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Tafsīr as-Saʿdī · Al-Anbiyaa
सूरह 21

Al-Anbiyaa

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 30

أَوَلَمْ يَرَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَنَّ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ كَانَتَا رَتْقًا فَفَتَقْنَـٰهُمَا ۖ وَجَعَلْنَا مِنَ ٱلْمَآءِ كُلَّ شَىْءٍ حَىٍّ ۖ أَفَلَا يُؤْمِنُونَ 30

{30} أي: أولم ينظُر هؤلاء الذين كفروا بربِّهم، وجَحَدوا الإخلاص له في العبوديَّة ما يدلُّهم دلالةَ مشاهدةٍ على أنه الربُّ المحمود الكريم المعبود، فيشاهدون السماء والأرض، فيجدونهما {رتقاً}؛ هذه ليس فيها سحابٌ ولا مطرٌ، وهذه هامدةٌ ميتةٌ لا نبات فيها، {ففتقناهما}؛ السماء بالمطر، والأرض بالنبات. أليس الذي أوجَدَ في السماء السحاب بعد أن كان الجوُّ صافياً لا قَزَعَةَ فيه، وأودَعَ فيه الماء الغزير، ثم ساقه إلى بلدٍ ميِّتٍ قد اغبرَّت أرجاؤه وقحط عنه ماؤه، فأمطره فيها، فاهتزَّت وتحرَّكت ورَبَتْ وأنبتت من كلِّ زوج بهيج مختلفِ الأنواع متعددِ المنافع؛ أليس ذلك دليلاً على أنه الحقُّ وما سواه باطلٌ، وأنَّه محيي الموتى، وأنَّه الرحمن الرحيم؟ ولهذا قال:{أفلا يؤمنون}؛ أي: إيماناً صحيحاً ما فيه شكٌ ولا شرك.

ثم عدَّد تعالى الأدلَّة الأفقيَّة، فقال: