ) said, "May Allah bestow His Mercy on Lot. He wanted to have a powerful support. If I were to stay in prison (for a period equal to) the stay of Joseph (in prison) and then the offer of freedom came to me, then I would have accepted it." (See Hadith No)

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 60 · Prophets

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।