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Tafsīr as-Saʿdī · Al-Anbiyaa
सूरह 21

Al-Anbiyaa

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयतें 45–46

قُلْ إِنَّمَآ أُنذِرُكُم بِٱلْوَحْىِ ۚ وَلَا يَسْمَعُ ٱلصُّمُّ ٱلدُّعَآءَ إِذَا مَا يُنذَرُونَ 45 وَلَئِن مَّسَّتْهُمْ نَفْحَةٌ مِّنْ عَذَابِ رَبِّكَ لَيَقُولُنَّ يَـٰوَيْلَنَآ إِنَّا كُنَّا ظَـٰلِمِينَ 46

{45} أي: {قلۡ}: يا محمدُ للناس كلِّهم: {إنَّما أنذِرُكم بالوَحۡي}؛ أي: إنما أنا رسولٌ، لا آتيكم بشيء من عندي، ولا عندي خزائنُ الله، ولا أعلم الغيبَ، ولا أقولُ إنِّي مَلَكٌ، وإنما أنذركم بما أوحاه الله لي؛ فإنِ استجَبْتُم فقد استجبتم لله، وسَيُثيبكم على ذلك، وإن أعرضتُم وعارضتم؛ فليس بيدي من الأمر شيء، وإنَّما الأمر لله، والتقدير كلُّه لله. {ولا يسمعُ الصمُّ الدُّعاء}؛ أي: الأصم لا يسمع صوتاً؛ لأنَّ سمعه قد فَسَدَ وتعطَّل، وشرط السماع مع الصوت أن يوجَدَ محلٌّ قابلٌ لذلك. كذلك الوحي سببٌ لحياة القلوب والأرواح وللفقهِ عن الله، ولكنْ إذا كان القلبُ غير قابل لسماع الهُدى؛ كان بالنسبة للهدى والإيمان بمنزلةِ الأصمِّ بالنسبة إلى الأصوات؛ فهؤلاء المشركون صمٌّ عن الهدى؛ فلا يُسْتَغْرَبُ عدم اهتدائهم، خصوصاً في هذه الحالة التي لم يأتِهِمُ العذابُ، ولا مسَّهم ألمه.

{46} فلو مسَّهم {نفحةٌ من عذاب ربِّك}؛ أي: ولو جزءٌ يسيرٌ ولا يسير من عذابِهِ؛ {لَيقولُنَّ يا ويۡلَنا إنا كنَّا ظالمينَ}؛ أي: لم يكن قولهم إلاَّ الدُّعاءَ بالويل والثُّبور والندم والاعتراف بظُلْمِهِم وكفرِهم واستحقاقِهِم العذاب.