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Tafsīr as-Saʿdī · Yunus
सूरह 10

Yunus

تيسير الكريم الرحمن

यह एक शास्त्रीय तफ़सीर का अरबी पाठ है, जैसा Quranic Universal Library (QUL, Tarteel की) में है, QUL के डेटा की उस खुली प्रति से लिया गया जो spa5k/tafsir_api रखता है। QUL यह नहीं बताती कि वह किस छपे संस्करण का अनुसरण करती है और पाठों के लिए कोई लाइसेंस नहीं बताती, इसलिए उन्हें दिखाने का अधिकार सत्यापित नहीं है। किसी ने इसे छपी किताब या पांडुलिपि से नहीं मिलाया है और किसी आलिम ने इसकी समीक्षा नहीं की है। हर अंश उन आयतों के पास है जिन पर वह टिप्पणी करता है; वे आयतें Tanzil का क़ुरआनी पाठ हैं, जैसा वहाँ है। जहाँ पाठ में संपादक की कोई टिप्पणी दोहरे कोष्ठक में है, वहाँ वह जैसी है वैसी दिखाई गई है। अभी कोई अनुवाद नहीं है।

पाठ का स्रोत:Quranic Universal Libraryspa5k/tafsir_apiMIT2026-10-21 को लिया गया

आयत 11

وَلَوْ يُعَجِّلُ ٱللَّهُ لِلنَّاسِ ٱلشَّرَّ ٱسْتِعْجَالَهُم بِٱلْخَيْرِ لَقُضِىَ إِلَيْهِمْ أَجَلُهُمْ ۖ فَنَذَرُ ٱلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ لِقَآءَنَا فِى طُغْيَـٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ 11

{11} وهذا من لطفه وإحسانه بعباده: أنَّه لو عجَّل لهم الشرَّ إذا أتَوْا بأسبابه وبادَرَهم بالعقوبة على ذلك كما يعجِّل لهم الخير إذا أَتَوْا بأسبابه؛ {لَقُضِيَ إليهم أجلُهم}؛ أي: لمحقتهم العقوبة، ولكنه تعالى يمهِلُهم ولا يهملهم ويعفو عن كثيرٍ من حقوقه؛ فلو يؤاخذ الله الناس بظلمهم؛ ما ترك على ظهرها من دابَّة، ويدخل في هذا أن العبد إذا غضب على أولاده أو أهله أو ماله ربَّما دعا عليهم دعوةً لو قُبِلَتْ منه؛ لهلكوا ولأضرَّه ذلك غاية الضرر، ولكنَّه تعالى حليمٌ حكيمٌ. وقوله:{فَنَذَرُ الذين لا يرجون لقاءنا}؛ أي: لا يؤمنون بالآخرة؛ فلذلك لا يستعدُّون لها ولا يعملون ما يُنجيهم من عذاب الله، {في طغيانِهِم}؛ أي: باطلهم الذي جاوزوا به الحقَّ والحدَّ {يعمهون}: يترَّددون حائرين، لا يهتدون السبيل، ولا يوفَّقون لأقوم دليل، وذلك عقوبة لهم على ظلمهم وكفرهم بآيات الله.