अबू मसऊद अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है, उन्होंने फ़रमाया कि एक आदमी ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अर्ज़ किया : ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ! मेरे लिए नमाज़ जमाअत से पढ़ना मुश्किल हो गया है, क्योंकि फलां आदमी नमाज़ बहुत लम्बी पढ़ाते हैं । अबू मसऊद अन्सारी रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नसीहत के वक़्त उस दिन से ज़्यादा कभी गुस्से में नहीं देखा । आपने फ़रमाया : “लोगो ! तुम दीन से नफ़रत दिलाने वाले हो । देखो जो कोई लोगों को नमाज़ पढ़ाये उसे चाहिए कि हल्की नमाज़ पढ़ाये, क्योंकि पीछे नमाज़ पढ़ने वालों में बीमार, कमज़ोर और ज़रूरतमन्द भी होते हैं ।”
जहाँ तर्जुमा शुदा नबवी हदीसों के इनसाइक्लोपीडिया (HadeethEnc.com) में किसी रिवायत का हूबहू टेक्स्ट मौजूद है, वहाँ उसका तर्जुमा उसी रिवायत के नीचे स्रोत के नाम के साथ दिखाया गया है। दोनों को प्रोग्राम के ज़रिए, सिर्फ़ अरबी टेक्स्ट की बुनियाद पर जोड़ा गया है: इनसाइक्लोपीडिया की हदीस का पूरा टेक्स्ट, उसमें दर्ज सहाबी के नाम समेत, रिवायत का आख़िरी हिस्सा है, हर्फ़-ब-हर्फ़। इस जोड़ को किसी ने नहीं जाँचा है, और सबील के जायज़ाकारों ने तर्जुमे की जाँच नहीं की है। असल टेक्स्ट अरबी है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।