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Tafsīr aṭ-Ṭabarī · Ibrahim
सूरह 14

Ibrahim

جامع البيان في تأويل آي القرآن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 8

وَقَالَ مُوسَىٰٓ إِن تَكْفُرُوٓا۟ أَنتُمْ وَمَن فِى ٱلْأَرْضِ جَمِيعًا فَإِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِىٌّ حَمِيدٌ 8

القول في تأويل قوله تعالى: ﴿وَقَالَ مُوسَى إِنْ تَكْفُرُوا أَنْتُمْ وَمَنْ فِي الأرْضِ جَمِيعًا فَإِنَّ اللَّهَ لَغَنِيٌّ حَمِيدٌ (٨) ﴾

قال أبو جعفر: يقول تعالى ذكره: وقال موسى لقومه: إن تكفروا، أيها القوم، فتجحدوا نعمةَ الله التي أنعمها عليكم، أنتم = ويفعل في ذلك مثل فعلكم مَنْ في الأرض جميعًا = ﴿فإن الله لغني﴾ عنكم وعنهم من جميع خلقه، لا حاجة به إلى شكركم إياه على نعمه عند جميعكم [[انظر تفسير " الغني " فيما سلف ١٥: ١٤٥، تعليق: ٢، والمراجع هناك.]] ﴿حميد﴾ ، ذُو حمد إلى خلقه بما أنعم به عليهم، [[انظر تفسير " الحميد "، فيما سلف قريبًا: ٥١٢، تعليق: ١، والمراجع هناك.]] كما: -

٢٠٥٨٩- حدثني المثنى قال، حدثنا إسحاق قال، حدثنا عبد الله بن هاشم قال، أخبرنا سيف، عن أبي روق، عن أبي أيوب، عن علي: ﴿فإن الله لغني﴾ ، قال: غني عن خلقه = ﴿حميد﴾ ، قال: مُسْتَحْمِدٌ إليهم. [[في أساس البلاغة: " استحمد الله إلى خلقه، بإحسانه إليهم، وإنعامه عليهم "، وقد سلف " استحمد " في خبر آخر رقم: ٨٣٤٩ في الجزء ٧: ٤٧٠، وهو مما ينبغي أن يقيد على كتب اللغة الكبرى، كاللسان والتاج وأشباههما.]]