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सहीह बुख़ारी

नंबर 1193

नंबर 1193किताब 20, नंबर 5
حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ، حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُسْلِمٍ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ دِينَارٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ ـ رضى الله عنهما ـ قَالَ كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم يَأْتِي مَسْجِدَ قُبَاءٍ كُلَّ سَبْتٍ مَاشِيًا وَرَاكِبًا‏.‏ وَكَانَ عَبْدُ اللَّهِ ـ رضى الله عنهما ـ يَفْعَلُهُ‏.‏
Narrated `Abdullah bin Dinar:Ibn `Umar said, "The Prophet (ﷺ) used to go to the Mosque of Quba every Saturday (sometimes) walking and (sometimes) riding." `Abdullah (Ibn `Umar) used to do the same

स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 20 · Virtues of Prayer at Masjid Makkah and Madinah

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।