حَدَّثَنَا قُتَيْبَةُ بْنُ سَعِيدٍ، عَنِ اللَّيْثِ، عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَبْدِ الرَّحْمَنِ، - يَعْنِي ابْنَ غَنَجٍ - عَنْ نَافِعٍ، عَنِ ابْنِ عُمَرَ، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم دَفَعَ إِلَى يَهُودِ خَيْبَرَ نَخْلَ خَيْبَرَ وَأَرْضَهَا عَلَى أَنْ يَعْتَمِلُوهَا مِنْ أَمْوَالِهِمْ وَأَنَّ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم شَطْرَ ثَمَرَتِهَا .
Narrated Ibn 'Umar:The Prophet (ﷺ) handed over the Jews of Khaibar the palm trees and the land of Khaibar on condition that they should employ what belonged to them in working on them, and that he should have half of the fruits
स्रोत में दर्ज दर्जे
SahihAl-Albani
SahihMuhammad Muhyi Al-Din Abdul Hamid
Sahih Muslim (1551)Zubair Ali Zai
हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।
अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।