حَدَّثَنَا مُوسَى، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ الْعَزِيزِ بْنُ مُسْلِمٍ، قَالَ حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ دِينَارٍ، قَالَ كَانَ عَبْدُ اللَّهِ بْنُ عُمَرَ ـ رضى الله عنهما ـ يُصَلِّي فِي السَّفَرِ عَلَى رَاحِلَتِهِ، أَيْنَمَا تَوَجَّهَتْ يُومِئُ. وَذَكَرَ عَبْدُ اللَّهِ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَفْعَلُهُ.
Narrated `Abdullah bin Dinar:On traveling, `Abdullah bin `Umar used to offer the prayer on his Mount by signs whatever direction it took. `Abdullah said that the Prophet (ﷺ) used to do so
स्रोत में इस रिवायत का कोई दर्जा दर्ज नहीं है।
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।