Aal-i-Imraan
تيسير الكريم الرحمنयह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।
पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया
قُلْ إِن كُنتُمْ تُحِبُّونَ ٱللَّهَ فَٱتَّبِعُونِى يُحْبِبْكُمُ ٱللَّهُ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ذُنُوبَكُمْ ۗ وَٱللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ 31 قُلْ أَطِيعُوا۟ ٱللَّهَ وَٱلرَّسُولَ ۖ فَإِن تَوَلَّوْا۟ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يُحِبُّ ٱلْكَـٰفِرِينَ 32
{31 ـ 32} هذه الآية هي الميزان التي يُعرَف بها من أحب الله حقيقة ومن ادعى ذلك دعوى مجردة؛ فعلامة محبة الله اتباع محمد - صلى الله عليه وسلم - الذي جعل متابعته وجميع ما يدعو إليه طريقاً إلى محبته ورضوانه فلا تُنال محبة الله ورضوانه وثوابه إلا بتصديق ما جاء به الرسول من الكتاب والسنة وامتثال أمرهما واجتناب نهيهما، فمن فعل ذلك أحبه الله وجازاه جزاء المحبين، وغفر له ذنوبه وستر عليه عيوبه، فكأنه قيل: ومع ذلك فما حقيقة اتباع الرسول وصفتها؟ فأجاب بقوله:{قل أطيعوا الله والرسول}؛ بامتثال الأمر واجتناب النهي وتصديق الخبر {فإن تولوا}؛ عن ذلك؛ فهذا هو الكفر والله {لا يحب الكافرين}.