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Tafsīr as-Saʿdī · Al-Anbiyaa
सूरह 21

Al-Anbiyaa

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयतें 74–75

وَلُوطًا ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَنَجَّيْنَـٰهُ مِنَ ٱلْقَرْيَةِ ٱلَّتِى كَانَت تَّعْمَلُ ٱلْخَبَـٰٓئِثَ ۗ إِنَّهُمْ كَانُوا۟ قَوْمَ سَوْءٍ فَـٰسِقِينَ 74 وَأَدْخَلْنَـٰهُ فِى رَحْمَتِنَآ ۖ إِنَّهُۥ مِنَ ٱلصَّـٰلِحِينَ 75

{74} هذا ثناءٌ من الله على رسوله لوطٍ عليه السلام بالعلم الشرعيِّ والحكم بين الناس بالصواب والسَّداد، وأنَّ الله أرسله إلى قومه يَدْعوهم إلى عبادة الله وينهاهم عما هم عليه من الفواحش، فَلَبِثَ يدعوهم، فلم يستجيبوا له، فَقَلَبَ الله عليهم ديارَهم، وعذَّبهم عن آخرهم؛ لأنَّهم {كانوا قَوۡمَ سَوۡءٍ فاسقينَ}: كذَّبوا الدَّاعي وتوعَّدوه بالإخراج، ونجَّى الله لوطاً وأهله، فأمره أن يَسْرِيَ بهم ليلاً ليبعدوا عن القرية، فَسَرَوْا ونَجَوْا من فضل الله عليهم ومنته.

{75}{وأدخَلۡناه في رحمتِنا}: التي مَنْ دَخَلَها كان من الآمنين من جميع المخاوف، النائلين كلَّ خير وسعادة وبرٍّ وسرور وثناءٍ، وذلك لأنَّه من الصالحين، الذين صَلَحَتْ أعمالهم، وزَكَتْ أحوالُهم، وأصلح الله فاسدَهم، والصلاحُ هو السبب لدخول العبدِ برحمةِ الله؛ كما أنَّ الفساد سببٌ لحرمانه الرحمة والخير، وأعظمُ الناس صلاحاً الأنبياءُ عليهم السلام، ولهذا يَصِفُهم بالصَّلاح، وقال سليمان عليه السلام:{وأدۡخِلۡني برحمتِكَ في عبادِكَ الصَّالحين}.