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सुनन अबू दाऊद

नंबर 1927

नंबर 1927किताब 11, नंबर 207
حَدَّثَنَا أَحْمَدُ بْنُ حَنْبَلٍ، حَدَّثَنَا حَمَّادُ بْنُ خَالِدٍ، عَنِ ابْنِ أَبِي ذِئْبٍ، عَنِ الزُّهْرِيِّ، بِإِسْنَادِهِ وَمَعْنَاهُ وَقَالَ بِإِقَامَةٍ إِقَامَةٍ جَمَعَ بَيْنَهُمَا ‏.‏ قَالَ أَحْمَدُ قَالَ وَكِيعٌ صَلَّى كُلَّ صَلاَةٍ بِإِقَامَةٍ ‏.‏
The aforesaid tradition has been transmitted by Al Zuhri through a different chain of narrators. This version adds “Each prayer with an iqamah”. Ahmad reported on the authority of Waki’ “he offered each prayer with a single iqamah.”
स्रोत में दर्ज दर्जे
  • SahihAl-Albani
  • SahihMuhammad Muhyi Al-Din Abdul Hamid
  • SahihShuaib Al Arnaut
  • Sahih Bukhari (1673)Zubair Ali Zai

हर रिवायत के नीचे डेटासेट का अपना तर्जुमा है, जैसा है वैसा ही दिखाया गया है। इसमें तर्जुमा करने वाले का नाम नहीं है, इसके हुक़ूक़ की तस्दीक़ नहीं हुई है, और किसी ने इसे अरबी से मिलाकर नहीं जाँचा है; कुछ रिवायतों का तर्जुमा है ही नहीं। असल टेक्स्ट अरबी है। डेटासेट में इस किताब का इस भाषा में कोई तर्जुमा नहीं है, इसलिए अंग्रेज़ी दिखाई जा रही है।

किताब 11 · The Rites of Hajj (Kitab Al-Manasik Wa'l-Hajj)

अरबी टेक्स्ट, नंबरिंग, किताबों के नाम और दर्जे ठीक वैसे ही दिखाए गए हैं जैसे वे एक खुले डेटासेट (hadith-api) में हैं। सबील ने अभी न उसके सही होने की तस्दीक़ की है, न उसके हुक़ूक़ की, और उसकी इल्मी जाँच अभी शुरू नहीं हुई है। तब तक किसी रिवायत पर भरोसा करने से पहले उसे किसी छपे हुए एडिशन से मिला लें।