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सहीह बुख़ारी

नंबर 3037

नंबर 3037किताब 56, नंबर 243
حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ عَبْدِ اللَّهِ، حَدَّثَنَا سُفْيَانُ، حَدَّثَنَا أَبُو حَازِمٍ، قَالَ سَأَلُوا سَهْلَ بْنَ سَعْدٍ السَّاعِدِيَّ ـ رضى الله عنه ـ بِأَىِّ شَىْءٍ دُووِيَ جُرْحُ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ مَا بَقِيَ مِنَ النَّاسِ أَحَدٌ أَعْلَمُ بِهِ مِنِّي، كَانَ عَلِيٌّ يَجِيءُ بِالْمَاءِ فِي تُرْسِهِ، وَكَانَتْ ـ يَعْنِي فَاطِمَةَ ـ تَغْسِلُ الدَّمَ عَنْ وَجْهِهِ، وَأُخِذَ حَصِيرٌ فَأُحْرِقَ، ثُمَّ حُشِيَ بِهِ جُرْحُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم‏.‏
Narrated Abu Hazim:The people asked Sahl bin Sa`d As-Sa' idi "With what thing (medicine) was the wound of Allah's Apostle treated?" He replied, "There is none left (living) amongst the people who knows it better than me. `Ali used to bring water in his shield and Fatima (i.e. the Prophet's daughter) used to wash the blood off his face. Then a mat (of palm leaves) was burnt and its ash was inserted in the wound of Allah's Apostle

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 56 · Fighting for the Cause of Allah (Jihaad)

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।